slide3-bg



img

श्री चन्द्रप्रभ सागर जी म.

जन्म - 10 मई 1962 को प्रात: 6 बजे (वैशाख शुक्ला सप्तमी, विक्रम संवत् 2021)

मातृभूमि - बीकानेर(राजस्थान)

दीक्षा - 27 जनवरी 1980, बाड़मेर(राजस्थान)

स्थापना- सम्मेतशिखर महातीर्थ में भव्य जैन म्यूजियम, जोधपुर में साधना तीर्थ संबोधि धाम, श्री जितयशा फाउंडेशन

ध्यानमार्ग - संबोधि ध्यान योग साधना

वीसीडी - विविध विषयों पर लगभग 1000 से अधिक प्रवचन

विशेष - 'माँ की ममता हमें पुकारें' प्रवचन अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित

पदयात्रा - 20 राज्यों में लगभग तीस हजार किलोमीटर


दिव्य जीवन : श्री चन्द्रप्रभ नए युग के नए दार्शनिक


श्री चन्द्रप्रभ वर्तमान युग के महान जीवनदृष्ट्रा संत हैं। उनका जीवन प्रेम, प्रज्ञा, सरलता और साधना से ओतप्रोत है। वे न केवल मिठास भरा जीवन जीने की प्रेरणा देते हैं वरन् अपने जीवन में भी मिठास और माधुर्य घोले रखते हैं। वे आम इंसान के बहुत करीब हैं। उनके द्वार सबके लिए खुले हुए हैं। सभी को प्रभु कहकर बुलाना उनकी बहुत बड़ी विशेषता है। चाहे कोई भी क्यों न हो उनसे मिलकर प्रभावित हुए बिना नहीं रहता। उनके पास बैठकर व्यक्ति को जो अनुपम आनंद, ज्ञान और सुकून मिलता है वह उसे आजीवन भुला नहीं पाता है।

श्री चन्द्रप्रभ की वाणी में न केवल गजब का सम्मोहन है वरन् उनके साहित्य में भी एक विशेष आकर्षण है। प्रायः अच्छा लेखक अच्छा वक्ता नहीं होता और अच्छा वक्ता अच्छा लेखक नहीं होता, पर माँ सरस्वती की कृपा से वे जितना अच्छा बोलते हैं उतना ही अच्छा लिखते भी हैं। श्री चन्द्रप्रभ यानी नई उम्मीद, नया उत्साह, नई ऊर्जा। इंसान की सुस्त हो चुकी चेतना को जगाने के लिए वे इंकलाब का पैगाम हैं। उनकी पुस्तकें यानी जीवन की हर समस्या का समाधान। आनंद और आत्मविश्वास से भरा उनका साहित्य नई पीढ़ी के लिए रामबाण औषधि का काम कर रहा है। जो उनको एक बार पढ़ लेता है वह उनकी जीवन-दृष्ट्रि का कायल हो जाता है। वे जिस भी गाँव या शहर में जाते हैं और बोलते हैं, उन्हें सभी पंथ, परम्पराओं के लोग सुनने के लिए हजारों की तादाद में उमड़ पड़ते हैं। प्रवचनों में जब वे अपने द्वारा बनाए गए रसभीने भजन गाते-गुनगुनाते हैं तो जनता झूमने को विवश हो जाती है। श्रीचन्द्रप्रभ ने देशभर में जो मानवीय कल्याण के कार्य किए हैं और सर्वधर्म सद्भाव का माहौल खड़ा किया है वह अद्भुत है। वे हर धर्म और हर महापुरुष पर बोलते हैं। उनका कहना है, दीये भले ही अलग-अलग हो, पर ज्योति सबकी एक है। राम, कृष्ण, महावीर, मोहम्मद, बुद्ध, जीसस, कबीर, नानक आदि धरती के बगीचे पर खिले हुए अलग-अलग फूल हैं जो इसकी सुंदरता को घटाते नहीं वरन् कई गुना बढ़ाते हैं। आज श्री चन्द्रप्रभ पंथ-परम्पराओं की संकीर्ण सीमा लाँघकर सबके बन चुके हैं। सचमुच इस मानवतावादी राष्ट्र-संत को विश्वभर में करोड़ों पाठकों एवं श्रोताओं द्वारा प्रतिदिन पढ़ा एवं सुना जा रहा है जो कि हम सबके लिए प्र्रेरणा स्रोत है।

श्री चन्द्रप्रभ का विचार दर्शन वर्तमान युग की गीता बन चुका है। उनके विचार सशक्त, तर्कयुक्त, परिमार्जित एवं सकारात्मकता की आभा लिए हुए हैं। उनके विचारों में कृष्ण का माधुर्य, महावीर की साधना, बुद्ध की मध्यम दृष्ट्रि, कबीर की क्रांति, मीरा की भक्ति और आइंस्टीन की वैज्ञानिक सच्चाई है। श्री चन्द्रप्रभ ने हँसी और खुशीपूर्वक जीवन जीने की कला सिखाई है। उन्होंने युवाओं को सफलता पाने और समृद्ध बनने के बेहतरीन गुर दिए हैं। वे कहते हैं, आज के समाज में केवल अमीरों की इज्जत होती है इसलिए हर व्यक्ति समृद्ध बने। अपरिग्रह का सिद्धांत अमीरों के लिए है, गरीबों के लिए नहीं। इस तरह उन्होंने स्वयं को परम्परागत ढर्रे से मुक्त किया है। उन्होंने ईंट, चूने, पत्थर से निर्मित मंदिरों को ही बनाते रहने की बजाय घर-परिवार को मंदिर बनाने और घर से धर्म की शुरुआत करने की क्रांतिकारी प्रेरणा देकर धर्म को व्यावहारिक एवं वैज्ञानिक बनाने का अनुपम कार्य किया है।

श्री चन्द्रप्रभ ने जीमणवारी के नाम पर हो रहे असीमित खर्चों का विरोधकर और गरीब भाइयों को ऊपर उठाने की प्रेरणा देकर स्वस्थ समाज की संरचना करने की कोशिश की है। जहाँ उन्होंने एक ओर धर्म को मानवीय मूल्यों के साथ जोड़ा वहीं दूसरी ओर आंतरिक समृद्धि के लिए संबोधि-साधना का सरल एवं मनोवैज्ञानिक मार्ग प्रस्तुत कर मानव जाति के समग्र विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है।

निःसंदेह विश्व में चल रही दार्शनिकों की प्रवाहमान धारा में श्री चन्द्रप्रभ ने जो विचार-दर्शन मानव-समाज को दिया वह न केवल अन्य दार्शनिकों से भिन्न और नया है वरन् मौलिक भी है। उनके द्वारा धरती पर की गई स्वर्ग-निर्माण की पहल आने वाली पीढ़ी के लिए प्रकाश-शिखा का काम करेगी। श्री चन्द्रप्रभ की साधना, साहित्य-लेखन एवं मानवता से जुड़ी सेवाएँ निरंतर प्रगति की ओर हैं। वे अतुलनीय और अनुपम हैं। उन्हें समझना या उन पर लिखना संभव है, पर उनकी सम्पूर्णता को प्रकट करना मुश्किल है।

-डाॅ. मुनि शांतिप्रियसागर


गुरुदेव श्री

श्री चन्द्रप्रभ सबसे हटकर क्यों ? : एक नजर


  •  मात्र 19 वर्ष में उम्र में पीएच.डी करने वाले पहले संत।
  •  प्रवचनों को दार्शनिक शैली से मुक्त कर जीवन सापेक्ष चिंतन प्रदान करने वाले प्रभावशाली वक्ता।
  •  पारलौकिक स्वर्ग की बजाय इसी जीवन को स्वर्ग बनाने के कीमिया गुर देने वाले धर्मगुरु।
  •  चिंतन, दर्शन, काव्यशास्त्र आदि वाङ्गमय के समस्त अंगों पर साहित्य का निर्माण करने वाले लेखक
  •  फुल सर्कल और हिन्द पॉकेट बुक जैसे राष्ट्रीय प्रकाशकों ने देश के महान पचास साहित्यकारों में श्री चन्द्रप्रभ को किया समाहित
  •  देश भर के संतों द्वारा श्री चन्द्रप्रभ का साहित्य बड़े चाव के साथ पढ़ा जाना
  •  युवा पीढ़ी को कॅरियर-निर्माण, व्यक्तित्व-निर्माण और संस्कार-निर्माण पर महान सोच देने वाले मुख्य संत।
  •  पंथ-परम्पराओं के आडम्बरों और भेदों पर भी निर्भीकता से चोट करने वाले आधुनिक युग के कबीर
  •  मैनेजमेंट गुरु की तरह जीवन जीने की कला सिखाने वाले संत
  •  पूरे देश में लोकप्रिय ''जहाँ नेमि के चरण पड़े...और मीठो-मीठो बोल थारो कांई लागे... '' भजन के रचयिता
  •  धर्म, शिक्षा, नारी, अध्यात्म, ध्यानयोग, व्यक्तित्व-निर्माण, परिवार, स्वास्थ्य, मानवीय एकता, प्रेम, विश्वशांति, राष्ट्र-निर्माण जैसे हर क्षेत्र में नई एवं मौलिक अंतर्दृष्टि प्रदानकर्ता
  •  संघ-समाज-राज्यों द्वारा प्रदत्त समस्त उपाधियों का त्याग करने वाले संत।
  •  देश भर के लाखों लोगों के विचारों को प्रभावित एवं प्रेरित करने वाली मैग्जिन संबोधि टाइम्स के मार्गदृष्टा
  •  सार्वजनिक मैदानों में छत्तीस कौम के पच्चीस हजार से ज्यादा जनसमुदाय को इकठ्ठा करने की क्षमता रखने वाले संत।
  •  अब तक एक लाख से ज्यादा लोगों को मांसाहार एवं दुव्र्यसनों का त्याग करवाने वाले प्रेरक संत
  •  लाखों हिन्दुओं का नवकार मंत्र एवं लाखों जैनों को गायत्री मंत्र याद करवाकर धार्मिक मिसाल कायम करने वाले संत।
  •  श्रीमद्भागवत गीता पर जोधपुर के गीता भवन में लगातार अठ्ठारह दिन तक संबोधित करने वाले पहले जैन संत।
  •  अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित माँ की ममता पर हृदयस्पर्शी प्रवचन देने वाले संत।
  •  मानवता का पाठ पढ़ाने के लिए देश के 20 राज्यों में तीस हजार से अधिक किलोमीटर की पदयात्रा
  •  गीता पर लिखा उनका गंथ ''जागो मेरे पार्थ'' जन-जन में चर्चित एवं लोकप्रिय
  •  वैराग्य भावना की बजाय संन्यस्त माता-पिता की सेवा के लिए संन्यास ग्रहण करने वाले संत
  •  35 साल से साथ-साथ रहकर जीवन जीने वाले भ्राता-संत के रूप में विख्यात
  •  भूकंप, बाढ़, सुनामी जैसी राष्ट्रीय आपदाओं में जनसहयोग भिजवाकर राष्ट्र-भक्ति का परिचय देने वाले संत
  •  जैन संतों के लिए पदयात्रा के साथ वाहन यात्रा को भी जोड़े जाने के प्रबल पक्षधर संत
  •  युवाओं में सफलता और प्रगति का नया जूनून जगाने वाले जोशीले संत
  •  हम्फी की गुफा में 16 घंटे तक लगातार समाधिस्थ रहने वाले आत्मयोगी संत
  •  सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक 20 वर्षों से लगातार मौन रखने वाले मौन-महाव्रती संत
  •  भागमभाग भरी जिंदगी से क्लांत और अशांत मन को शांति और समाधि की सुवास देने के लिए संबोधि साधना मार्ग का प्रवर्तन करने वाले संत
  •  सभी धर्मों के सिद्धांतों एवं महापुरुषों के संदेशों में निकटता स्थापित कर सवधर्मसद्भाव की मिसाल खड़े करने वाले संत
  •  अनुसरण की बजाय जीवन के अनुभवों से भरा मनोवैज्ञानिक दर्शन प्रस्तुत करने वाले संत
  •  पारिवारिक परम्परा से मिले धर्म को धारण करने की बजाय सोच-समझकर धर्म को धारण करने की प्रेरणा देने वाले संत
  •  धर्म के नाम होने वाले आडम्बरों और अनावश्यक खर्चों को कम करने का पाठ पढ़ाने वाले संत
  •  धर्म की शुरुआत मंदिर-मस्जिद-चर्च-गुरुद्वारा-स्थानक-उपाश्रय से करने की बजाय परिवार से करने की सीख देने वाले संत
  •  मंदिरों के निर्माण से अधिक मानव-समाज के उत्थान पर बल देने वाले संत
  •  संतों और मुनियों को गरीबों का भी सम्मान करने के लिए प्रेरित करने वाले संत
  •  आत्मकल्याण के लिए एक हाथ में माला और आत्मरक्षा के लिए दूसरे हाथ में भाला रखने का सिद्धांत देने वाले संत
  •  विदेशी संस्कृति की आलोचना करने की बजाय उनकी अच्छाइयों से प्रेरणा लेने की सीख देने वाले संत
  •  धर्म, जाति, रूप, रंग, परम्परा की बजाय इंसानियत को महत्त्व देने का पाठ पढ़ाने वाले संत
  •  भारत-निर्माण के लिए युवाशक्ति को आगे आने का जोश भरने वाले संत
  •  गरीबी को देश का अभिशाप बताकर आम व्यक्ति को समृद्ध बनने और आगे बढऩे का आह्वान करने वाले संत।


गुरुदेव श्री

श्री चन्द्रप्रभ जो सिखाते हैं आर्ट ऑफ लाइफ


भारतीय दार्शनिकों की वर्तमान परम्परा में श्री चन्द्रप्रभ एक ऐसे दार्शनिक हुए हैं जिन्होंने धर्म-अध्यात्म को एक नई दिशा एवं नई दृष्टि प्रदान की है। उन्होंने न केवल अध्यात्म की जीवन-सापेक्ष व्याख्या की वरन् वर्तमान की समस्याओं का सरल व प्रभावी समाधान दिया है। उनके द्वारा दी गई महान सोच और आत्मदृष्टि नई पीढ़ी के लिए मील के पत्थर का काम कर रही है। एक तरह से श्री चन्द्रप्रभ का मौलिक चिंतन और प्रभावी जीवन-दर्शन वर्तमान की गीता बन चुका है।

श्री चन्द्रप्रभ का जन्म शूरवीरों और दानवीरों की भूमि राजस्थान में हुआ है। महाराणा प्रताप जैसे शूरवीर, भामाशाह और जगडू़शाह जैसे दानवीर, समयसुंदर जैसे कवि, मीरा जैसी भक्त कवयित्री इसी भूमि पर जन्मे हैं। संत पीपा, संत रैदास, संत दादू, यमुनाचार्य, निम्बार्काचार्य, परशुराम, संत खेताराम, संत राजाराम, संत चरणदास, ख्वाजा मुईनुद्दीन हसन चिश्ती, दुलेशाह जैसे महान पुरुषों को जन्म देने का सौभाग्य राजस्थान को प्राप्त हुआ है। राजस्थान के सांस्कृतिक आँचल में सभी धर्मों ने अपनी विशिष्ट संस्कृति को संजोया है। अजमेर के ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती, रामदेवरा के बाबा रामदेव पीर, उदयपुर के केसरियानाथ, पुष्कर के ब्रह्मा मंदिर, नाकोड़ा के नाकोड़ा भैरुजी एवं नाथद्वारा के श्रीनाथजी में छत्तीस कौम के विश्वभर से लोग आते हैं। चित्तौडग़ढ़ का विजयस्तंभ, देलवाड़ा, रणकपुर और जैसलमेर के मंदिरों ने राजस्थान को स्थापत्य और मूर्तिकला का विश्वकोश जैसा सम्मान दिलाया है। ऐसी महान विशेषताओं से युक्त इस भूमि पर महान दार्शनिक एवं चिन्तक, राष्ट्र-संत श्री चन्द्रप्रभ ने जन्म लेकर अपनी ज्ञान-मनीषा से इस भूमि की गरिमा में और चार चाँद लगाए हैं।

श्री चन्द्रप्रभ का जन्म राजस्थान प्रदेश के बीकानेर शहर में दफ्तरी गोत्रीय श्री मिलापचंद जी दफ्तरी की धर्मपत्नी श्रीमती जेठी देवी की कुक्षि से वैशाख शुक्ला सप्तमी, विक्रम संवत् 2021, 10 मई 1962, गुरुवार को पुष्य नक्षत्र में प्रात: 6 बजे अपने ननिहाल में मातामह, महान साहित्य-सेवी, इतिहासवेत्ता श्री अगरचंद जी नाहटा के यहाँ हुआ, जिन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन शिक्षा, साहित्य एवं ज्ञान की सेवा में समर्पित कर दिया। उनके घर का कोना-कोना ग्रंथों से भरा रहता था और देश-विदेश के मनीषी उनके यहाँ शोध-कार्य के लिए आते थे। ऐसे ज्ञान से सुवासित वातावरण में श्री चन्द्रप्रभ का जन्म होना श्री प्रभु की सारस्वत कृपा का ही फल था। पुष्य नक्षत्र में जन्म होने के कारण इनका नामकरण 'पुखराज किया गया, पर घर में सभी इन्हें प्यार से 'राजू कहकर पुकारा करते थे। इनके तीन बड़े भाई श्री प्रकाशचन्द जी, श्री अशोककुमार जी एवं श्री सिद्धिराज जी हैं एवं एक छोटे भाई श्री ललितकुमार जी हैं जो कि आज दीक्षित अवस्था में महोपाध्याय श्री ललितप्रभसागर जी महाराज के नाम से सुप्रतिष्ठित हैं।

श्री चन्द्रप्रभ शुरू से ही मेधावी और संस्कारशील बालक थे। प्राय: बाल्यावस्था खेलने-कूदने और लाड़-प्यार में ही पूरी हो जाती है, पर श्री चन्द्रप्रभ के साथ ऐसा नहीं था। उन्हें प्रभु-पूजा, संतों के दर्शन, धार्मिक पुस्तकों का पठन, तीर्थयात्रा जैसे संस्कार विरासत से ही मिले हुए थे। श्री चन्द्रप्रभ का बचपन अन्य बालकों की तरह नहीं था। अपने नाना श्री अगरचंद नाहटा जैसे विद्वान पुरुष का वरदहस्त उन्हें सहज रूप से मिला हुआ था। समय-समय पर नाहटाजी से मिलने आते विद्वानों, समाजसेवियों को देखना, उनका आपसी व्यवहार, वार्तालाप, शास्त्रीय चर्चाओं से युक्त वातावरण उनके उज्ज्वल भविष्य के लिए बीज वपन का कार्य कर रहा था। उनकी प्रतिभा धार्मिक गीतों की रचना के रूप में सामने आती रहती थी। श्री चन्द्रप्रभ बचपन से ही मेधावी होने के साथ-साथ साहसी व्यक्तित्व के धनी रहे हैं। गलत का दृढ़ता से मुकाबला करने की आदत उनकी बचपन से रही है। यही कारण है कि बचपन में एक बार वे विद्यालय से घर आने के लिए निकले तो उन्होंने गुर्जरों के मौहल्ले के पास देखा कि आठ-दस लड़के उनके ही विद्यालय के एक सीधे-सरल लड़के की पिटाई कर रहे हैं। उन्होंने उन लड़कों को समझाने की कोशिश की और उसे छोडऩे के लिए कहा, पर जब वे उद्दण्डी लड़के न माने तो उन्होंने अपनी साइकिल दीवार के सहारे छोड़ी और उन शैतान लड़कों को ठीक करने के लिए वे उन पर टूट पड़े। दस का मुकाबला अकेले ने किया और उन दुष्ट लड़कों को भगाकर अपने ही विद्यालय के सहपाठी को घर छोड़कर आए।

श्री चन्द्रप्रभ का अध्ययन शुरू में घर पर ही हुआ। इन्हें सीधे पाँचवीं कक्षा में प्रवेश दिलाया गया। बीकानेर के जैन स्कूल में उन्होंने अध्ययन करते हुए आगे की कक्षाएँ अच्छे अंकों से उत्तीर्ण कीं, पर खेलकूद में अपना ज्यादा ध्यान देने के कारण वे शिक्षा के प्रति पूर्णतया गंभीर न हो पाये और ऐसी स्थिति बनी कि एक बार तो अनुत्तीर्ण होते-होते बचे। उस समय एक ऐसी घटना घटी जिसने उन्हें जीवन में कुछ कर गुजरने का जज्बा पैदा किया। स्वयं श्री चन्द्रप्रभ के शब्दों में

बात तब की है, जब मैं नौवीं कक्षा की परीक्षा दे रहा था। संयोग की बात कि परीक्षा में मेरी सप्लीमेंटरी आ गई। क्लास टीचर सभी छात्रों को उनके प्रमाण-पत्र दे रहे थे। जब मेरा नंबर आया, तो न जाने क्यों उन्होंने खासतौर से मेरी मार्कसीट पर नज़र डाली। वे चौंके और उन्होंने एक नज़र से मुझे देखा। मैं संदिग्ध हो उठा, कुछ भयभीत भी। उन्होंने मुझे मार्कशीट न दी। यह कहते हुए मार्कशीट अपने पास रख ली कि ज़रा रुको, मुझसे मिलकर जाना। जब सभी सहपाठी अपनी-अपनी मार्कशीट लेकर क्लास से चले गए, तो पीछे केवल हम दो ही बचे, एक मैं और दूसरे टीचर। उन्होंने मुझे दो-चार पंक्तियाँ कही होंगी, लेकिन उनकी पंक्तियों ने मेरा नज़रिया बदल दिया, मेरी दिशा बदल डाली। उन्होंने कहा, ''क्या तुम्हें पता है कि तुम्हारे सप्लीमेंटरी आई है? चूंकि तुम्हारा बड़ा भाई मेरा अज़ीज मित्र है इसलिए मैं तुम्हें कहना चाहता हूँ कि तुम्हारा भाई हमारे साथ इसलिए चाय-नाश्ता नहीं करता कि अगर वह अपनी मौज-मस्ती में पैसा खर्च कर देगा, तो तुम शेष चार भाइयों की स्कूल की फीस कैसे जमा करवा पाएगा? तुम्हारा जो भाई अपना मन और पेट मसोसकर भी तुम्हारी फीस जमा करवाता है, क्या तुम उसे इसके बदले में यह परिणाम देते हो?

उस क्लास टीचर द्वारा कही गई ये पंक्तियाँ मेरे जीवन-परिवर्तन की प्रथम आधारशिला बनीं। उन्होंने न केवल मुझे अपने भाई के ऋण का अहसास करवाया, अपितु शिक्षा के प्रति बहुत गंभीर बना दिया और तब से प्रथम श्रेणी से कम अंकों से उत्तीर्ण होना मेरे लिए चुल्लुभर पानी में डूबने जैसा होता। मैं शिक्षा के प्रति सकारात्मक हुआ। माँ सरस्वती ने मुझे अपनी शिक्षा का पात्र बनाया। उन्होंने हायर सैकण्डरी परीक्षा उत्तीर्ण कर बी.कॉम. प्रथम वर्ष का अध्ययन प्रारम्भ किया, किंतु भविष्य उनसे कुछ और करवाना चाहता था।

श्री चन्द्रप्रभ के माता-पिता एवं ननिहाल पक्ष धार्मिक एवं ज्ञानमूलक संस्कारों से जुड़ा हुआ था। श्री चन्द्रप्रभ के माता-पिता के अंतर्मन में जैन धर्म के महान तीर्थ पालीताणा की 'नवाणु यात्रा करने का संकल्प जगा। वहाँ वे एक साध्वी के सम्पर्क में आए, जिनका नाम था पुष्पा श्री जी महाराज। श्री चन्द्रप्रभ के माता-पिता को उनकी वैराग्यभरी बातों ने प्रभावित किया। उन्होंने अपने शेष जीवन को धन्य करने के लिए दीक्षा धारण करने का मानस बनाया। उनके संत बनने की भावना से श्री चन्द्रप्रभ के छोटे भाई ललितजी भी प्रभावित हुए। तीनों ने एक साथ दीक्षा धारण की। अपने छोटे भाई के अस्वस्थ हो जाने पर श्री चन्द्रप्रभ ने उनकी सेवा-व्यवस्था सँभाली। वे अपनी साध्वी माँ श्री जितयशा जी एवं उनकी गुरुणी महान साध्वी श्री विचक्षण श्री जी महाराज के कहने पर धमतरी (छत्तीसगढ़) में आयोजित तत्त्व ज्ञान शिक्षण शिविर में शरीक हुए। वे वहाँ जैनधर्म के तत्त्व ज्ञान एवं शिविर-निदेशक कुमारपाल भाई की त्यागमयी जीवन-शैली से प्रभावित हुए। उन्होंने अपने माता-पिता की सेवा और आध्यात्मिक जीवन की ओर बढऩे का मानस बनाया। उनका साध्वी श्री विचक्षण श्री जी महाराज के पास भी काफी निकटता से रहने का अवसर बना। साध्वी जी को कैंसर था, पर उसके बावजूद 'तन में व्याधि मन में समाधि के आध्यात्मिक मंत्र को उन्होंने अपने जीवन में चरितार्थ किया। श्री चन्द्रप्रभ ने उनके पास रहकर भेद-विज्ञान के मर्म को समझा जिसे उन्होंने जीवन-भर जीने की सजगता रखी। कुल मिलाकर श्री चन्द्रप्रभ ने धर्म और अध्यात्म की नई उर्मि को हृदय में सँजोते हुए दीक्षा के रूप में प्रभु के पवित्र पथ पर कदम बढ़ाने का निर्णय कर लिया।

श्री चन्द्रप्रभ की दीक्षा माघ शुक्ला एकादशी, विक्रम संवत् 2036 सन् 1980 में 27 जनवरी को साढ़े सतरह वर्ष की अल्पायु में राजस्थान के बाड़मेर शहर में जैन जगत के परम प्रभावी आचार्य प्रवर श्री जिन कांतिसागर सूरिजी महाराज के कर-कमलों से सम्पन्न हुई। आचार्य प्रवर ने नवदीक्षित मुनि का नाम चन्द्रप्रभ सागर घोषित किया। खुद उतार-चढ़ाव से गुजरते हुए भी अंधेरी दुनिया को शांत, शीतल रोशनी प्रदान करना चन्द्रमा का मूल गुण है। इनकी दीक्षा के चार दिन बाद ही बाड़मेर से पालीताणा के लिए विशाल पैमाने पर चतुर्विध पदयात्रा संघ निकला जो कि इनके पुण्योदय का शुभ संकेत था।

दुनिया में सबसे बड़ा आध्यात्मिक रिश्ता गुरु-शिष्य का होता है। हमारे जीवन में गुरु अवश्य होना चाहिए। गुरु बनाना जितना सौभाग्यदायी होता है, उतना ही शिष्य बनना भी। संसार में ज्ञानदाता को गुरु कहा जाता है। माता-पिता और उपकारी जन भी गुरु माने जाते हैं। महोपाध्याय ललितप्रभ सागर महाराज गुरु की व्याख्या करते हुए कहते हैं, ''जो शिष्य को शिष्य नहीं रहने देता वरन् अपने समान बना देता है वही सच्चा गुरु है। गुरु गंगा, गायत्री, गाय, गीता और गोविंद से भी बढ़कर है। गुरु उस शिल्पकार की तरह है जो शिष्य रूपी अनघड़ पत्थर को पत्थर नहीं रहने देता वरन् प्रतिमा बना देता है। श्री चन्द्रप्रभ के अनुसार, ''गुरु धरती का चलता-फिरता मंदिर है। गुरु कोई व्यक्ति या वेश का नहीं, शांत सरोवर और ज्ञान सागर का नाम है जो जीवन में आता है और सोई हुई चेतना को जगा जाता है।

श्री चन्द्रप्रभ के दीक्षागुरु प्रसिद्ध आचार्य श्री जिन कांतिसागर सूरि जी म. थे जो जैन धर्म के खरतरगच्छ आम्नाय से थे।

दीक्षा लेते ही श्री चन्द्रप्रभ धार्मिक एवं शास्त्रीय अध्ययन में संलग्न हो गए। उन्होंने लगभग एक वर्ष तक आचार्यश्री के सान्निध्य में अध्ययन एवं प्रवास किया। फिर उनका अपने पिता-संत शासन-प्रभावक मुनिराज श्री महिमाप्रभ सागर जी महाराज तथा अपने बंधुवर्य मुनिवर श्री ललितप्रभ सागर जी महाराज के साथ अलग विहार-क्रम चालू हो गया। उन्होंने अहमदाबाद में लगभग एक वर्ष तक अध्ययन किया एवं दिल्ली में अनेक प्रोफेसरों के मार्गदर्शन में उन्होंने सात महीनों तक अध्ययन किया, फिर वे गहन अध्ययन के लिए बनारस आ गए, जहाँ पाश्र्वनाथ शोध संस्थान में उन्होंने लगातार तीन वर्ष तक संस्कृत, प्राकृत, हिन्दी, प्राचीन राजस्थानी, गुजराती, अंग्रेजी आदि भाषाओं के अतिरिक्त प्राचीन लिपी, भाषा-विज्ञान, आगम, शास्त्र, दर्शन, इतिहास, मनोविज्ञान, काव्यशास्त्र, पिटक, उपनिषद्, विधि-विधान, व्याकरण शास्त्र आदि विषयों पर गहन अध्ययन के साथ अनुसंधान भी किया। श्री चन्द्रप्रभ ने अपनी विहार यात्राओं में प्रबुद्ध मनीषियों से विद्याध्ययन एवं मार्गदर्शन का सुअवसर प्राप्त किया, जिनमें मुख्य रूप से शोध-निदेशक डॉ. सागरमल जैन, प्रो. भगवानदास जैन, डॉ. ओमप्रकाश शास्त्री, डॉ. छगनलाल शास्त्री, आचार्य विश्वनाथ द्विवेदी, श्री भँवरलाल नाहटा, प्रो. श्रीनारायण मिश्र आदि विद्वानों के नाम उल्लेखनीय हैं।

अपनी नैसर्गिक प्रतिभा को प्रखर करते हुए श्री चन्द्रप्रभ ने विद्या-अध्ययन में साहित्य-विशारद, साहित्य-रत्न, जैन सिद्धांत-प्रभाकर तक की उच्चतम परीक्षाएँ उत्तीर्ण कीं और जैन जगत के अद्भुत अष्टलक्षी महाकाव्य के रचयिता महोपाध्याय समयसुंदर पर महत्त्वपूर्ण शोध-कार्य किया, जिस पर उन्हें हिन्दी विश्वविद्यालय, प्रयाग ने 'महोपाध्याय की उपाधि से अलंकृत किया। उनका शोध-प्रबंध महोपाध्याय समयसुंदर : व्यक्तित्व एवं कृतित्व के रूप में प्रकाशित है जो विद्वत जगत में बहुत सम्मानित हुआ है। शोध-प्रबंध की शैली सीखने के लिए शोधार्थी आज भी इसका उपयोग करते हैं।

श्री चन्द्रप्रभ की भारतीय चिंतन, साहित्य एवं साधना के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण भूमिका है। उन्होंने तर्क-वितर्क भरी दार्शनिक शैली से मुक्त होकर चिंतन को जीवन सापेक्ष स्वरूप प्रदान किया और पारलौकिक स्वर्ग-नरक की परिभाषा से बाहर निकलकर इसी जीवन को स्वर्ग बनाने एवं इसी जीवन में नरक से बचकर रहने की प्रेरणा दी। वे न केवल एक महान गुरु, महाश्रमण और समाज-सुधारक हैं, अपितु विलक्षण प्रतिभा तथा सृजन क्षमता से सम्पन्न महामनीषी भी हैं। उन्होंने चिंतन, दर्शन, काव्यशास्त्र आदि वाङ्गमय के समस्त महत्त्वपूर्ण अंगों पर साहित्य का निर्माण कर एक नया कीर्तिमान स्थापित किया है। वास्तव में न केवल जैन साहित्य में अपितु सम्पूर्ण भारतीय साहित्य के प्रमुख साहित्यकारों में श्री चन्द्रप्रभ का नाम गौरव के साथ लिया जाता है। फुल सर्कल और हिन्द पॉकेट बुक जैसे राष्ट्रीय प्रकाशकों ने देश के महान पचास साहित्यकारों में श्री चन्द्रप्रभ को बड़े सम्मान के साथ समाहित किया है। फुल सर्कल, पुस्तक महल, हिन्द पॉकेट बुक, मनोज पब्लिकेशन जैसे राष्ट्रीय स्तर के प्रकाशकों ने उनका साहित्य विपुल मात्रा में प्रकाशित किया है। देश की सभी बुकस्टालों पर उनका साहित्य आम व्यक्ति को उपलब्ध रहता है। उनके साहित्य ने लोगों में किताबें पढऩे की रुचि जगाई। लोगों को शिव खेड़ा और प्र्रमोद बत्रा जैसे बड़े लेखकों के स्तर की किताबें श्री चन्द्रप्रभ के जरिये सहज सुलभ हो गई।

जीवन-निर्माण, पारिवारिक प्रेम, व्यक्तित्व-विकास और जीवन की सफलता से जुड़ी श्री चन्द्रप्रभ की शताधिक पुस्तकों ने घर-घर में प्रेम और प्रज्ञा के दीप जला दिये। देश भर के संतों में भी श्री चन्द्रप्रभ का साहित्य बड़े चाव के साथ पढ़ा जाता है। संत लोग अपने प्रवचन श्री चन्द्रप्रभ की पुस्तकों के आधार पर देते हैं क्योंकि श्री चन्द्रप्रभ की किताबें और उनके विचार पूरी तरह से जीवन के व्यावहारिक पहलुओं से जुड़े होते हैं इसलिए सीधे दिल को छूते हैं और जीवन के साथ लागू होते हैं। श्री चन्द्रप्रभ का साहित्य एक तरह से एक बहुत बड़ी क्रांति है, आम समाज के लिए दीप-शिखा की तरह मार्गदर्शक है, मील के पत्थर की तरह आगे से आगे रास्ता दिखाने वाला है।

श्री चन्द्रप्रभ के साहित्य पर समीक्षा करते हुए डॉ. नागेन्द्र ने लिखा है, ''उनका साहित्य कोई मनोरंजन का छिछला और सस्ता साधन नहीं है, वह तो जीवन के सूक्ष्म रहस्यों को उद्घाटित करने वाला स्रोत है। उनके साहित्य से स्पष्ट प्रतीत होता है कि वे सत्यग्राही हैं। वे देश-काल-जाति-धर्म की ग्रंथियों से मुक्त हैं। चारों तरफ उनका साहित्य-प्रवाह गतिशील रहा है। उनकी प्रवचन शैली लीक से हटकर एवं दिल-दिमाग को सीधी छूने वाली है। संतों के साहित्य मुख्यतया ईश्वर की उपासना, मोक्ष-प्राप्ति, वैराग्य, ध्यान साधना अथवा धर्म-अध्यात्म तक ही सीमित रहते हैं, पर श्री चन्द्रप्रभ ऐसे पहले संत हैं जिन्होंने इन सब पर तो गहरा चिंतन दिया ही है, साथ ही भटकती युवा पीढ़ी के लिए उन्होंने कॅरियर-निर्माण, व्यक्तित्व-निर्माण और संस्कार-निर्माण पर भी अपनी महान सोच दी है। यही कारण है कि सम्पूर्ण देश में श्री चन्द्रप्रभ एक ऐसे संत हैं जिनका साहित्य सबसे ज्यादा युवा पीढ़ी पसंद करती है और उसे अपने जीवन के लिए किसी रोशनदान की तरह मानती है। इससे जुड़ी कई घटनाएँ उनके पास रहने के कारण मुझे सुनने को मिली हैं जिसमें से एक घटना है -

एक 20 साल की बालिका ने श्री चन्द्रप्रभ को पंचांग प्रणाम कर कहा, ''आपके मार्गदर्शन से मैं कॉलेज में प्रथम आने में सफल हुई हूँ जिसके कारण आज पूरा परिवार और समाज मुझ पर गर्व कर रहा है। उन्होंने आश्चर्य से पूछा, ''आप तो मुझे अपरिचित नजर आ रही हैं, फिर आपको मेरा मार्गदर्शन कैसे प्राप्त हुआ? बालिका ने रहस्य उद्घाटित करते हुए कहा कि कुछ महीने पहले मेरा जन्मदिन था। मेरी सहेली ने मुझे जन्मदिन पर आप द्वारा लिखी पुस्तक 'लक्ष्य बनाएँ, पुरुषार्थ जगाएँ उपहार में दी थी। मैंने उसको पढ़ा तो मेरा खोया आत्मविश्वास जागृत हो गया, साथ ही कॅरियर बनाने के कुछ सरल टिप्स मिल गए। उन्हीं टिप्स की बदौलत मैं इस बार कॉलेज में प्रथम आ पाई।

इसी के साथ ही श्री चन्द्रप्रभ ने पंथ-परम्पराओं में पाये जाने वाले आडम्बरों और भेदों पर भी कबीर की तरह निर्भीकता से चोट की है। उन्होंने अपने साहित्य और जीवन-दृष्टि को साम्प्रदायिकता से पूरी तरह मुक्त रखा है। उनका साहित्य हर जाति-कौम द्वारा पढ़ा जाता है। उन्हें पढऩे वाला व्यक्ति उन्हें महज किसी संत या धर्माचार्य के रूप में नहीं देखता। उसे लगता है कि मानो एक मैनेजमेंट गुरु उसे जीवन जीने की कला सिखा रहा है।

श्री चन्द्रप्रभ चिंतक एवं दार्शनिक होने के साथ-साथ महान कवि, गीतकार एवं कहानीकार भी हैं। उन्होंने अतीत को ध्यान में रखकर वर्तमान को चिंतनधारा में मिलाते हुए उज्ज्वल भविष्य के आदर्श स्थापित करने में शत-प्रतिशत सफलता पाई है। श्री चन्द्रप्रभ की काव्य पुस्तिका 'प्रतीक्षा का अवलोकन करते हुए महान कवयित्री महादेवी वर्मा ने कहा था, ''इन कविताओं ने मेरी आत्मा को छू लिया है। श्री चन्द्रप्रभ ने उड़ीसा राज्य की यात्रा के दौरान उदयगिरि-खण्डगिरि की गुफाओं में साधना के लिए प्रवास किया। पूरे देश में लोकप्रिय ''जहाँ नेमि के चरण पड़े गिरनार की धरती है, वह प्रेम मूर्ति राजुल उस पथ पर चलती है भजन की रचना भी उन्होंने वहीं की थी।

श्री चन्द्रप्रभ की अब तक शताधिक पुस्तकें छप चुकी हैं, जिनका विस्तार से अध्ययन हम दूसरे अध्याय में करेंगे। उन्होंने जीवन के हर सकारात्मक पहलू का स्पर्श करते हुए धर्म, शिक्षा, नारी, अध्यात्म, ध्यानयोग, व्यक्तित्व-निर्माण, परिवार, स्वास्थ्य, मानवीय एकता, प्रेम, विश्वशांति, राष्ट्र-निर्माण जैसे हर क्षेत्र में नई एवं मौलिक अंतर्दृष्टि प्रदान की है। हर विषय पर उनकी अद्भुत पकड़ है। जहाँ तक लेखन-शैली का प्रश्न है, गद्य हो या पद्य दोनों में वे सिद्धहस्त नजर आते हैं। उन्होंने तार्किक शैली, संवाद शैली, दृष्टान्त शैली, प्रेरक प्रसंग और व्याख्यात्मक शैली का प्रभावी उपयोग किया है। भाषा, गुण, शैली, वर्णन-कौशल, रस, अलंकार, छन्द, सुभाषित, विचार इत्यादि सभी दृष्टियों से श्री चन्द्रप्रभ का साहित्य भारतीय साहित्य एवं दर्शन के गगन में चार चांद लगा रहा है। हिंदी साहित्य एवं भारत की ज्ञानमनीषा उनके गरिमापूर्ण व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर गौरवान्वित है।

भारतीय संस्कृति में उत्कृष्ट कार्य करने वालों को 'सम्मान प्रदान करने की गरिमामय परम्परा रही है। जिन्होंने धर्म, समाज, राष्ट्र के विकास में महत्त्वपूर्ण आहुतियाँ समर्पित कीं, उन्हें विशेष सम्मान देकर उनके प्रति कृतज्ञता अर्पित की जाती है। उपाधि से व्यक्ति महान नहीं बनता, वरन् महापुरुषों को पाकर उपाधियाँ स्वयं गौरवान्वित होती हैं।

श्री चन्द्रप्रभ अपने व्यक्तित्व एवं कृतित्व से मानव समाज के विकास में जो महत्त्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं वह अद्भुत है। उनके ओजस्वी व्यक्तित्व एवं कृतित्व के कारण अनेक संघों एवं संस्थाओं द्वारा समय-समय पर उन्हें प्रवचन-प्रभाकर, कविरत्न, व्याख्यान-वाचस्पति, सिद्धांत-प्रभाकर, साहित्य-विशारद, महामहोपाध्याय, राष्ट्र-संत जैसी अनेक सम्माननीय उपाधियों से अलंकृत किया गया, पर वे सदा उपाधियों से उपरत रहे। उन्होंने पद को भी परिग्रह माना और सन् 1988 में हम्पी की गुफा में साधना करते हुए उपलब्ध हुए आत्म-प्रकाश के बाद उन्होंने समस्त उपाधियों का त्याग कर दिया। वे अपने नाम के साथ किसी भी तरह की उपाधि का उपयोग करने के लिए मना करते हैं। वे कहते हैं, ''संत-पद अपने आप में सबसे बड़ा सम्मान है। इससे अधिक सम्मान की मुझे जरूरत नहीं है। उनका दृष्टिकोण है - कुदरत ने सम्मान सदा औरों को देने के लिए बनाया है, लेने के लिए नहीं। मान-सम्मान से खुद को मुक्त रखना निश्चय ही श्री चन्द्रप्रभ की एक महान साधना है।

नूतन मंदिरों में तीर्थंकर परमात्मा, गुरु, आचार्य, देवी-देवताओं की प्रतिमा को मंत्रोच्चार एवं विधि-विधान द्वारा स्थापित करना प्रतिष्ठा कहलाता है। गृहस्थों के मन में प्रभु-भक्ति के प्रति श्रद्धा पैदा करना ही इसका मुख्य लक्ष्य है। इससे धर्म की प्रभावना भी होती है। इसी उद्देश्य को लेकर श्री चन्द्रप्रभ द्वारा अनेक मंदिरों की प्रतिष्ठा कार्यक्रम सम्पन्न हुए हैं। उन्होंने सन् 1989 में गुजरात के सूरत में विश्वविख्यात सहस्रफणा पाश्र्वनाथ मंदिर, नागेश्वर पाश्र्वनाथ मंदिर और हरिपुरा दादावाड़ी की, सन् 1994 में मध्यप्रदेश के भोपाल स्थित आस्टा में श्री सीमंधर स्वामी मंदिर की, राजस्थान के जोधपुर में सन् 1995 में अजीत कॉलोनी कुंथुनाथ मंदिर की, सन् 1996 में सिंहपोल जैन मंदिर की, सन् 2002 में संबोधि धाम अष्टापद मंदिर की, सन् 2008 लालसागर जैन मंदिर की प्रतिष्ठाएँ करवाई।

भारतीय दर्शन में संस्कृति का हर दृष्टिकोण से महत्त्वपूर्ण स्थान है। आम जनमानस को हमारे सांस्कृतिक वैभव से परिचित करवाने के लिए श्री चन्द्रप्रभ के निर्देशन में झारखंड के सम्मेतशिखर महातीर्थ में सर्वप्रथम भव्य जैन म्यूजियम की स्थापना हुई, जहाँ प्रतिवर्ष हजारों श्रद्धालु पहुँचकर जैन संस्कृति से रूबरू होते हैं। जैनत्व को मानवीय एवं आध्यात्मिक दृष्टि से जनमानस को परिचित कराना जैन म्यूजियम का मुख्य उद्देश्य है। म्यूजियम के बाहर भगवान महावीर की मनोरम ध्यानस्थ प्रतिमा और भगवान पाश्र्वनाथ की योगमय दिव्य प्रतिमा विराजमान है। म्यूजियम में प्रवेश करते ही तीर्थंकरों एवं आदर्श पुरुषों के प्राचीन स्वर्ण-चित्र, ताड़पत्र पर लिखित शास्त्रों के नमूने, हाथीदाँत पर नक्काशी की गई जिन प्रतिमाएँ, चंदन काष्ठ पर अंकित शिल्प वैभव, देश व विदेश द्वारा जैन धर्म पर जारी डाक टिकटों का अनोखा संकलन दर्शित होता है। सूक्ष्म लिपिपत्र एवं चित्र, चावलों के दाने पर तीर्थंकरों की छवियों का अंकन, बदाम व काजू की आकृति में जिनत्व का परिदर्शन, प्रभावी चमत्कारी यंत्र, विविध प्रकार की मालाएँ, ताम्र एवं रजत पत्रों पर भगवान ऋषभ, लक्ष्मी, सरस्वती, पद्मावती आदि की उभरती छवियों से म्यूजियम में जैन संस्कृति का दिग्दर्शन छिपा हुआ नजर आता है।

श्री चन्द्रप्रभ की प्रेरणा से म्यूजियम में जैन तीर्थंकरों एवं महापुरुषों के जीवन से जुड़ी विभिन्न घटनाक्रमों को झाँकियों के माध्यम से संजीवित किया गया है। इसके अतिरिक्त म्यूजियम में श्री जितयशा फाउंडेशन का संपूर्ण साहित्य, वीसीडी एवं विश्वभर का प्रसिद्ध साहित्य भी अध्ययन के लिए रखा गया है। इस तरह यह म्यूजियम जैन संस्कृति एवं सभ्यता को उजागर करने वाला देश का प्रमुख केन्द्र है।

तत्पश्चात श्री चन्द्रप्रभ के मार्गदर्शन में राजस्थान प्रदेश के जोधपुर शहर में कायलाना रोड पर विख्यात साधना स्थली संबोधि धाम का निर्माण हुआ। जहाँ पहुँचने मात्र से मन को शांति मिलती है एवं अध्यात्म का प्रसाद प्राप्त होता है। संबोधि साधना मार्ग का राष्ट्रीय केन्द्र संबोधि धाम से प्रतिवर्ष व्यापक स्तर पर सामाजिक, मानवीय, साहित्यिक आदि अनेक सेवाएँ सम्पन्न होती हैं। वहाँ अष्टापद मंदिर, दादावाड़ी, गुरु मंदिर, संबोधि साधना सभागार, सर्वधर्म मंदिर, साहित्य मंदिर, स्वाध्याय मंदिर, जयश्रीदेवी मनस् चिकित्सा केन्द्र, गुरु महिमा मेडिकल रिलीफ सोसायटी निर्मित हैं एवं आवास व भोजन की सम्पूर्ण सुविधायुक्त व्यवस्था उपलब्ध है। यहाँ प्रतिवर्ष लाखों लोग पहुँचकर जीवन जीने के नए पाठ सीखते हैं। यहाँ आयोजित संबोधि ध्यान योग साधना के आवासीय शिविरों में भी पूरे देश से साधक पहुँचते हैं।

सत्साहित्य प्रकाशन के क्षेत्र में अपनी अग्रणी भूमिका निभाने वाली श्री जितयशा फाउंडेशन की स्थापना भी श्री चन्द्रप्रभ की प्रेरणा से हुई है। यह फाउंडेशन अब तक संतश्री ललितप्रभ जी एवं संतश्री चन्द्रप्रभ जी की सैकड़ों पुस्तकों का प्रकाशन कर चुका है। अल्पमोली, श्रेष्ठ तथा सुंदर साहित्य के प्रकाशन में यह संस्थान पूरे देश भर में लोकप्रिय है। श्री चन्द्रप्रभ ने गीताप्रेस, गोरखपुर से प्रेरणा लेकर इस फाउंडेशन का गठन किया। जीवन-विकास, संस्कार-निर्माण, कॅरियर-निर्माण, स्वास्थ्य लाभ, पारिवारिक समन्वय, राष्ट्र-निर्माण के साथ धर्म, अध्यात्म और ध्यान योग साधना पर इस संस्थान ने बहुतेरे प्रकाशन किए हैं। हालाँकि श्री चन्द्रप्रभ के साहित्य को देश के कई वरिष्ठ प्रकाशकों ने भी प्रकाशित किया है, तथापि उनका अधिकांश साहित्य इसी फाउंडेशन से प्रकाशित हुआ है। फाउंडेशन से प्रकाशित अल्पमोली साहित्य आमजनमानस में इतना लोकप्रिय होता है कि कोई भी पुस्तक एक वर्ष पूर्ण होने से पहले ही समाप्त हो जाती है। इण्डिया टूडे प्रकाशन समूह ने तो इस फाउंडेशन को अपने मुखपृष्ठ पर जगह दी है और इसे देश का गरिमापूर्ण प्रकाशक स्वीकार किया है।

संबोधि साधना मार्ग और व्यक्तित्व-निर्माण से जुड़े दिव्य वचनों को आम जनमानस तक पहुँचाने के लिए संबोधि टाइम्स नामक विचारप्रधान पत्रिका का प्रकाशन भी यही फाउंडेशन करता है जिसके पूरे देश में तकरीबन दो लाख पाठक हैं । देशभर में लाखों लोगों के विचारों को प्रभावित एवं प्रेरित करने वाली इस मासिक पत्रिका में श्रेष्ठ ज्ञान एवं पवित्र चिंतन को समाहित किया जाता है। जिंदगी को चार्ज करने वाली इस पत्रिका के पहले पृष्ठ पर श्री चन्द्रप्रभ के प्रकाशित होने वाले प्रेरक वक्तव्य आम जिंदगी को नई दिशा देते हैं। जैन म्यूजियम का निर्माण भी इसी फाउंडेशन ने करवाया जो कि पूर्वी भारत में अपने आप में अनूठा और अद्भुत है। प्रवचनों का राष्ट्रव्यापी प्रभाव

श्री चन्द्रप्रभ के न केवल साहित्य में वरन् प्रवचनों में भी जादू है, उनका एक बार प्रवचन सुन लेने वाला व्यक्ति इस तरह सम्मोहित हो जाता है कि जीवनभर उन्हीं को सुनना चाहता है। उनके प्रवचनों का व्यक्तित्व पर ऐसा प्रभाव पड़ता है कि व्यक्ति स्वत: ही बदल जाता है। सबसे खास बात यह है कि उनके प्रवचनों की शैली, शब्दचयन, लयबद्धता, क्रमबद्धता, विषय-विवेचन इतना सरल, संजीदा और प्रभावशाली होता है कि बच्चे से लेकर वृद्ध व्यक्ति के मानस-पटल पर अमिट अक्षरों की तरह अंकित हो जाता है। श्री चन्द्रप्रभ जहाँ पर भी प्रवचन देते हैं, उन्हें सुनने हजारों लोग उमड़ते हैं। वस्तुत: उनके प्रवचनों में ऊँची एवं ऊपरी बातें कम व्यावहारिक बातें अधिक होती हैं। भीलवाड़ा के पूर्व कलेक्टर राजीव सिंह ठाकुर का कहना है, ''पूज्यश्री के प्रवचनों ने जनमानस पर जो जबरदस्त प्रभाव डाला है वह अपने आप में एक ऐतिहासिक काम है। संगम गु्रप, भीलवाड़ा के चेयरमैन रामपाल सोनी के अनुसार, ''अत्यधिक व्यस्तता होने के बावजूद मैंने अनेक बार आजाद चौक में पहुँचकर इन राष्ट्रीय संतों के संदेशों को सुना। इनकी हर बात इतनी सीधी, सरल और सटीक होती है कि अनायास ही हृदय में उतर जाती है। उनके प्रवचन-प्रभावक ता से जुड़े कुछ प्रसंग इस प्रकार हैं -

कुलपति हुए आह्लादित - सन् 1985 में श्री चन्द्रप्रभ सहयोगी संतों के साथ कोलकाता में चातुर्मास कर रहे थे। उनके साहित्य महोपाध्याय के शोध-प्रबंध का वायवा (साक्षात्कार) लेने हेतु हिन्दी विश्वविद्यालय, इलाहाबाद के कुलपति डॉ. प्रभात शास्त्री दो अन्य प्रोफेसरों के साथ आए थे। दोपहर में शोध-प्रबंध के बारे में परिचर्चा होने वाली थी। उस दिन सुबह 9.00 से 10.30 बजे तक 'साधना के प्रयोग पर श्री चन्द्रप्रभ का दिव्य सत्संग होना था। डॉ. प्रभात शास्त्री सहित सभी प्रोफेसरों ने उनके प्रवचन का श्रवण किया और अंतत: शास्त्री जी ने खड़े होकर कहा, ''मैं आया तो हूँ इनके शोध-प्रबंध का वायवा लेने के लिए, पर साधना पर दिए गए इनके सत्संग को सुनकर मैं इतना आह्लादित हो उठा हूँँ कि मन ही मन इनको अपना गुरु मान बैठा हूँ। मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि इनका क्या वायवा लूँ।

गुरुजी ने थपथपाई पीठ - नागेश्वर तीर्थ में सन् 1982 में दादावाड़ी की प्रतिष्ठा का महोत्सव था। इस दौरान जैन धर्म की महान साध्वी विचक्षणश्री जी महाराज की प्रथम पुण्य तिथि का कार्यक्रम था। आचार्य श्री जिन उदयसागर सूरि जी महाराज, आचार्य श्री जिन कांतिसागर सूरी जी महाराज, मुनि श्री जयानंद जी, साध्वी श्री चन्द्रप्रभा श्री जी महाराज, साध्वी मणिप्रभा श्री जी महाराज आदि सभी के प्रवचन हुए। 12 बज चुके थे और कार्यक्रम समाप्ति की ओर था। तभी साध्वी श्री चन्द्रप्रभा महाराज ने आचार्यजी से निवेदन किया कि चन्द्रप्रभ जी को इस अवसर पर बोलवाया जाए। पहले तो मना किया गया, पर जब दो बार आग्रह किया गया तो आचार्यजी ने श्री चन्द्रप्रभ को भी बोलने के लिए कहा। आचार्यजी का आदेश था, उन्हें बोलना पड़ा। वे लगभग 25 मिनट बोले होंगे, आचार्यजी चलते प्रवचन में खड़े हुए और चन्द्रप्रभ की पीठ थपथपाते हुए कहा, ''तुम्हारा प्रवचन सुनकर तो हम सब आत्मविभोर हो गए हैं। जरूर तुम बड़े होकर मेरा नाम रोशन करोगे। श्री चन्द्रप्रभ कहते हैं कि गुरु के ये वचन मेरे लिए आशीर्वाद के समान हैं। उन्होंने ऐसा करके मेरा उत्साह बढ़ाया।

प्रवचन-प्रभाकर की दी उपाधि - सन् 1984 की बात है। बनारस में श्री चन्द्रप्रभ अध्ययन हेतु प्रवासरत थे। स्थानकवासी जैन परम्परा के वरिष्ठ एवं प्रभावी संत हुकुमचंद जी महाराज का बनारस में आगमन हुआ। पाश्र्वनाथ शोध संस्थान में सामूहिक प्रवचन का कार्यक्रम रखा गया। श्री चन्द्रप्रभ ने लगभग पौन घंटे का प्रवचन दिया। जब हुकुमचंद जी महाराज ने उनका प्रवचन सुना तो वे गद्गद हो उठे। उन्होंने धर्मसभा में कहा, ''मैंने प्रवचन तो कइयों के सुने, पर अंतरात्मा को जो आनंद संत श्री चन्द्र्रप्रभ को सुनकर मिला वह कभी न मिला। मैंने ऐसा हृदय को छूने वाला प्रवचन पहले कभी नहीं सुना। ये वास्तव में समाज के सूर्य हैं। मैं इन्हें प्रवचन-प्रभाकर के गौरव से अंलकृत करता हूँ।

श्री चन्द्रप्रभ की देश के लगभग हर बड़े शहरों के मैदानों में विशाल एवं प्रभावशाली प्रवचनमालाएँ हुई हैं जिसमें चैन्नई के साहूकार पेठ, कलकत्ता के कलाकार स्ट्रीट, पूना के शुक्रवार पेठ, बैंगलोर के चिकपैठ, इंदौर के दशहरा मैदान, नीमच का दशहरा मैदान, मंदसौर के संजय गांधी उद्यान, जयपुर के राजमंदिर थियेटर व दशहरा मैदान, जोधपुर के गाँधी मैदान, भीलवाड़ा के आजाद चौक, उदयपुर के टाउन हॉल मैदान, पाली के अणुव्रत नगर मैदान, चित्तौडग़ढ़ के गोरा बादल स्टेडियम, निम्बाहेड़ा के कृ षि मण्डी मैदान, अजमेर के बर्फखाना मैदान में हुई प्रवचनमालाएँ मुख्य हैं।

श्री चन्द्रप्रभ जीवन, व्यक्तित्व, कॅरियर, स्वास्थ्य, धर्म, परिवार, समाज, राष्ट्र, विश्व, अध्यात्म से जुड़े हर विषय पर, हर पहलू पर बोलते हैं और लीक से हटकर विचार रखते हैं। उनके प्रवचनों में बीस-बीस, पच्चीस-पच्चीस हजार तक की जनसमुदाय की उपस्थिति देखी गई है। जिसमें युवावर्ग की संख्या सबसे अधिक होती है। वे जीवन-निर्माण के अंतर्गत जीने की कला, सकारात्मक सोच, प्रभावी व्यवहार, मानसिक विकास, बोलने की कला जैसे विषयों पर प्रवचन देते हैं। ये प्रवचन जीवन की डिस्चार्ज बेटरी को चार्ज करने का काम करते हैं। व्यक्ति हँसी और खुशी से सरोबार हो जाता है। वे व्यक्तित्व एवं कॅरियर-निर्माण के अंतर्गत व्यक्तित्व विकास, लाइफ मैनेजमेंट, आत्मविश्वास, प्रतिभा और किस्मत से जुड़े विषयों को छूते हैं। ये प्रवचन युवा पीढ़ी के लिए रामबाण औषधि का काम करते हैं। उनकी मायूसी और निराशाएँ छँट जाती हैं। व्यक्ति अपने आपको आत्मविश्वास से परिपूर्ण महसूस करता है। उन्होंने स्वास्थ्य-निर्माण के अन्तर्गत चिंता-तनाव मुक्ति, नशे से छुटकारा, घरेलु चिकित्सा, मानसिक एकाग्रता, खुशहाली, योग और ध्यान पर अनेक प्रवचन दिए हैं। स्वास्थ्य से जुड़ा उनका समसामयिक विवेचन शारीरिक एवं मानसिक चिकित्सा का काम करता है। उनके विचारों से प्रभावित होकर अब तक लाखों लोग दुव्यर्सनों को जीतने में सफल हुए हैं और हजारों लोग शारीरिक-मानसिक रूप से पूर्णत: स्वस्थ हुए हैं।

श्री चन्द्रप्रभ के परिवार-निर्माण पर अति रसभीने, भावुक और मार्मिक प्रवचन होते हैं, जिससे व्यक्ति की आत्मा हिल जाती है। वे पारिवारिक उत्थान के अंतर्गत बच्चों का भविष्य, रिश्तों में मिठास, वसीयत लेखन, बुढ़ापा, मित्र, माँ की ममता, घर-परिवार आदि विषयों पर मार्गदर्शन देते हैं। उनके प्रवचनों के प्रभाव से अब तक हजारों टूटे परिवार जुड़े हैं, रिश्तों में कटुताएँ कम हुई हैं, माता-पिता बच्चों के संस्कारों के प्रति जागरूक हुए हैं, वृद्ध लोगों में उत्साह का संचार हुआ है, बेटे-बहू माता-पिता को भगवान मानकर सेवा करने लगे हैं।

श्री चन्द्रप्रभ ने अपने प्रवचनों में धर्म को नया स्वरूप दिया है। उन्होंने धर्म को जीवन से जोडऩे की सीख दी है। वे क्रियागत धर्म की बजाय मानवीय धर्म में अधिक आस्था रखते हैं। वे धर्म के अंतर्गत धर्म का युगीन स्वरूप, नवकार-गायत्री मंत्र का रहस्य, तपस्या, प्रभुभक्ति, सर्वधर्मसद्भाव, जीने की आध्यात्मिक शैली से जुड़े विषयों पर मार्गदर्शन देते हैं। इन प्रवचनों के प्रभाव से व्यक्ति की धार्मिक संकीर्णता की दृष्टि विराट हुई है। लोग जीवनगत धर्म को जीने लगे हैं। उनके प्रभाव से लाखों जैनी गायत्री मंत्र का और लाखों हिन्दू नवकार मंत्र का जाप करने लगे हैं जो कि अपने आप में धार्मिक एकता की मिसाल है।

श्री चन्द्रप्रभ अपने प्रवचनों में समाज-निर्माण का भी कार्य करते हैं। वे सामाजिक उत्थान और सामाजिक दूरियों को कम करने का बेहतरीन मार्गदर्शन देते हैं। उनके प्रवचनों से सामाजिक समरसता का अद्भुत वातावरण बनता है। यही वे पहले जैन संत हैं जिन्होंने भगवतगीता पर जोधपुर के गीताभवन में अठारह दिन तक लगातार प्रवचन दिए। वे जितना महावीर पर प्रेम से बोलते हैं, उतना ही राम, कृष्ण, मोहम्मद, जीसस एवं नानक पर बोलते हैं। इसी का परिणाम है कि उनके प्रवचनों में छत्तीस कौम के जैन, हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई लोग आते हैं।

श्री चन्द्रप्रभ राष्ट्र-भक्त हैं। वे राष्ट्र-निर्माण हेतु प्रतिबद्ध हैं। उन्होंने भारतीय संस्कृति के नैतिक मूल्यों को आधुनिक ढंग से पूरे विश्व में फैलाया है। वे राष्ट्र-निर्माण के अंतर्गत राष्ट्रीय गौरव, भारत की समस्याएँ एवं समाधान, नैतिक मूल्य, राजनीतिक आरक्षण, दुव्र्यसन, युवा वर्ग के दायित्व, विश्वशांति, अणुबम-अणुव्रत जैसे विषयों पर क्रांतिकारी प्रवचन देते हैं। उनके सान्निध्य में जोधपुर के गाँधी मैदान में, भीलवाड़ा के आजाद चौक में, नीमच के दशहरा मैदान में विराट सर्वधर्म सम्मेलन भी सम्पन्न हुए हैं, जिसमें सभी धर्मों के धर्मगुरुओं ने सम्मिलित होकर अनेकता में एकता का स्वर बुलंद किया है।

श्री चन्द्रप्रभ आध्यात्मिक गुरु हैं। उन्होंने संबोधि ध्यान साधना के मार्ग को, भारतीय अध्यात्मएवं ध्यान योग साधना को देश-विदेश के कोने-कोने तक पहुँचाया है। वे अध्यात्म के अंतर्गत मौन, आभामण्डल, वीतरागता, ध्यान-साधना, योग-रहस्य, अनुप्रेक्षा व विपश्यना, मृत्यु या मुक्ति, भेद-विज्ञान जैसे विषयों पर श्रेष्ठ मार्गदर्शन देते हैं। श्री चन्द्रप्रभ के तकरीबन 1000 से अधिक प्रवचनों के अनुपम वीडियो सेट जारी हुए हैं। उनका 'माँ की ममता हमें पुकारें प्रवचन अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित हुआ है।

भारत में पदयात्रा का बहुत बड़ा महत्त्व रहा है। जैन धर्म एवं परम्परा के लगभग सभी साधु-साध्वियाँ पैदल यात्रा करते हैं। गाँव-गाँव तक धर्म की गंगा बहाते हैं। हजार परिवर्तन होने के बावजूद जैन धर्म में यह परम्परा अभी भी अक्षुण्ण है। श्री चन्द्रप्रभ मानवीय कल्याण की पवित्र भावना से अब तक देश के 20 राज्यों की यात्रा करते हुए लगभग तीस हजार किलोमीटर पैदल चल चुके हैं। उनका सान्निध्य गुजरात - अहमदाबाद, भावनगर, पालीताणा, सूरत, बड़ौदा, भरूच, नवसारी, महाराष्ट्र - पूना, सतारा, बोम्बे, कोल्हापुर, कर्नाटक - बैंगलोर, हुबली, बेल्लारी, बेलगाँव, मैसूर, तमिलनाडू - चैन्नई, कोयम्बटूर, पांडिचेरी, कडलूर, नीलगिरि की पहाडिय़ाँ, वैल्लूर, इरोड़, सैलम, आंध्रप्रदेश - विशाखापट्टनम, नैल्लूर, पश्चिम बंगाल - कोलकाता, वीरभूम, खडग़पूर, सेथिया, मायापुरम, बिहार - सम्मेतशिखर, पावापुरी, बौद्धगया, क्षत्रिय कुण्ड, वैशाली, उत्तरप्रदेश - बनारस, वाराणसी, इलाहाबाद, आगरा, कानपुर, अलीगढ़, मथुरा, उत्तरांचल - ऋषिकेश, हरिद्वार, हिमालय, गंगोत्री, उत्तरकाशी, टेहरी, हस्तिनापुर, राजस्थान - जयपुर, जोधपुर, बीकानेर, बाड़मेर, भीलवाड़ा, उदयपुर, कोटा, पाली, चित्तौडग़ढ़, निम्बाहेड़ा, अजमेर, नाकोड़ा, नागौर, बिजयनगर, ब्यावर, मध्यप्रदेश - नीमच, इंदौर, रतलाम, उज्जैन, झाबुआ, जावरा, मंदसौर, आस्टा, दिल्ली, हरियाणा - फरीदाबाद, गुडग़ाँव, झारखंड - शिखरजी, गिरडीह आदि नगरों-महानगरों को मिला। ये देश-प्रदेश ऐसे हैं जहाँ श्री चन्द्रप्रभ के प्रवचनों की विशाल जनसभाएँ हुईं, इन स्थानों पर उनका ज्यादा दिनों तक रुकना हुआ। इनके अलावा भी ऐसे सैकड़ों क्षेत्र हैं जहाँ उनकी प्रवचन-सभाएँ तो नहीं हुईं, पर श्रद्धालुओं ने उनके सान्निध्य का लाभ जरूर उठाया।

श्री चन्द्रप्रभ के द्वारा अब तक किए गए चातुर्मास इस प्रकार है - सन् 1980 में पालीताणा, 1981 में अहमदाबाद, 1982 में दिल्ली, 1983 व 1984 में वाराणसी, 1985 में कलकत्ता, 1986 व 1987 में मद्रास, 1988 में पूना, 1989 में उदयपुर, 1990 में जोधपुर, 1991 में ऋषिकेश, 1992 में आगरा, 1993 में इंदौर, 1994, 1995 व 1996 में जोधपुर, 1997 में बीकानेर, 1998 में नागौर, 1999 में जयपुर, 2000 में अजमेर, 2001 में श्री नाकोड़ा तीर्थ, 2002 में नीमच, 2003 में जयपुर, 2004 में भीलवाड़ा, 2005 में बाड़मेर, 2006 में जोधपुर, 2007 में भीलवाड़ा, 2008 में जोधपुर, 2009 में इंदौर, 2010 में अजमेर, 2011 में उदयपुर, 2012 में जोधपुर।

श्री चन्द्रप्रभ के जीवन-वृत्त पर दृष्टिपात करने से एक अलग तरह के व्यक्तित्व का रूप निखर कर आता है। डॉ. नागेन्द्र ने लिखा है, ''सचमुच उनका व्यक्तित्व एवं कृतित्व बहुआयामी है, उनका साहित्य ही उनके व्यक्तित्व का दर्पण है। व्यक्ति कैसा है यह उसके कृत्यों से या कृतियों से उजागर होता है। श्री चन्द्रप्रभ शिखर पुरुष हैं। उनकी आध्यात्मिक साधना एवं साहित्यिक विद्वत्ता से यह बात उजागर होती है। उनका जीवन बहुमुखी व्यक्तित्व को समेटे हुए है। उनकी कृतियाँ भी महान हैं एवं उनका व्यक्तित्व भी।

श्री चन्द्रप्रभ के साहित्य के अवलोकन से यह ज्ञात होता है कि वे महान जीवन द्रष्टा, मानवता के महर्षि, ज्ञान के शिखर पुरुष, विशाल साहित्य के सर्जक, शोध मनीषी, आगम-ज्ञाता, गीता-मर्मज्ञ, देश के शीर्षस्थ प्रवचनकार, मनोवैज्ञानिक शैली के जनक, हर समस्या के तत्काल समाधानकर्ता, जीवंत काव्य के रचयिता, शब्दों के कमाल के जादूगर, सहज जीवन के मालिक, सौम्य व्यवहार के धनी, शिष्टता और मर्यादा की जीवंत मूर्ति, प्रेम की साक्षात प्रतिमा, परम मातृभक्त, भ्रातृत्व प्रेम की अनोखी मिसाल, पारिवारिक प्रेम एवं सामाजिक समरसता के अग्रदूत, राष्ट्रीय चेतना के उन्नायक, निष्काम कर्मयोग के प्रेरक, क्रांति के पुरोधा, धर्म को युग के अनुरूप बनाने के प्रेरक, सफल मनोचिकित्सक एवं आरोग्यदाता, सफलता के गुर सिखाने वाले पहले संत, सत्य के अनन्य प्रेमी, सर्वधर्मसद्भाव के प्रणेता, आध्यात्मिक चेतना के धनी, मौन-महाव्रती, संबोधि साधना मार्ग के प्रवर्तक, शांतिदूत, गीतकार एवं आम जनता के करीब हैं। उनके व्यक्तित्व के महत्त्वपूर्ण पहलू इस प्रकार हैं।

श्री चन्द्रप्रभ महान जीवन-द्रष्टा हैं। वे शास्त्रों से भी ज्यादा जीवन के अध्ययन को महत्त्व देते हैं। उन्होंने जीवन की बारीकियों का अध्ययन किया है जो उनके साहित्य में स्पष्ट रूप से नजर आता है। उन्होंने जीवन को सबसे मूल्यवान तत्त्व बताया है। उन्होंने जीवन को वीणा के तारों की तरह साधने की प्रेरणा दी है। वे अतिभोग के साथ अतित्याग के भी खिलाफ हैं । उन्होंने धरती का पहला शास्त्र मनुष्य का जीवन, दूसरा शास्त्र जगत, तीसरा शास्त्र प्रकृति और चौथा शास्त्र धर्म-अध्यात्म की पवित्र किताबों को माना है। वे कहते हैं, ''सीखने, पाने और जानने की ललक हो तो सृष्टि के हर डगर पर वेद, कुरआन, बाइबिल के पन्ने खुले और बोलते हुए नजर आ जाएँगे।

श्री चन्द्रप्रभ ने जीवन सापेक्ष धर्म को जन्म देने के लिए जीवन-जगत के सार-असार दोनों पहलुओं को समझना आवश्यक माना है। उन्होंने अपना अनुभव बताते हुए लिखा है, ''कोई अगर मुझसे पूछे कि आपका धर्म और धर्मशास्त्र कौन-सा है, तो मेरा सीधा-सा जवाब होगा - जो धर्म मनुष्य का होता है, वही मेरा धर्म है और जिस प्रकृति ने इतने विचित्र और अद्भुत जगत की रचना की है, यह जगत और जगत पर पल्लवित होने वाला जीवन ही मेरा शास्त्र है। किताबों के नाम पर मैंने ढेरों किताबें पढ़ी हैं, न केवल पढ़ी हैं, वरन् ढेरों ही मैंने कही और लिखी हैं, पर कोई अगर कहे कि मुझे सबसे सुंदर किताब कौन-सी लगी है तो मैं कहूँगा कि इस जगत से बढ़कर कोई श्रेष्ठ किताब नहीं है और जीवन से बढ़कर कोई शास्त्र नहीं है। उन्होंने जीवन-जगत को समझे बिना गीता-रामायण-महाभारत को पढऩा परिणामदायी नहीं बताया है। वे राम-कृष्ण-महावीर-बुद्ध से पहले जीवन से प्रेम करने की सिखावन देते हैं। श्री चन्द्रप्रभ ने जीवन को प्रभु प्रदत्त श्रेष्ठ उपहार माना है।


गुरुदेव श्री

श्री चन्द्रप्रभ की महान जीवन-दृष्टि को व्यक्त करती कुछ घटनाएँ इस प्रकार हैं-



जीवन को कैसे जीऊँ - एक युवक ने श्री चन्द्रप्रभ के चरणों में फूल चढ़ाते हुए कहा - गुरुजी, आज मेरा जन्मदिन है और मैं यह जानने आया हूँ कि जीवन को कैसे जीयूँ ताकि सदा खुश और प्रसन्न रह सकँ। श्री चन्द्रप्रभ ने युवक को आशीर्वाद देते हुए कहा - पहले यह बताओ कि अगर इन फूलों को किसी राजमहल में रख देंगे तो क्या होगा? युवक ने कहा - ये फूल वहाँ खुशबू बिखेरेंगे। श्री चन्द्र्रप्रभ ने युवक से दोबारा पूछा - अगर इन्हें मंदिर या किसी किराणे की दुकान पर रख देंगे तो क्या होगा? युवक ने पुन: जबाव दिया कि ये वहाँ भी महक फैलाएँगे। श्री चन्द्रप्रभ ने कहा - मेरा अंतिम सवाल है कि अगर इन फूलों को कहीं गंदगी के ऊपर फेंक देंगे तो...? युवक ने कहा - ये वहाँ पर भी खुशबू ही बिखेरेंगे। श्री चन्द्रप्रभ ने युवक को समझाते हुए कहा - बस, आनंदपूर्ण जीवन जीने का राज इतना-सा है कि जीवन में चाहे जैसी परिस्थिति आए, हम चाहे राजमहल में रहें या सड़क पर, फूलों की तरह हर जगह अपनी खुशबू बिखेरते रहें और हर परिस्थति में महकते रहें।

बोलने से पहले किन बातों का ध्यान रखें - एक युवक ने श्री चन्द्रप्रभ से पूछा - बोलने से पहले किन बातों का ध्यान रखना चाहिए ताकि कभी तकरार वाली नौबत न आए। उन्होंने युवक को कुछ पंख दिए और उसे बाहर फेंककर आने के लिए कहा। युवक फेंककर आ गया। युवक ने कहा - मेरे सवाल का जवाब? उन्होंने कहा - मैंने तो दे दिया। युवक ने कहा - मैं समझा नहीं। उन्होंने कहा - जाओ, जो पंख आपने बाहर फेंके हैं उन्हें वापस ले आओ। युवक ने वापस आकर कहा - वे तो उड़ गए, उन्हें अब वापस समेटना मुश्किल है। उन्होंने कहा - जैसे उड़े हुए पंखों को वापस समेटना संभव नहीं है वैसे ही बोलने के बाद शब्दों को वापस लेना भी संभव नहीं है। इसलिए बोलने से पहले मुस्कुराओ और फिर सामने वाले का अभिवादन कर मीठी, उपयोगी व शिष्टतापूर्ण भाषा बोलो।

जीवन भर खुश कैसे रहें - संबोधि धाम, जोधपुर में बाहर से यात्री-संघ आया हुआ था। खुशी-नाखुशी की चर्चा चल रही थी। एक यात्री ने श्री चन्द्रप्रभ से पूछा - हम कभी खुश रहते हैं तो कभी नाखुश। क्या ऐसा कोई सरल नुस्खा है कि हम जीवन भर खुश रहें? उन्होंने कहा - हाँ, अगर एक घंटे की खुशी चाहते हो तो जहाँ बैठे हो वहीं झपकी ले लो। एक दिन की खुशी चाहिए तो दुकान-ऑफिस से छुट्टी ले लो और आस-पास पिकनिक मनाने चले जाओ। एक सप्ताह की खुशी चाहते हो तो किसी हिल स्टेशन - माउण्ट आबू, मसूरी, दार्जलिंग घूमने चले जाओ। एक महीने की खुशी चाहते हो तो किसी से शादी कर लो। साल भर की खुशी चाहते हो तो किसी करोड़पति के गोद चले जाओ, पर यदि जीवनभर की खुशी चाहते हैं तो अपने स्वभाव को मीठा व मधुर बना लो ।

नाखुशी के 'ना को हटाएँ - एक व्यक्ति को अखबार में राशिफल देखने का शौक था। अगर राशिफल अच्छा लिखा आता तो वह दिनभर प्रसन्न रहता और राशिफल अच्छा लिखा नहीं आता तो वह दिनभर उदास हो जाता। रोज-रोज अखबार देखने की झंझट से बचने के लिए वह एक पंडित के पास पहुँचा और अपनी समस्या रखी। पंडित ने उसे एक सिक्का बनवाकर दिया - जिस पर एक ओर खुशी खुदी थी तो दूसरी ओर नाखुशी। वह सुबह उठते ही सिक्का उछालता। अगर खुशी आती तो वह खुश हो जाता और नाखुशी आती तो नाखुश। एक दिन वह व्यक्ति मुँह लटकाए गुरुदेव श्री चन्द्रप्रभ जी के पास बैठा था। गुरुजी ने पूछा - आप दुखी क्यों हैं? उसने कहा - आज मेरे भाग्य में नाखुशी लिखी हुई है। गुरुदेवश्री ने पूछा - कारण? उसने सिक्के वाली बात बताई और गुरुदेवश्री से कहा - आप सिक्के पर कुछ तंत्र-मंत्र कर दीजिए ताकि हमेशा खुुशी ही आए। गुरुदेवश्री ने कहा - आप आज से चिंता छोड़ दीजिए। सात दिन बाद मुझसे सिक्का ले जाना, आपके चमत्कार हो जाएगा। सात दिन बाद उस व्यक्ति ने सिक्का ले लिया। अब तो वह व्यक्ति हर दिन खुश रहता। सप्ताह में सात दिन और महिने में तीस दिन खुश। उसने गुरुदेवश्री से पूछा - आखिर आपने यह चमत्कार कैसे कर दिया? अति आग्रह से पूछे जाने पर गुरुदेवश्री ने कहा - मैंने कुछ नहीं किया, बस नाखुशी के 'ना को घिसकर मिटा दिया। अब चित गिरे तो भी खुशी और पुट गिरे तो भी खुशी। व्यक्ति यह सुनकर आश्चर्यचकित रह गया। गुरुदेवश्री ने कहा - जीवन को आनंदपूर्ण बनाने का राज इतना-सा है कि जो जिंदगी में से नकारात्मकता के 'न को हमेशा के लिए हटा देता है और हर कार्य को मुस्कुराते हुए करता है वह सदा खुश रहता है। सकारात्मकता ही सफलता का प्रथम मंत्र है।

मानवता के महर्षि


श्री चन्द्रप्रभ मानवतावादी संत हैं। वे मानवता से बेहद लगाव रखते हैं। उनके यहाँ अमीर-गरीब, गोरे-काले अथवा ऊँच-नीच की भेदरेखा नहीं है। उनके साहित्य में सर्वत्र मानवीय दृष्टि उजागर हुई है। वे न केवल मानवीय कल्याण की बात कहते हैं वरन् वे मानवीय सेवा के अनेक प्रकल्प भी चला रहे हैं। उनकी दृष्टि में, सभी मानव महान एवं आदरणीय हैं। वे जाति और रंग की बजाय इंसानियत को मूल्य देने, मानवता की पूजा करने का पाठ सिखाते हैं। वे अच्छा जैन, हिन्दू, मुस्लिम, सिख अथवा ईसाई बनने की बजाय अच्छा इंसान बनने की प्रेरणा देते हैं। वे कहते हैं, ''अच्छा जैन, अच्छा हिन्दू, अच्छा मुसलमान अच्छा इंसान हो यह जरूरी नहीं है, पर अच्छा इंसान अपने आप में अच्छा जैन भी होता है और अच्छा हिन्दू और मुसलमान भी। इस तरह उन्होंने धर्म, पंथ, परम्परा से ज्यादा मानवता को महत्त्व दिया है।

श्री चन्द्रप्रभ मानवीय उत्थान एवं प्राणीमात्र के कल्याण की भावना से सदा ओतप्रोत रहते हैं। उनका मानना है, ''महत्त्व इसका नहीं है कि हमारे कितने सेवक हैं, बल्कि इसका है कि हममें कितना सेवाभाव है। श्री चन्द्रप्रभ ने सर्वधर्म सद्भाव, मानवीय एकता एवं प्राणी मात्र की पर विशेष रूप से बल दिया है। वे सेवा धर्म को परमात्म-पूजा और प्रभु-प्रार्थना के तुल्य बताते हैं। वे कहते हैं, ''मानवता की सेवा करने वाले हाथ उतने ही धन्य होते हैं, जितने परमात्मा की प्रार्थना करने वाले होंठ। उनका मानना है, ''किसी पीडि़त व्यक्ति की सेवा में लगा हुआ हाथ परमात्मा की पूजा के समान है। उन्होंने संतों को भी समाज की सेवा करने की प्रेरणा दी है और समाजोत्थान की भावना रखने वाले संतों की आवश्यकता को अनिवार्य बताया है। उनका कहना है, ''समाज को वे संत चाहिए जो समाज-सेवा और मानवीय-उत्थान को अपना धर्म समझें। उन्होंने अनेक जगह सामाजिक बैंकों की स्थापना की है जो गरीब एवं जरूरतमंद लोगों को बिना ब्याज के ऋण देकर उन्हें पाँवों पर खड़ा कर सामाजिक उत्थान का कार्य कर रही हैं। इससे जुड़ी विशेष घटना है -

ऐसे हुआ सामाजिक बैंक का निर्माण - श्री चन्द्रप्रभ का चातुर्मास बाड़मेर शहर में था। वे प्रतिदिन 20-30 घरों में गोचरी (आचारचर्या) हेतु जाते थे। लगभग 3000 घर वे पधारे। दीपावली का समय था। वे आचारचर्या हेतु घरों में जा रहे थे। वे एक घर में पहुँचे। श्री चन्द्रप्रभ को देखते ही घर में बैठी तीन बहिनों के आँसू आ गए। कारण पूछा तो बताया कि हमारे पिताजी नहीं रहे। हम पापड़शाला में काम करके अपना घर चलाती हैं, पर किसी कारणवश पापड़शाला में कई दिनों से काम नहीं मिल रहा है। जहाँ दीपावली में सबके मिठाइयाँ बन रही हैं वहीं हमें रोटी के भी लाले पड़ रहे हैं। यह सुन हृदय पिघल आया। उन्होंने अगले दिन प्रवचन में सामाजिक उत्थान पर क्रांतिकारी प्रवचन देते हुए अमीरों को 5100/- रुपये निकालने का आह्वान किया। देखते-ही-देखते लाखों रुपये इकट्ठे हो गए। उससे एक समाज-बैंक बनाया गया, जो कमज़ोर भाई-बहिनों को ब्याजमुक्त 10,000/- रुपये का लोन देता है। उस बैंक ने अब तक सैकड़ों भाई-बहिनों को बिना ब्याज ऋण देकर पाँवों पर खड़ा करने का पुण्य कमाया है।

इंसानियत की सेवा और जीव-जंतुओं के कल्याण के लिए श्री चन्द्रप्रभ सदा ही प्रयत्नशील रहे हैं। उनका विश्वास है, ''हमें दीन-दु:खियों की मदद के लिए सहयोग समर्पित करते रहना चाहिए। वे लोग धरती पर जीते-जागते भगवान होते हैं जो औरों का हित और कल्याण के लिए अपने स्वार्थों का त्याग कर देते हैं।श्री चन्द्रप्रभ का यह संदेश देशभर में लोकप्रिय है, ''अपनी आमदनी का ढाई प्रतिशत हिस्सा दीन-दु:खी, जरूरतमंद और पशु-पक्षियों पर अवश्य खर्च करना चाहिए। इससे हमारा शेष बचा धन निर्मल होता है और हमारी भावशुद्धि होती है। अगर हमारे पास रोटी दो और खाने वाले चार हों तब भी हमें स्वार्थ-बुद्धि का त्याग कर दो रोटी चार लोगों में बाँटकर खानी चाहिए। श्री चन्द्रप्रभ ने 'मानव स्वयं एक मंदिर है का संदेश देकर हर धर्म को मानवता का पाठ पढ़ाया है। 'पहले कीजिए मदद फिर कीजिए इबादत पुस्तक में श्री चन्द्रप्रभ का यह संदेश धर्म-जगत् को नई दिशा प्रदान करता है, ''जहाँ केवल पत्थरों के मंदिरों पर श्रद्धा की जाती है वहाँ हमें मानवीय प्रेम का विस्तार करना चाहिए। दुनिया में एकमात्र प्रेम की ही परिभाषा होती है जिसे गूँगे बोल सकते हैं, बहरे सुन सकते हैं।

पशु-पक्षियों की सेवा - श्री चन्द्रप्रभ ने मानवीय सेवा के लिए तो कई प्रकल्प चलाए ही हैं साथ ही उन्होंने जीव-जंतुओं और पशु-पक्षियों के लिए भी अपनी ओर से सेवाएँ प्रदान की हैं। उनकी प्रेरणा से गौसेवा के क्षेत्र में भी कई कार्य हुए हैं। उन्होंने अपने सत्संगों में प्रेरणा प्रदान करके गौशालाओं में लाखों रुपयों का सहयोग भिजवाया है वहीं उनकी प्रेरणा से भीलवाड़ा एवं नीमच में पक्षी चिकित्सालय की भी स्थापना हुई है। वे कहते हैं कि इंसानों की तरह हमें घायल पशु-पक्षियों के लिए जागरूक रहना चाहिए ताकि वे भी स्वस्थ हो सकें। उन्होंने पक्षी चिकित्सालय जैसे सेवा-केन्द्र खोलकर इंसानियत की सेवा के दायरे को और बढ़ाया।

नारी उत्थान के कार्य- नारी जाति के अभ्युत्थान के प्रति श्री चन्द्रप्रभ जागरूक नजर आते हैं। उन्होंने नारी जाति के विकास एवं कल्याण के लिए कई संगठनों का गठन किया है। उनका मानना है, ''नारी जाति को विगत 50 वर्षों में विकास के जो अवसर मिले हैं अगर वे अवसर 500 वर्ष पहले प्रदान किये जाते तो आज दुनिया का स्वरूप कुछ और होता। अब जमाना महिलाओं का है। वे पुरुषों के सामने हाथ फैलाने की बजाय जॉब करें और आगे बढ़ें। पढ़ी-लिखी महिलाएँ पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर विकसित भारत का निर्माण करें। महिला उत्थान के प्रति उनकी सजगता से जुड़ी एक प्रेरक घटना इस प्रकार है -

आज वह कॉलेज में लेक्चरार है - एक बहिन दो वर्षीय बच्चे को साथ लेकर श्री चन्द्रप्रभ के पास आई और कहने लगी - शादी के दो महीने बाद ही पति की मृत्यु हो गई। ससुराल वालों ने मुझे मनहूश कहकर घर से निकाल दिया। पीहर वालों ने मेरी कोई सहायता न की। मैं बहुत दु:खी हूँ। कृपा कर आप मेरे एक महीने के राशन-पानी की व्यवस्था कर दीजिए। उन्होंने कहा - मैं तो अभी करवा दूँगा, पर बाद में फिर तुम्हें औरों के सामने हाथ फैलाना पड़ेगा। इससे तो अच्छा है आप कहीं काम कर लीजिए। उसने कहा - मैं तो केवल आठवीं पास हूँ, मुझे काम कौन देगा? उन्होंने कहा - अगर कोई छोटा काम करना पड़े तो...? वह तैयार हो गई। उन्होंने एक विद्यालय में फोन करवाकर उन्हें चपरासी से जुड़ी नौकरी दिलवा दी। महीना पूरा होते ही बहिन ने अपनी पहली तनख्वाह गुरुचरणों में रख दी। उन्होंने उनको एक हजार रुपये घर खर्च हेतु व एक हजार रुपये से आगे की पढ़ाई करने की प्रेरणा दी। उस बहिन ने दसवीं का फार्म भरा। क्रमश: दसवीं, बारहवीं पास की, ग्रेजुएशन किया, बी.एड. किया। उनकी टीचर की नौकरी लग गई। फिर उसने एम.ए. किया। आप यह जानकर ताज्जुब करेंगे कि आज वही महिला एक कॉलेज में लेक्चरार के पद पर कार्यरत है।

श्री चन्द्रप्रभ की प्रेरणा से अनेक शहरों में संबोधि महिला मण्डल एवं संबोधि बालिका मण्डल के नाम से संस्थाएँ गठित हुई हैं। नारी जाति के कल्याण के लिए ये संस्थाएँ विभिन्न योजनाएँ के साथ प्रतिबद्ध हैं। भीलवाड़ा का संबोधि महिला मण्डल तो सम्पूर्ण राजस्थान के लिए आदर्श मण्डल के रूप में उभरकर आया है जिसने अपने नगर की कई सेवापरक गतिविधियों को अपने कंधे पर उठाकर रखा है। नारी-जाति को आत्मनिर्भर बनाने के लिए जहाँ सिलाई प्रशिक्षण चलता है वहीं टिफिन सेवा सेंटर भी शहर में लोकप्रिय है। इसने अस्पताल में कई वार्ड गोद लिए हैं तो शहर में कई चिकित्सा शिविरों के आयोजन में यह मण्डल अपनी विशिष्ट सेवाएँ देता है। बाड़मेर का संबोधि बालिका मण्डल भी बालिकाओं के कल्याण के लिए सदा जागरूक रहता है। अन्य शहरों में जोधपुर का संबोधि महिला मण्डल नारी जाति को आत्मनिर्भर बनाने के लिए कई गतिविधियों को संचालित करता रहता है। इस मण्डल ने अब तक 500 से अधिक महिलाओं को विभिन्न कार्यों का प्रशिक्षण देकर पाँवों पर खड़ा किया है एवं आत्मनिर्भर बनाया है। श्री चन्द्रप्रभ के मार्गदर्शन में इंदौर (म.प्र.) में संबोधि नारी निकेतन संस्था की स्थापना हुई जो अशक्त, परित्यक्ता एवं विधवा महिलाओं के लिए आवास की व्यवस्था करने के साथ उन्हें आत्मनिर्भर बनाने के लिए कई तरह का प्रशिक्षण प्रदान करती है। श्री चन्द्रप्रभ की प्रेरणा से बाड़मेर में भी महिला सिलाई-कढ़ाई केन्द्र चल रहा है।

श्री चन्द्रप्रभ के मार्गदर्शन में जोधपुर, संबोधि धाम में सन् 2006 में गुरुमहिमा मेडिकल रिलिफ सोसायटी की स्थापना की गई है। यह सोसायटी गरीब एवं जरूरतमंद भाई-बहिनों को 40 प्रतिशत छूट पर बड़ी एवं लम्बी बीमारियों की दवाएँ उपलब्ध करवाती है। अब तक यह सोसायटी पिछले 5 वर्षों में लगभग एक करोड़ रुपये से ऊपर की दवाइयाँ वितरित कर चुका है। उनके मार्गदर्शन में जयश्री मनस् चिकित्सा केन्द्र सन् 2000 में संचालित किया गया। जिसके अन्तर्गत मनोमस्तिष्क से जुड़ी बीमारियों की चिकित्सा इंग्लैण्ड से आयातित फूलों के अर्क से की जाती है। श्री चन्द्रप्रभ की प्रेरणा से भीलवाड़ा, जोधपुर, बीकानेर, राजसमंद, इंदौर आदि अनेक शहरों में सैकड़ों शीतल जल की प्याऊओं का निर्माण हुआ है। उन्होंने नशामुक्ति और मांसाहार के त्याग का अभियान भी भारतभर में चलाया। उनके वचनों और प्रवचनों से प्रभावित होकर अब तक हजारों लोग नशा और मांसाहार का त्याग कर चुके हैं, जिसमें सिंधी कौम एवं मुस्लिम कौम भी सम्मिलित है। इस संदर्भ में निम्न घटनाएँ उल्लेखनीय हैं

विदेशी महिला ने अंडे का किया त्याग - उदयपुर की घटना है। अमेरिका से पेचविशा नामक एक महिला श्री चन्द्रप्रभ से मिलने आई। चर्चा के दौरान उसने बताया कि मैंने मांसाहार का त्याग कर दिया है। श्री चन्द्रप्रभ ने उनकी प्रशंसा की। चर्चा क रते हुए मालूम चला कि वे अंडों को सेवन करती हैं। श्री चन्द्रप्रभ ने उन्हें समझाया, जब आप मुर्गी नहीं खाती तो उसके अंडे को भी नहीं खाना चाहिए। ऐसा कर आप पूर्ण शाकाहारी बन जाएँगे। उन्हें बात समझ में आ गई और उन्होंने अंडे न खाने का भी हमेशा के लिए संकल्प कर लिया।

दुव्र्यसन का किया त्याग - एक सिंधी बहिन ने श्री चन्द्रप्रभ से कहा - आज से मैं आपकी सदा ऋणी रहूँगी। उन्होंने बहिन से पूछा - आप कौन हैं? मैं आपसे परिचित नहीं हूँ फिर यह ऋण की बात कैसे? बहिन ने बताया कि आज मेरे पति ने आपका प्रवचन सुनकर घर आते ही फ्रीज में रखी बीयर की सारी बोतलों को निकाला और बाहर जाकर नाली में बहा दिया। मुझे आश्चर्य हुआ कि आज इनको ये क्या हो गया? मैंने पतिदेव से पूछा - इतनी महँगी बीयरों को नाली में क्यों बहाया? उन्होंने कहा - आज महाराज श्री चन्द्र्रप्रभ जी ने 'अपनी वसीयत कैसी लिखें प्रवचन में कहा कि, क्या आप चाहेंगे कि आपके बच्चों को भी वसीयत में दुव्र्यसनों के संस्कार मिलें? आपके बच्चे भी बड़े होकर इन्हीं का सेवन करें। यह सुनकर मेरी अंतर्आत्मा हिल गई। मुझे लगा कि अपने बच्चों को दुव्र्यसनों की नहीं, संस्कारों की वसीयत देनी चाहिए। इसीलिए आज से मैं शराब का त्याग कर रहा हूँ।

बेटा महाराज बने तो भी गम नहीं - श्री चन्द्रप्रभ का सन् 2000 में चातुर्मासिक प्रवास अजमेर में था। वहाँ आयोजित प्रवचनमाला में अनेक सिंधी परिवार भी आया करते थे। एक सिंधी युवक प्रवचनों से इतना प्रभावित हुआ कि उसने शराब के दुव्र्यसन का त्याग कर दिया। वह अपना ज्यादातर समय उनकी सेवा में ही बिताया करता था। इतनी निकटता देख सिंधी भाइयों में चर्चा शुरू हो गई कि कहीं यह इनके साथ महाराज न बन जाए। सिंधी समाज के कुछ प्रमुख लोग उस युवक के घर गए। उसके माता-पिता को समझाया कि आपके बेटे का दिनभर इन महाराज के पास रहना अच्छा नहीं है। क्या भरोसा कहीं जैन बन गया तो! उसके माता-पिता ने कहा — हमारा बेटा दिनभर शराब पिया करता था। हम और उसकी पत्नी उसे समझाते-समझाते हार गए, पर उसकी शराब न छूटी, पर जब से इसने इन गुरुजी के प्रवचन सुनने शुरू किए हैं न जाने इसको क्या हुआ कि इसने न केवल शराब छोड़ी वरन् इसका वाणी-व्यवहार भी मधुर हो गया है। हमारे बेटे में जितने भी सद्गुण आए हैं ये सब इन्हीं गुरुजी के सत्संग-सम्पर्क का चमत्कार है, अगर इनके सम्पर्क में रहते-रहते हमारा बेटा महाराज भी बन जाए तो कोई गम नहीं है। हमें खुशी है कि इसने श्रेष्ठ मार्ग पर कदम बढ़ाया है।

श्री चन्द्रप्रभ जीवन-निर्माण एवं जीवन-विकास के लिए कारागार और कच्ची बस्तियों में जाते हैं। उनके इस अभियान से सैकड़ों कैदियों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आए हैं एवं कच्ची बस्ती वालों को आगे बढऩे का मार्ग मिला है।

सचमुच में, श्री चन्द्रप्रभ मानवता के महर्षि हैं। वे धर्म के उन्नायक हैं। धर्म को आश्रम, स्थानक और उपाश्रय के दायरे से बाहर निकालकर आम इंसान के साथ उसे लागू करने के पक्षधर हैं।

ज्ञान के शिखर पुरुष


श्री चन्द्रप्रभ ज्ञान के क्षेत्र में शिखर पुरुष हैं। उनकी बुद्धि, प्रतिभा और ज्ञान अनुपम हैं। उन्होंने न केवल अध्ययन किया वरन् चिंतन-मनन-मंथन भी किया और उससे जो सार निकला वह आमजनमानस के सामने रखा। उन्होंने प्राचीन ज्ञान का केवल अनुसरण नहीं किया वरन् उसे वर्तमान संदर्भों में और जीवन के परिप्रेक्ष्य में समझने का प्रयास किया है। उनके लिए न तो कोई सिद्धांत अगम्य है न ही कोई परम्परा। श्री चन्द्रप्रभ को समय-समय पर मिले ज्ञान-अलंकार और उनके प्रवचनों में छत्तीस कौम की जनता का उमडऩा उनके ज्ञान-गांभीर्य और उदार दृष्टिकोण को प्रकट करता है। श्री चन्द्रप्रभ का ज्ञानपरक साहित्य इतना सरल व जीवंत है कि लोग उसे बड़े चाव से पढ़ते हैं और एक बार पढऩे के बाद स्वयं को रोक नहीं पाते हैं। जीवन, व्यक्तित्व, स्वास्थ्य, ध्यान, धर्म, अध्यात्म, परिवार, समाज, राष्ट्र से जुड़े विषयों पर उनके विचार पढ़कर न केवल उनके प्रति हृदय में श्रद्धा भाव प्रकट होता है वरन् जीवन में आश्चर्यकारी परिवर्तन भी घटित होने लगते हैं। उनके साहित्य की प्रभावकता से जुड़ी मुख्य घटनाए हैं -

जीवन हुआ धन्य - छत्तीसगढ़ से एक वृद्ध माताजी संबोधि धाम, जोधपुर आईं। उन्होंने श्री चन्द्रप्रभ को बताया, आपकी कृपा से मैं बहुत ख़ुश, प्रसन्न व स्वस्थ हूँ। हमारे यहाँ आपका साहित्य आता है। मैंने उसे एक बार पढ़ा तो पढ़ने का शौक चढ़ गया। अब मैं प्रतिदिन 7-8 घंटे आपके साहित्य का स्वाध्याय करती हूँ। उससे मुझे इतनी शांति, आनंद और ख़ुशी मिलती है कि पूछो मत। पहले मेरा समय फालतू की बातों में, बहुओं की खिच-खिच में चला जाता था, जिससे मैं परेशान भी होती थी, पर आपकी कृपा ऐसी हुई कि जीवन धन्य हो गया।

डिप्रेशन हुआ दूर - सन् 2012 श्री चन्द्रप्रभ का चातुर्मास जोधपुर में था। इक्कावन दिवसीय विराट प्रवचनमाला गांधी मैदान में चल रही थी। प्रवचन के दौरान जोधपुर के संभागीय आयुक्त एन.के. जैन का आना हुआ। उन्होंने मंच पर बताया कि मेरे पास श्री चन्द्रप्रभ की कुछ किताबें थीं जिन्हें मैं रोज पढ़ा करता था, जिससे मुझे आत्मिक आनंद और अतिरिक्त ऊर्जा मिलती थी। मेरे चाचाजी को शुगर थी, एक बार वे बीमार पड़ गए, उनकी शुगर बहुत ज्यादा बढ़ गई। डॉक्टरों को उनका एक पाँव काटना पड़ा। उनके बार-बार मुझे फोन आते - मैं बहुत दुखी और निराश हो गया हूँ। दिनभर घर बैठे-बैठे तंग आ गया हूँ। इस तरह वे डिप्रेशन में आ गए। मैंने श्री चन्द्रप्रभ की किताबें चाचाजी को भेज दीं। अचानक कुछ समय बाद उनका फोन आया। वे कहने लगे - तुमने पता नहीं कैसी किताबें भेजीं, इन्हें पढ़कर मेरे जीवन में चमत्कार हो गया। अब जीने का अंदाज ही कुछ और हो गया है। आयुक्त साहब ने कहा - इस घटना के बाद मैं श्री चन्द्रप्रभ के साहित्य का भक्त बन गया। अब मैं किसी भी कार्यक्रम में जाता हूँ तो अपनी ओर से रुपयों की बजाय किताबों का सेट देता हूँ जिसे सामने वाला जिंदगी भर याद रखता है।

श्री चन्द्रप्रभ द्वारा लिखित 'समय के हस्ताक्षर नामक काव्य पुस्तक राष्ट्रीय स्तर के समीक्षक एवं मूर्धन्य साहित्यकार डॉ. प्रभाकर माचवे को सम्पादन हेतु भेजी गई। पुस्तक के संदर्भ में उन्होंने प्रतिक्रिया देते हुए कहा, ''मैंने सोचा भी नहीं था कि यह पुस्तक इतनी प्रभावशाली हो सकती है, वास्तव में पुस्तक पढ़कर मैं चमत्कृत हो उठा। आज के लेखकों में काव्यपरक इतना अच्छा लेखन मुझे पहली बार पढऩे व संपादन करने को मिला। डॉ. नागेन्द्र के अनुसार, ''श्री चन्द्रप्रभ का साहित्य सत्य की सूक्ष्म एवं गूढ़ ग्रन्थियों को उद्घाटित करने का लोकमंगलकारी स्रोत है। उनके प्रवचनों में सूक्ष्मता, विद्वता और रोचकता का त्रिवेणी संगम है। श्री चन्द्रप्रभ का शास्त्रीय ज्ञान जितना गहरा है उतना ही उनका व्यावहारिक जीवन का ज्ञान। वे काव्यशास्त्र के भी ज्ञाता हैं। उन्हें छन्दों व अलंकारों का भी स्पष्ट ज्ञान है। उनका संगीत ज्ञान भी अच्छा है। उन्होंने सैकड़ों भजनों व कविताओं की रचना की है। उनके साहित्य में हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू, संस्कृत, प्राकृत, राजस्थानी, गुजराती शब्दों का बहुतायत मात्रा में प्रयोग हुआ है जो उनके भाषात्मक ज्ञान की प्रखरता को अंकित करता है। इस तरह श्री चन्द्रप्रभ ने सद्ज्ञान के विस्तार में अमूल्य योगदान दिया है।

सचमुच में, श्री चन्द्रप्रभ मानवता के महर्षि हैं। वे धर्म के उन्नायक हैं। धर्म को आश्रम, स्थानक और उपाश्रय के दायरे से बाहर निकालकर आम इंसान के साथ उसे लागू करने के पक्षधर हैं।

जविशाल साहित्य के सर्जक एवं शोध मनीषी


श्री चन्द्रप्रभ ने साधना के साथ साहित्य सृजन में खूब रुचि दिखाई है। उनका साहित्य गद्य-पद्य दोनों में है। उनके साहित्य में नई दृष्टि है, विज्ञान-अध्यात्म का समन्वय है, पुरानी बातों का परिष्कृत रूप है एवं वर्तमान को उन्नत बनाने की प्रेरणा है। उनका साहित्य भाषा, भाव, शैली, काव्य आदि सभी दृष्टिकोणों से रोचक व परिपूर्ण है। उन पर सरस्वती की असीम कृपा है। उन्होंने मनोरंजन करने वाला साहित्य सृजन नहीं किया है वरन् साहित्य द्वारा जीवन को नई दिशा एवं दृष्टि देना उनका मुख्य उद्देश्य है। उनका साहित्य देशभर के विद्वानों एवं समाचारपत्रों द्वारा प्रशंसित हुआ है। डॉ. नागेन्द्र ने लिखा है, ''श्री चन्द्रप्रभ ने साहित्य, दर्शन एवं इतिहास से जुड़ी भूमिकाओं को जिस सफलता के साथ निभाया है वह हिन्दी जगत के लिए कीर्तिमान है। उनके साहित्य से विविध भाषाओं एवं विविध विषयों का ज्ञान सहज ही हो जाता है। शोध-प्रबंध के दूसरे एवं तीसरे अध्याय में श्री चन्द्रप्रभ द्वारा लिखे गए सम्पूर्ण साहित्य का विस्तार से विवेचन किया गया है।

श्री चन्द्रप्रभ जीवन, जगत और धर्मशास्त्रों के शोधकर्ता भी रहे हैं। उनका शुरुआती लेखन अनुसंधानपरक ही रहा है। उनके द्वारा महोपाध्याय समयसुंदर के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर लिखा गया शोध-प्रबंध विद्वत् जनों में समादृत हुआ है। उनके द्वारा संकलित व संपादित हिंदी व प्राकृत सूक्ति कोशों को देखने से पता चलता है वे अनुसंधानकर्ता के क्षेत्र में भी आगे हैं। उनके साहित्य से योगिता यादव द्वारा संकलित किया गया पाँच हजार से अधिक सूक्त वचनों का 'बोधि बीज नामक कोश देखने योग्य है। आयारसुत्तं, समवायसुत्तं, खरतरगच्छ का आदिकालीन इतिहास, जिनसूत्र, प्राकृत-हिन्दी सूक्ति कोश, हिन्दी सूक्ति संदर्भ कोश, पारिभाषिक शब्द कोश आदि उनकी शोधपरक कृतियाँ रही हैं। उन्होंने धर्म को अनुसरण की बजाय अनुसंधान की चीज माना है। उन्होंने शास्त्रों पर भी शोध किया और महापुरुषों के अमृत वचनों पर भी। उनकी शोधमूलक निम्न घटनाएँ उल्लेखनीय हैं -

दलाई लामा हुए प्रभावित - श्री चन्द्रप्रभ पाश्र्वनाथ शोध संस्थान, वाराणसी में अध्ययनरत थे। उस दौरान तिब्बतीयन धर्मगुरु दलाईलामा का वाराणसी में कार्यक्रम आयोजित हुआ। श्री चन्द्रप्रभ का भी वक्तव्य रखा गया। उन्होंने पहले तो भगवान महावीर के संदेशों से जुड़ी हुई गाथाएँ प्राकृत में उच्चारित कीं फिर उन्होंने जैन और बौद्ध धर्म की शोधमूलक समानता एवं तुलनात्मक समीक्षा पर अपना खास वक्तव्य दिया। इस वक्तव्य से दलाई लामा इतने प्रभावित हुए कि उनका सारा वक्तव्य श्री चन्द्रप्रभ पर ही केन्द्रित रहा। उन्होंने अपने वक्तव्य में कहा कि मैं और मेरे शिष्य भी आगे से वक्तव्य की शुरुआत भगवान बुद्ध के पिटक की गाथाओं से करने की कोशिश करेंगे। तिब्बतियन रिसर्च इन्स्टीट्यूट के प्रोफेसर तो उनके प्रशंसक बन गए और उनसे कई बार मिलने आते। बौद्ध भिक्षु भी उनसे चर्चा हेतु आने लगे। उनके प्रभावी वक्तव्य से प्रभावित होकर बनारस सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में उन्हें वक्तव्य के लिए आमंत्रित किया गया। यह देखकर शोध संस्थान के निदेशक डॉ. सागरमल जैन ने भी गौरव का अनुभव किया।

पंचांग देखना छोड़ दिया - एक सज्जन श्री चन्द्रप्रभ से विशेष कार्य हेतु मुहूर्त निकलवाने आए। उन्होंने पंचांग देखकर मुहूर्त बता दिया। मैंने उनसे पूछा, ''आप दूसरों को मुहूर्त बताते हैं, पर मैंने आपको अपने कार्यों के लिए कभी मुहूर्त निकालते नहीं देखा, आखिर इसका क्या कारण है? उन्होंने कहा, ''पहले मैं देखा करता था, पर एक दिन बड़े भाईसाहब प्रकाश जी दफ्तरी कोलकाता जाने वाले थे। उन्होंने भाईसाहब से कहा - आज मत जाइए, क्योंकि पंचांग के अनुसार आज इस दिशा में जाना वर्जित है, कुछ गलत हो सकता है। फिर भी वे चले गए और सकुशल पहुँच भी गए, वापस भी आ गए। उन्हें लगा - पंचांग से ज्यादा प्रभावशाली प्रभु की व्यवस्थाएँ होती हैं। उस दिन के बाद उन्होंने अपने काम के लिए पंचांग देखने बंद कर दिए। वे कहते है सभी दिन प्रभु के है उसमें छँटनी क्या करना!

गीता के मर्मज्ञ एवं महान प्रवक्ता


श्री चन्द्रप्रभ जैन संत होते हुए भी उनकी गीता पर पकड़ मजबूत है। उनके द्वारा गीता पर की गई व्याख्याएँ आश्चर्यकारी हैं। अब तक गीता पर जो कुछ लिखा गया है उस सबमें परम्परागतता नजर आती है, पर श्री चन्द्रप्रभ ने जो लिखा वह परम्परा से हटकर है। वे स्वयं को गीता-प्रेमी मानते हैं। वे गीता के संदेशों को आत्मसात करने व फैलाने की प्रेरणा देते हैं। वे कहते हैं, ''गीता भारत की आत्मा है। गीता युद्ध करना नहीं, अरिहंत बनाना सिखाती है। कर्तव्य-पालन का पाठ पढ़ाने और सोये हुए आत्मविश्वास को जगाने की प्रेरणा है गीता। गीता दुर्बल मन की चिकित्सा करने वाला ग्रन्थ है। अगर गीता के संदेशों को भीतर से जोड़ लिया जाए तो ये महावीर के आगम बन जाएँगे। उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण के बारे में लिखा है, ''कृष्ण अपने आप में प्रेम के अवतार, शांति के देवदूत, कर्तव्य-परायणता की किताब और कर्म, ज्ञान तथा भक्ति की त्रिवेणी बहाने वाले भारत के भाग्य विधाता हैं। उन्होंने अपने जीवन से जुड़े गीता के अनेक उपकारों व प्रभावों का भी जिक्र किया है। वे घर-घर में गीता को रखने व उसका पारायण करने की प्रेरणा देते हैं। वे गीता को नपुंसकहो चुकी चेतना को जगाने के लिए रामबाण औषधि मानते हैं। गीता के सूत्रों पर की गई व्याख्याओं से जुड़ा उनका ग्रंथ 'जागो मेरे पार्थ जन-जन में बहुत चर्चित हुआ है। यह ग्रंथ उनकी सर्वधर्मसद्भावना का प्रतीक है। वे कृष्ण द्वारा तोड़ी गई माखन की मटकियों को पापों की मटकियाँ फोडऩे के रूप में सौभाग्यकारी मानते हैं। वे प्रतिवर्ष हजारों-हजार श्रद्धालुओं के बीच धूम-धाम से जन्माष्टमी महोत्सव मनाते हैं। गीता भवन, इंदौर के मंत्री राम विलास राठी कहते हैं, ''गीता पर अब तक हमने अनेकों दफा प्रवचन सुने लेकिन कोई जैन संत भी गीता पर इतना जबर्दस्त बोल सकते हैं यह देखकर हमारा सारा समाज गद्गद और अभिभूत है। श्री चन्द्रप्रभ के गीता से जुड़े निम्न घटना प्रसंग उल्लेखनीय हैं

उपराष्ट्रपति पर पड़ा ग्रंथ का प्रभाव - सन् 1996 में श्री चन्द्रप्रभ का चातुर्मास गीताभवन, जोधपुर में था। चातुर्मास के दौरान श्री चन्द्रप्रभ के 'जागो मेरे पार्थ ग्रंथ का लोकार्पण तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री भैरोंसिंह शेखावत द्वारा किया गया। जब श्री शेखावत उपराष्ट्रपति बने तब उनका फिर उनके सान्निध्य में आना हुआ। अपने अध्यक्षीय भाषण में उपराष्ट्रपति ने कहा, ''मैंने गीता पर कई संतों के ग्रंथ पढ़े, पर जब पूज्य श्री चन्द्रप्रभ जी द्वारा गीता पर लिखे 'जागो मेरे पार्थ ग्रंथ को पढ़ा तो पहली बार समझ में आया कि गीता का अंतर्रहस्य क्या है? यह ग्रंथ मेरे हृदय को इतना छू गया है कि मैं हर समय इसे अपने पास ही रखता हूँ और यथासमय इसका पठन करता हूँ जिससे मुझे एक अलग ही सुकून और आनंद मिलता है। जैन परिवेश में भी गीता पर इतना गहरा विश्लेषण और व्याख्या करना अपने आप में आश्चर्य है।

गीता का प्रभाव - श्री चन्द्रप्रभ अपने पिता एवं भ्राता संत के साथ माउंट आबू की यात्रा पर जा रहे थे। किसी विरोधी तांत्रिक ने उन पर मूठ फेंक दी। उन्हें खून की उल्टियाँ होने लगीं। वे कमजोर होने के साथ भयग्रस्त भी हो गये। अब तो हवा भी चलती तो वे भयभीत हो जाते। चलते-चलते वे एक स्थान पर पहुँचे। उन्हें एक घर में रुकने के लिए कमरा मिला, वहाँ पुरानी किताब का एक गुटका रखा हुआ था। उन्होंने उसे देखा तो वह गीता थी, उनकी सीधी नजर उसके दूसरे अध्याय पर पड़ी जिसमें लिखा था - हे अर्जुन, तू हृदय की तुच्छ दुर्बलता का त्याग कर, आगे बढ़, मैं तेरे साथ हूँ। उन्हें लगा - भगवान ने उनके लिए ही यह संदेश लिखा है। उनकी मन की दुर्बलता समाप्त हो गयी और सोया हुआ आत्मविश्वास जग गया।

देश के शीर्षस्थ प्रवचनकार


श्री चन्द्रप्रभ की देश के शीर्षस्थ प्रवचनकारों में गिनती होती है। उनकी वक्तव्य शैली लाजवाब है। वे जहाँ भी जाते हैं छत्तीस कौम की जनता उन्हें सुनने के लिए लालायित हो उठती है। बच्चे से लेकर बड़ों तक, अशिक्षित से लेकर उच्च शिक्षित व्यक्ति तक उनकी बातें बड़े काम की होती हैं। हर कोई उन्हें सरलता से समझ लेता है। इसीलिए उनके प्रवचनों एवं सत्संगों में जैन, हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई आदि सभी धर्म-परम्पराओं के लोग हजारों की संख्या में आते हैं। उनके वक्तव्यों में केवल पांडित्य पूर्ण बातें नहीं होतीं, वरन् विद्वता, अनुभव एवं वैज्ञानिकता का भी समावेश होता है। वे जीवन-सापेक्ष होकर बोलते हैं और जीवन-निर्माण की बात करते हैं। गूढ़ से गूढ़ बातों को सरलता व सहजता से बोलना व समझाना उनकी विशेषता है। उनकी प्रभावी वक्तृत्व कला और इससे जनमानस पर पडऩे वाले प्रभाव से जुड़ी कई घटनाएँ इस प्रकार हैं -

वैर बदला प्रेम में - जयपुर के एक ज्वैलर्स ने अपने दो लाख रुपये न लौटाने के कारण दूसरे व्यापारी को फोन पर $जान से मारने की धमकी दी। व्यापारी धमकी पाकर आतंकित हुआ, पर रुपये नहीं लौटाये। ज्वैलर्स भी यह सोचकर परेशान था कि कहीं उसे मारने के बाद अनर्थ न हो जाए। संयोग से उन्हें जैन दादाबाड़ी में श्री चन्द्रप्रभ का सत्संग मिला। उन्होंने सत्संग में प्रेरणा देते हुए कहा - जो कार्य प्रेम और क्षमा से हो जाए उसके लिए तैश और तकरार का रास्ता नहीं अपनाना चाहिए। न जाने उन पर कैसा असर हुआ वे घर जाने की बजाय सीधे उस व्यापारी के घर गये और अपने गलत व्यवहार के लिए क्षमा माँगते हुए कहा, ''जब आपके पास रुपयों की सहूलियत हो तब पहुँचा देना। आज के बाद मैं कभी नहीं माँगूगा। यह व्यवहार देखकर व्यापारी आश्चर्य में पड़ गया। उसने कहा, ''तुम्हारे स्वभाव में इस तरह का परिवर्तन कैसे आया?जवाब मिला, ''श्री चन्द्रप्रभ के सत्संग से। व्यापारी भी पसीज उठा। वह तुरंत भीतर कमरे में गया और बीस हजार रुपये थमाते हुए कहा, ''अभी मेरे पास इतने ही हैं, शेष राशि मैं आपको इसी माह पहुँचा दूँगा।

हृदय-परिवर्तन - सन् 1996 में संबोधि-धाम, जोधपुर में एक नेपाली भाई काम करता था। उस समय चारों तरफ सुनसान बस्ती थी, लेकिन वह बहुत बहादुर था। संबोधि-धाम में वह अकेला सो जाता था। एक बार वह बिना बताए अपने घर नेपाल चला गया। कुछ समय बाद उसका एक पत्र आया। उसमें लिखा था, ँँगुरुजी, मैं वहाँ गलत कार्यों को अंज़ाम देने आया था, पर आपका सत्संग पाकर मेरा मन बदल गया। मैं भविष्य के लिए संकल्प लेता हूँ कि चाहे मुझे भूखा ही क्यों न मरना पड़े, पर मैं कभी भी अपने जीवन में गलत कार्य नहीं करूँगा।

ठेले वाले ने दी सिलाई मशीन - सन् 2006 में श्री चन्द्रप्रभ की गाँधी मैदान, जोधपुर में प्रवचनमाला चल रही थी। श्री चन्द्रप्रभ ने गरीब एवं जरूरतमंद महिलाओं को सिलाई सिखाने के लिए सिलाई-प्रशिक्षण केन्द्र खोलने की घोषणा की। जब उन्होंने सत्संगप्रेमियों से सिलाई मशीनें समर्पित करने का आह्वान किया तो मैदान के बाहर सब्जी-फ्रूट का ठेला लगाने वाले एक व्यक्ति ने भी एक मशीन इस कार्य हेतु भेंट की। जब उनको इस बात का पता चला तो उन्होंने उसे बुलाकर पूछा, ''भैया, आप तो दिन में दो-तीन सौ रुपये कमाते हैं और मशीन देने का मतलब है कि एक महीने की कमाई समर्पित करना। उसने कहा, ''मुझे लगा कि पांडाल बँधवाकर सत्संग करवाने का सौभाग्य तो अभी मेरी किस्मत में नहीं है, पर कम-से-कम एक जरूरतमंद बहिन को सिलाई मशीन देकर उसे पाँवों पर खड़ा करने का सौभाग्य तो मैं प्राप्त कर ही सकता हूँ। उन्होंने उस व्यक्ति की भावनाओं को प्रणाम किया और उसे अगले दिन मंच पर खड़ा करके लोगों को उससे प्रेरणा लेने की सीख दी।

ऐसे दिखाई ईमानदारी - जोधपुर की घटना है: एक महानुभाव ने बताया कि वह गाँधी मैदान से प्रवचन सुनकर घर पहुँचा। जल्दी में उसके रुपयों का बैग टैक्सी में ही रह गया। टैक्सी ड्राइवर ने रुपयों का बैग देखा तो अपने पास रखनेकी बजाय मुझे घर लौटाने आया। बैग देखकर मेरी जान में जान आयी। मैंने टैक्सी ड्राइवर से पूछा, ''रुपये देखकर भी आपका मन बेईमान नहीं हुआ, आखिर तुम इतने ईमानदार कैसे हो? उसने बताया, ''मुझे ईमान पर चलने की पे्ररणा श्री चन्द्रप्रभ की गाँधी मैदान में चल रही प्रवचनमाला को सुनकर मिली। मुझे लगा, ''ये रुपये रखकर मैं तो सुखी हो जाऊँगा, पर इसके मालिक का क्या होगा। भला, दूसरों को दु:खी करके मैं कैसे सुखी हो सकता हूँ। वे टैक्सी ड्राइवर हैं - श्री नरपतसिंह जी राजपुरोहित।

आखिर हुआ चमत्कार - उदयपुर की घटना है। गोर्धन विलास कॉलोनी के एक महानुभाव श्री चन्द्रप्रभ से कहने लगे - आपके टाउन हॉल मैदान में चल रहे प्रवचनों का जो चमत्कार मैंने देखा, ऐसा चमत्कार मैंने अपने जीवन में कभी नहीं देखा। मेरे दो बेटे हैं, पर उनकी पत्नियों में बिल्कुल भी आपस में नहीं बनती थी। किचन में अगर कोई एक होती तो दूसरी नहीं आती और दूसरी आ जाती तो पहली वाली बाहर निकल जाती। इतना ही नहीं, यदि किसी के कार्यक्रम में जाना होता तो दोनों कभी एक गाड़ी में बैठकर नहीं जातीं। मैं दोनों बहुओं को समझाते-समझाते हार गया, पर वे वैसी की वैसी रहीं। जब से आपकी प्रवचनमाला टाउन हॉल मैदान में शुरू हुई है तब से ये दोनों प्रवचन सुनने जाने लगीं। मैंने शहरभर में आपकी तारीफ सुनी, पर मुझे नहीं लगा कि आप लोग भी इस अनबन को दूर कर पाएँगे क्योंकि आपके प्रवचन सुनते-सुनते इनको बीस दिन जो बीत चुके थे। मुझे लगा - शायद भगवान भी क्यों न आए, मेरी बहुएँ वैसी की वैसी रहेंगी।

शायद परिवार सप्ताह का चौथा दिन रहा होगा। मेरी बहुएँ आपका प्रवचन सुनने के लिए मैदान जाने की तैयारी कर रही थी। यह देखकर मैं दंग रह गया कि घर के बाहर गाड़ी खड़ी थी, मेरी छोटी बहू आकर उसमें बैठ गई, वह रवाना होने ही वाली थी कि बड़ी बहू भी उसमें आकर बैठ गई। दोनों एक-दूसरे को देखकर थोड़ा मुस्कुराई। मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ। मैं दोनों को साथ में देखने के लिए दौड़ता हुआ आया, तब तक वे रवाना हो चुकी थीं। मैं भी प्रवचन सुनने मैदान जा पहुँचा। मुझे यह देखकर विश्वास नहीं हो रहा था कि मेरी दोनों बहुएँ पास-पास बैठी हैं और आपका प्रवचन सुनने में मगन हैं। उन महानुभाव ने कहा - मैं आपके इस एहसान का जिंदगी भर ऋणी रहूँगा कि आपने मेरे घर की डूबती नैया को पार लगा दिया। श्री चन्द्रप्रभ ने कहा- भगवान करे, आपके घर में यह सौभाग्य सदा बना रहे।

टूटे-रिश्ते हुए हरे-भरे - महाराष्ट्र से दो वृद्ध सज्जन श्री चन्द्रप्रभ के दर्शनार्थ संबोधि धाम, जोधपुर आए। एक सज्जन ने कहा - हम दोनों सगे भाई हैं और आपको यह सुनकर आश्चर्य होगा कि हमने पूरे पचास साल बाद एक-दूसरे का मुँह देखा है और इतने वर्षों में पहली बार एक साथ यात्रा करके सीधे आपके दर्शन करने आए हैं। श्री चन्द्रप्रभ ने उनसे पूछा - ऐसा कैसे हो गया? छोटे भाई ने कहा - मेरी शादी के बाद किसी बात को लेकर हम दोनों में कहासुनी हो गई। तैश, तकरार और गुस्से में आकर बात इतनी बढ़ गई कि हमने आपस में वैर की गाँठ बाँध ली। इसके चलते एक-दूसरे से मिलना तो दूर, चेहरा न देखने की भी कसम खा ली। पिछले पचास वर्षों से हम एक-दूसरे के दुश्मन बनकर जी रहे थे। श्री चन्द्रप्रभ ने पूछा - फिर आपके बीच में वापस प्रेम कैसे उमड़ आया? उन्होंने कहा - मेरे एक मित्र से उपहार में मिली आपके प्रवचन की वीसीडी सुनकर। श्री चन्द्रप्रभ ने पुन: पूछा - लेकिन यह सब हुआ कैसे? छोटे भाई ने बताया - एक दिन बड़े भाई मेरे घर आए और मुझे देखते ही हाथ जोड़कर कहने लगे - भैया, मुझे माफ कर देना। गुस्से में आकर मैंने बहुत बड़ी भूल कर दी। अब मैं अपने भाई को खोना नहीं चाहता। यह सुनकर मेरी आँखें भी भीग उठीं। मैं भी उनके चरणों में गिर पड़ा। उन्होंने मुझे उठाकर गले लगाया और इस तरह हमारा वर्षों से टूटा रिश्ता फिर से हरा-भरा हो गया। बड़े भाई ने कहा - यह चमत्कार आपकी प्रवचन की वीसीडी को सुनकर ही हुआ है।

लाइफ और वाइफ सुधर गई - हैदराबाद की घटना है। एक सज्जन ने फोन पर अपनी आपबीती सुनाते हुए बताया कि पत्नी के गुस्से और व्यंग्य भरे बाणों से आहत होकर मैंने जहर की गोलियाँ खा लीं, पर ईश्वर की कृपा से बच गया। मैं हर समय चिंता और तनाव से ग्रस्त रहता। एक दिन मैंने घर में बैठे-बैठे कई वर्ष पहले उपहार में आई श्री चन्द्रप्रभ के प्रवचन की वीसीडी चला दी। प्रवचन सुनने के बाद मुझे लगा जैसे मेरे दिमाग में कोई चमत्कार हो गया है। मैं अपने आप को पूरी तरह रिलेक्स महसूस करने लगा। फिर मैंने जोधपुर, संबोधि धाम से श्री चन्द्रप्रभ का पूरा वीसीडी-साहित्य-केलेण्डर सेट मँगवाया। आज मेरा पूरा परिवार सुबह-शाम आपके प्रवचन सुनता है। इन प्रवचनों से मेरी लाइफ भी सुधर गई और वाइफ भी।

मनोवैज्ञानिक शैली के जनक


श्री चन्द्रप्रभ मनोवैज्ञानिक शैली के जनक हैं। उनका साहित्य मनोवैज्ञानिकता लिए हुए है। उनके सभी प्रवचन-मार्गदर्शन व्यक्ति के दिलोदिमाग को सीधे छूने वाले होते हैं। उन्होंने जीवन-शुद्धि का विज्ञान, मृत्यु से मुलाकात, चेतना का विज्ञान आदि पुस्तक ों में मन केअनेक रहस्य प्रकट किए हैं। बातें जीवन की, जीने की और बेहतर जीवन के बेहतर समाधान पुस्तकों में श्री चन्द्रप्रभ ने जीवन-निर्माण से जुड़ा मनोवैज्ञानिक मार्गदर्शन दिया है। उन्होंने मन के स्वरूप पर विस्तृत व्याख्याएँ की हैं। उन्होंने बाल-मनोविज्ञान पर 'कैसे करें व्यक्तित्व विकास नामक पुस्तक लिखी है। उन्होंने साधना के लिए मन का अध्ययन करने को आवश्यक माना है। वे मन व चित्त को अलग-अलग मानते हैं। वे चंचल चित्त को मन व एकाग्र मन को चित्त कहते हैं। उन्होंने मन को मौन करना व उसके शोरगुल को शांत करने के प्रयत्न को ध्यान एवं योग कहा है। मन को मौन करने के लिए श्री चन्द्रप्रभ मन को पहचानना व उसे सम्यक् दिशा देना जरूरी बताते हैं। उन्होंने इंसान को अपनी सोच को उन्नत बनाने की प्रेरणा गीत के माध्यम से देते हुए लिखा है -

हम सोचें ऐसी बातें, जिन बातों में हो दम। दुश्मन से भी हम प्यार करें, दुश्मनी हो जिससे कम।।
जिस घर में तूने जन्म लिया, वो मंदिर है तेरा। प्रभु की मूरत हैं माता-पिता, उनसे न जुदा हों हम।।
दुनिया में ऐसा कौन भला, जो दूध से धुला हुआ। कमियाँ तो हर इंसान में, फि र क्यों न रखें संयम।।
हमसे सबको सम्मान मिले, सबको ही बाँटें प्यार। बोलें तो पहले हम तौलें, मिश्री घोलें हर दम।।

श्री चन्द्रप्रभ से जुड़े कुछ मनोवैज्ञानिक घटनाप्रसंग इस प्रकार हैं-

सबसे मजबूत चीज क्या - श्री चन्द्रप्रभ जोधपुर स्थित संबोधि धाम की पहाड़ी पर बैठे हुए थे। तभी एक युवक उनके पास आया और पूछने लगा - दुनिया में सबसे मजबूत चीज क्या है? उन्होंने कहा - मैं जिस पत्थर पर बैठा हूँ वह सबसे मजबूत है। युवक ने फिर पूछा - क्या पत्थर से भी ज्यादा मजबूत कुछ है? उन्होंने कहा - हाँ, पत्थर से भी ज्यादा मजबूत है लोहा। क्योंकि लोहा पत्थर को भी तोड़ देता है। लोहे से ज्यादा कुछ भी मजबूत नहीं होता है क्या? युवक ने पुन: जिज्ञासा रखी। उन्होंने कहा - हाँ, एक चीज है वह है अग्नि, जो लोहे को भी पिघला देती है। युवक ने अपना सवाल दोहराते हुए पूछा - क्या अग्नि से भी ज्यादा मजबूत कोई चीज हो सकती है? उन्होंने कहा - हाँ, पानी है क्योंकि पानी अग्नि को भी बुझा देता है। युवक ने कहा - मेरा अंतिम सवाल, पानी से भी मजबूत दुनिया में क्या है? उन्होंने कहा - बेटा, पानी से ही नहीं, पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा मजबूत एक ही चीज है और वह है इंसान का संकल्प। अगर इंसान का संकल्प जग जाए तो वह पत्थर को भी तोड़ सकता है, लोहे को भी पिघला सकता है, अग्नि को भी बुझा सकता है और यहाँ तक कि पानी की धार को भी मोड़ सकता है।

लोहा मूल्यवान है या चाँदी? - एक व्यक्ति ने श्री चन्द्रप्रभ से पूछा - दुनिया में लोहा मूल्यवान है या चाँदी? उन्होंने कहा - लोहा। वह अब तक चाँदी को मूल्यवान समझ रहा था। उसने आश्चर्य से पूछा - क्यों? उन्होंने कहा - चाँदी जीवनभर चाँदी ही रहेगी, पर लोहे के साथ ऐसा नहीं है। अगर उसे पारस का स्पर्श मिल जाए तो वह सोना बन जाएगा। उन्होंने कहा - सदा याद रखो, मूल्य वस्तु का नहीं, उसमें रहने वाली संभावना का होता है। अगर व्यक्तिअपनी सुप्त संभावनाओं को जागृत कर ले तो वह मूल्यवान बन सकता है।

सिक्के नहीं, सुविचार बाँटें - श्री चन्द्रप्रभ ने एक बार प्रवचन में सुविचार बाँटने की प्रेरणा दी। एक व्यक्ति ने उनसे कहा - हमने सिक्के या लड्डू बाँटने की बात तो सुनी है, पर सुविचार बाँटने की बात पहली बार सुनी। सिक्कों की प्रभावना से तो लोग प्रवचनों में आते हैं, पर सुविचार बाँटने से क्या होगा? श्री चन्द्रप्रभ ने उन्हें व उनके मित्र को अपने पास बुलाया और कहा - आप दोनों जेब से एक-एक सिक्का निकालिए और एक-दूसरे को बाँट दीजिए। अब बताओ आपकेपास कितने सिक्के हुए? दोनों ने कहा - एक-एक। अब आप अपना एक सुविचार उनको दीजिए व उनका एक सुविचार खुद लीजिए। अब बताओ आपके पास कितने सुविचार हुए। दोनों ने कहा - दो-दो। उन्होंने कहा - बस यही सार की बात है, सिक्कों का लेन-देन करोगे तो वे उतने ही रहेंगे, पर सुविचारों का लेन-देन करोगे तो वे दुगुने हो जाएँगे। हम सिक्कों की बजाय सुविचारों की प्रभावना करनी शुरू करें इससे धर्म का भी भला होगा और लोगों का भी।

लाल बत्ती जल गई है - एक सास-बहू श्री चन्द्रप्रभ के दर्शन करने आई। सास ने श्री चन्द्रप्रभ से पूछा - हमारे बीच कभी-कभी किसी बात को लेकर अनबन हो जाती है जिसके कारण हम दोनों का मन भारी हो जाता है। हम चाहते हैं कि फिर ऐसी कभी नौबत न आए, हमारे बीच सदा प्रेम बना रहे, इसके लिए हमें क्या करना चाहिए? श्री चन्द्रप्रभ ने दोनों से कहा - यदि आप दोनों एक-एक सूत्र को अपनाने का संकल्प कर लें तो आपकी ये अनबन सदा के लिए दूर हो सकती है। सास-बहू ने पूछा - कौनसा संकल्प? श्री चन्द्रप्रभ ने बहू से कहा - एक बात सदा याद रखो, सास शक्कर की भी क्यों न हो टक्क र मारना नहीं भूलती इसलिए सास तुम्हें कुछ भी न कहे यह तो हो नहीं सकता, पर आप एक बात दिमाग में बिठा लो कि सास अथवा ससुर जब भी डाँटे या कुछ कहे तो सोचना चौराहे की लालबत्ती जल गई है। भले ही हमें लालबत्ती का जलना अच्छा न लगे, पर वह हमारी सुरक्षा के लिए ही जलती है। श्री चन्द्रप्रभ ने सास से कहा - याद रखो, बहू हजार काम घर के करेगी, पर एक काम अपने मन का भी करेगी इसलिए बहू जब भी कहीं जाने के लिए, कुछ करने के लिए बोले तो तुरंत हाँ कर देना, भूलचूककर मना मत करना। कुछ दिनों के बाद सास-बहू ने आकर कहा - सचमुच, काम कर गया आपका मंत्र।

हर समस्या के तत्काल समाधानकर्ता


श्री चन्द्रप्रभ के पास जीवन, व्यक्तित्व, कॅरियर, स्वास्थ्य, परिवार, धर्म, समाज, राष्ट्र से जुड़ी हर समस्या का समाधान है। वे हर प्रकार की समस्या के बेहतरीन एवं तत्काल समाधानदाता हैं। उनकी कृतियों में परिवार से समाज तक, धर्म से अध्यात्म तक, व्यापार से व्यक्तित्व विकास तक हर तरह की जिज्ञासाओं का रोचक समाधान हुआ है जिसे पढऩे मात्र से जीवन में एक नई ताजगी का संचार होता है। सांसद बालकवि वैरागी कहते हैं, ''श्री चन्द्रप्रभ द्वारा जीवन की समस्याओं से जुड़े हुए समाधान पढ़कर पाठक साधक हो जाता है। वह विचारक से चिंतक और चिंतक से मनीषी तक के पायदान पर चढ़ता चला जाता है। वह वह नहीं रहता जो कि वह था। वह वह हो जाता है जो कि वह होना चाहता है। उनके समाधान मनोवैज्ञानिकता, तार्किकता एवं सरलता लिए हुए होते हैं। साथ ही उनमें क्रमबद्धता एवं रोचकता का समावेश होता है। इस कारण वे युवा पीढ़ी एवं आमजन में ज्यादा उपयोगी सिद्ध हुए हैं। बातें जीवन की, जीने की, बेहतर जीवन के बेहतर समाधान, अंतर्यात्रा, ध्यान : साधना और सिद्धि, चेतना का विकास आदि पुस्तकों में श्री चन्द्रप्रभ ने सैकड़ों तरह की जिज्ञासाओं एवं समस्याओं का विस्तार से समाधान दिया है। उनकी समाधान के संदर्भ में निम्न घटनाएँ हैं -

सबसे कठिन क्या - एक युवक श्री चन्द्रप्रभ से मिलने आया। उनसे प्रभावित होकर पूछने लगा - संतप्रवर, इस दुनिया में सबसे विशाल क्या है? कहा - आकाश। युवक ने अगले प्रश्न में पूछा - ज़रा बताएँ, दुनिया में सबसे महान चीज़ क्या है? मुस्कुराते हुए कहा - सद्गुण, जो इंसान को सबसे महान बना देते हैं। युवक ने ख़ुश होकर फिर नई जिज्ञासा रखी कि दुनिया में सबसे सरल काम क्या है? उपदेश देना - कहा। यह सुनकर युवक को लगा बात तो वास्तव में सही है। उसने कहा - गुरुदेव, अब मैं अंतिम जिज्ञासा का समाधान चाहता हूँ कि जीवन में सबसे कठिन काम क्या है? कुछ पल सोचा और कहा - जीवन में सबसे कठिन काम एक ही है जिसे कर लेने पर इंसान इंसान नहीं रहता देवदूत बन जाता है और वह है अपने-आपको जानना और अपने स्वभाव को सुधारना ।

यश कामना कैसे जीतें - एक समारोह में आए विशिष्ट मेहमानों की खुले दिल से प्रशंसा की जा रही थी। माला और साफा पहनकर वे बड़े खुश हो रहे थे। कार्यक्रम के पश्चात् एक व्यक्ति ने श्री चन्द्रप्रभ से पूछा - क्या सम्मान पाने की कामना को जीता जा सकता है? उन्होंने कहा - इस कामना को जीतना मुश्किल तो है, पर नामुमकिन नहीं। इसके लिए दो बातों का ध्यान रखा जाना चाहिए। उसने पूछा- कौनसी? उन्होंने कहा - मंच पर खुद की तारीफ व सम्मान नहीं करवाएँगे, कोई ऐसा कर रहा है तो उसे वैसा न करने का निवेदन करेंगे और सदा दूसरों को सम्मान देने की भावना रखेंगे क्योंकि सम्मान पाने की नहीं, देने की चीज होती है।

नई कार्यशैली की सीख - एक बहिन श्री चन्द्रप्रभ के दर्शन करने आई। उसने श्री चन्द्रप्रभ से कहा - मैं बहुत दुखी हूँ। मेरे घर में मेरी देवरानी भी है और जेठानी भी, पर घर का काम सबसे ज्यादा मुझे ही करना पड़ता है। इस कारण मुझे उनसे ईष्र्या होती है और मैं मन ही मन जलती रहती हूँ। आखिर मैं ही घर में ज्यादा घिसँू-पिसूँ क्यूँ? श्री चन्द्रप्रभ ने कहा - यह तो अच्छी बात है। बहिन ने कहा - आप भी क्यों मेरे साथ मजाक कर रहे हैं, यह भला कैसे अच्छी बात हो सकती है। श्री चन्द्रप्रभ ने कहा - मेरे इस प्रश्न का उत्तर दो कि जो चंदन ज्यादा घिसता है उसका क्या उपयोग होता है? बहिन ने कहा - वह तो मंदिर में परमात्मा के चरणों में चढ़ता है। श्री चन्द्रप्रभ ने फिर पूछा - जो चंदन बिल्कुल भी नहीं घिसता उसका क्या होता है? बहिन ने कहा - उसे श्मशान में किसी अमीर का शव जलाने में काम ले लिया जाता है। श्री चन्द्रप्रभ ने कहा - इसका मतलब है आप मंदिर में चढऩे वाले चंदन की तरह हैं और काम नहीं करने वाले श्मशान में जलने वाले चंदन की तरह। याद रखें, जो घिसता है वह परमात्मा तक पहुँचता है और जो निठल्ला बैठा रहता है वह श्मशान में खाक हो जाता है। यह सुन बहिन की आँखों में नई चमक आ गई। उसने कहा- आज से मुझे काम करने की सकारात्मक जीवन-दृष्टि मिल गई।

जीवंत काव्य के रचयिता


श्री चन्द्रप्रभ साहित्यकार होने के साथ सिद्धहस्त काव्यकार एवं गीतकार भी हैं। उन्होंने सैकड़ों जीवंत कविताओं एवं भजनों का सृजन किया है। जहाँ उनकी कविताएँ छायावादी एवं रहस्यवादी संस्कारों के साथ दर्शन की अनुपम छटा दर्शाती हैं वहीं उनके भक्ति एवं साधना से भरे भजन अंतर्मन को सुकून और जीवन को नई दिशा प्रदान करते हैं। उनकी कविताएँ कल्पनालोक में विचरण नहीं करती हैं वरन् जीवन के विभिन्न पहलुओं का स्पर्श करती हुई यथार्थपरक चिंतन प्रस्तुत करती हैं। उनकी कविताओं एवं भजनों के पीछे जीवन-निर्माण, व्यक्तित्व-विकास एवं आध्यात्मिक उन्नति का महान उद्देश्य छिपा हुआ है। श्री चन्द्रप्रभ जीवन को वीणा के तारों की तरह साधने की प्रेरणा देते हैं। अतित्याग व अतिभोग की बजाय वे मध्यम मार्ग अपनाने का समर्थन करते हैं। उन्होंने 'वीणा के तार नामक कविता के माध्यम से आम जनमानस को अंतर्दृष्टि प्रदान करते हुए लिखा है -

इतने अधिक कसो मत निर्मम, वीणा के हैं कोमल तार। टूट पड़ेंगे सबके सब वे, कभी न निकलेगी झंकार।।
इतने अधिक करो मत ढीले, रसवन्ती वीणा के तार। कोई राग नहीं बन पाए, निष्फल हो स्वर का संसार।।

इसी कविता से जुड़ा एक घटना प्रसंग इस प्रकार है - महान कवयित्री महादेवी वर्मा हुईं अभिभूत - जितयशा फाउंडेशन के सचिव प्रकाशचंद दफ्तरी इलाहबाद में देश की महान कवयित्री महादेवी वर्मा के पास श्री चन्द्रप्रभ का साहित्य प्रदान करने गये। महादेवी वर्मा ने श्री चन्द्रप्रभ का साहित्य देख कर कहा - मेरे पास उनकी किताबें पहले से भी है और यह कहते हुए श्री चन्द्रप्रभ की प्रतीक्षा नाम की काव्य पुस्तिका निकाली और कहने लगी - मैंने इस किताब को पूरा पढ़ा है कोई जैन संत छायावाद पर इतनी अच्छी कविताएँ लिख सकता है यह देखकर मैं प्रसन्न हूँ। यह कहते हुए उन्होंने उसी किताब की एक कविता सबके सामने पढऩी शुरू की जिसके बोल थे 'इतने अधिक कसो मत निर्मम वीणा के हैं कोमल तार... सबने देखा कविता सुनाते हुए महादेवी जी भाव-विह्वल हो उठी थीं।

श्री चन्द्रप्रभ ने सुखी जीवन के लिए भाषाशैली को श्रेष्ठ बनाने एवं माता-पिता की सेवा करने की प्रेरणा एक राजस्थानी गीत के माध्यम से देते हुए लिखा है -

मीठो-मीठो बोल थारो कांई लागै, कांई लागेजी थारो कांई लागै। संसार कोई रो घर नहीं, कद निकलै प्राण खबर नहीं।।
चार दिना रो जीणो है संसार, थारी-मारी छोड़ करां सब प्यार। हिलमिल रैवो, हँसखिल जीवो, संसार कोई रो घर नहीं।।
मात-पिता ने जाणो थे भगवान, उणरी सेवा है प्रभु रो सम्मान। सेवा करो, आशीष लो।।

जैन धर्म के 22वें तीर्थंकर नेमिनाथ कुमार अवस्था में जब राजकुमारी राजुल से शादी करने के लिए जाते हैं, पर जब उन्हें पता चलता है कि बारातियों के भोजन के लिए हजारों पशुओं को बाड़े में रखा गया है तो वे उनके करुण-क्रंदन को सुनकर द्रवित हो जाते हैं और अपने कदम गिरनार की धरती पर संन्यास लेने के लिए बढ़ा देेते हैं। यह देखकर राजकुमारी राजुल भी उनका अनुसरण करने को उद्यत हो जाती है। तीर्थंकर नेमिनाथ और उनकी दासी राजुल की विरह व्यथा के इस प्रसंग को श्री चन्द्रप्रभ ने काव्य के रूप में व्यक्त करते हुए लिखा है -

जहाँ नेमि के चरण पड़े, गिरनार की धरती है। वह प्रेम मूर्ति राजुल, उस पथ पर चलती है।।
राजुल की आँखों से, झर-झरता पानी। अन्तस् में घाव भरे, प्रभु दरस की दीवानी।।
मन-मंदिर में जिसकी, तस्वीर उभरती है। जिस ओर गये प्रभु तुम, वही मेरा ठिकाना है।।
जीवन की यात्रा का वो पथ अनजाना है। लख चरण 'चन्द्रप्रभु के, राजुल तब चलती है।।

श्री चन्द्रप्रभ ने तीर्थंकर आदिनाथ की भक्ति पर रचित जैन धर्म का महान स्तोत्र भक्तामर का पद्यानुवाद भी किया है। प्रभु-भक्ति में लिखे गए बोल उनके इस प्रकार हैं -

जिसने तुम्हें निहारा जी भर, वह क्यों इधर-उधर झाँकेगा? क्षीर-नीर को पीने वाला, क्षार-नीर को क्यों चाहेगा?
और देव निरखे कितने ही, पर परितुष्ट हुआ मैं तुझसे। मन-मंदिर में तुझे बसाया, हरे कौन मेरा उर मुझसे।।
नमन तुम्हें हैं संकट-भंजक, वसुधा-भूषण, प्रथम जिनेश्वर । सोख लिया तुमने भव सागर, तीन लोक के हे परमेश्वर ।।

श्री चन्द्रप्रभ ने संबोधि सूत्र में आध्यात्मिक मार्गदर्शन देते हुए लिखा है -

मन मंदिर इंसान का, मरघट मन शमशान। स्वर्ग-नरक भीतर बसे, मन निर्बल, बलवान्।।
जग जाना, पर रह गये, खुद से ही अनजान। मिले न बिन भीतर गए, भीतर का भगवान।।
कर्ता से ऊपर उठें, करें सभी से प्यार। ज्योति जगाये ज्योति को, सुखी रहे संसार।।
बंधन तभी है जगत जब, मन में विषय की लहर हो। मन निर्विषय यदि विषय से, तो मुक्ति बोले मुखर हो।।
संसार क्या है वासना का, एक अंधा सिलसिला। निर्वाण तब, जब वासना से, मुक्ति का मारग मिला।।

श्री चन्द्रप्रभ ने मन की भटकन का सुंदर चित्र खींचा है। वे संत-गृहस्थ की मनोदशा के बारे में कहते हैं -

जब संन्यास में होते हैं, लगता है गार्हस्थ्य अच्छा; जब गार्हस्थ्य में होते हैं, लगता है संन्यास अच्छा।
जैसे पिंजरे के पंछी को, लगता है आकाश अच्छा; आकाश विहारी पंछी को, लगता है पिंजरा अच्छा।।

श्री चन्द्रप्रभ केवल मुक्ति का संदेश ही नहीं देते वरन् मुक्ति का मार्ग भी स्पष्ट करते हैं। उन्होंने इस भावना को काव्य में प्रकट करते हुए लिखा है -

मुक्ति का पथ, धार खड्ग की, विरले ही होते गतिमान। लगातार जो चलते रहते, पाते हैं वे लक्ष्य महान॥
दीप जलाएँ श्रद्धा-घृत से, ज्ञान की बाती, कर्म प्रकाश। जीवन ज्योतिर्मय हो उठता, पाते मुक्ति का आकाश॥

इस तरह श्री चन्द्र्रप्रभ जीवंत काव्य की रचना करने में सफल रहे हैं।

शब्दों के कमाल के जादूगर


श्री चन्द्रप्रभ शब्दों के कमाल के जादूगर एवं चलते-फिरते शब्दकोश हैं। उन्होंने जीवन, जगत और अध्यात्म से जुड़े विविध पहलुओं की जो व्याख्याएँ की हैं वह अद्भुत हैं, जिससे उनके चिंतन की गहराई का सहज अनुमान लग जाता है। उन्होंने जीवन के बारे में लिखा है, ''जीवन किसी साँप-सीढ़ी के खेल की तरह है। कभी साँप के जरिए हम ऊपर से नीचे लुढ़क आते हैं तो कभी सीढ़ी के जरिए नीचे से ऊपर पहुँच जाते हैं। एक बार नहीं, दस बार भी साँप निगल ले, तब भी हम उस उम्मीद से पासा खेलते रहते हैं कि शायद अगली बार सीढ़ी चढऩे का अवसर अवश्य मिल जाए। संगत का महत्त्व बताते हुए वे कहते हैं, ''दु:खी और बदिकस्मत लोगों के साथ रहने की बजाय सुखी और खुशिकस्मत लोगों के साथ रहें, नहीं तो आपके सौभाग्य को भी उनकी बदिकस्मती का सूर्य-ग्रहण लग जाएगा। माता-पिता को सावधान करते हुए उन्होंने कहा है, ''आप अपने बच्चों को बुरी नज़र से बचाकर रखते हैं, पर बुरी संगत से ? बच्चों को बुरी संगत से बचाइए, नहीं तो कल आप पर उनकी बुरी नज़र हो जाएगी। नजरों के प्रति सावधान करते हुए वे लिखते हैं, ''रावण के बीस आँखें थीं, पर नजर सिर्फ एक औरत पर थी जबकि अपने दो आँखें हैं, पर नजर हर औरत पर है। फिर सोचो कि असली रावण कौन है?

श्री चन्द्रप्रभ ने युवा पीढ़ी में जोश और जज्बा जगाने की बेहतरीन कोशिश की है। उन्होंने हार-जीत के बारे में कहा है, ''िजंदगी हार का नाम नहीं, जीत का नाम है। हारना गुनाह नहीं है, लेकिन हार मान बैठना अवश्य गुनाह है। वे कहते हैं, ''माना कि आज हमारी औकात बूँद जितनी होगी, पर बूँद से बूँद मिलाते रहे, तो एक दिन वही बिजली पैदा करने वाला बाँध बन जाता है। उन्होंने याददाश्त के संदर्भ में कहा है, ''याददाश्त के लिए थ्री आर का फार्मूला अपनाइए — 1. रिमेम्बरिंग, 2. रिवाइिजंग, 3. राइटिंग। यानी याद कीजिए, दोहराइए, लिखकर उसे और पक्का कीजिए।

श्री चन्द्रप्रभ ने कार्यशैली की विवेचना करते कहा है, ''बहुत से काम खराब ढ़ंग से करने की बजाय थोड़े काम अच्छे ढंग से करना बेहतर है। उनकी दृष्टि में धनार्जन का अर्थ है, ''यदि आपको धन कमाना है तो यह मत सोचिए कि पैसों के बिना कैसे शुरू करूँ? बल्कि यह सोचिए कि यदि आप शुरू ही नहीं करेंगे, तो पैसे कहाँ से आएँगे। श्री चन्द्रप्रभ ने जीवन में प्रेम और क्षमा को अपनाने की प्रेरणा देते हुए कहा है, ''जो काम रुमाल से हो सकता है उसके लिए रिवाल्वर मत निकालिए। गरमी-नरमी पर उन्होंने लिखा है, ''अगर गरमी रखोगे तो लोग ए.सी. में बैठना पसंद करेंगे, पर अगर नरमी रखोगे तो लोग तुम्हारे पास बैठना पसंद करेंगे।

श्री चन्द्रप्रभ ने परिवारों में प्रेम और मिठास का अमृत घोला है। उनकी पारिवारिक रिश्तों को लेकर की गई व्याख्याएँ अद्भुत हैं। परिवार की नई परिभाषा देते हुए उन्होंने लिखा है, ''परिवार का मतलब है : फेमिली का मतलब है : फादर एण्ड मदर आई लव यू। उन्होंने माँ को इस तरह व्याख्यायित किया है, ''माँ का 'म महादेव, महावीर और मोहम्मद साहब की महानता लिए हुए है और माँ का 'अ आदिब्रह्मा, आदिनाथ और अल्लाह को अपने आँचल में समेटे हुए है। आप माँ की वंदना कीजिए, सृष्टि के सभी देवों की वंदना अपने-आप हो जाएगी। वे 1 और 1 को नए स्वरूप में परिभाषित करते हुए कहते हैं, ''कितना अच्छा हो कि हम दो भाइयों के बीच १ङ्ग१, १+१, १-१ करने की बजाय वैर-विरोध के सारे 3 + - हटा दें तो यही दो भाई 11 (ग्यारह) की ताकत नजर आने लग जाएँगे। 'घर में बड़ा कौन? के बारे में उनका कहना है, ''घर में बड़े वे नहीं हैं जिनकी उम्र बड़ी है, घर में बड़े वे होते हैं जो वक्ïत पडऩे पर अपनी कुर्बानी देकर अपना बड़प्पन निभाते हैं। बेटी और बहू की सुंदर व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा है, ''बेटी लक्ष्मी है और बहू गृहलक्ष्मी। लक्ष्मी चंचला है और गृहलक्ष्मी स्थायी। गृहलक्ष्मी को इतना प्यार दीजिए कि घर से गई लक्ष्मी की याद न सताए। लायक-नालायक की व्याख्या करते हुए वे कहते हैं, ''बच्चों को पढ़ा-लिखाकर लायक बनाएँ, पर उस तरह का लायक न बनाएँ कि वे आपके प्रति ही नालायक साबित हो जाएँ।

श्री चन्द्रप्रभ ने पति-पत्नी के रिश्ते के संदर्भ में 'झेलना शब्द की विवेचना इस प्रकार की है, ''अपने पति पर झल्लाइए मत। वे दूसरों से सौ-सौ लड़ाइयाँ झेल सकते हैं, पर आपकी रोज़-रोज़ की टीं-टीं बर्दाश्त नहीं कर सकते हैं । पति का दिल जीतना है, तो उन्हें अपना प्यार, सम्मान और खुशियाँ बाँटते रहिए। धन और बेईमानी के संदर्भ में उन्होंने कहा है, ''अपने पति को धन कमाने की प्रेरणा दीजिए, पर बेईमान बनने की नहीं। बेईमानी करके वे आपके लिए हीरों की चूडिय़ाँ तो बना देंगे, पर कहीं ऐसा न हो कि उनके हाथों में लोहे की हथकडिय़ाँ आ जाएँ। पतियों को सीख देते हुए वे कहते हैं, ''पत्ïनी के अगर सरदर्द हो तो उसे केवल 'सर का बाम मत दीजिए, दो पल उसके पास बैठकर उसके सिर को सहलाइए। यह सच है कि पत्नी को सदाबहार खुश रखना संसार का सबसे बड़ा चुनौतीपूर्ण कार्य है, पर याद रखिए पत्नी खुश है तो ही आप खुश हैं, नहीं तो वह आपकी खुशी को ग्रहण लगा देगी। उन्होंने लक्ष्मी का अर्थ इस प्रकार बताया है, ''इंसान की एक लक्ष्मी दुकान के गुल्लक में रहती है और दूसरी लक्ष्मी घर के आँगन में। यदि घर की लक्ष्मी का सम्मान न किया तो याद रखना दुकान की लक्ष्मी से हाथ धो बैठोगे।

श्री चन्द्रप्रभ ने खानपान-खानदान के बारे में कहा है, ''आपका खानपान ही आपके खानदान की पहचान करवाता है। सदा वही खानपान कीजिए जो आपके खानदान को स्वस्थ और गरिमामय बनाए। वे सुधार की व्याख्या इस प्रकार करते हैं, ''कृपया अपना पेट सुधारिए, शरीर स्वत: सुधर जाएगा। मस्त रहिए, मन सुधर जाएगा। आधे घंटे ही सही, भजन अवश्य कीजिए, आपका भव-भव सुधर जाएगा। उन्होंने गुटखे के बारे में लिखा है, ''गुटखा खाने से पहले 'ट हटाकर बोलिए, फिर भी जी करे, तो प्रेम से खाइए। अंगप्रदर्शन के बारे में उनका कहना है, ''अंगप्रदर्शन करना बैल को सींग मारने के लिए न्यौता देने के समान है। उनके अनुसार एकता का अभिप्राय है, ''0 की कोई कीमत नहीं होती, पर यदि उससे पहले 1 की ताकत लगा दी जाए तो हर 0 की कीमत 10 गुना बढ़ जाती है।

श्री चन्द्रप्रभ ने प्रभु और ईश्वर के बारे में लिखा है, ''प्रभु को इस बात से कोई प्रयोजन नहीं है कि आप उसे किस पंथ और पथ से पाना चाहते हैं, प्रभु को सिर्फ इस बात से सरोकार है कि आप उसे कितना पाना चाहते हैं। ईश्वर हममें है, अगर हम भी ईश्वर में हो जाएँ तो हमारे जीवन की समस्याओं का खुद-ब-खुद अंत हो जाए। प्रेम की विवेचना उन्होंने इस प्रकार की है, ''मनुष्य से प्रेम, प्रेम का पहला चरण है। पशु-पक्षियों से प्रेम, प्रेम का विस्तार है। पेड़-पौधे, नदी-नाले और चाँद-सितारों से प्रेम, प्रेम की पराकाष्ठा है। उन्होंने कट्टरता शब्द की व्याख्या करते हुए लिखा है, ''कट्टरता संसार का सबसे खतरनाक कैंसर है जो कि मानवता और भाईचारे की आत्मा को खोखला कर देता है। वे भारत के भाग्योदय पर कहते हैं, ''भारत का भाग्योदय तभी होगा जब यहाँ का हर नागरिक राष्ट्रीय भावना को प्राथमिकता देगा। इस तरह वे हर व्यक्ति को अपने व्यक्तित्व को निखारने की प्रेरणा देते हैं। उनकी हर व्याख्या में नयापन है, नया चिंतन है, नया दृष्टिकोण है जो परिवार, समाज, राष्ट्र, जीवन और व्यक्तित्व-निर्माण में बेहद उपयोगी है।

सहज जीवन एवं सौम्य व्यवहार के मालिक


श्री चन्द्रप्रभ सहज जीवन के मालिक हैं। सहजता का अर्थ है : हर हाल में आनंद, शांति। वे जीवन के हर पहलू में सहजता का दृष्टिकोण रखते हैं। चाहे सुनना हो या कहना, सहजता उनके लिए पहले है। उन्होंने सहजता और निर्लिप्तता को साधना की नींव बताया है। उन्होंने संबोधि साधना के अंतर्गत पाँच चरणों का जिक्र किया है - (1) सहजता (2) सचेतनता (3) सकारात्मकता (4) निर्लिप्तता और (5) प्रसन्नता। वे आध्यात्मिक शांति और मुक्ति के लिए सहजता अर्थात् हर हाल में आनंद-दशा को बनाए रखने को पहला सोपान मानते हैं। उन्होंने आरोपित, कृत्रिम और बनावटी जीवन से दूर रहने की सलाह दी है। 'शांति पाने का सरल रास्ता नामक पुस्तक में उन्होंने सहजता पर विस्तार से प्रकाश डाला है।

श्री चन्द्रप्रभ सौम्य व्यवहार की साक्षात मूर्ति हैं। उनसे मिलने वाला हर कोई उनके व्यवहार से प्रभावित हुए बिना नहीं रहता। वे सौम्य व्यवहार को सफलता के लिए जरूरी मानते हैं। उनका मानना है, ''विनम्र व्यक्ति की तो दुश्मन भी प्रशंसा करते हैं, जबकि घमंडी व्यक्ति को दोस्त भी दुत्कारते हैं। वे न केवल सौम्य व्यवहार के धनी हैं वरन् उनकी व्यावहारिक ज्ञान पर भी पकड़ मजबूत है। वे कहते हैं, ''गुस्सा दिवाला है और क्षमा दीवाली है। गुस्सा थूकिए और क्षमा कीजिए।

श्री चन्द्रप्रभ ने हजारों किलोमीटर की पदयात्राएँ की हैं। उन्होंने जीवन, जगत, प्रकृति और लाखों लोगों को काफी करीबी से देखा है। उनके साहित्य में इसकी स्पष्ट झलक है। वे जीवन-जगत को धरती की सर्वश्रेष्ठ कृति मानते हैं और इसे पढऩा दुनिया की किसी भी महानतम पुस्तक को पढऩे से ज्यादा बेहतर बताते हैं। वे जीवन का व्यावहारिक ज्ञान पाने के लिए हमें बार-बार प्रकृति के सान्निध्य में जाने की प्रेरणा देते हैं। वे कहते हैं, ''हम फूलों को चूमकर देखें, हमारे हृदय में प्रेम का सागर लहरा उठेगा। हम प्रकृति का सौन्दर्य देखें, प्रकृति का सौन्दर्य हममें नृत्य कर उठेगा। उन्होंने दुनिया को अनुगूँज कहा है। यहाँ फूलों के बदले फूल व काँटों के बदले काँटे आते हैं। इसके उदाहरण के रूप में श्री चन्द्रप्रभ ने कुएँ में मुँह डालकर बोलने की बात बताई है। अगर कुएँ में गधा बोलेंगे तो वापस गधा शब्द लौटकर आएगा और गणेश बोलेंगे तो गणेश। वे कहते हैं, ''औरों के लिए अच्छा बनना, अपने लिए और बेहतर बनने की कला है। इसलिए उन्होंने सबके साथ अच्छा व्यवहार करने की प्रेरणा दी है ताकि वापस अच्छा व्यवहार लौटकर आ सके। उनके सौम्यता भरे व्यवहार से जुड़ी निम्न घटनाएँ प्रेरणारूप हैं -

नम्रता से जीता दिल - दीक्षा लेने के बाद श्री चन्द्रप्रभ पढऩे हेतु बनारस गए। वहाँ पर उन्होंने लगातार तीन साल तक दर्शन, व्याकरण, संस्कृत, प्राकृत, आगम, पिटक, वेद, उपनिषद् व गीता जैसे शास्त्रों का गहन अध्ययन किया। इस दौरान वे संस्कृत-साहित्य और दर्शन-शास्त्र का अध्ययन वाराणसी विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग के अध्यक्ष प्रो. नारायण मिश्र से करना चाहते थे। उन्हें पढ़वाने के लिए निमंत्रण भेजा गया। उन्होंने साफ तौर पर कह दिया कि सप्ताह में तीन दिन आऊँगा, एक घंटे से ज्यादा नहीं पढ़ाऊँ गा, किसी दिन छुट्टी कर ली तो पैसे नहीं कटेंगे और महीने के छह सौ रुपए लूँगा। इन शर्तों के साथ भी श्री चन्द्रप्रभ को पढऩा पड़ा क्योंकि 30 साल पहले बनारस में उनके जैसा कोई विद्वान प्रोफेसर था नहीं, पर मात्र एक महीने के बाद वे सप्ताह में सातों दिन आने लगे, यहाँ तक कि रविवार को भी छुट्टी नहीं करते, एक घंटे की बजाय दो-दो, चार-चार घंटे तक पढ़ाते और महीना होने पर फीस भी नहीं माँगते, आिखर सब कुछ ऐसा कैसे हो गया?

प्रोफेसर के आते ही संत होने के बावजूद श्री चन्द्रप्रभ द्वारा खड़े होकर उनका अभिवादन करना, पिछले दिन पढ़ाए गए पाठों को पूरी तरह याद रखना, आगे के अध्यायों का पढ़ाने के पूर्व अभ्यास कर लेना, वाणी-व्यवहार से सदैव उन्हें प्रसन्न रखना जैसे गुणों व श्री चन्द्रप्रभ की विनम्रता, अभिरुचि, लगन व समर्पण देखकर वे अभिभूत हो गए और तब उन्होंने किसी गुरु की तरह नहीं, अपितु एक पिता की भाँति पढ़ाना शुरू कर दिया।

गुरुजी की विनम्रता - सन् 2008 के अगस्त माह में श्री चन्द्रप्रभ की जोधपुर के गाँधी मैदान में प्रवचनमाला चल रही थी। किसी संस्था का वहाँ दोपहर में नाश्ते का कार्यक्रम था। लोग नाश्ता करके कचरा वहीं फेंककर चले गये। उसके अगले दिन जब वे मैदान पहुँचे तो कचरा देखकर उसे पांडाल से बाहर फेंकने लगे। मैंने उनसे कहा - आप यह क्या कर रहे हैं, हमें कह दिया होता। उन्होंने कहा - क्यों कचरा उठाना कोई हल्का काम है? भगवान कृष्ण ने भी तो जूठी पत्तलें उठाई थीं, फिर मैं ऐसा क्यों नहीं कर सकता? उनके इन शब्दों को सुनकर वहाँ खड़े लोगों को न केवल कचरा हटाने की प्रेरणा मिली वरन् जिन्होंने कचरा फेंका था उन्हें भी अपनी गलती का अहसास हुआ।

शिष्टता और मर्यादा की जीवंत मूर्ति


श्री चन्द्रप्रभ दार्शनिक, विचारक और तत्त्ववेत्ता होने के साथ शिष्टता और मर्यादा की जीवंत मूर्ति हैं। वे वेश बदलकर संत बनने को आसान मानते हैं, पर स्वभाव बदलकर संत बनने को वे असली साधना मानते हैं। वे उसी आचार-विचार को श्रेष्ठ मानते हैं जिसका परिणाम सुख, शांति और समाधि के रूप में आता है एवं जो व्यक्ति को परिवार, समाज और देश का कल्याण करने की प्रेरणा देता है। वे जीवन को खुली डायरी की तरह रखने के समर्थक हैं। उन्होंने लिखा है, ''सोचिए वही जिसे बोला जा सके और बोलिए वही जिस पर हस्ताक्षर किये जा सकें। उनकी नजरों में, आचार-विचार और कथनी-करणी में दूरी रखना न केवल दूसरों को वरन् खुद को खुद के द्वारा धोखा देना है। वे सबके साथ प्रेम और मर्यादा से पेश आते हैं। वे विरोधियों के दिल को भी बड़प्पन भरे व्यवहार से जीतने की कोशिश करते हैं। इस संदर्भ में श्री चन्द्रप्रभ के जीवन से जुड़ी निम्न घटना उल्लेखनीय है -

बड़प्पन से जीता दिल - काफी वर्ष पुरानी बात है। श्री चन्द्रप्रभ का एक विशेष शहर से विहार होने वाला था। संयोग से उसके दो दिन बाद ही एक बड़े संत उस शहर में आने वाले थे। वे उनसे प्रेमभाव नहीं रखते थे। उन्होंने कई बार उनके विरोध में श्रावकों को पत्र भी लिखे थे, पर श्री चन्द्रप्रभ चाहते थे कि यह विद्वेष-भाव यहीं खत्म हो जाए सो उन्होंने विहार का कार्यक्रम स्थगित कर दिया। श्री चन्द्रप्रभ ने श्रावकों को प्रेरणा दी कि संतप्रवर का स्वागत बैंडबाजे के साथ करवाया जाए। जब यह खबर उनके पास पहुँची तो उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ। इतना ही नहीं श्री चन्द्रप्रभ दो कि.मी. चलकर उनकी अगवानी करने के लिए भी पहुँचे। उनको सामने देखकर वे अभिभूत हो उठे। जैसे ही वे उन्हें वंदन करने के लिए चरणों में झुके तो उनकी आँखें भर आईं। उन्होंने कहा - आपके बड़प्पन ने मेरा दिल जीत लिया।

प्रेम के प्रबल पक्षधर


श्री चन्द्रप्रभ जितने ज्ञान और ध्यानयोगी हैं उतने ही प्रेम मूर्ति भी। वे विश्व की सारी समस्याओं का समाधान प्रेम में देखते हैं। उन्होंने भक्ति, श्रद्धा, प्रार्थना, पूजा को प्रेम के ही अलग-अलग रूप माने हैं। शास्त्रों में साधना के तीन मार्ग बताए गए हैं - (1) ज्ञान (2) श्रद्धा और (3) आचरण। श्रद्धा को धर्म की आत्मा माना गया है। श्री चन्द्रप्रभ का हृदय प्रेम, श्रद्धा और भक्ति की त्रिवेणी से भरा हुआ है। वे स्वयं प्रेम की साक्षात प्रतिमा हैं। उनके द्वारा रचित प्रेम और भक्ति से भरे गीत गाने योग्य हैं। उनका नेमि-राजुल गीत तो विश्व स्तर पर चर्चित हुआ है, जिसके प्रथम बोल है -

सौभाग्य कहाँ सहगमन करूँ, अनुगमन करूँ ऐसा वर दो। जो हाथ हाथ में नहीं दिया, वो हाथ शीष पर तो रख दो॥

श्री चन्द्रप्रभ प्रेमरहित जीवन को अपाहिज के समान और प्रेम युक्त जीवन को अमृत के समान मानते हैं। वे प्रेम रहित प्रार्थना को शब्दजाल, प्रेम रहित पूजा को केवल चंदन का घिसना और प्रेम रहित समाज को उठक-बैठक भर मानते हैं। उनके द्वारा प्रेम की महिमा अनेक जगह वर्णित हुई है। उन्होंने पत्नी से जुड़ा प्रेम सामान्य कोटि का, माँ से जुड़ा प्रेम पवित्र कोटि का और परमात्मा से जुड़े प्रेम को प्रेम की पराकाष्ठा माना है। वे कहते हैं, ''प्रभु को माइक पर नहीं, मन में पुकारिए। माइक पर उठी पुकार भीड़भाड़ के शोर में खो जाती है, पर मन में उठी पुकार सीधे प्रभु से लौ लगाती है। उनकी प्रेम और अहिंसा से जुड़ी यह बात कितनी सुंदर है, ''चाँटा न मारना अहिंसा हो सकता है लेकिन स्नेह से माथा चूमना अहिंसा का विस्तार और प्रेम की प्रगाढ़ता का ही परिणाम है। उन्होंने आध्यात्मिक विकास के दो मार्ग बताए हैं - एक ध्यान, दूसरा प्रेम। वे ध्यान को स्वयं के साथ और प्रेम को इस जगत के साथ जीने के लिए बताते हैं। उनके प्रेमी-हृदय को प्रकट करने वाली एक घटना है -

प्रेम की ताकत - एक बार श्री चन्द्रप्रभ ने सहयोगी संतों के साथ अपना चातुर्मास मध्यप्रदेश के एक शहर में करने की घोषणा की। वहाँ पहुँचते ही उन्हें लगा कि एक अन्य सम्प्रदाय का श्रावक उनका कट्ïटर विरोधी बना हुआ है। वह जगह-जगह उनके विरुद्ध टीका-टिप्पणी व उल्टी-सीधी बातें करता रहता है। उन्होंने उस शहर में चातुर्मास प्रवेश हेतु उसी व्यक्ित के घर से होते हुए शोभायात्रा निकालने का सुझाव दिया। संघ के वरिष्ठ श्रावकों ने उनसे कहा - यह अच्छा नहीं रहेगा, कहीं उसने कुछ गलत कह दिया, या गलत कर दिया तो रंग में भंग पड़ जाएगा। उन्होंने सबको निश्िंचत रहने को कहा। जैसे ही वह घर आया, शोभायात्रा रुकवाई गई और श्री चन्द्रप्रभ सहयोगी संतों के साथ उसके घर गए। विरोधी श्रावक यह देखकर हक्का-बक्का रह गया। उनकी मुस्कान और नमस्कार मुद्रा देखकर उसकी विरोधी भावनाएँ गायब हो गईं और वह भी हाथ जोड़े खड़ा हो गया। श्री चन्द्रप्रभ ने कहा - हमारे जीवन का सौभाग्य है कि इस शहर में हमें एक श्रेष्ठ और गरिमापूर्ण श्रावक के घर से प्रथम आहार लेने का अवसर मिल रहा है। यह शब्द सुनते ही वह उनके चरणों में गिर पड़ा, उसे अपनी गलती का अहसास हुआ और वह क्षमायाचना करने लगा। वही व्यक्ित उस चातुर्मास में उनका निकटवर्ती भक्त बन गया।

परम मातृभक्त एवं भ्रातृत्व प्रेम की अनोखी मिसाल


श्री चन्द्रप्रभ के माता-पिता की कुल पाँच संतानें हैं। जब माता-पिता ने बुढ़ापे में संन्यास के मार्ग पर कदम बढ़ाने का दृढ़ निश्चय कर लिया तो पाँच संतानों में से सबसे छोटी दो संतानों में श्री चन्द्रप्रभ एवं श्री ललितप्रभ ने भी माता-पिता की सेवा के लिए संन्यास धारण कर लिया। श्री चन्द्रप्रभ कहते हैं, ''हमने न तो वैराग्य की भावना से, न मोक्ष पाने की तमन्ना से संन्यास लिया। हमने संन्यास माता-पिता की सेवा करने के लिए लिया है। हमारे लिए समाज बाद में है, पहले माता-पिता की सेवा है। पिता संत श्री महिमाप्रभ सागर जी महाराज का देवलोकगमन मई 2005 में हो गया। साध्वी माँ श्री जितयशा जी अभी संबोधि धाम, जोधपुर में विराजमान हैं और उनकी सेवा में दोनों भ्राता संत अहर्निश समर्पित हैं। दोनों को संन्यास लिए लगभग 35 साल हो चुके हैं और ये दोनों संत पूरे देश में भ्रातृत्व प्रेम की मिसाल बने हुए हैं। ये दोनों कलयुग के राम-लक्ष्मण हैं। ये हर समय सदा साथ रहते हैं और हर कार्य मिलजुलकर करते हैं। वे शरीर से भले ही दो हैं, पर आत्मा दोनों की एक है।

श्री चन्द्रप्रभ का मातृ-प्रेम चमत्कारिक है। जब वे माँ पर बोलते हैं तो सुनने वालों की आँखों से गंगा-जमुना बहने लगती है। उनका 'माँ की ममता हमें पुकारें प्रवचन अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित हुआ है। वे माँ को महात्मा व परमात्मा से भी महान बताते हैं। उन्होंने संतों की साधना व योगियों के योग को भी माँ की साधना के आगे फीका बताया है। उन्होंने माँ को ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति माना है। वे कहते हैं - हर व्यक्ति सोचे, अगर माँ न होती तो....! उन्होंने माँ पर विस्तृत व्याख्याएँ लिखी हैं। माँ की सेवा करने की सीख उन्होंने इस प्रकार दी है, ''जिस प्रतिमा को हमने बनाया, हम उसकी तो पूजा करते हैं, पर जिस माँ ने हमें बनाया हम उसकी पूजा क्यों नहीं करते? संत होकर भी माँ पर इतनी गहराई से बोलना आश्चर्यकारी है। वे माँ-बाप को निभाने, उनकी सेवा करने को जीवन में संन्यास लेने से भी ज्यादा कठिन मानते हैं। उनके मातृत्व-प्रेम से जुड़ी घटनाएँ इस प्रकार हैं-

छाती पर काले निशान क्यों - जब मैंने श्री चन्द्रप्रभ की छाती पर जले हुए के हल्के निशान देखे तो उनसे इसका कारण पूछा। उन्होंने बताया कि ये निशान नहीं, माँ की ममता के अमिट चिह्न हैं। बचपन से जुड़ी हुई घटना का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा - माँ के ननिहाल में किसी की बरसी का कार्यक्रम था। एक बड़ी कढ़ाई में खीर उबल रही थी। मैं पास में ही लेटा हुआ था। अचानक कढ़ाई के नीचे रखी एक भाग की ईंट खिसक गई। उबलती हुई खीर मुझ पर उछल पड़ी। जिससे शरीर के आगे वाले पूरे भाग पर फफोले हो गए। मुझे डॉक्टर के पास ले जाया गया। इलाज हुआ। डॉक्टर ने माँ से साफ-साफ कह दिया - जब तक फफोले के घाव न भरें तब तक बच्चे को सीधा रखना होगा। अगर एक भी फफोला फूट गया तो उस स्थान पर जिंदगी भर के लिए निशान बन जाएगा। माँ ने अपना सुख-दु:ख भूलकर मुझे लगभग डेढ़ साल तक सीधा पकड़कर रखा। फिर भी कुछ फफोले फूट गए और ये निशान उसी कारण बने हुए हैं। माँ ने इसके लिए मुझसे माँफी माँगते हुए कहा - बेटा, मैंने कोशिश तो बहुत की, पर फिर भी मैं तुझे पूरा बेदाग रखने में सफल न हो सकी। उन्होंने बताया - जब मैंने माँ के मुख से ये शब्द सुने तो मेरी आँखें झर-झर बहने लगीं। मैंने माँ से कहा - धन्य है आपकी इस ममता को। उस दिन के बाद मुझे माँ की मूरत में ही महावीर और महादेव के दर्शन होने लगे।

माँ की भावना को माना आदेश - सन् 1981 की बात है। माँ साध्वी श्री जितयशा जी महाराज के पालीताणा में वर्षीतप चल रहा था। उन्होंने श्री चन्द्रप्रभ एवं श्री ललितप्रभ को पत्र लिखा कि मेरी बार-बार इच्छा हो रही है कि मैं अपने वर्षीतप का पारणा आप दोनों पुत्र-संतों के हाथों से करूँ , पर मुझे मालूम है कि आप अभी आगरा में हैं और कोलकाता चातुर्मास करने की हाँ भर चुके हैं, अगर संभव हो तो आखातीज पर पालीताणा आ जाओ। उन्होंने पत्र पढ़ा और चिंतन किया कि अब क्या किया जाए। एक तरफ समाज में चातुर्मास खोला हुआ और दूसरी तरफ माँ की भावना। उन्होंने कोलकाता समाज को कहलवाया कि इस साल में हमारा आना संभव नहीं है। वे आगरा से 1500 किलोमीटर की दूरी तय कर प्रतिदिन पचास-पचास किलोमीटर पैदल चलकर ठेठ आखातीज के दिन 11 बजे पालीताणा पहुँचे और माताजी महाराज को अपने हाथों से पारणा करवाया। वास्तव में, उनका मातृत्व-प्रेम सबके लिए आदर्श है।

पारिवारिक प्रेम एवं सामाजिक समरसता के अग्रदूत


श्री चन्द्रप्रभ पारिवारिक प्रेम एवं सामाजिक समरसता के सूत्रधार हैं। उन्होंने घर-परिवार को स्वर्गनुमा बनाने की सीख दी है। घर के प्रत्येक सदस्य को उसका दायित्व-बोध करवाया है एवं हर रिश्ते को मधुरतापूर्ण बनाने के सरल सूत्र दिए हैं। उनके मार्गदर्शन से प्रभावित होकर हजारों युवक-युवतियाँ माता-पिता, सास-ससुर एवं बड़े-बुजुर्गों की सेवा करने लगे हैं। सास-बहू, भाई-भाई, देवरानी-जेठानियाँ हिल-मिलजुलकर रहने लगी हैं। माता-पिता बच्चों के संस्कारों के प्रति सजग हुए हैं। उनके द्वारा पारिवारिक-प्रेम पर निर्मित यह भजन घर-परिवार के लिए गीता का काम करता है

आओ कुछ ऐसे काम करें, जो घर को स्वर्ग बनाए। हमसे जो टूट गए रिश्ते, हम उनमें साँध लगाएँ। हम अपना फर्ज निभाएँ।।
जिस घर को हमने घर माना, उसको हम मंदिर मानें। और मात-पिता को इस मंदिर की, पावन प्रतिमा जानें। जितना उन्होंने हमें निभाया, उतना उन्हें निभाएँ।।
जहाँ सास-बहू और देवर-भाभी, प्रेम से हिल-मिल रहते। जहाँ संस्कारों की दौलत है, और मर्यादा को जीते। वहाँ 'चन्द्र स्वयं लक्ष्मीजी आकर, अपना धाम बनाए।।

श्री चन्द्रप्रभ ने घर के कमरों को क ब्रिस्तान न बनाने की सीख देते हुए कहा है, ''जिस घर में भाई-भाई, सास-बहू, देवरानी-जेठानी के प्रति प्रेम और समरसता होती है वह घर मंदिर की तरह होता है, पर जहाँ भाई-भाई, पिता-पुत्र आपस में नहीं बोलते, वह घर कब्रिस्तान की तरह होता है। कब्रिस्तान की कब्रों में भी लोग रहते हैं, पर वे आपस में बोलते नहीं, अगर घर की भी यही हालत है तो कब्रों और कमरों में फर्क ही कहाँ रह जाता है। वे सुबह से लेकर रात तक की घर की दिनचर्या बताते हुए कहते हैं, ''सुबह उठने पर माता-पिता के चरण स्पर्श कीजिए और भाई-भाई गले मिलिए, यह ईद का त्यौहार बन जाएगा। दोपहर में देवरानी-जेठानी साथ-साथ खाना खाइए, यह होली का पर्व बन जाएगा। रात को बड़े-बुजुर्गों की सेवा करके सोइए, आपके लिए आशीर्वादों की दीवाली हो जाएगी।

श्री चन्द्रप्रभ ने संतानों से कहा है, ''जब हमने जीवन की पहली साँस ली थी, तब माता-पिता हमारे करीब थे, जब वे जीवन की आिखरी साँस लें, तब हम उनके करीब अवश्य हों। परिवार में अगर धन का बँटवारा हो तो आप जमीन-जायदाद की बजाय, माता-पिता की सेवा को अपने हिस्से में लीजिएगा। धन तो उनके आशीर्वादों से स्वत: चला आएगा। वे बड़े-बुजुर्गों की उपयोगिता बताते हुए कहते हैं, ''बुजुर्गों के साये में रहिए। वे उस बूढ़े वृक्ष की तरह होते हैं जो फल भले ही न दे पायें, पर छाया तो अवश्य देते हैं। भाई-भाई के रिश्ते की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा है, ''वह भाई कैसा, जो भाई के काम न आए। राम का पिता के काम आना, सीता का राम के काम आना, लक्ष्मण का भाई-भाभी के काम आना और भरत का बड़े भाई के लिए मिट जाना - यह है धर्म, परिवार का धर्म, गृहस्थ का धर्म।

श्री चन्द्रप्रभ ने माता-पिता को बच्चों के प्रति विशेष रूप से सावधान किया है। वे बच्चों को संस्कारित एवं श्रेष्ठ नागरिक बनाने का मार्गदर्शन देते हुए कहते हैं, ''बच्चों पर समय का भी निवेश कीजिए। आप उन्हें 20 साल तक संस्कार दीजिए, वे आपको 80 साल तक सुख देंगे। यदि हम बच्चों के मोह में अंधे होकर धृतराष्ट्र बन बैठे, तो सावधान! हमें भी दुर्योधन और दु:शासन जैसी कुलघाती संतानों का सामना करना पड़ सकता है। पिता-पुत्र को दायित्व-बोध देते हुए उन्होंने कहा है, ''यदि आप एक पिता हैं तो अपनी संतान को इतना योग्य बनाएँ कि वह समाज की प्रथम पंक्ित में बैठने के काबिल बने और यदि आप किसी के पुत्र हैं तो इतना अच्छा जीवन जिएँ कि लोग आपके माता-पिता से पूछने लगें कि आपने कौन से पुण्य किये थे जो आपके घर ऐसी संतान हुई। बच्चों के खानपान के प्रति जागरूकता बरतने की सलाह देते हुए वे कहते हैं, ''बच्चों को मिठाइयाँ, चॉकलेट, चिप्स, शीतलपेय आदि विशेष अवसरों पर दें। इनका रोजाना सेवन करने से बच्चों की भूख मर जाएगी और दाँत भी खराब होंगे। बच्चों को फल, जूस, सलाद की ओर खींचें। उन्हें बताएँ कि फल खाने से तुम 'शक्तिमान बनोगे और दूध पीने से 'हनुमान।

श्री चन्द्रप्रभ ने समाज-निर्माण का अनुपम कार्य किया है। उन्होंने मानवजाति को नैतिकता के पाठ सिखाए, अहिंसा-प्रेम जैसे व्रतों को जीवन से जोडऩे की प्रेरणा दी और दुव्र्यसनों से मुक्त होने का मार्ग दिया। श्री चन्द्रप्रभ के अमृत प्रवचनों से, सत्संग एवं सान्निध्य से अब तक हजारों लोगों के स्वभाव बदले हैं। हिंसक लोगों ने अहिंसा का मार्ग स्वीकार किया है। मांसाहारी शाकाहारी बने हैं। काफी तादाद में लोगों ने बुरी आदतों का त्याग किया है। समाजों के बीच की दूरियाँ कम हुई हैं। लोग एक-दूसरे के धर्मों के निकट आए हैं। उनकी उदार सोच के चलते ही छत्तीस कौम की जनता उनके प्रवचनों में प्रेम से आती है। उनके उदारवादी विचारों से प्रभावित होने के कारण ही उनकी सत्संगकथाओं में हिन्दू लोग जैनों का पर्युषण पर्व मनाते हैं और जैनी लोग हिन्दुओं का जन्माष्टमी महोत्सव। यह उनके दिव्य वचनों का ही चमत्कार है कि अब तक उनकी प्रेरणा से लाखों जैनी गायत्री मंत्र सीख चुके हैं तो लाखों हिन्दू नवकार महामंत्र को। इस तरह उनके मार्गदर्शन से परिवार व समाज को नई दिशा मिली है। परिवार-निर्माण एवं समाज-निर्माण के संदर्भ में उनकी कुछ घटनाएँ इस प्रकार हैं -

श्रवणकुमार की माँ कैसे बनूँ - एक बहिन ने श्री चन्द्रप्रभ से कहा - मैं श्रवणकुमार जैसी संतान की माँ बनना चाहती हूँ क्या यह आज के युग में संभव है? उन्होंने कहा - आपकी यह इच्छा अवश्य पूरी हो सकती है, पर...। बहिन ने पूछा - पर, क्या? उन्होंने कहा - इसके लिए आपको एक कठिन काम करना होगा। बहिन ने उनसे कहा - मुझे इसके लिए एक तो क्या दस काम भी करने पड़ें तो मैं तैयार हूँ। उन्होंने कहा - तब फि र आप अपने पति क ो श्रवणकुमार बना दो। अगर आपका पति श्रवणकुमार बन गया तो आपको श्रवणकुमार की माँ बनने से कोई नहीं रोक पाएगा। बहिन को समझ में आ गया कि जैसे हम होंगे वैसी ही हमारी संतानें होंगी।

ऐसे मना असली रक्षा-बंधन - इंदौर की घटना है। एक व्यक्ति ने छह बेटों में से सबसे छोटे बेटे को घर से अलग कर दिया। उनका आना-जाना बंद था। प्रवचन दशहरा मैदान में चल रहे थे। पूरा परिवार प्रवचन सुनने आता था। रक्षाबंधन-महोत्सव पर प्रवचन सुनकर छोटे भाई का मन पसीज गया। उसने अपनी भाभी को फोन किया और कहा - मेरा बार-बार मन हो रहा है कि मैं आपके हाथ से राखी बँधवाऊँ। भाभी पशोपेश में पड़ गई। वह सीधी श्री चन्द्रप्रभ के पास पहुँची व कहा - हमारा पूरा परिवार साथ में है, पर देवर अलग रहता है, मैं चाहती हूँ कि वे भी हमारे साथ रहें, पर ससुर जी से उनकी बनती नहीं है। अब मैं ससुरजी को नाराज़ कैसे करूँ। कहा - क्या ससुर जी भी प्रवचन सुनने आते हैं। ‘हाँ’ - बहन ने कहा। कहा - आप तो उन्हें राखी के बहाने घर लेकर आ जाओ। आपके ससुर जी को मैं सम्हाल लूँगा। जब पिता ने राखी वाली बात सुनी और बेटे को घर पर देखा तो उनका हृदय पिघल आया। उन्होंने बेटे से और बेटे ने भी पिता के पैरों में झुककर क्षमायाचना की, और इस तरह राखी के बहाने टूटा हुआ परिवार एक हो गया।

सत्संग का सीधा प्रभाव - इंदौर की घटना है। श्री चन्द्रप्रभ का सत्संग अभय प्रसाल स्टेडियम में था। वहाँ से कस्तूर गार्डन में आयोजित भक्ति संध्या के लिए रवाना हो गए। जैसे ही चौराहे पर पहुँचे कि वहाँ एक पति-पत्नी स्कूटर से नीचे उतरे और सड़क पर पंचांग प्रणाम किया। बहिन की आँखों से झर-झर आँसू बह रहे थे। पूछा - बहिन, क्या बात है? रो क्यों रही हो? बहिन ने कहा - ये ग़म के नहीं ख़ुशी के आँसू हैं, क्योंकि आज मेरे पति 15 सालों में पहली बार मुझे मेरे पीहर ले जा रहे हैं। इन्होंने प्रवचन अभय प्रसाल स्टेडियम में ‘घर को कैसे स्वर्ग बनाएँ ?’ सुना तो इनकी आत्मा हिल गई। मेरे पापाजी और इनकी किसी कारणवश बहस हो गई थी और इन्होंने ससुराल जाना छोड़ दिया, साथ ही मुझे भी नहीं जाने का आदेश दे दिया। मैं आपकी जीवन भर ऋणी रहूँगी कि आपने मेरे टूटे घर को जोड़ दिया, उसे स्वर्ग बना दिया, सोचा आपको इसके बदले क्या दूँ तो आँखों में अपने-आप श्रद्धा के आँसू बह निकले।

प्रवचनों का हुआ असर - अजमेर की एक बहिन ने बताया किउसके पति इतने गुस्सैल थे कि उसे दिन में दस-बीस बार उनके गुस्से का सामना करना पड़ता और हर बार आँसू आने के बाद ही उनका गुस्सा ठण्डा पड़ पाता। इसके चलते मेरा जीवन नरक बन गया था। एक बार मेरा श्री चन्द्रप्रभ की बर्फखाना मैदान में चल रही प्रवचनमाला में जाना हुआ। मुझे इतना अच्छा लगा कि मैं जैसे-तैसे करके अपने पति को भी एक दिन साथ लेकर आई। प्रवचनों से वे प्रभावित हुए और हमेशा आने लगे। प्रवचनों को सुनते-सुनते पति में इतना बदलाव आ गया कि यह कहते-कहते बहिन की आँखों में आँसू आ गए। उन्होंने कहा - मैं जीवनभर आपकी आभारी रहूँगी क्योंकि आपने मेरे पूरे परिवार को स्वर्ग बना दिया है।

परिवार प्रेमपूर्ण बन गया - बोम्बे की घटना है। महेन्द्र भाई को एक कार्ड मिला। जिसमें लिखा था - सादर निमंत्रण। पूज्य श्री चन्द्रप्र्रभ जी का दिव्य सत्संग। वे वहाँ पहुँचे तो देखा सैकड़ों लोग आए हुए हैं। बड़ी स्क्रीन पर श्री चन्द्रप्रभ का 'माँ की ममता हमें पुकारे विषय पर प्रवचन चल रहा है। उन्होंने आयोजनकर्ता से पूछा - दस रुपये की सीडी दिखाने के लिए इतना बड़ा आयोजन। आयोजनकर्ता ने कहा - मैंने व मेरे परिवारवालों ने जब से इस प्रवचन को सुना है तब से हमारा घर प्रेमपूर्ण बन गया है। मैंने यह सब इसलिए किया ताकि और घरों में भी प्रेमपूर्ण वातावरण बन सके । यह है प्रवचन का प्रभाव।

ड्राइवर का बदला हृदय - अजमेर के एक महानुभाव ने बताया कि वे अपने परिवार के साथ बिजयनगर से भीलवाड़ा जा रहे थे। गाड़ी में मैंने श्री चन्द्रप्रभ की माँ की ममता वाले प्रवचन की सीडी लगाई। हम लगभग एक घंटा चले होंगे कि अचानक ड्राइवर ने गाड़ी रोकी और गाड़ी के पीछे जाकर जोर-जोर से रोने लगा। मैंने उससे पूछा - ये अचानक तुझे क्या हो गया? उसने कहा - प्रवचन सुनते-सुनते मेरी अंतरात्मा हिल गई। मैंने अब तक अपनी माँ को दुख के अलावा कुछ नहीं दिया। मुझे अपनी करणी पर पश्चाताप हो रहा है। उस मुस्लिम ड्राइवर ने मुझसे कहा- मैं पहले अपनी माँ से मिलना चाहता हूँ। मैंने कहा - ठीक है। बिजयनगर के पास ही एक गाँव में उसकी माँ अकेली रहती थी। हम जैसे ही उसके गाँव पहुँचे, ड्राइवर ने माँ को प्रणाम किया, रोते हुए अपने अपराधों के लिए माफी माँगी। माँ को दो हजार रुपये पकड़ाए और कहा - अब चाहे जो भी हो, तुझे बिजयनगर में मेरे पास ही रहना होगा। माँ से हाँ भराकर उसने कहा - मैं मालिक को भीलवाड़ा छोड़ कर वापस आ रहा हूँ, तब तक तू सामान बाँधकर तैयार कर ले। उन महानुभाव ने बताया कि प्रवचन की वीसीडी का प्रत्यक्ष प्रभाव व चमत्कार देखकर हम गद्गद् हो उठे।

ऐसे हिली आत्मा - मद्रास का एक परिवार जोधपुर, संबोधि-धाम देखने आया। उसमें 77 वर्ष के एक दादाजी भी थे। श्री चन्द्रप्रभ ने उनसे पूछा - क्या आप धर्म-आराधना, प्रभु-भक्ित करते हैं? उन्होंने कहा - महाराज जी, क्या बताऊँ, समय ही नहीं मिलता। सुबह 9 बजे दुकान जाता हूँ, वापस आते-आते रात्रि के 9 बज जाते हैं। अब आप ही बताएँ कि धर्म-आराधना कैसे करूँ? श्री चन्द्रप्रभ ने उनसे पूछा - अगर आप अपने बेटों के लिए 2-4 लाख रुपये ज्यादा कमाकर चले जाएँगे तो भी क्या वे आपके अहसानमंद रहेंगे? क्या आपके जाने के बाद आपके नाम पर धर्म-पुण्य-दान करेंगे? बचपन में ज्ञानार्जन किया, जवानी में धनार्जन किया, पर अब यदि बुढ़ापे में पुण्यार्जन नहीं करेंगे तो फिर किस उम्र में करेंगे? यूँ ही संसार में उलझे रहेंगे तो क्या प्रभु के दरबार में मुँह दिखाने के काबिल रहेंगे? दादाजी ने कहा - धंधा छोड़ दिया तो समय कैसे बिताएँगे? उन्होंने कहा - आप संपन्न हैं, कुछ धन निकालिए, छोटा-सा हॉस्पिटल बनाइए और दु:खी-रोगी मानवता की सेवा में दिन के पाँच-छह घंटे समर्पित कीजिए। आपको खुशी की अनुभूति होगी कि मैंने केवल अपने या परिवार वालों के लिए ही नहीं वरन् मानवजाति के लिए भी कुछ किया। जब वे बुजुर्ग दादाजी वापस रवाना होने लगे तो उनके चरणों में पंचांग प्रणाम करते हुए कहा - आज आपने मेरी आत्मा को हिला दिया है, मैं मद्रास पहुँचते ही मानवता की सेवा में जरूर कुछ-न-कुछ नेक काम करूँगा।

ऐसा हाथ थामा कि जीवन सुधर गया - श्री चन्द्रप्रभ के एक बार अँगूठे में काँच का कट लग गया, जिसके कारण अँगूठे को ऊपर-नीचे करने वाले लिगामेन्ट्स भी कट गए। ऑपरेशन के लिए उनका जयपुर जाना हुआ। सौभाग्य से मैं भी साथ में था। ऑपरेशन में बाईपास सर्जरी करके हाथ की नाड़ी को अँगूठे में फिट किया गया। ऑपरेशन के बाद उनको शय्या से उठने, नीचे उतरने व पुन: बैठने के लिए सहयोग की अपेक्षा रहती थी। इसी दौरान एक बार उन्होंने हॉस्पिटल में कुशल-क्षेम पूछने आए एक युवक के हाथों में अपना हाथ शय्या से नीचे उतरने के लिए थमा दिया। सेवा हो गई। युवक चला गया। युवक के लिए अपने हाथ में गुरुजी का हाथ आना आनंदकारी अनुभव था। उसने इस बात को अपनी माँ से कहा। माँ ने कहा - तू बड़ा िकस्मत वाला है, जो गुरु ने तेरा हाथ थामा। ऐसा करके उन्होंने हमारे जीवन को अपने हाथों में थाम कर हमारा निस्तार कर दिया। ऐसा सुनकर युवक और आनन्द से भर गया। वह युवक सिगरेट पीता था। न जाने उसे क्या हुआ, वह घर से सीधा हॉस्पिटल पहुँचकर उनके पास आया और कहने लगा - मुझे आप आज से हमेशा के लिए सिगरेट पीने का त्याग करवा दीजिए। उनको भी आश्चर्य हुआ कि उन्होंने पहला ऐसा युवक देखा जो खुद चलाकर सिगरेट का त्याग करने आया हो। उन्होंने युवक से पूछा - आखिर आपको यह प्रेरणा किसने दी? युवक ने कहा - अंतर्आत्मा ने। उन्होंने पूछा - मतलब? युवक ने बताया - उसने जैसे ही सिगरेट हाथों में ली कि उसे माँ के शब्द प्रत्यक्ष दिखाई देने लगे। उसकी चेतना ने उसे झकझोरा कि जिन हाथों को गुरु ने थामा, उनका उपयोग तू सिगरेट पीने के लिए कर रहा है तुझे धिक्कार है। बस, मैं अब ज्यादा गिरना नहीं चाहता हूँ।

राष्ट्रीय चेतना के उन्नायक


श्री चन्द्रप्रभ की कृतियों से उनका राष्ट्र प्रेम भी स्पष्ट झलकता है। वे राष्ट्रीय चेतना के उन्नायक हैं। उन्होंने भारतीय संस्कृति का गुणगान किया है। वे देश की वर्तमान समस्याओं पर चिंतित भी नजर आते हैं। उन्होंने राष्ट्र के सकारात्मक-नकारात्मक दोनों बिंदुओं पर विश्लेषण किया है एवं नकारात्मक पहलुओं से बाहर निकलने का समाधान भी दिया है। उन्होंने शिक्षा एवं प्रौद्योगिकी को विशेष महत्त्व देने की प्रेरणा दी है। वे रटाऊ शिक्षा की बजाय सृजनात्मक एवं समझाऊ शिक्षा की पहल करते हैं। वे भारत में प्रतिदिन नैतिक मूल्यों के होने वाले ह्रास को देखकर चिंतित हैं। उन्होंने नैतिक मूल्यों की पुनर्प्रतिष्ठा करने का सिंहनाद किया है। दिनोदिन बढ़ता भ्रष्टाचार, अपराध, मिलावट आदि को रोकने के लिए उन्होंने युवा पीढ़ी एवं नैतिक लोगों को आगे आने की प्रेरणा दी है। श्री चन्द्रप्रभ ने युवाओं को सफलता पाने के जोशीले पाठ पढ़ाए हैं। वे प्रगति में विश्वास रखते हैं और हर किसी को आगे बढऩे की प्रेरणा देते हैं। वे कहते हैं, ''जो पैदा नहीं कर सकता, वह बाँझ कहलाता है और जो कुछ काम नहीं करता, वह निकम्मा कहलाता है। क्या आप अपने मुँह पर इस लेबल की कालिख पोतना चाहेंगे ?

श्री चन्द्रप्रभ ने राष्ट्र से जुड़े हर पहलू का राष्ट्र-निर्माणपरक साहित्य में विश्लेषण किया है। उन्होंने वर्तमान राष्ट्र से जुड़ी हर समस्या का कारण, परिणाम एवं निवारण पर भी मार्गदर्शन दिया है। उन्होंने आरक्षण को देश के दुर्भाग्य का कारण बताया है। वे युवाओं को कड़ी मेहनत द्वारा स्वर्णिम भारत का निर्माण करने की शिक्षा देते हैं। श्री चन्द्रप्रभ प्रतिवर्ष 15 अगस्त को हजारों लोगों के बीच स्वतंत्रता दिवस समारोह मनाते हैं। तिरंगा फहराकर राष्ट्रगान का सस्वर सामूहिक संगान करते हैं और 'कैसे बढ़ाएँ देश का गौरव विषय पर दिव्य सत्संग-प्रवचन कर राष्ट्र के प्रति अपनी आस्था व्यक्त करते हैं। जब भी राष्ट्र ने भूकंप, बाढ़ और सुनामी जैसी आपदाओं को झेला तो उन्होंने राष्ट्रभक्ित का परिचय देते हुए न केवल लोगों को सहयोग के लिए प्रेरित किया और सहयोग भिजवाया, वरन् वे स्वयं भी ऐसे सेवा कार्यों के लिए कटिबद्ध रहे।

निष्काम कर्मयोग जिनकी साधना


श्री चन्द्र्रप्रभ साधना के साथ-साथ निष्काम कर्मयोग में विश्वास रखते हैं। वे कहते है, ''गीता से मैंने कर्मयोग करने की प्रेरणा पाई है। संत होने का अर्थ यह नहीं हुआ कि समाज की मुफ्त की रोटी खाई जाए। हमें किसी की दो रोटी तभी खानी चाहिए जब हम उससे चार गुना वापस लौटाने का सामथ्र्य रखते हों, अन्यथा हम पर दूसरों की रोटी का ऋण चढ़ता जाएगा। श्री चन्द्रप्रभ पूरी तरह से सक्रिय जीवन जीते हैं। उनकी दृष्टि में व्यक्ति का कर्म उसकी पूजा का ही हिस्सा होना चाहिए। अगर कत्र्ता-भाव से मुक्त होकर कर्म किया जाए तो वह हर कर्म हमारे लिए स्वर्ग और मुक्ति की सीढ़ी बना करता है।

श्री चन्द्रप्रभ कहते हैं, ''पहले 'क आता है, फिर 'ख। पहले कीजिए, फिर खाइए। कर्मयोग से जी मत चुराइये।श्री चन्द्रप्रभ मुफ्त की रोटी खाना अपराध मानते हैं। वे कहते हैं, ''व्यक्ति को 12 घंटे अवश्य मेहनत करनी चाहिए फिर चाहे वह दिन के हों या रात के। उन्होंने भगवान की पूजा करने के साथ ऐसे कर्म करने की प्रेरणा दी है कि वे कर्म स्वयं प्रभु-पूजा बन जाए। उन्होंने भारत को स्वर्ग बनाने के लिए 'चरैवेति-चरैवेति के सूत्र को अपनाने का उद्घोष किया है। उन्होंने सुबह नौ-दस बजे तक खर्राटे भरने वाले भारतीयों पर व्यंग्य करते हुए कहा है, ''अगर भारत में विद्यालयों के खुलने का समय सुबह-सुबह न होता तो आधा भारत दस बजे तक बिस्तरों में ही मिलता। वर्क को वर्शिप मानकर करने की सीख देते हए वे कहते हैं, ''दुनिया की कोई भी गाय दूध नहीं देती वरन् बूँद-दर-बूँद निकालना पड़ता है। वैसे ही किस्मत उन्हें ही फल देती है जो वर्क को वर्शिप मानते हैं। दान की रोटी और दया का दूध पीने की बजाय पुरुषार्थ का पानी पीना गरिमापूर्ण है। बस निठ्ठले होकर मत बैठो, फिर चाहे कहीं ज्यूस की दुकान ही क्यों न खोल दो।

श्री चन्द्रप्रभ ने सामाजिक-उत्थान के नाम पर औरों से धन माँग-माँगकर इकट्ठा करने वालों को समाज व देश का अपराधी बताया है। उन्होंने अनाथ और विकलांगों की सहायता करने के साथ उनके स्वाभिमान को जगाकर पाँवों पर खड़ा करने की प्रेरणा भी दी है।

धर्म को युग के अनुरूप बनाने के प्रेरक


श्री चन्द्रप्रभ धर्मगुरु हैं। उन्होंने जैन धर्म में संन्यास ले रखा है किंतु वे सभी धर्मों के प्रति प्रेम और सद्भाव रखते हैं। लगभग 32 वर्षों से वे संन्यास जीवन जी रहे हैं। वे समाज की सच्चाइयों, रूढि़वादिताओं और कार्यशैली से पूरी तरह परिचित हैं। उन्होंने जैन धर्म की वैज्ञानिकता और मानवतावादिता का अभिनंदन किया है। वे कहते हैं, ''जैन धर्म ने धर्म, दर्शन और सिद्धांत की दृष्टि से समग्र इंसानियत को अपने दायरे में लेने का प्रयास किया है। व्यवहार में अहिंसा, विचारों में अनेकांत और जीवन में अपरिग्रह इस धर्म की बुनियादी प्रेरणा है, पर इस धर्म में कुछ रूढ़ मान्यताएँ इस तरह घर कर चुकी हैं, जिन्हें बदलने के लिए अब तक या तो सकारात्मक विचार नहीं किया गया या फिर परम्परा चुस्तता के चलते उसे परिणाम तक पहुँचने नहीं दिया गया।

श्री चन्द्रप्रभ जैन संत होने के नाते पैदल चलते हैं। वे अब तक देशभर में तीस हजार किलोमीटर से अधिक पदयात्रा कर चुके हैं। उन्होंने जीवन-यात्रा पुस्तक में पदयात्रा का समर्थन करते हुए उसे विश्व-दर्शन की मानवीय तकनीक कहा है। वे पदयात्रा को उचित मानते थे, पर अब वे जैन संतों के लिए पदयात्रा के साथ वाहन यात्रा को जोड़े जाने के पक्षधर हैं। उन्होंने धर्म-परम्परा के संदर्भ में लकीर के फकीर बनने को अनुचित माना है। उनकी दृष्टि में, ''समाज, संस्था और संत पुराने रास्तों पर ही चलना पसंद करते हैं। पुराने रास्तों पर चलना सुरक्षित तो है, पर जब तक हम नए रास्तों का निर्माण करने का हौंसला बुलंद नहीं करेंगे, तो आखिर पुराने हो चुके इंजनों से हम गाड़ी को कब तक खींचते रहेंगे। हम सब लकीर के फकीर हैं। हम केवल दूसरों के परिवर्तनों का अनुसरण न करते रहें वरन् खुद अपने रास्ते बनाएँ। जीवन में सफलता की यही आधारशिला है। उन्होंने जैन और हिन्दू संतों को ब्रह्माकुमारी एवं आर्ट ऑफ लिविंग जैसे संगठनों से प्रेरणा लेने की सीख दी है और मानवतावादी धर्म को पूरे विश्व में स्थापित करने की प्रेरणा दी है। वे कहते हैं, ''केवल हिन्दू संतों की तरह भागवत्कथाएँ बाँच लेने भर से और जैन संतों की तरह उपाश्रयों और स्थानकों में व्याख्यान कर लेने भर से धर्म को स्थापित नहीं किया जा सकता। आज स्थिति यह बन गई है कि जैन संत दूसरों को क्या जैनत्व प्रदान करेंगे, उनके लिए जैनों को भी जैन बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो गया है।

यद्यपि श्री चन्द्रप्रभ पदयात्रा से होने वाले लाभों को स्वीकार करते हैं, पर पदयात्रा में नष्ट होने वाली शक्ति, समय और ऊर्जा को बहुत बड़ा नुकसान मानते हैं। वे कहते हैं, ''आज किसी संत को जयपुर से मद्रास की पदयात्रा करने में दो साल लग जाते हैं, जबकि यही कार्य दो घंटे में पूरी होने की सहज व्यवस्था उपलब्ध है। दो साल की पदयात्रा त्याग के लिहाज से अच्छी है, पर समय और शक्ति खर्च की दृष्टि से बहुत महँगी और बोझिल है। जीवन सीमित है। कहीं ऐसा न हो कि हम रास्ता नापने में ही जीवन की ऊर्जा खत्म कर दें। वाहन यात्रा में अहिंसा की दृष्टि से कुछ दोष भी हो, पर ऐसा कौनसा बड़ा दोष है जिसके चलते मुनिजनों के लिए इसका सर्वथा ही निषेध कर दिया गया। यदि जैन समाज के संत वाहनयात्रा स्वीकार कर लेते तो, आज जैन धर्म की व्यापकता कुछ और ही होती। वह केवल राजस्थानियों और गुजरातियों तक ही सिमटकर नहीं रह जाता वरन् वह विश्व धर्म होता।

श्री चन्द्रप्रभ ने वर्तमान में पदयात्रा को वाहन यात्रा से महँगा माना है। उदाहरण के माध्यम से समझाते हुए वे कहते हैं, ''जोधपुर से पाली जाने में गाड़ी से एक घंटा लगता है और साधु-साध्वियों को पदयात्रा से चार दिन। अब इस दौरान यदि श्रावकों को आहार की व्यवस्था के लिए रास्ते में रोज दो बार भी आना पड़ा, तो उनके निमित्त से कितनी गाडिय़ाँ आईं-गईं। कितना खर्च हुआ? हमारे कारण श्रावकों को कितना समय और श्रम का भोग देना पड़ा? यह सच है कि पहले संतों का श्रावकों के साथ धन का कोई रिश्ता नहीं था, पर अब तो संतों के इशारे मात्र से लाखों-करोड़ों रुपये इकट्ठे हो जाते हैं और खर्च भी हो जाते हैं। मेरी समझ से पदयात्रा वाहन यात्रा से ज्यादा महँगी है। ज्यादा व्यवस्था की अपेक्षा रखती है। उन्होंने हिंसा और आतंक से घिरे विश्व में अहिंसा को फैलाने की अति आवश्यकता स्वीकार की है। उनका मानना है, ''आज विश्व हिंसा और आतंक के विचित्र दौर से गुजर रहा है। ऐसे में इस अहिंसावादी धर्म का यह दायित्व बनता है कि वह पूरे विश्व में अपने प्रबुद्ध संतों को पहुँचाने का रास्ता खोले।उन्होंने वाहन यात्रा के दायरे के रूप में व्यक्तिगत वाहन न रखने, शहर में पैदल चलने का समर्थन किया है।

जैन धर्म का मुख्य विधि-विधान है प्रतिक्रमण। प्रतिक्रमण आत्मशुद्धि व कषायमुक्ति का महान अनुष्ठान है, पर यह दो हजार साल पुरानी प्राकृत भाषा में किया जाता है। श्री चन्द्रप्रभ इसे आज की हिन्दी भाषा में करने के समर्थक हैं। उनका मानना है, ''जैनों की सम्पूर्ण आबादी में से आज अधिकतम एक लाख लोग रोज प्रतिक्रमण करते होंगे, पर प्रतिक्रमण का अर्थ उनमें से दो प्रतिशत लोगों को बमुश्किल आता होगा। प्रतिक्रमण में जब अतिचार, स्तवन, स्तुति या सज्झाय बोली जाती है, तब तो कुछ रुचि भी जगती है क्योंकि वे हिन्दी में होते हैं। अन्यथा लोग श्रद्धावश बैठे रहते हैं या उबासियाँ खाते रहते हैं। भला, जब अतिचार व स्तवन हिन्दी में बोले जा सकते हैं, तो हिन्दी में कुछ और पाठों का समावेश क्यों नहीं किया जा सकता।वे धर्म को रटाऊ की बजाय समझाऊ होने पर बल देते हैं। उनकी दृष्टि में, ''यदि भगवान महावीर आज होते, तो वे आज की भाषा में करते क्योंकि उन्होंने 2500 साल पहले उस युग की भाषा का प्रयोग किया था। मेरी समझ से धर्म समझाऊ होना चाहिए, न कि रटाऊ। धर्म सक्रियता और सचेतनता लिये हुए होना चाहिए, न कि पाठों का रिपिटेशन।

श्री चन्द्रप्रभ ने जैनों के महान पर्व संवत्सरी पर भी क्रांतिकारी विचार रखे हैं। वे जैनों के वार्षिक पर्व संवत्सरी को एक ही दिन मनाने के समर्थक हैं। वे कहते हैं, ''यदि जैनी लोग संवत्सरी को ही एक साथ मना पाने में सफल नहीं हो पाते हैं, तो ऐसे बिखरे समाज से मैं पूछूँगा कि तब फिर आप दुनिया के लिए क्या कर पाएँगे। हम लोगों को चाहिए कि हम संवत्सरी से जुड़े मतभेदों को भुलाएँ और उसे एक दिन मनाएँ। संवत्सरी कई परम्पराओं में चौथ को मनाई जाती है, कई परम्पराओं में पंचमी को। सबसे विचित्र समस्या तो तब आ खड़ी होती है, जब कुछ परम्पराएँ संवत्सरी एक महीना पहले मनाती हैं और कुछ परम्पराएँ एक महीना बाद। इन तिथियों के झगड़ों ने जैन धर्म का बहुत नुकसान पहुँचाया है। जैनियों के आधे पंचांग किसी पर्व को एक दिन पहले बताते हैं, तो किसी पर्व को एक दिन बाद। अब हम कोई देश से अलग तो हैं नहीं। जिस दिन जिस पर्व को पूरा देश मनाए क्यों न हम भी उसी में शामिल होकर पर्व का सामूहिक आनंद उठाएँ। अपनी डफली अलग से बजाने से क्या तुक। केवल तुम्हीं सुनोगे और दूसरे लोगों के उपहास के पात्र बनोगे।

श्री चन्द्रप्रभ ने जैनों में पंथ-परम्पराओं के प्रति बन रही संकीर्णताओं पर भी व्यंग्य किया है। उन्होंने संतों को भी विराट मानसिकता बनाने का अनुरोध किया है। उनका कहना है, ''जैन धर्म के अलग-अलग पंथों के भेद वक्त के भूचाल हैं, किन्हीं दो आचार्यों, दो गुटों के मतभेदों का परिणाम हैं। हम मतभेदों के परिणाम न बनें, हम धर्म के परिणाम हों। ये संत लोग अपने अनुयायियों को जैन कहना क्यों नहीं सिखाते? जैन से पहले श्वेताम्बर, दिगम्बर या तेरापंथी का एक्स्ट्रा लेबल क्यों लगवाना चाहते हैं। इस संदर्भ में उनकी एक घटना है -

जियो और जीने दो - एक दस साल का लड़का श्री चन्द्रप्रभ के पास आया। प्रणाम कर कहा - मैं स्थानक में हो रही वेशभूषा प्रतियोगिता में जैन संत बन रहा हूँ। मुझे वहाँ पर दो लाइन का अमृत-संदेश बोलना है। आप बताने की कृपा कीजिए। कहा - आप लोगों से कहना - अगर आप मंदिरमार्गी जैन हैं तो ‘धर्मलाभ’, स्थानकवासी जैन हैं तो ‘दया पालो’, तेरापंथी जैन हैं तो ‘जय भिक्खु’ और अगर आप केवल जैन हैं तो ‘जीयो और जीने दो।’

इस तरह श्री चन्द्रप्रभ समय की नब्ज को देखते हुए वैचारिक एवं व्यवस्थागत परिवर्तन को अनिवार्य मानते हैं। उन्होंने पदयात्रा की जगह वाहन यात्रा की उपयोगिता सिद्ध कर हर किसी को सोचने के लिए मजबूर किया है। उन्होंने प्रतिक्रमण, संवत्सरी जैसे बिन्दुओं पर जो उदार एवं यथार्थ विचार रखे हैं वे वर्तमान समाज के लिए अत्यंत प्रेरक एवं उपयोगी है। अगर उनके सुझावों को मान लिया जाए तो धर्म की जटिलता कम हो सकती है और नई पीढ़ी के लिए धर्म के कायदे-कानून और विधि-विधान सरल और व्यावहारिक हो जाएँगे।

श्री चन्द्रप्रभ धर्म के सरल एवं जीवंत स्वरूप के पक्षधर हैं। वे अर्थहीन क्रियाओं के विरोधी रहे हैं। उन्होंने परम्परागत क्रियाओं को जीवन से जोडऩे की बजाय परिणामदायी क्रियाओं को आत्मसात् करने की प्रेरणा दी है। वे ज्यादा धर्म करने में कम विश्वास रखते हैं, पर थोड़े में भी पूर्णता हो इसे आवश्यक मानते हैं। उनकी नजरों में वही धर्म उत्तम है जो स्व-पर मंगलकारी हो, जो हमें नेक और एक बनाए और जो इबादत से पहले मदद करने की प्रेरणा दे। उन्होंने मानवीय-धर्म की प्रेरणा देते हुए कहा है -

खुद जिओ सबको जीने दो, यही मंत्र अपनाना है। इसी मंत्र से विश्वशांति का, घर-घर दीप जलाना है।।
मंदिर है यदि दूर तो हमसे, एक काम ऐसा कर लें। रोते हुए किसी बच्चे के, जीवन में खुशियाँ भर दें। खुद भी महकें फूलों जैसे, औरों को महकाना है।।
वो कैसा इंसान कि जो अपने ही खातिर जिया करे। वो ही है इंसान कि जो औरों के आँसू पिया करे। 'चन्द्र प्रेम की राहों से, संसार को स्वर्ग बनाना है।।

श्री चन्द्रप्रभ ने धर्म करने वालों के जीवन में विद्यमान कथनी-करनी के भेद पर व्यंग्य किया है। उन्होंने धर्म को बाहरी रूप-रूपायों में नहीं, भीतर की पवित्रता में माना है। उन्होंने महावीर-बुद्ध जैसेे महापुरु षों की पूजा करने की बजाय उनके जैसा बनने की सीख दी है। वे भीतरी परिवर्तनों के बिना बाहरी परिवर्तनों को गौण समझते हैं। इस तरह उन्होंने धर्म को रूढि़वाद, परम्परावाद, पंथवाद की संकीर्णता से मुक्त किया है और उसे जीवन सापेक्ष बनाकर उसे युगानुरूप बनाया है।

सफल मनोचिकित्सक एवं आरोग्यदाता


श्री चन्द्रप्रभ तन, मन और जीवन की चिकित्सा करने में माहिर हैं। उनके साहित्य एवं प्रवचनों से लोगों की मानसिक दुर्बलता दूर हो जाती है। युवाओं की जिंदगी में नए उत्साह का संचार होने लगता है और वृद्धजनों का बुढ़ापा गायब हो जाता है। उन्होंने गुस्सा, चिंता, तनाव, मनो-दुर्बलता को स्वास्थ्य, शांति और सफलता का शत्रु बताया है। उन्होंने इनके कारणों व परिणामों पर भी विस्तृत चर्चाएँ की हैं। वे इन्हें जीतने को जीवन की असली साधना बताते हैं। उन्होंने इन पर विजय पाने के लिए मुस्कान, मौन व क्षमा जैसे मंत्रों को अपनाने की सलाह देने के साथ अनेक व्यावहारिक गुर भी दिए हैं। इस संदर्भ में कुछ घटना-प्रसंग इस प्रकार हैं -

दो घंटे का एपिसोड दस मिनिट में पूरा - एक सज्जन ने श्री चन्द्रप्रभ से कहा- मैं और मेरी पत्नी में आए दिन किसी-न-किसी बात को लेकर अनबन हो जाती है। कल की ही बात है। मैं ऑफिस जाने की जल्दी में था, जाते-जाते पत्नी ने दो-चार काम बता दिए। जल्दी में दिमाग से ये बातें फिसल गईं। शाम को घर वापस आया तो पत्नी चिल्लाने लगी कि मैं आपका हर काम पूरा करती हूँ और आप ठहरे भुलक्कड़, जो मेरे दो-चार काम भी नहीं करते। मैंने उससे कहा - कागज पर लिखकर नहीं दे सकती थीं क्या? उसने कहा - आप फोन से नहीं पूछ सकते थे क्या? बस इस छोटी-सी बात को लेकर तकरार हो गई। अब आप ही बताएँ कि मैं क्या करूँ? श्री चन्द्रप्रभ ने कहा - आप मेरी केवल एक बात गाँठ बाँध लें फिर यह नौबत नहीं आएगी। उन्होंने पूछा - कौनसी बात? पूज्यश्री ने कहा - अब पत्नी जब भी चिल्लाने लगे तो आप दस मिनिट के लिए गूँगे बन जाएँ। उन्होंने कहा - गूँगा बनने से तो मुसीबत और बढ़ जाएगी। पूज्यश्री ने कहा - अगर अनबन दूर करनी है तो मेरा कहना मानिए, अन्यथा जैसी आपकी मर्जी। उन्हें बात समझ में आ गई। दो दिन बाद उस सज्जन ने कहा - गुरुजी, आपकी बात ने तो चमत्कार कर दिया। पूज्यश्री ने पूछा - क्या हुआ? उन्होंने कहा - कल मैं फिर कोई सामान लाना भूल गया। घर पहुँचते ही पत्नी चिल्लाने लगी। मैं दस मिनिट के लिए गूँगा बन गया। पत्नी ने थोड़ी देर फाँ-फँू किया, फिर अपने आप चुप हो गई। एक घंटे बाद उसने मुझसे सॉरी भी कहा। इस तरह दो घंटे का एपिसोड मात्र दस मिनिट में पूरा हो गया।

शहद जैसे बनो - श्री चन्द्रप्रभ के पास एक बहिन आई। उसने कहा - मेरे और मेरे पति के बीच बनती नहीं थी सो मैं एक पंडित के पास गई। मैने अपनी समस्या बताई तो उसने एक मंत्र लिखकर दिया और कहा - शहद की शीशी में इस मंत्र को डाल देना और रोज सुबह उठकर इस शीशी को देखना। मात्र 27 दिनों में तेरे व तेरे पति की अनबन सदा के लिए दूर हो जाएगी। बहिन ने गुरुजी से कहा - आज 27 नहीं, पूरे 57 दिन हो गए हैं, फिर भी स्थिति वैसी की वैसी है। अब आप ही बताइए कि मैं करूँ तो क्या करूँ? श्री चन्द्रप्रभ ने कहा - यूँ टोटकों से अगर सारी बात बन जाए तो पूरी दुनिया सुधर जाए। आप तो घर जाकर एक काम कीजिए कि शहद की शीशी को देखने के बजाय, शहद को पानी में घोलकर पी लीजिए और संकल्प ले लीजिए कि जैसे शहद मिठास से भरा हुआ है वैसे ही आज से मैं भी अपने जबान से सदा मीठा बोलूँगी। अगर आपने मेरे कहे अनुसार मीठा बोलना शुरू कर दिया, तो पति तो क्या पूरा परिवार मात्र 7 दिनों आपका भक्त बन जाएगा। बहिन ने गुरुजी को धन्यवाद देते हुए कहा - आपकी बात बिल्कुल सही है। अगर मैं जबान को मीठा रखती तो ये अनबन की नौबत ही न आती।

मौनपूर्वक भोजन का चमत्कार - एक सज्जन ने बताया कि मेरी खाने में कमियाँ निकालने की आदत थी। जब भी मैं भोजन करने बैठता, तो मेरी पत्नी या बेटी से तकरार हो जाती। मैं कुछ कहता तो वे कह देतीं - आप किचन में मनमर्जी जैसा बनाकर खा लो या फिर नमक-मिर्ची-नींबू लाकर पटक देतीं। एक बार मुझे श्री चन्द्रप्रभ से मौनपूर्वक भोजन करने की प्रेरणा मिली। मैंने एक महीने तक मौनपूर्वक भोजन करने की प्रतिज्ञा ले ली। दो-चार दिन तो मुझे अजीब-सा लगा। मेरी थाली में जैसा भी आता मैं उसे मौनपूर्वक खा लेता। परिवार वालों को लगा - ये तो कुछ बोलते नहीं इसलिए इन्हें चखकर ही भोजन परोसना चाहिए। अब भोजन भी एकदम स्वादिष्ट बनकर आने लगा। मेरे इस छोटे से नियम ने मेरे साथ घरवालों को भी बदल दिया।

श्री चन्द्रप्रभ ने मानसिक रोगों के साथ-साथ शारीरिक रोगों की चिकित्सा के लिए भी मार्गदर्शन दिया है। वे असात्विक आहार को बीमारी की मूल वजह बताते हैं। उन्होंने शरीर को भगवान का मंदिर मानने व अतिभोग-अतित्याग की बजाय बीच का मार्ग अपनाने की प्रेरणा दी है। उन्होंने आहार में छिपे आरोग्य के रहस्य को प्रकट करते हुए स्वास्थ्य हेतु निम्न सूत्रों को जोडऩे की सलाह दी है - स्वाद की बजाय स्वास्थ्य प्रधान भोजन करें; अति तेल, घी, मिर्च-मसालेदार भोजन, दूषित, दुर्गंधित भोजन व मांसाहार से बचें; हितकारी, सीमित एवं ऋतु अनुसार भोजन लें और भोजन में सभी चीजों का पर्याप्त मात्रा में सेवन करें। उन्होंने हेल्थ-सिक्रेट बताते हुए कहा है, ''अन्न को करो आधा, सब्जी को करो दुगुना, पानी पियो तिगुना और हँसी को करो चौगुना। कैसे बनाएँ अपना कॅरियर, शानदार जीवन के दमदार नुस्खे, कैसे जिएँ क्रोध एवं चिंतामुक्त जीवन, सफल होना है तो..., शांति पाने का सरल रास्ता आदि पुस्तकों में उन्होंने शारीरिक-मानसिक चिकित्सा एवं मानसिक विकास के बेहतरीन गुर बताए हैं।

सफलता के गुर सिखाने वाले देश के पहले संत


संत लोग सामान्य तौर पर त्याग, वैराग्य की ही प्रेरणा देते हैं या भागवत-कथाओं के जरिये भगवन्नाम लेने पर जोर देते हैं, पर श्री चन्द्रप्रभ भगवान का नाम लेने के साथ संसार में सुखी और सफल होने का पाठ भी पढ़ाते हैं। शायद देश में श्री चन्द्रप्रभ ही ऐसे संत होंगे जिन्होंने नई पीढ़ी को जीने की कला और सफलता के मंत्र सिखाने वाली ढेर सारी किताबें दी हैं। अपने प्रभावी विचारों और प्रवचनों से उन्होंने नई पीढ़ी में प्रगति का एक नया जूनून जगाया है। दुनिया में चाहे कोई कितना भी हताश क्यों न हो गया हो अगर श्री चन्द्रप्रभ का कोई एक उद्बोधन सुन ले तो वह एक अद्भुत उत्साह एवं ऊर्जा से भर उठेगा। उसके अंधेरे जीवन में आत्मविश्वास का प्रकाश भर उठेगा।

श्री चन्द्रप्रभ जीवन में ऊँचाइयाँ पाने व सफल बनने में विश्वास रखते हैं। उन्होंने स्वयं भी भौतिक एवं आध्यात्मिक ऊँचाइयों को छुआ और लोगों को भी सफल बनने का मार्ग प्रदान किया। वे सफलता के मंत्रदृष्टा हैं। वे कहते हैं, ''सफलता कोई मंिजल नहीं, एक सफर है। मैट्रिक में मेरिट आकर कोई बैठ जाता तो वह एम.बी.ए. नहीं बन पाता, करोड़पति होकर संतोष कर लेता तो वह धीरूभाई अंबानी नहीं बन पाता और विश्व सुंदरी बनकर हाशिए पर चली जाती तो वह ऐश्ïवर्या की तरह महान्ï अभिनेत्री नहीं बन पाती। उनका मानना है, ''सफलता तो तब मिलती है जब हमारी श्वास में सफलता का सपना बस जाता है।सफलता के संदर्भ से जुड़ी उनकी कुछ खास घटनाएँ उल्लेखनीय हैं -

प्रतिभा कैसे जगाएँ - एक 18 साल का युवक श्री चन्द्रप्रभ को प्रणाम कर कहने लगा - गुरुजी, मैं अपनी प्रतिभा को जगाना चाहता हूँ, मुझे इसके लिए क्या करना चाहिए? श्री चन्द्रप्रभ ने कहा - प्रतिभा को निखारना है तो पेंसिल के उदाहरण को सदा याद रखो। जैसे पेंसिल में जो कुछ भी है, वह सब उसके भीतर है, पर उसको नुकीला बनने के लिए किसी सार्पनर में जाना पड़ता है, अपनी छिलाई करवानी पड़ती है, उसके बाद कुछ लिखना होता है और गलती हो जाए तो उसे सुधारना पड़ता है ठीक वैसे ही जो छात्र किसी योग्य गुरु के हाथों में स्वयं को सौंपता है, उनके अनुशासन से गुजरता है, जीवन में नए काम करने की कोशिश करता है, कुछ गलत हो जाए तो माफी माँग वापस वैसा न करने का संकल्प ले लेता है उसके भीतर की रही हुई सुप्त प्रतिभा अवश्यमेव नुकीली एवं जाग्रत हो जाती है।

पत्थर भी गोल हो गया - एक छात्र श्री चन्द्रप्रभ के पास आया। वह दुखी और उसका चेहरा उदास था। श्री चन्द्रप्रभ ने उससे पूछा - क्या बात है? परेशान नजर आ रहे हो? छात्र ने कहा - मैं घरवालों के ताने सुन-सुन कर परेशान हो गया हूँ, अब मैं जीना नहीं चाहता। श्री चन्द्रप्रभ ने फिर उससे पूछा - क्यों, ऐसा आपसे क्या हो गया? छात्र ने कहा - मैंने गलत तो कुछ नहीं किया, पर मेरे दिमाग में कोई भी चीज चढ़ती नहीं है, इसलिए घरवाले मुझसे परेशान हैं। श्री चन्द्रप्रभ उसे कुएँ पर ले गए और पूछा - कुएँ पर क्या-क्या चीजें रखी हुई हैं? उसने कहा - बाल्टी और रस्सी। श्री चन्द्रप्रभ ने फिर पूछा - कुएँ की मेड पर लगा ये पत्थर घिसा हुआ कैसे है? उसने कहा - बार-बार रस्सी के आने-जाने के कारण? श्री चन्द्रप्रभ ने कहा - जब रस्सी के बार-बार आने-जाने से कठोर पत्थर भी घिस सकता है तो सोचो हम लगातार कोशिश करके कुछ भी क्यों नहीं बन सकते। अगर आप भी मन में ठान लें और निरंतर कोशिश करना शुरू कर दें तो एक दिन अवश्य इस परेशानी पर जीत हासिल कर लेंगे। यह सुन छात्र का सोया आत्मविश्वास जग गया। उसने अपना निर्णय बदला और आगे बढऩे की ठान ली।

इसी तरह श्री चन्द्रप्रभ ने जीवन-प्रबंधन से जुड़े हर पहलू पर बेहतरीन गुर थमाए हैं। समय-प्रबंधन हो या दिनचर्या प्रबंधन, व्यक्तित्व विकास हो या कॅरियर निर्माण, प्रबंधन से जुड़े हर पहलू पर उनकी पकड़ मजबूत है। जीवन में जोश जगाने से जुड़ा उनका यह गीत युवाओं के लिए गीता का काम कर रहा है -

जीएँ, ऐसा जीएँ, जो जीवन को महकाए। पंगु भी पर्वत पर चढ़कर जीत के गीत सुनाए।।
जीवन में हम जोश भरें, अपने सपने पूर्ण करें। साथ मिले तो लें सबका, नहीं मिले तो गम किसका।
अर्जुन में बेहद दम है, एकलव्य भी कहाँ कम है। हम भी दिल में लक्ष्य बसाकर, जीवन सफल बनाएँ।।
संघर्षों से डरें नहीं, बिना मौत के मरें नहीं। खुद को बूढ़ा क्यों समझें, खुद को अपाहिज क्यों समझें।
जिसने भी संघर्ष किया, उसको अपना लक्ष्य मिला। 'चन्द्र स्वयं पुरुषार्थ जगाकर, सोया भाग्य जगाएँ।।

श्री चन्द्रप्रभ का व्यक्तित्व-निर्माण पर विस्तृत साहित्य प्रकाशित हुआ है। वे सफलता के लिए बेहतर सोच व बेहतर कार्यशैली अपनाने की सीख देते हैं। जीवन का नजरिया देते हुए उन्होंने कहा है, ''दुनिया तो गेंद की तरह है खेलने वाला हो तो इस दुनिया को जि़ंदगी भर खेला जा सकता है। तुम अपनी इच्छाशक्ति का हॉर्लिक्स दुगुना करो, खेलने की ताकत खुद-ब-खुद बढ़ जाएगी। उनके विचार नपुंसक हो चुकी चेतना को झंकृत कर देते हैं। वे कहते हैं, ''हर गुरु-शिक्षक के पास हजारों शिष्य आते हैं, पर अर्जुन वही बनता है जो पूरी तन्मयता से अभ्यास करते हुए अपने लक्ष्य की ओर बढ़ता है। उन्होंने किसी भी कार्य को छोटा न मानने और प्रतिदिन कुछ नया करने की कोशिश करने की सीख दी है। वे कहते हैं, ''दुनिया का कोई भी पत्थर एक ही बार में नहीं टूटता, पर दसवें वार में टूटने वाले पत्थर के लिए उन नौ वारों को अर्थहीन नहीं कहा जा सकता, जिनकी हर मार ने पत्थर को कमजोर किया था। वे कॅरियर अथवा सफलता को केवल आर्थिक स्तर पर नहीं तोलते वरन् सम्पूर्ण जीवन के विकास से जोड़ते हैं।

सर्वधर्म सद्भाव के प्रणेता एवं सत्य के अनन्य प्रेमी


श्री चन्द्रप्रभ पंथ, परम्परा अथवा धर्म से नहीं, सत्य से प्रेम रखते हैं। उन्होंने हर महापुरुष के अनुभवों को चुराया है और उनकी अच्छी बातों को अपनाकर, उन पर विस्तृत व्याख्याएँ भी की हैं। उनकी नज़रों में, ''राम, कृष्ण, महावीर, जीसस, बुद्ध एक ही बगीचे में खिले हुए अलग-अलग फूल हैं जो धर्म रूपी बगीचे की सुंदरता को घटाते नहीं, बढ़ाते हैं। वे सर्वधर्म के महान प्रवक्ता हैं। उन्होंने न केवल भारतीय वरन् पाश्चात्य धर्म साहित्य का भी गहरा अध्ययन किया है। उनकी जैन, बौद्ध और हिन्दू शास्त्रों पर पकड़ विशेषत: मजबूत है। उन्होंने हर धर्म के महापुरुषों पर अपनी लेखनी चलाई है जो कि उनकी उदार दृष्टि का परिचायक है। उन्होंने शास्त्रों की वर्तमान युग के लिए अप्रासंगिक बातों को नकारा भी है। वे उन्हीं सिद्धांतों को आमजन के सामने रखते हैं जिसे अपनाने पर इंसानियत का भला हो सकता है। स्वर्ग-नर्क जैसे बिंदुओं पर उनकी मनोवैज्ञानिक व्याख्याएँ पढऩे योग्य हैं।

श्री चन्द्रप्रभ के सान्निध्य में अनेक सर्वधर्म सम्मेलनों का आयोजन हुआ है जिसमें सभी धर्मों के गुरुओं ने शरीक होकर धार्मिक एकता का स्वर बुलंद करने की कोशिश की है। ज्योतिषाचार्य पं. प्रमोदराय आचार्य का कहना है, ''पूरे देश में घूमा, अनेक समारोहों में सम्मिलित हुआ, पर सर्वधर्म सम्मेलन का जो स्वरूप यहाँ देखने को मिला वह अपने आप में अद्भुत, अनुपम और अद्वितीय है। आज मेरे घर में इनके साहित्य, सीडी और कैसेट्स ही छाये हुए हैं। अब्दुल सलाम काजी का मानना है, ''सर्वधर्म प्रेमी तथा मानवतावादी इन संतों ने सभी धर्मों का सम्मान करते हुए जीवन-विकास का अनोखा कार्य किया है। विश्व हिन्दू परिषद् के प्रांतीय पूर्व अध्यक्ष प्रदीप साँखला ने कहा था, ''हर दिल को छू लेने वाली श्री चन्द्रप्रभ की यह प्रवचनमाला बरसों तक भीलवाड़ावासियों को याद रहेगी। नगर में सर्वधर्मसमभाव का अनूठा वातावरण पहली बार बना। पूरे शहर ने पर्युषण पर्व मनाया और जन्माष्टमी भी।

श्री चन्द्रप्रभ द्वारा सभी धर्मों के समन्वय पर दिए गए प्रवचन बेहद रसभीने होते हैं और सर्वधर्म सद्भाव का माहौल तैयार करते हैं। वे न केवल सर्वधर्म सद्भाव की बात करते हैं वरन् सभी धर्मों के संतों से मिलते हैं और एकता से जुड़े विभिन्न बिन्दुओं पर चर्चा करते हैं। वे सभी धर्मों के महापुरुषों के मंदिरों में जाते हैं और उन्हें श्रद्धापूर्वक प्रणाम करते हैं। उनका कहना है, ''हम भले ही राम और महावीर के मंदिर में श्रद्धापूर्वक जाएँ, पर बीच रास्ते में मस्जिद आ जाए तो वहाँ पर भी अकड़ कर चलने की बजाय झुककर चलें। उनके सान्निध्य में निर्मित संबोधि धाम के ट्रस्ट मण्डल में सभी धर्मों के प्रतिनिधि हैं एवं वहाँ सभी महापुरुषों के मंदिर हैं।

श्री चन्द्रप्रभ ने भले ही जैन धर्म में संन्यास लिया हो, पर उनके विचारों में कहीं कट्टरता नजर नहीं आती। वे सभी धर्मों का सम्मान करते हैं और हर धर्म के महापुरुष से कुछ-न-कुछ सीखने का प्रयास करते हैं। उनके साहित्य में सर्वत्र सर्वधर्म सद्भाव के दर्शन होते हैं। दिगम्बर समाज के प्रवक्ता कमल सेठी कहते हैं, ''ये जैन संत नहीं जन संत हैं जिन्होंने हमें जीवन और धर्म की सही समझ दी और हमारे भीतर पारिवारिक प्रेम तथा राष्ट्रीय भावना को पूरी गहराई के साथ स्थापित किया। उनके द्वारा राम के बारे में की गई धार्मिक व्याख्याओं में भी यह तत्त्व उभर कर आया है।

श्री चन्द्रप्रभ ने जैन, हिन्दुओं, सिखों, मुसलमानों, ईसाइयों के बीच पलने वाली दूरियों को दूर करने की कोशिश की है। इसी के चलते उनके प्रवचनों का आयोजन मुस्लिम भाइयों द्वारा भी करवाया जाता है। बोहरा मुस्लिम समाज के प्रमुख श्री बाबूभाई ने कहा था, ''इंदौर में ऐसा पहली बार हुआ जब पंथ-मजहबों से परे होकर इंसानियत का सीधा पाठ पढ़ाया गया। हिंदुओं को छोड़ो हम मुसलमान तक भी गुरुजी की वाणी के कायल हो गये। उन्होंने साम्प्रदायिकता को जीने वालों पर करारा व्यंग्य किया है। उन्होंने महापुरुषों को सम्प्रदायों, पंथों और पक्षों से मुक्त माना है। वे घर-परिवार में जीने के लिए राम व रामायण को आदर्श बनाने, जीवन की उन्नति व विकास के लिए श्रीकृष्ण से प्रेरणा लेने और आध्यात्मिक साधना के लिए बुद्ध व महावीर से सीखने की बात करते हैं। डॉ. नागेन्द्र ने उनकी साहित्य समीक्षा में लिखा है, ''यदि चन्द्रप्रभ चाहते तो किसी भी एक विधा में जैन जगत से ही विषय-वस्तु का चयन करके साहित्य सृजन कर सकते थे लेकिन प्रबुद्ध साहित्यकार ने ऐसा नहीं किया। मानवीय हित चिंतन ही तो साहित्य में किया जाता है। सचमुच वे मानवता के संदेशवाहक हैं।

आध्यात्मिक एवं अतीन्द्रिय शक्ति से सम्पन्न


श्री चन्द्रप्रभ अतीन्द्रिय शक्ति से सम्पन्न एवं आध्यात्मिक चेतना के धनी हंै। गुरुकृपा से वे संन्यास लेने के कुछ वर्ष पश्चात् ही प्रवचन देने एवं साहित्य लिखने में सिद्धहस्त हो चुके थे। पर एक बार प्रवचन देते हुए उनके भीतर यह जिज्ञासा जगी कि मैं लोगों को आत्मा, परमात्मा, मोक्ष की बातें बताता हूँ, पर ये वास्तव में है भी या नहीं। या केवल शास्त्रों में जैसा लिखा है वैसा ही मैंने मान लिया है। तब श्री चन्द्रप्रभ ने यह संकल्प ले लिया कि मैं स्वयं सत्य की खोज करूँगा। सत्य की खोज में उन्होंने लगातार पन्द्रह साल लगाए। हिमालय की यात्रा की, पहुँचे हुए योगियों-ऋषि-महर्षियों से सम्पर्क किया। लगातार कुछ वर्ष मंत्र, तंत्र और ध्यान साधनाएँ की। इस दौरान उन्हें अनेक खट्टे-मीठे-कड़वे अनुभवों से गुजरना पड़ा। कई बार मौत साक्षात उनके पास से गुजरी। उन्होंने योगियों के साथ ब्रह्मयात्रा भी की। पिछले जन्मों से साक्षात्कार भी किया। उन्हें अनेक अनहोनी घटनाओं का पूर्वाभास भी हुआ। हम्फी की गुफा में 17 फरवरी के दिन वे लगातार 16 घंटे तक समाधिस्त रहे। साधना के दौरान उनसे अनेक दिव्य आध्यात्मिक भजनों की रचना भी हुई। अध्यात्म की गहराइयों से जुड़ा 36 दोहों का संबोधि सूत्र तो मात्र कुछ मिनटों में उनके मुख से प्रस्फुटित हो गया, जिसके प्रथम बोल है -

अंतस के आकाश में, चुप बैठा वह कौन। गीत शून्य के गा रहा, महागुफा में मौन।।
बैठा अपनी छाँह में, चितवन में मुस्कान। नूर बरसता नयन से, अनहद अमृत पान।।

श्री चन्द्रप्रभ का अध्यात्म शास्त्रों से नहीं, भीतर के अनुभव से निकलता है। उन्होंने पहले इसे जिया है फिर सबको दिया है। प्रभु से आध्यात्मिक-प्रार्थना करते हुए श्री चन्द्रप्रभ कहते हैं -

सबमें देखूँ श्री भगवान।। हम सब हैं माटी के दीये, सबमें ज्योति एक समान। सबसे प्रेम हो, सबकी सेवा, ऐसी सन्मति दो भगवान।।
आँखों में हो करुणा हरदम, होंठों पर कोमल मुस्कान। हाथों से हो श्रम और सेवा, ऐसी शक्ति दो भगवान।। चाहे सुख-दु:ख, धूप-छाँव हो, चाहे मिले मान-अपमान। व्याधि में भी रहे समाधि, ऐसी मुक्ति दो भगवान।।

श्री चन्द्रप्रभ अध्यात्म को संसार का त्याग नहीं वरन् संसार को बारीकी से देखने की कला कहते हैं। वे आध्यात्मिक साधना के लिए हृदय में मीराभाव अर्थात् समर्पण का प्रकट होना अनिवार्य मानते हैं। उन्होंने मन की मृत्यु को मुक्ति माना है। वे संन्यास से ज्यादा अनासक्ति एवं विरक्ति को महत्त्व देते हैं । उन्होंने आध्यात्मिक साधना के दो मार्ग बताए हैं : पहला संकल्प का, दूसरा समर्पण का। पहले में स्वयं का स्वयं पर विश्वास है तो दूसरे में स्वयं का ईश्वरीय चेतना पर विश्वास है। उनकी दृष्टि में, ''संकल्प जिनत्व और बुद्धत्व को पाने की आधारशिला है और समर्पण भक्त से भगवान होने का मार्ग है। उन्होंने अपने आध्यात्मिक अनुभवों से जुड़ी घटनाओं का जिक्र इस प्रकार किया है -

जिज्ञासा बनी अभीप्सा - कुछ वर्ष पहले जब मैं प्रवचन दिया करता तो हजारों-हजार लोग एकत्र हुआ करते थे। तब मैं बहुत धुआँधार बोला करता था, जिसके आगे आज कुछ नहीं बोलता। अब तो वही उद्गार मुँह तक आता है, जिसका अनुभव भीतर तक गया हुआ है। अगर किसी पहलू का अनुभव भीतर नहीं हुआ है तो वह कभी अभिव्यक्ति में नहीं आएगा। जीवन में कभी यह जिज्ञासा जगी थी कि मैं लोगों को आत्मा के कल्याण की, परमात्मा का ध्यान करने की बात कहता हूँ, क्या आत्मा-परमात्मा है भी या नहीं? जीवन में उठने वाली यह जिज्ञासा, यह शंका अभीप्सा बन गई, साधक अन्तर्साधक बन गया। जब संन्यास लिया तो गृहस्थ से मुक्ति पाई और जब आत्मज्ञान पाया तो रूढ़ संन्यास से भी मुक्ति मिल गई। तब गृहस्थ और संन्यास - दोनों ही भावों से वीतराग होने का अवसर मिल गया।

दैवीय-शक्ति का चमत्कार - श्री चन्द्रप्रभ हिमालय यात्रा के दौरान उत्तर काशी की ओर जा रहे थे। अचानक मौसम बदल गया, चारों तरफ घनघोर काले बादल आ गए, बिजलियाँ जोरों से कड़कने लगीं। उनकी टकराहट से बड़े-बड़े ग्लेशियर टूटकर नीचे गिरने लगे। रास्ता पूरा बंद हो गया। चेहरे तक नज़र नहीं आ रहे थे। उनको लगा कि आज उनका अंतिम समय निकट है। उन्होंने पिता एवं भ्राता संत को 'उवसग्गहरं स्तोत्र का जाप करने को कहा। केवल कुछ मिनटों में स्तोत्र का ऐसा चमत्कार हुआ कि एक सरकारी बस उनके पास आकर रुकी। एक व्यक्ति नीचे उतरा और उन्हें चढऩे के लिए कहा। भगवान द्वारा भेजी हुई सहायता मानकर वे बस में चढ़ गए। बस ने उन्हें अगले गाँव में चाय के ढाबे के पास उतारा। वहाँ पर एक व्यक्ति पास के मकान की चाबी लिए खड़ा मिला। सभी उस घर में चले गए। श्री चन्द्रप्रभ ने रहस्योद्घाटन करते हुए कहा कि उस स्तोत्र के प्रभाव से कोई दैवीय-शक्ति जाग्रत हुई, उसी ने बस-ड्राइवर को प्रेरणा दी, बस में केवल चार लोग ही थे। हमारा भतीजा, जो पिछले गाँव से आहार लाने के लिए बस की इंतजारी कर रहा था, ड्राइवर, कंडक्टर व एक अजनबी पुरुष। ऐसी घनघोर स्थिति में, जहाँ एक वाहन सड़क पर नहीं, उस स्थिति में भी वह बस हमारे लिए सहायता रूप में आई और हमें सुरक्षित स्थान पर पहुँचाया। बस में बैठा वह अजनबी पुरुष और चाय के ढाबे पर चाबी लिए खड़ा युवक भी न जाने कुछ ही देर में कहाँ गायब हो गए।

जिज्ञासु-वृत्ति - श्री चन्द्रप्रभ पूज्य गणिवर महिमाप्रभ सागर महाराज के साथ हिमालय की यात्रा के दौरान गंगोत्री में प्रवासरत थे। वे तांत्रिक साधना के संदर्भ में एक तांत्रिक के आश्रम में पहुँचे। तांत्रिक ने उन्हें तंत्र-साधना का कुछ ज्ञान दिया और एक प्रयोग करते हुए आग जलाई, कुछ तंत्र बोले और चाकू लेकर श्री चन्द्रप्रभ के पास पहुँचा। तांत्रिक चाकू उनके शरीर से स्पर्श करने वाला ही था कि न जाने श्री चन्द्रप्रभ को कौनसी अतीन्द्रिय प्रेरणा मिली, उन्होंने तांत्रिक को जोर से धक्का दिया और ललितप्रभ जी के साथ तेजी से दौड़ते हुए स्वस्थान आ गए। श्री चन्द्रप्रभ ने यह घटना आश्रम के गादीपति को बताई तो उन्होंने कहा - अगर वह तांत्रिक तुम्हारे खून की एक बूँद भी निकाल लेता तो तुम हमेशा के लिए उसके गुलाम बन जाते। आज तुम्हारी रक्षा अतीन्द्रिय शक्ति के कारण हुई।

अतीन्द्रिय शक्ति का संकेत - श्री चन्द्रप्रभ ने अपने आदरणीय पिता-संत गणिवर श्री महिमाप्रभ सागर जी महाराज के साथ उत्तरकाशी में चातुर्मास करने का निश्चय किया। काफी कोशिशों के बाद उन्हें चातुर्मास करने हेतु बिड़ला हाउस मिला। वे वहाँ पहुँचे। चातुर्मास लगने में कुछ दिन बाकी थे। वे बिड़ला हाउस में ठहरे हुए थे, पर श्री चन्द्रप्रभ का वहाँ बिल्कुल भी मन नहीं लग रहा था। उन्होंने अन्य संतों को यह बात बताई। तीन दिन तक लगातार ऐसी स्थिति बनने के कारण उन्हें अनहोनी होने जैसा अनुभव हुआ। अंतत: उन्होंने वह स्थान छोडऩे का मानस मनाया। वे वहाँ से ऋषिकेश आ गए। एक माह बाद ही इतना भयंकर भूकंप आया कि वह बिड़ला हाउस नींव सहित मलबे में बदल गया, वहाँ रहने वालों में एक भी बच नहीं पाया। जब श्री चन्द्रप्रभ को यह खबर मिली तो भविष्य के पूर्व संकेत से जुड़ी वास्तविकता उन्हें ज्ञात हो गई।

इष्ट शक्ति ने दी सहायता - श्री चन्द्रप्रभ अपने पिता संत श्री महिमाप्रभ सागर व लघु भ्राता संत श्री ललितप्रभ सागर के साथ फिरोजाबाद की यात्रा पर थे। वे विहार करते हुए फिरोजाबाद से 14 किलोमीटर दूरी पर एक गाँव में पहुँचे। उस दिन अयोध्या कांड होने से दंगे भड़क गए थे। वह क्षेत्र जाति-विशेष बहुल था। उनके लिए आहार आया। श्री चन्द्रप्रभ ने कहा - मेरा यहाँ मन नहीं लग रहा है, लगता है कुछ अनहोनी हो सकती है। हमारा यहाँ रुकना ठीक नहीं है। वे आगे बढऩे की बज़ाय वापस फिरोज़ाबाद शहर की ओर रवाना हो गए। वे कुछ किलोमीटर चले होंगे कि दूर से सैकड़ों लोग हाथों में अस्त्र-शस्त्र लेकर उनकी ओर आने लगे। उनको लगा आज प्राणान्त संकट सामने है। वे मंत्र-जाप में लीन हो गए। लोग निकट पहुँचने वाले ही थे कि अचानक वहाँ एक सैनिकों की गाड़ी पहुँची। जल्दी से अधिकारी नीचे उतरे, उनको सुरक्षा के घेरे में लिया और उन्हें सुरक्षित स्थान तक पहुँचा दिया। दूसरे दिन अखबारों में पढऩे में आया कि 14 किलोमीटर आगे गाँव के जिस मकान में वे ठहरे थे उसे अराजक तत्त्वों ने रात में ही जलाकर राख कर दिया।

मौन को बनाया जीवन का महाव्रत


श्री चन्द्रप्रभ प्रखर वक्ता ही नहीं, मौन साधक भी हैं। वे बोलने को चाँदी और चुप रहने को सोना बताते हैं। उन्होंने मौन साधना के प्रेरक के रूप में संत श्री अमिताभ को माना है। उन्होंने मौन से जुड़े अनुभवों को 'ऐसी हो जीने की शैली नामक पुस्तक के अन्तर्गत उल्लेखित किया है। वे लगभग 20 वर्षों से लगातार सूर्यास्त से लेकर सूर्योदय तक मौन-व्रत को जी रहे हैं। उनसे प्रेरित होकर पिताजी महाराज महिमाप्रभ सागर महाराज ने भी पौने तीन वर्ष अखंड मौन-व्रत की साधना की थी। उनके द्वारा मौनधर्म की महिमा पर रचित गीत प्रेरणादायक है -

मौन है शिवपुर का सोपान। होते झगड़े शांत, बने घर सचमुच स्वर्ग समान।।
मौन धर्म है, मौन साधना, समरसता की कुंजी। मौन महाव्रत, मौन तपस्या, ध्यानयोग की पूँजी। मन का मौन सधे तो सधता, सचमुच आतम-ज्ञान।।
बारह वर्ष मौन करने से, वचन-सिद्धि हो जाती। दो घंटा नित मौन करे तो, नई ताजगी आती। 'चन्द्र प्रभु से प्रीत लगाकर, पा लें शुभ वरदान।।

श्री चन्द्रप्रभ के सान्निध्य में आयोजित संबोधि साधना शिविरों में भी मौन रखने पर विशेष रूप से प्रेरणा दी जाती है। उन्होंने मौन को साधना की नींव का मुख्य पत्थर माना है। मौन से जुड़ी उनके जीवन की निम्न घटनाएँ हैं -

मौन का संकल्प - श्री चन्द्रप्रभ सन् 1991 में माउण्ट आबू में प्रवासरत थे। वे शाम को छत पर टहल रहे थे। टहलते-टहलते वे डूबते सूर्य पर त्राटक करने लगे। थोड़ी देर में उनकी आँखें मुँद गई। वे ध्यानमग्न हो गए। लगभग दो घंटे बाद जब उनका ध्यान पूर्ण हुआ तब उनके अंतर्मन में संकल्प जगा कि आज से मैं एक वर्ष के लिए प्रतिदिन सूर्यास्त से लेकर सूर्योदय तक मौन-व्रत रखूँगा। तब से लेकर अब तक लगभग बीस वर्ष हो चुके हैं वे मौन-व्रत को रख रहे हैं।

मौन से मिली शांति - श्री चन्द्रप्रभ के मौन-व्रत का संकल्प लेने के दूसरे दिन का वाकया है। उनके पिताजी महाराज ने उन्हें किसी बिन्दु को लेकर चार-पाँच कड़वी बातें सुना दीं। श्री चन्द्रप्रभ को बुरा लगा। उनके मन में क्रिया-प्रतिक्रि या चलती रही। उन्होंने सोचा - सुबह जैसे ही मौन-व्रत पूरा होगा, मैं एक-एक बात का जवाब दूँगा। पर जब वे सुबह उठे तो उन्होंने देखा उनके भीतर किसी प्रकार की प्रतिक्रिया नहीं हो रही थी, मन में सहज शांति थी। उसी क्षण उन्होंने दूसरा संकल्प ले लिया कि मौन के दौरान घटी घटना की मैं किसी प्रकार की क्रिया-प्रतिक्रिया नहीं करूँगा। इस संकल्प के बाद मौन ने उन्हें अंतर्मन की दिव्य शांति और आत्मिक आनंद का आलोक प्रदान किया।

संबोधि साधना मार्ग का प्रवर्तन


श्री चन्द्रप्रभ का व्यक्तित्व ध्यानयोगी के रूप में भी उभर कर आया है। उन्होंने ध्यान को गहराई के साथ आत्मसात किया और ध्यान से बहुत कुछ उपलब्ध किया। उनकी ध्यान योग साधना पर कई किताबें प्रकाशित हुई हैं। उन्होंने हम्पी और हिमालय की गुफाओं में साधना की और आत्म-प्रकाश की उपलब्धि के पश्चात् संबोधि साधना के मार्ग का प्रवर्तन किया। जिससे अब तक लाखों लोग लाभान्वित हो चुके हैं। वे ध्यान को साधना की आत्मा मानते हैं। वे कहते हैं, ''प्रार्थना पहला चरण है और ध्यान अगला। प्रार्थना में हम प्रभु से बातें करते हैं, जबकि ध्यान में प्रभु हमसे। उनकी दृष्टि में, ''प्रयासपूर्वक किया गया ध्यान एकाग्रता है, अनायास घटित होने वाली एकाग्रता ध्यान है।उन्होंने जीवन की नकारात्मकताओं से मुक्ति पाने के लिए ध्यान मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी है। उन्होंने ध्यान की अनेक वैज्ञानिक विधियाँ भी प्रतिपादित की हैं। वे तन, मन, चेतना की चिकित्सा के लिए ध्यान को राजमार्ग बताते हैं। उनकी ध्यान साधना से जुड़ी मुख्य घटनाएँ इस प्रकार हैं -

गहन साधक - श्री चन्द्रप्रभ सहयोगी संतों के साथ कर्नाटक के गुन्टूर में प्रवासरत थे। वे वहाँ स्थित हम्फी की गुफाओं में साधना किया करते थे। तीन माह की साधना के दौरान उन्हें एक बार दीर्घावधि की समाधि सधी। वे लगातार 16 घंटों तक समाधिस्त रहे। समाधि की पूर्णता हुई तब उन्होंने देखा उनके चारों तरफ चंदन के चूर्ण की वृष्टि हुई है। संघस्थ गुरुभक्तों ने उसे इकठ्ठा किया। आज भी वह चमत्कारी और मनोवांछित देने वाला चूर्ण संबोधि धाम में है।

योगशक्ति की भविष्यवाणी - मद्रास की बात है। पिता संत श्री महिमाप्रभ सागर, भ्राता संत श्री ललितप्रभ सागर के साथ श्री चन्द्रप्रभ कुन्नूर के पास नीलगिरि की घाटियों की ओर जा रहे थे। गुरुभक्त श्री विजय झाबक ने आग्रह किया कि वे आदि परा शक्ति की उपासिका योग माँ से जरूर मिलें। श्री चन्द्रप्रभ ने भी उनसे मिलने की इच्छा जाहिर की। श्री झाबक ने कहा - वे कहीं नहीं जाती हैं, पर श्री चन्द्र्रप्रभ ने कहा - आप उन्हें लेने जाइए। हमारा नाम लें, वे जरूर आएँगी।। वे उन्हें लेने पहुँचे। वे कार से उतरे कि योग माँ ने उन्हें देखते ही कहा - तुम्हें संतों ने मुझे बुलाने के लिए भेजा है न। मैं तो खुद काफी वर्षों से उनका इंतजार कर रही हूँ। यह सुनकर वे हतप्रभ रह गए। योग माँ उनके साथ श्री चन्द्रप्रभ के पास पहुँचीं। श्री चन्द्रप्रभ को देखते ही योग माँ ने योग विद्या से पूजा की साम्रगी और आरती प्रकट की और श्री चन्द्रप्रभ की पूजा करते हुए आरती उतारी। यह देखकर योग माँ की शिष्य-शिष्याएँ भी आश्चर्यचकित रह गईं। उन्होंने योग माँ से पूछा - यह आप क्या कर रही हैं? योग माँ ने कहा - ये सामान्य पुरुष नहीं वरन् असाधारण आत्मा हैं। इन्हें आज से ठीक एक वर्ष बाद योगशक्ति प्राप्त होगी। ऐसी कुछ विशिष्ट बातें योग माँ ने बातचीत के दौरान श्री चन्द्रप्रभ के भविष्य को लेकर कहीं जो आगे चलकर सच साबित हुईं। ऐसी सैकड़ों दिव्य घटनाएँ मुझे सुनने और जानने को मिली हैं।

निष्कर्ष


श्री चन्द्रप्रभ के समग्र जीवन पर दृष्टिपात करने से स्पष्ट होता है कि वे भारतीय संस्कृति एवं दर्शन जगत् के उज्ज्वल नक्षत्र हैं। उन्होंने एक ओर भारतीय संस्कृति के मूलभूत तत्त्वों को युगीन संदर्भों में प्रस्तुत कर विश्व का ध्यान भारत की ओर खींचा है और भटकती युवा पीढ़ी को नई दिशा दी है वहीं दूसरी ओर दर्शन की दुरूहता को दूर कर नया कीर्तिमान स्थापित किया है। उनका दर्शन, साहित्य, जीवन, विचार, व्यवहार और क्रियाकलाप सब कुछ सकारात्मकता, रचनात्मकता एवं विविधता लिए हुए हैं। इसी कारण वे वर्तमान के ऐसे संत, दार्शनिक, लेखक और व्यक्तित्व हैं जिनसे देश का हर व्यक्ति किसी-न-किसी रूप से अवश्य परिचित है। वे बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी हैं। उनकी साधना, साहित्य-लेखन एवं मानवता से जुड़ी हुई सेवाएँ निरंतर प्रगति की ओर उन्नतिशील हैं। उन्हें समझना या उन पर लिखना संभव है, पर उनकी सम्पूर्णता को प्रकट करना असंभव है।



चन्द्र प्रभ जी का साक्षात्कार में पूछे गए प्रश्न


एक सहज तृप्ति, संतोष और आनंद। जीवन ने इतना कुछ दिया है कि उसके सामने झोली छोटी पड़ गई। हैसियत से ज्यादा मिला है। इसे परा शक्ति का अनुग्रह मानेंगे।
मैं सहज और नैसर्गिक जीवन में विश्वास रखता हूँ। मेरा लक्ष्य और अध्यात्म मुझसे पल भर के लिए भी जुदा नहीं है। मैं अपने में और अपने आसपास प्रभु की उपस्थिति का अहसास करता रहता हूँ। मुझे स्वयं में भी प्रभु की व्याप्ति का अहसास होता है और मेरे पास आने वाले हर व्यक्ति में उसकी व्याप्ति का अहसास होता है। मैं एक ऐसा शख्स हूँ जिसका कोई लक्ष्य नहीं है क्योंकि लक्ष्य इंसान को दौड़ाता है, छकाता है। पूर्ण न होने पर टेंशन देता है। मैं लक्ष्य में नहीं जीवन में विश्वास रखता हूँ। जीवन गति का नाम है। जहाँ गति होती है वहाँ प्रगति अपने आप होती है। भला फूलों और झरनों का क्या लक्ष्य होगा, चाँद-सितारों का क्या लक्ष्य होगा। फूल नैसर्गिक रूप से खिलते हैं, झरने स्वत: बहते हैं, चाँद-सितारे अनायास चमकते हैं। मैं नैसर्गिक हूँ और अपने नैसर्गिक विकास एवं प्रगति में विश्वास रखता हूँ।
जब तक व्यक्ति को अपने जीवन की सही समझ नहीं है, तब तक निश्चय ही उसे ऐसे रास्ते पर कदम बढ़ाते रहना चाहिए जिससे समृद्धि और प्रगति की सुवास मिलती रहे। चाँदी मूल्यवान होती है, पर लोहा चाँदी से भी ज्यादा बेशकीमती हो सकता है। बशर्ते वह पारस से सान्निध्य की तलाश करता रहे। हमें भौतिक और बौद्धिक रूप से भी समृद्ध होना चाहिए साथ ही आध्यात्मिक रूप से भी। अपने आपको भुलाकर पाई गई समृद्धि इंसान को आंतरिक सुख नहीं दे पाएगी।
मेरी नौंवी कक्षा में सप्लीमेंट्री आने पर मुझे मेरे क्लास टीचर ने कहा था - तुम्हारे अभिभावक तुम्हारी पढ़ाई और फीस के लिए कठिन परिश्रम करके व्यवस्था करते हैं और तुम उन्हें ऐसा कमजोर परिणाम देते हो। क्लास टीचर के शब्दों ने मेरी अंतर्आत्मा को झिंझोड़ डाला। उस दिन से मैं शिक्षा और सद्जान के प्रति गंभीर हो गया। मैं चाहूँगा कि अपनी पढ़ाई के प्रति लापरवाह रहने वाले लोग मेरी इस घटना से प्रेरित हों और वे अपने अभिभावकों को ऐसा परिणाम लाकर दिखाएँ जिससे उनकी हम पर होने वाली आहुतियाँ गौरवान्वित हो सकें।
मैं या तो यह कहूँगा कि हमने संत बनने वाले अपने माता-पिता की सेवा के लिए संन्यास लिया या इसे नियति का खेल कहें। जो भी हो हम इसे श्रीप्रभु की बहुत बड़ी कृपा समझते हैं कि उसने हमें गृहस्थ बनाने की बजाय संत होने का गौरव प्रदान किया। वैसे व्यक्ति गृहस्थ में रहकर भी दिव्य और नैतिक जीवन जी सकता है।
जीवन में भाई या बहिन का होना न होना प्रकृति की व्यवस्था है। हम हर नारी को बहन का प्रेम देते हैं। प्रभु की कृपा हमें हर नारी से सगी बहिन से कहीं ज्यादा प्यार मिलता है।
मेरे लिए वे सभी लोग गुरुतुल्य आदरणीय हैं जिनसे मैंने जीवन जीने के कुछ बेहतरीन पाठ सीखे और अपने जीवन की नसीहतें पाईं।
ईश्वर के सिवा इसका श्रेय किसे दिया जा सकता है। हम ईश्वर के दिव्य मार्ग, उनके दिव्य प्रेम और सद्भावना के सकारात्मक संदेशों को जन-जन के हृदय में उतारने के लिए ही जन समुदाय के बीच बोलते हैं। सार्वजनिक मैदानों में बोलने का उद्देश्य यही रहता है कि हमारी वाणी और अनुभवों से हर इंसान लाभान्वित हो। हमें इंसानियत में कोई भेद नजर नहीं आता, हम किसी पंथ के नहीं, इंसानियत के संत हैं।
(हँसकर जवाब देते हैं) आप मुझसे मेरी तारीफ करवाना चाहते हैं? लोग हमें इसलिए सुनने को आतुर रहते हैं क्योंकि हम इंसान के वर्तमान जीवन को स्वर्ग और सुकूनभरा बनाने की प्रेरणा देते हैं। लोगों को हमसे जीवन का एक अद्भुत प्रेम, मिठास और आत्मविश्वास प्राप्त होता है। उन्हें लगता है हम परलोक की नहीं, एक कल्याण मित्र बनकर उनके अपने जीवन को सुखी, सफल और मधुर बनाने की बात करते हैं। निश्चय ही हम आम इंसान के द्वारा समर्पित प्रेम के ऋणी हैं।
'माँ पर दिये जाने वाले प्रवचन मात्र चिंतन और विचार नहीं होते, बल्कि मेरी अपनी श्रद्धा और भावना की अभिव्यक्ति होते हैं। मुझे अपनी माँ से बेहद प्रेम है। मेरे लिए माँ स्वयं एक मंदिर है, प्रभु की मूरत है, ममता की देवी है। वह स्वयं बहुत सीधी और भोली है, पर उसे देवी न कहें तो क्या कहें जो सूरज-चाँद जैसे प्रकाशपुंज को जन्म दे दिया करती हैं।
मैं व्यवस्थित जीवन शैली में विश्वास रखता हूँ। मेरा खाना-पीना, उठना-बैठना, पहनना सब कुछ सुव्यवस्थित होता है। सचेतनता मेरी दिनचर्या की आत्मा है। हर कार्य तो क्या मैं अपनी हर साँस भी सचेतन होकर लेता हूँ। मेरी समझ से अगर हम होश और बोधपूर्वक अपना जीवन जीते हैं तो व्यक्ति चाहे जिस रूप रूपाय में रहे वह आध्यात्मिक चेतना का मालिक बना रहता है। सचेतनता मुक्ति है, भावनात्मकता मोह और गुलामी है, यंत्रवत् जीना मूढ़ता है।
मानवतावादी क्रियाकलाप और आध्यात्मिक भाव भूमिका से जुड़े लोग।
भला इससे बड़े गौरव की बात क्या होगी कि हमें देशभर का प्रबुद्ध वर्ग और बड़े-बड़े आचार्य तक पढ़ते हैं और हमारे प्रवचनों के आधार पर वे अपने प्रवचन देते हैं। हम माँ सरस्वती की इस कृपा से आभारी हैं।
देश में राजनीति के गिरते मूल्यों को देखकर हमने अपने यहाँ नेताओं को मूल्य देना बंद कर दिया। वैसे हमें सभी एक समान दिखाई देते हैं। जब हम सब प्राणी एक समान हैं तो फिर किसी को ज्यादा अहमियत देने की जरूरत नहीं रह जाती।
दुनिया में ऐसा कौन व्यक्ति है, जिसे अपने जीवन में विपरीत परिस्थितियों का सामना न करना पड़ा हो। खुदा का शुक्र है कि हमें कोई विपरीत परिस्थिति विपरीत नहीं लगती। हमें हर परिस्थिति प्रकृति का एक हिस्सा लगती है। हमारा विश्वास है कि हम तो प्रभु के पार्थ मात्र हैं और प्रभु हर हाल में अपने पार्थ के साथ रहते हैं।
लकीरों पर चलना सुरक्षित होता है। लकीरों को छोड़कर नई लकीर बनाना चुनौतीपूर्ण होता है। उसके लिए साहस चाहिए, कई दफा दुस्साहस भी। अभी तक जितना साहस जग पाया, सत्य के लिए उतने कदम बढ़ाए। जब और साहस जग जाएगा तब वे भी कदम उठ पड़ेंगे जिनकी आप हमसे उम्मीद लगाए बैठे हैं।
नंगे पाँव और केवल सूती कपड़े पहनकर की गई गंगोत्री यात्रा। वह पूरी यात्रा हमारे लिए जितनी अध्यात्म भाव से भरी हुई थी उतनी ही रोमांचकारी, मीठे और तीखे अनुभवों से परिपूर्ण। हमने वहाँ प्रकृति का जीभर आनंद लिया, अद्भुत अनूठे योगियों से मिलना हुआ, और सबसे खास बात मृत्यु से प्रत्यक्ष साक्षात्कार का मौका मिला।
मजन्म, जरा, रोग, मृत्यु ये सब जीवन के अनिवार्य हिस्से हैं। मैंने बचपन में ही एक साध्वी से व्याधि से समाधि का मंत्र पाया है। मेरे लिए जीवन एक उत्सव है। मैं हर हाल में, हर परिस्थिति में सहज और आनंदित रहता हूँ। उत्सव हमारी जाति है, आनंद हमारा गौत्र।
संत किसी एक शहर, पंथ या प्रदेश का नहीं होता। मैं सबका हूँ, सबके लिए हूँ। मैं किसी एक पंथ का नहीं, मानवता का पथिक हूँ। मुझे इंसानियत से प्यार है। मंदिर जाना हिन्दुओं का काम है, मस्जिद जाना मुसलमानों का; चर्च जाना ईसाइयों का काम है और गुरुद्वारा जाना सिक्खों का, पर इंसानियत से प्यार करना तो हर इंसान का काम है। इंसानियत है, तो उसमें महावीर की अहिंसा, बुद्ध की करुणा, जीसस का प्रेम और राम की मर्यादा स्वयं समाहित है। इंसानियत संसार का सबसे महान तीर्थ है। निश्चित तौर पर हमने पूरे देश की पदयात्रा की है और जिस शहर में गए 36 कौम के लोगों ने हमें भरपूर प्रेम और सम्मान दिया। हमारे संदेशों को अपनी आत्मा के साथ जोड़ा और हम शहर के होते चले गए। हमें सब लोग अच्छे लगते हैं, हर शहर अच्छा लगता है, हर धर्म और हर पंथ अच्छा लगता है। आप भला तो जग भला। मैं चाहता हूँ कि लोग पंथ, परम्पराओं की संकीर्णता से बाहर निकलें और इंसानियत से प्रेम करें। हम किसी भी जाति या पंथ के सदस्य बाद में हैं उससे पहले हम इंसान हैं। इंसान होकर इंसान के काम आना, इंसान से प्रेम करना यही इंसान का सबसे बड़ा धर्म है।
सवाल मेरे और आपके पाठक वर्ग का नहीं है, सवाल आम इंसान का है। मैं हर किसी भाई-बहिन से अनुरोध करूँगा कि वे केवल अपने स्वार्थ तक सीमित न रहें। फूल-पाँखुड़ी ही सही, हमें गरीब और जरूरतमंद लोगों के लिए आहुतियाँ देते रहना चाहिए। जरूरतमंद लोगों का सहयोग करना यज्ञ करने के समान पुण्यकारी है। हम केवल शादी-विवाह और जीमणवारियों में अपने धन को स्वाहा न करते रहें। हमें जीवन के साथ प्रेक्टिकल होना चाहिए। प्रभु ने हमें पृथ्वी ग्रह पर भेजा है तो हमें अपने आस-पास प्रेम, शांति और भाईचारे के कुछ फूल अवश्य खिलाने चाहिए, रोते हुए लोगों के आँसू जरूर पौंछने चाहिए।

Our Lifestyle

Features