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गुरुदेव श्री

बापजी साहब के जीवन की प्रेरणास्पद घटनाएँ



पूज्यपाद बापजी महाराज श्री महिमाप्रभ सागर जी ने अपनी युवावस्था में घटी घटना का जिक्र करते हुए बताया कि करीब 40 वर्ष पहले कोलकाता से वे दस मित्रों के साथ सम्मेत-शिखर तीर्थ यात्रा पर निकले। उनके साथ एक मुस्लिम भाई भी था। सम्मेत-शिखर की पहाड़ी को पार करते हुए जब वे मध्य रास्ते में पहुँचे तो उन्हें जोरों की प्यास लगी, साथ में रखा पानी समाप्त हो गया। सभी के कंठ सूखने लगे। प्यास के मारे सभी तडफ़ड़ाने लगे। तभी मुस्लिम भाई ने कहा, 'मैं कुछ पानी का इंतजाम करने की कोशिश करता हूँ। यह कहकर वे मंत्रजाप में बैठ गए, कुछ समय बाद उन्होंने पहाड़ के पास की मिट्टी को खोदा। लगभग दो फुट खोदा कि नीचे से पानी की धारा फूट पड़ी। सभी आश्चर्यचकित रह गए कि पहाड़ पर पानी कैसे निकल आया? सभी ने प्यास बुझाई, बोतलें भरीं और आगे निकल पड़े।

सभी ने मुस्लिम भाई से पूछा, 'आपने आखिर ऐसा कौनसा मंत्र पढ़ा कि ऐसा दुष्कर कार्य भी संभव हो गया। उसने कहा, 'मैं नहीं बताऊँगा क्योंकि बता दिया तो आपको विश्वास नहीं होगा इसलिए आप यह प्रश्न न पूछें। पर वे सब तो अड़ गए कि बताना तो पड़ेगा ही, नहीं तो हम आगे नहीं बढ़ेंगे। उसने जो जवाब दिया वह आश्चर्य को और बढ़ाने वाला निकला क्योंकि उसने जिस मंत्र का जाप किया था वह था - 'नवकार महामंत्र।

एक पल तो किसी को विश्वास न हुआ कि मुस्लिम भाई इस मंत्र को कैसे साध सकता है। उसने बताया कि एक जैन मुनि ने उसे इस मंत्र का जाप करने की प्रेरणा दी थी और विकट परिस्थिति में प्रयोग करने को कहा था। धन्य है मुस्लिम भाई की नवकार मंत्र के प्रति श्रद्धा और मिलने वाली सिद्धि। आजीवन मौन ही रहूँगा

पूज्य बापजी गणिवर्य श्री महिमाप्रभ सागर जी महाराज ने आजीवन मौन व्रत का संकल्प ले रखा था। उनके देह-विलय के मात्र 5 दिन पूर्व की घटना है। वे गीता भवन में विराज रहे थे। शाम के करीबन सात बजे थे। कई संबोधि साधक और श्रद्धालु पास में बैठे थे। यकायक पता नहीं क्यों गुरुदेव श्री ललितप्रभ जी ने बापजी से पूछा, 'आिखर आप मौन-व्रत कब तक रखेंगे? लोग आपके वचन सुनने को लालायित हो रहे हैं। उन्होंने इशारे से बताया कि अब मैं आजीवन मौन ही रहूँगा। गुरुदेवश्री ने कहा कि अभी आप बयासी वर्ष के हैं और अगर आपका आयुष्य 100 वर्ष का हुआ तो क्या आप तब तक मौन ही रहेंगे? पूज्य बापजी साहब ने एक मधुर मुस्कान ली और स्लेट पर लिखा कि जीवन चाहे चार दिन का हो या चालीस वर्ष का, मैं मौन और समाधि में ही रहूँगा। यह देख वहाँ बैठे सभी श्रद्धालुओं का हृदय भाव-विभोर हो उठा।

कुछ वर्ष पहले जोधपुर के कुशल भवन में पूज्य बापजी गणिवर्य श्री महिमाप्रभ सागर जी का चातुर्मास था। वे जीवरक्षा और मानवीय सहायता के कार्य भक्तों से करवाते रहते थे। एक बार उन्होंने जरूरतमंद महिलाओं को सिलाई की मशीनें दिलवाने का निर्णय लिया, ताकि वे आत्मनिर्भर हो सके। अनेक महिलाओं को मशीनें दी जा रही थीं। उनमें कुछ मुस्लिम महिलाएँ भी थीं। पास बैठे किसी व्‍यक्‍ित ने उनसे कहा, 'आपने हिन्दुओं और जैनों को मशीनें दिलवाईं, पर मुसलमानों को दिलवाने से क्या लाभ? पूज्य बापजी साहब ने सहज भाव से कहा कि मैं मशीनें अपने लाभ के लिए नहीं, उनके लाभ के लिए दिला रहा हूँ। मानवता की सेवा में भला कैसा जातिभेद? उनकी इसी मानवीय भावना के चलते वे छत्तीस कौम के संत बन गए।

पूज्य बापजी गणिवर्य श्री महिमाप्रभ सागर जी महाराज के अखंड मौन का एक वर्ष पूर्ण हो गया था। नाकोड़ा तीर्थ में इस उपलक्ष में श्रद्धालुओं द्वारा मौन-अभिवंदना समारोह का आयोजन किया गया। अनेक साधु-साध्वीगण भी समारोह में उपस्थित थे। एक संत जो उनके पास बैठे थे, पूछ बैठे, बाप जी साहब! इस अखंड मौन व्रत से आपको क्या मिला? बाप जी साहब ने स्लेट पर लिखकर दिया, 'मौन से मुझे मन की अपूर्व शांति मिली? यह पढ़कर सभी भाव विभोर हो गए। बापजी के तेज स्वभाव को कौन नहीं जानता था, लेकिन इस अखंड मौन व्रत ने उनके जीवन में मात्र दो-ढाई साल में जो रूपांतरण किया था वह किसी चमत्कार से कम नहीं था।

पूज्यपाद गणिवर्य श्री महिमा प्रभ सागर जी नाकोड़ा तीर्थ में थे। उनके मौन-व्रत चल रहा था। उन्होंने निर्णय किया था कि अब वे तीर्थ-भूमि में रहकर साधना करेंगे। भीलवाड़ा से श्रावक-रत्न श्री सागरमल जी पानगडिय़ा के नेतृत्व में भीलवाड़ा के वरिष्ठ श्रावक गणिवर्यश्री व गुरुदेव श्री ललितप्रभ जी, गुरुदेव श्री चन्द्रप्रभ जी को चातुर्मास हेतु विनति करने आए। बापजी महाराज ने कहा - मैं तीर्थ-भूमि में ही रहूँगा। आप लोग मेरे मुनिजनों को ले जाएं। उन्हें यह अच्छा नहीं लगा कि पिताजी महाराज यहाँ अकेले रहें और पुत्र संत भीलवाड़ा में। अंत में सागरमलजी ने सजल नेत्रों से कहा कि आपको चातुर्मास के लिए पूरा भीलवाड़ा बुला रहा है। आप वहाँ पधारकर भीलवाड़ा को ही तीर्थभूमि बनाने की कृपा कीजिए। उनकी सजल विनति के आगे गणिवर्यश्री को झुकना पड़ा और गुरुजनों का वह चातुर्मास भीलवाड़ा वासियों के लिए अमर यादगार बन गया।

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