slide3-bg


प्रयोग, प्रक्रिया और परिणाम

संबोधि साधना


स्वयं को जानने और ऊर्जावान बनाने की सरल तकनीक संबुद्ध सद्गुरु श्री चन्द्रप्रभ जी का आध्यात्मिक मार्गदर्शन

संबोधि-साधना जीवन जीने की आध्यात्मिक कला है। संबोधि का अर्थ है : स्वयं को जानना और साधना का अर्थ है : लगातार मनोयोगपूर्वक अभ्यास करना। स्वयं को जानना और स्वयं की आध्यात्मिक शक्तियों को जागृत करना - संबोधि-साधना का यही लक्ष्य है। स्पष्ट समझ, पूर्ण सचेतनता और दृढ़ आस्था के साथ खुद में खुद को साधने और तपाने का नाम ही संबोधि-साधना है।

जैसे उत्तम संगीत के लिए वीणा के तारों को साधना होता है, वैसे ही उत्तम आत्मदशा के लिए शरीर, मन, प्राण और अतीन्द्रिय शक्ति को साधना होता है। संबोधि-साधना वीणा के तारों की तरह हमें स्वस्थ, संतुलित, ऊर्जावान और दिव्य चेतना का मालिक बनाती है।

यह साधना हमें क्रोध, चिंता और लालसाओं के मकडज़ाल से बाहर निकालती है, मन में शांति और समाधि घटित करते हुए हृदय में प्रेम, करुणा और भक्ति जैसे दिव्य गुणों का उदय करती है। संबोधि-साधना हमें मरणोपरांत मिलने वाले मोक्ष, निर्वाण या ईश्वर-प्राप्ति में विश्वास नहीं करवाती, बल्कि अपने वर्तमान जीवन में ही दिव्य शांति, आत्मज्ञान और मुक्ति के सच्चे आनंद का रसास्वादन करवाती है। यह साधना जहाँ हमें सच्चे ज्ञान और आनंद की उच्च दशा की ओर ले जाती है वहीं आध्यात्मिक शक्तियों को जागृत करते हुए हमारे तन-मन-आत्मा को दिव्यता प्रदान करती है।

इस साधना-मार्ग को जीकर आपको लगेगा - आपके लिए अमृत का द्वार खुल गया है, प्राणों में मुक्ति और आनंद का कमल खिल उठा है, आपके कदम अरिहंत, बुद्धत्व और शिवत्व की ओर बढ़ गए हैं।

संबोधि-साधना के दो भेद

संबोधि-साधना के दो भेद हैं - 1. सक्रिय साधना और 2. सचेतन साधना। सक्रिय साधना हमारे तन, मन और प्राणों को स्वस्थ, गतिशील और ऊर्जावान बनाती है वहीं सचेतन साधना हमारे लिए मानसिक शांति, आत्म-जागृति और अंतर-बोध का द्वार खोलती है। सक्रिय साधना का संबंध आंतरिक आध्यात्मिक शक्ति से है जबकि सचेतन साधना का संबंध अंतर-बोध, निर्मल स्थिति और मुक्ति से है। आम व्यक्ति सक्रिय साधना करे तो मुमुक्षु साधक सचेतन साधना। वैसे दोनों साधना एक-दूसरे की पूरक हैं। सुबह हम सक्रि य साधना कर सकते हैं तो शाम को सचेतन साधना। सुबह उगता हुआ सूरज, चहकते हुए पंछी और खिलते हुए फू ल हमें सक्रिय साधना करने की प्रेरणा देते हैं वहीं शाम को ढलता हुआ सूरज, नीड़ में लौटते हुए पंछी, घर लौटती गौएँ और बंद होते कमल हमें सचेतन साधना करने के लिए प्रेरित करते हैं। निश्चय ही हमें सूरज की रोशनी में सक्रिय साधना करनी चाहिए तो चाँद की मीठी चाँदनी में सचेतन साधना।

साधना के लिए पूर्व तैयारी


1. साधना स्वच्छ, शांत और सौम्य वातावरण में करें। साधना के लिए अलग से साधना-कक्ष या प्रकृति की गोद हो तो अति उत्तम।

2. साधना स्वयं के सुकून, कल्याण और आनंद के लिए करें, किसी को दिखाने या दूसरों पर प्रभाव जमाने के लिए न करें।

3. साधना के दौरान वस्त्र ढीले और सम्भव हो तो श्वेत रंग के पहनें। श्वेत रंग शांति और निर्मलता का प्रतीक है। बैठने के लिए आसन मोटा और नरम रखें ताकि साधना की बैठक आपके लिए सुकूनभरी और आरामदायी हो।

4. साधना के लिए उस मुद्रा में बैठें जिसमें हम पूरी साधना के दौरान सहज, तनाव-मुक्त और निश्चल रह सकें। साधना के लिए शरीर और इन्द्रियों की हलचल एवं हरकतों पर अंकुश लगाना आवश्यक है।

5. साधना के लिए इस तरह बैठें कि शरीर का ऊपरी भाग सीधा हो, सिर, गर्दन और पीठ एक सीध में आ जाएँ। आवश्यक हो तो कुर्सी पर बैठकर भी साधना की जा सकती है।

6. अति तनाव, उद्विग्नता अथवा अति थकान की स्थिति में साधना के अभ्यास के लिए न बैठें। अति तनाव अथवा अति थकान की स्थिति में हमें लेटकर शरीर और दिमाग को पूरी तरह रिलेक्स करने का ही अभ्यास करना चाहिए।

7. सक्रिय साधना करते समय हमें दोनों हाथों को चिन्मुद्रा में घुटनों पर ध्यान रखना चाहिए। अंगुठे के अग्र भाग से प्रथम अंगुली को स्पर्श करके रखना चिन्मुद्रा कहलाता है। सचेतन ध्यान-साधना करते हुए हमें हाथों को गोद में रखना चाहिए। बाएँ हाथ की हथेली पर दाएँ हाथ की हथेली। हाथों को इस स्थिति में रखने से शरीर की आंतरिक ऊर्जा एकलय हो जाती है।

8. आँखें दिमाग की खिड़कियाँ हैं। अत: दिमाग को बाहर के दृश्यों से निष्प्रभावित रखने के लिए आँखों को बंद कर लें।

9. चेहरे की मांसपेशियाँ को, विशेष रूप से आँखों, पलकों और दिमाग को सहज, तनाव-मुक्त, रिलेक्स कर लें।

10. अपने विचारों, मानसिक तरंगों और भावनाओं को धैर्यपूर्वक शांत-मौन करें। साधना के लिए पूरी तरह सचेत, स्पष्ट समझ और आत्मभाव लिये हुए बैठें। इस विश्वास के साथ कि ब्रह्माण्ड की दिव्य शक्तियाँ हमारे साथ हैं।

सक्रिय


ध्यान साधना का अभ्यास

धस्तर - 1 : मंत्र-साधना

समय : लगभग 30 मिनट

मंत्र-साधना मन के केन्द्रीकरण के लिए है। जो हमारे मन को निर्मल और सात्त्विक बनाए उसका नाम मंत्र है। मंत्र-साधना साधना की सबसे सरल विधि है। यह सालम्बन ध्यान है। मंत्र-साधना से मन में एकाग्रता, शांति और दिव्यता का उदय होता है, हम स्वयं की आध्यात्मिक चेतना से एकाकार होने लगते हैं।

1. मंत्र का उच्चारण 5 मिनट


 ओम् ईश्वर और दैवीय शक्ति के आह्वान का मंत्र है। हम स्वयं में ब्रह्माण्ड की दिव्य शक्ति के आह्वान के लिए दोनों हाथों को छाती के तल तक आकाश की ओर उठाएँ। फिर दिव्य शक्ति बीज-मंत्र ओम् का 21 बार शंखनाद की तरह उद्घोष करें।

 ओम् के उद्घोष के समय ब्रह्माण्ड की दिव्य शक्ति पर ध्यान दें। विश्व शक्ति पर ध्यान देते हुए ओम् का उद्घोष करने से हमारे चारों ओर सुरक्षा-कवच का निर्माण होता है और हमारा तन-मन विश्व-शक्ति के दायरे में आने लग जाता है।

2. मंत्र का स्मरण 10 मिनट


 अब हाथों को पुन: घुटनों पर रख लें - चिन्मुद्रा में। मुखमण्डल के प्रति जागरूक होकर आती साँस का अनुभव करते हुए 'ओम् और जाती साँस का अनुभव करते हुए 'नम: का स्मरण/मानसिक जप करना प्रारंभ करें।

 धीरे-धीरे साँस को अधिक गहराई से खींचना और छोडऩा शुरू करें। हर लम्बी साँस खींचते हुए ओम् और लम्बी साँस छोड़ते हुए नम: का स्मरण करते रहें। साँस और ओम् नम: का लगातार साहचर्य बना रहे। गहरी-लम्बी साँसों की उतनी आवृत्ति अवश्य कर लें जितने कि माला में मणिये होते हैं। इस चरण से मन में शांति, स्थिरता और एकाग्रता का उदय होगा।

3. मंत्र का अंतरमंथन 5 मिनट


 अब साँस को गति देने लगें और लोहार की धोंकनी की तरह लगातार लयबद्ध गतिशील साँस चलने दें। हर साँस के साथ दिव्य शक्ति बीज-मंत्र ओम् का स्मरण करते रहें, नम: को छोड़ दें। ओम् और साँस, साँस और ओम्, दही में मथनी की तरह अपने में अंतर-मंथन करते रहें। यह चरण हमारे भीतर ऊर्जा-जागरण और आत्म-जागृति को साधेगा।

4. प्रभु के स्वरूप का दर्शन 10 मिनट


 साँस जब शांत और मंद होने लगे तो छाती के मध्य क्षेत्र में ओम् अथवा प्रभु के स्वरूप को इस तरह हृदय में बिठाएँ मानो हमने उन्हें पूरी तरह आत्मसात् कर लिया हो। हम प्रभु की दिव्यता का ध्यान करते हुए हृदय में व्याप्त अपनी अंतरात्मा में डूबते जाएँ।

 अंतरलीनता ज्यों-ज्यों गहरी होती जाएगी, स्थापित की गई छवि विलुप्त होती जाएगी और स्वयं प्रभुता का प्रकाश वैसे ही प्रगट हो जाएगा जैसे बादलों में से अचानक सूरज बाहर निकलता है।

 इस आध्यात्मिक प्रकाश के उदय होने पर क्रोध, चिंता, ईष्र्या जैसे नकारात्मक भावों का वर्चस्व कम होता जाएगा और प्रेम, शांति, दिव्यता तथा सर्व कल्याणमयी भावदशा का उदय होगा।

 अंत में, हृदय की दिव्यता को पूरे शरीर में व्याप्त करते हुए अपने समग्र अस्तित्व का अनुभव करें, तन-मन, शरीर के रोम-रोम में सुखद शांति और आनंद-दशा का विस्तार करें।

 तीन बार ओम् का उद्घोष करते हुए साधना की बैठक पूरी करें। अंत में, कोई भी प्यारी-सी प्रार्थना अथवा भजन गुनगुनाना अंतरमन को और अधिक आनंदित करेगा।

सक्रिय


ध्यान साधना का अभ्यास

स्तर - 2 : दिव्य-साधना

समय : लगभग 45 मिनट

दिव्य-साधना के जरिये हम अपने प्राणों की गहराई में उतरते हैं और स्वयं की प्राण-शक्ति, आत्म-शक्ति और परा-शक्ति को और अधिक बढ़ाते हैं। इस विधि में हम मन-वचन-काया से बहिरात्म-भाव का त्यागकर अंतरात्मा में उतरते हुए प्रभु परमात्मा का ध्यान करते हैं।

1. प्रवेश : ओंकार का उद्घोष 5 मिनट


 साधना में प्रवेश के लिए सर्वप्रथम दिमाग को शांत, मौन और स्थिर करें। आकाश से बरस रही विश्व-शक्ति पर ध्यान दें। विश्व-शक्ति के आह्वान के लिए दोनों हाथों को छाती के तल तक आकाश की ओर उठाएँ और उसी के साथ दिव्य शक्ति बीज मंत्र ओम् का 21 अथवा 9 बार उद्घोष करें। इससे हमारी मानसिक शक्ति केन्द्रित होगी, आभामण्डल निर्मल होगा और हम विश्व शक्ति के दायरे में आ जाएँगे।

2. ओंकार का जाप 15 मिनट


 हाथों को पुन: चिन्मुद्रा में घुटनों पर रखते हुए मुखमण्डल के प्रति जागरूक हों और नासिका द्वार से आती-जाती साँस-धारा का अनुभव करने लगें। जैसे ही साँस-धारा का अनुभव होने लगे, मन में दिव्य शक्ति बीज मंत्र ओम् नम: को साकार कर लें। आती साँस के साथ ओम् और जाती साँस के साथ नम: का जाप करने लगें।

 करीब 2-3 मिनट के बाद साँस को धैर्यपूर्वक लम्बी और गहरी खींचने लगें। हर गहरी साँस के साथ दिव्य भावदशा से जुडऩे के लिए 'ओम् नम: का जाप करते रहें। ओम् परमात्मा के आह्वान का बीजाक्षर है। ओम् नम: का अर्थ है : ओम् श्री परमात्मने नम:। गहरी साँसों के साथ ओम् नम: की 108 बार आवृत्ति अवश्य हो जाए। इससे मन में निश्चलता, एकाग्रता और दिव्यता साकार होने लगेगी।

 धीरे-धीरे दीर्घ साँस को गति देने लगें, साँसों में लयबद्घ रफ्तार पकड़ें। साँस और ओम् के साहचर्य का अंतर-मंथन करते रहें, इससे हमारी प्राण-चेतना में अतिरिक्त ऊर्जा जाग्रत होगी।

3. नाभि-केन्द्र पर ध्यान 5 मिनट


 अंतरमंथन के बाद अपने आप को पूरी तरह से शांत और स्थिर कर लें, अपनी दृष्टि और मानसिक चेतना को नाभि-प्रदेश की ओर केन्द्रित करें। नाभि हमारा अन्नमय कोश, माँ के पेट में शरीर-निर्माण का मूल द्वार और शरीर का सबसे स्थूल प्राण-केन्द्र है। हम बाहर से भीतर तक इस ऊर्जा-क्षेत्र में व्याप्त होते जाएँ। नाभि प्रदेश पर मानसिक शक्ति को केन्द्रित करने से शरीर की प्राण-शक्ति पुष्ट होती है।

 नाभि-प्रदेश पर चित्त की स्थिरता के लिए हम ओम् के स्वरूप को साकार करते हुए उसके स्वरूप का ध्यान कर सकते हैं। इससे मानसिक स्थिरता में मदद मिलेगी।

 नाभि-प्रदेश पर ध्यान धरने से हमारी नाभिकीय ऊर्जा का पोषण होगा। चित्त को स्थिर और अंतर्मुखी बनाने में मदद मिलेगी। नाभि तेजस् केन्द्र होने से हमारा आरोग्य भी पुष्ट होगा और प्राणों में तेजोमयता बढ़ेगी। इसके जरिये ब्रह्माण्डीय ऊर्जा भी हमारी ओर आकर्षित होगी।

4. हृदय-केन्द्र पर ध्यान 10 मिनट


 नाभि-क्षेत्र पर ध्यान करने के बाद छाती के मध्य केन्द्र पर ध्यान दें। छाती का यह मध्य क्षेत्र हमारा प्राणमय कोश है। यह नाभि से अधिक सूक्ष्म सचेतन केन्द्र है। हमारे शरीर में व्याप्त आत्म-प्रदेशों का सर्वाधिक घनत्व हमें इसी प्रदेश में अनुभव होता है। हम यहाँ धैर्यपूर्वक बाहर से भीतर तक व्याप्त होते जाएँ। यहाँ ध्यान धरकर हम अपनी अंतरात्मा की अनुभूति में डूब रहे हैं।

 हृदय क्षेत्र में चित्त की स्थिरता के लिए हम परमात्मा के वाचक ओम् के स्वरूप को साकार करते हुए उसका ध्यान कर सकते हैं।

 हृदय केन्द्र पर ध्यान धरने से हमारी भाव-शक्ति पुष्ट होगी, सूक्ष्म प्राण-चेतना का पोषण होगा, आत्मानुभूति का अवसर घटित होगा, आध्यात्मिक प्रकाश से साक्षात्कार होगा, साथ ही अंतरहृदय में प्रेम, भक्ति, करुणा और आनंद जैसे दैवीय गुणों का विकास होगा।

5. ज्ञान-केन्द्र पर ध्यान 10 मिनट


 हृदय-केन्द्र पर ध्यान करने के बाद दोनों भौहों के मध्य ललाट प्रदेश की ओर ध्यान दें। यह हमारा मनोमय और ज्ञानमय कोश है - तीसरी आँख का केन्द्र। यह नाभि और हृदय से भी अधिक सूक्ष्म सचेतन-केन्द्र है। यहाँ ध्यान धरने से ज्ञान, विज्ञान, सकारात्मक सोच, आत्मविश्वास और सृजनात्मक चेतना का विकास होता है।

 इस ज्ञान क्षेत्र में चित्त की स्थिरता के लिए परमात्म-स्वरूप के प्रतीक - ओम् को साकार करते हुए ईश्वरीय चेतना अथवा सूर्य के दिव्य प्रकाश का ध्यान करें।

 इस ज्ञान केन्द्र में ध्यान धरने से हमारी छठ्ठी इन्द्रिय की क्षमता और अधिक विकसित होगी। हम ज्ञान की निर्मल दशा की ओर बढेंगे। हमारा लक्ष्य स्पष्ट होगा और बुद्धि तेजोमय। सबसे बड़ी बात - हमारे तामसिक मन में परमात्म-चेतना के प्रकाश का उदय होगा।

 अंत में अपने सम्पूर्ण शरीर का, अपने सम्पूर्ण अस्तित्व का अनुभव करें। तन, मन, प्राणों में आनंदित होते जाएँ, स्वयं को ऐसे किसी मंदिर की तरह अनुभव करें जिसमें ईश्वर की दिव्य अनुभूति की जा सकती है।

 तीन बार ओम् का उद्घोष करते हुए साधना की बैठक पूरी करें। अंत में, कोई भी प्यारी-सी प्रार्थना अथवा भजन गुनगुनाना अंतरमन को और अधिक आनंदित करेगा।

सक्रिय


ध्यान साधना का अभ्यास

स्तर - 3 : शक्ति-जागरण साधना

समय : लगभग 45 मिनट

 अन्तर्निहित शक्ति के जागरण के लिए हम चक्र-साधना करते हैं। चक्र हमारे शरीर के वे शक्ति-केन्द्र हैं जिनके माध्यम से शरीर की सारी गतिविधियाँ, सूक्ष्म नाड़ी-संस्थान संचालित होते हैं तथा ब्रह्माण्ड की ऊर्जा हमारे मानव-शरीर में प्रवाहित होती है।

 चक्र (शक्ति-केन्द्र) सात हैं, जिनमें पाँच चक्र रीढ़ के अग्र भाग पर स्थित हैं जबकि शेष दो विशिष्ट चक्र सिर में स्थित हैं।

 चक्रों की सक्रियता हमारी चेतना और शारीरिक स्वास्थ्य को प्रभावित करती है। गलत भोजन, दूषित और नकारात्मक विचार तथा उत्तेजनापूर्ण वातावरण चक्रों की ऊर्जा को बाधित करते हैं जिससे हमारी चेतना असंतुलित और शरीर बीमार हो जाता है।

 चक्रों पर ध्यान धरने का मतलब है : उनका स्वस्थ, सक्रिय और संतुलित होना। इन पर ध्यान धरने से जीवन-शक्ति का विकास और आध्यात्मिक लाभ भी होता है। विश्व-चेतना अथवा ईश्वरीय तत्त्व की ओर हमारी गति होती है।

 हर चक्र के बीज मंत्र भी हैं। मानसिक स्थिरता बनाने के लिए हम एक-एक शक्ति-केन्द्र पर अलग-अलग बीज मंत्र का जाप कर सकते हैं। इन सात चक्रों के क्रमश: बीज मंत्र हैं : 1. लं 2. वं 3. रं 4. यं 5. हं 6. क्षं 7. ओम् । अगर ये बीज मंत्र बराबर याद न रह पाते हों तो एक अकेले बीज-मंत्र ओम् का स्मरण करें अथवा ओम् के साथ बीज-मंत्र का उपयोग करें। इससे हर चक्र पर चित्त की स्थिरता बनाने में मदद मिलेगी।

पहले मंत्र साधना 15 मिनट


 अंतर्मन में ध्यान की धारणा क रते हुए ध्यान-मुद्रा ग्रहण करें।

 स्वयं में विश्व-शक्ति के आह्वान के लिए दोनों हाथों को छाती के तल तक आकाश की ओर उठाते हुए ओम् का नौ बार उद्घोष करें।

 मन की धाराओं में निर्मलता के लिए गहरी साँसों के साथ ओम् नम: मंत्र का 108 बार स्मरण करें।

अब शक्ति-जागरण की साधना 30 मिनट


 अब साँस को शांत, स्थिर करें और आज्ञाचक्र से मूलाधार तक अर्थात् रीढ़ के ऊपरी छोर से लेकर निचले छोर तक साँस अथवा ऊर्जा के सूक्ष्म प्रवाह का अनुभव करने लगें।

 धीरे-धीरे मूलाधार अर्थात् रीढ़ के अंतिम निचले सिरे पर अपने ध्यान को केन्द्रित करते जाएँ। हर चक्र अर्थात् शक्ति केन्द्र पर हमें लगभग पाँच मिनट अथवा तब तक ध्यान करना चाहिए जब तक कि उस चक्र की ऊर्जा का भलीभाँति अनुभव न होने लग जाए।

 हर चक्र पर ध्यान करते हुए पूरी तरह शांत और तनावमुक्त बने रहें। चित्त में स्थिरता न बनती हो तो चक्रों से जुड़े बीज मंत्र का मानसिक स्मरण करें।

 मूलाधार चक्र : मूल शक्ति केन्द्र। स्थिति : रीढ़ के अंतिम निचले सिरे के आगे का ऊर्जा क्षेत्र। बीज मंत्र है : ओम् लं। यहाँ ध्यान धरने से सूक्ष्म शरीर की मूल शक्ति जाग्रत होती है, स्थूल शरीर के विकार धर्मों पर नियंत्रण होता है और शरीर का पृथ्वी-तत्त्व संतुलित होता है।

 स्वाधिष्ठान चक्र : स्वास्थ्य केन्द्र। स्थिति : पेडू़ के अंदर, कटि प्रदेश की ओर। बीज मंत्र है : ओम् वं। यहाँ ध्यान धरने से कमर दर्द दूर होता है, आरोग्य का विकास होता है, जल तत्त्व का संतुलन होता है और ब्रह्माण्ड ऊर्जा की ओर गति होती है।

 मणिपूर चक्र : तेजस् केन्द्र। स्थिति : नाभि के अंदर मेरुदण्ड की ओर। बीज मंत्र है : ओम् रं। यहाँ ध्यान धरने से पाचन तंत्र दुरुस्त होता है, आंतरिक शक्ति में तेजोमयता आती है और शरीर का अग्नि तत्त्व सक्रिय एवं संतुलित होता है।

 अनाहत चक्र : हृदय केन्द्र। स्थिति : यह हृदय के निकट छाती के बीच स्थित है। बीज मंत्र है ओम् यं। यहाँ ध्यान धरने से दिव्य प्रेम, शांति, करुणा, क्षमा, भक्ति और आनंद जैसे भावों का उदय होता है तो एकाग्रता और आत्मविश्वास जाग्रत होता है। स्वयं की प्रकृति और चेतना में सहजता-समरसता आने लगती है।

 विशुद्धि केन्द्र : ऊर्जा विशुद्धि केन्द्र। स्थिति : कंठ का भीतरी प्रदेश। बीज मंत्र है : ओम् हं। हं का संबंध हंसवाहिनी माँ सरस्वती से है। यहाँ ध्यान धरने से न केवल शारीरिक अपितु मानसिक स्तर पर भी शुद्धिकरण होता है। विचार और मन की धाराएँ शांत-संतुलित होती हैं, आकाश तत्त्व की ओर गति होती है, वचन-सिद्धि फलित होती है।

 आज्ञा चक्र : ज्ञान केन्द्र। स्थिति : ललाट के मध्य का भीतरी क्षेत्र। यह मन और बुद्धि का क्षेत्र है। इसका संबंध हमारी सृजनात्मक चेतना से है। बीज मंत्र है ओम् क्षं। यहाँ ध्यान धरने से बौद्धिक प्रतिभा, नैतिक विवेक और वैज्ञानिक तर्क -शक्ति का उदय होता है।

 सहस्रार प्रदेश : समाधि केन्द्र। स्थिति : मस्तिष्क का सबसे ऊपरी प्रदेश, सिर के शिखर पर। इसे ब्रह्म रंध्र अर्थात् परमात्म चेतना का द्वार भी कहा जाता है। यह सूर्य की भाँति ऊर्जा का विकिरण करता है। शरीर के सभी नाडिय़ों की ऊर्जा सूक्ष्म रूप में इसी प्रदेश से जुड़ी है। इसका बीज मंत्र है : ओम् अर्हम्। यहाँ ध्यान धरने से हमारी चेतना ब्रह्माण्ड की आकाशीय चेतना से जुड़ जाती है। हम सिद्ध, बुद्ध और मुक्त दशा की ओर बढऩे लगते हैं। समाधि, अतीन्द्रिय शक्ति और विदेह दशा की स्थिति यहाँ ध्यान धरने से फलित होती है।

 सहस्रार प्रदेश पर ध्यान करने के उपरांत पूरी तरह भीतर से मौन और आत्मस्थित होते जाएँ, सहज विश्राम दशा में आते जाएँ। साधना के अभ्यास के दौरान धीरे-धीरे आप पाएँगे कि ब्रह्माण्ड की दिव्य ऊर्जा आकाश से हमारे शरीर पर बरस रही है। हम केवल चेतनामय और ऊर्जामय हो चुके हैं। इस दिव्य ऊर्जा से हमारे तन, मन और प्राण स्वस्थ, स्फूर्त और दिव्य दशा को प्राप्त होते जाएँगे। आप पाएँगे हम ईश्वरीय चेतना / उच्च आध्यात्मिक चेतना के सान्निध्य में हैं।

Our Lifestyle

Features