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माताजी महाराज श्री जितयशा श्री जी म.

जन्म - देह-विलय - 4 अप्रेल 2014

संबोधि धाम के माताजी महाराज श्री जितयशा श्री जी म.

जीवन-परिचय- उन्होंने 48 वर्ष की उम्र में जैन धर्म की महान साध्वी श्री विचक्षण श्री जी महाराज के पास साध्वी-जीवन स्वीकार किया था। उन्होंने देश के अनेक राज्यों में विहार करते हुए अहिंसा, शांति एवं धार्मिक मूल्यों का प्रचार-प्रसार किया था। वे प्रसिद्ध राष्ट्र-संत श्री ललितप्रभ सागर जी एवं राष्ट्र-संत महान चिंतक श्री चन्द्रप्रभ सागर जी महाराज की साध्वी माँ थे। उन्होंने अपने पति गणिवर श्री महिमाप्रभ सागर जी महाराज के साथ दीक्षा ली थी। उनकी प्रेरणा से जोधपुर में संबोधि धाम की स्थापना हुई। प्रसिद्ध जैन तीर्थ सम्मेतशिखर में निर्मित जैन म्यूजियम उन्हींं की प्रेरणा का परिणाम है। उनकी शुभकामनाओं से निर्मित श्री जितयशा फाउंडेशन अल्पमोली श्रेष्ठ साहित्य प्रकाशित करने के लिए देशभर में लोकप्रिय है। माताजी महाराज अत्यंत सरल और शांत प्रकृति की थीं। वे जीवन भर प्रभु-भक्ति और ज्ञान, ध्यान, तप-जप में लीन रहीं।

साध्वी माँ

माँ ही मंदिर, माँ ही मूरत, माँ पूजा की थाली बिन माँ के जीवन ऐसा है, ज्यों बगिया बिन माली।

जीवन में आज पहली बार ऐसा मौका आया है कि कुछ बोलते हुए शब्द शिथिल पड़ रहे हैं। भाव-चेतना ज्ञान-चेतना पर हावी हो रही है। माताजी महाराज साहब के चले जाने से न केवल जीवन के दायित्व पूरे हो गए, बल्कि एक तरह से जीवन जीने का मकसद भी पूरा हो गया। हमें अपने हृदय में लगातार एक रिक्तता का अहसास हो रहा है, एक अनोखे खालीपन से गुजर रहा हूँ मैं। माताजी महाराज साहब ने हमें जीवन दिया, जीने का पथ दिया, उस पथ पर चलने के लिए अपने सद्गुणों, संस्कारों और ममता की छाँव दी। अब जीवन तो रह गया, जीने का पथ भी सामने है, लेकिन उस पथ पर मिलने वाली छाँव ओझल हो गई। जीवन के रास्तों को पार करते हुए अगर साथ में मीठी मधुर फलदायी छाँव हो तो हँसते-मुस्कराते हुए जीवन के हर रास्ते पार हो जाते हैं। बगैर छाँव के जीवन को जीना खुद ही एक तपस्या बन जाता है। उनके चले जाने से अब जीवन बगैर रेड लाइट का चौराहा लगता है। मुझे पब्लिक के बीच यह कहते हुए संकोच नहीं है कि हमें अपनी माँ से बेहद प्यार है, लगाव है। हमने उनमें हमेशा ईश्वर की छवि देखी है। उनको देख लेते तो ईश्वर को देखने की तम्मना पूरी हो जाती। मैं भगवान को देखने के लिए मंदिर-मंदिर और तीरथ-तीरथ घूमते रहने की बजाए अपने संत माता-पिता में उसका नूर देख लिया करता था। मैं यह बात बड़े दिल से कहा करता हूँ कि

भला जब हम मंदिर में लगी हुई प्रतिमा में परमात्मा को देख सकते हैं तो हम हमें जन्म देने वाले, पालन-पोषण करने वाले, हमें एक अच्छा इंसान बनाने वाले माता-पिता में भगवान की छवि क्यों नहीं देख सकते? मैंने तो यही सुन रखा है कि भगवान को जब-जब भी अवतार लेना होता है तो वे माता-पिता के रूप में धरती पर आते हैं। हमें जन्म देने का, हमें बड़ा करने का फर्ज अदा करके फिर वो वापस अपने बैकुण्ठ धाम चले जाते हैं।

हमारे माता-पिता ने हमारे लिए जो कुछ किया हमें उसका अहसास है। अहसास है शायद इसीलिए हमारे जीवन में उनका इतना महत्त्व है। हमें ही नहीं, दुनिया में जो भी इंसान इस अहसास का अहसान करेगा वो हर व्यक्ति अपने माँ-बाप का श्रवणकुमार बन जाएगा। हमने दुनिया में भले ही संत बनकर लोगों को जीवन जीने की रोशनी देने का प्रयास किया हो, जीवन को स्वर्ग जैसा सुखी, सफल और मधुर बनाने का लोगों में जज्बा जगाया हो, लेकिन अपने माता-पिता के प्रति हमने सदा श्रवणकुमार की भूमिका ही अदा की है। हमें सुकून है कि हम जीवन भर अपने माता-पिता के काम आए, उनके सुख, समाधि और साधना में हम हर रूप में सहयोगी बने।

हमारी माँ हम बच्चों से बेहद प्यार करती थीं। होली-दिवाली-राखी पर उन्हें उनके भाइयों के द्वारा जो कुछ मिलता था, वह सब हम बच्चों के लाड-दुलार में ही खर्च करती। मुझे स्कूल जाते वक्ïत टॉफी-चॉकलेट खाने के लिए हर रोज जो पाँच-दस पैसे दिये जाते थे, वो आज भी मेरे जेहन में है। मैं अपनी माँ की कुर्बानियों की सौ से ज्यादा घटनाएँ बता सकता हूँ।



गुरुदेव श्री

ममतामयी माँ चारित्रशील साध्वी : घटना प्रसंग


माताजी महाराज के पीहर में उनकी मम्मीजी की बरसी का कार्यक्रम था। पूरा परिवार इकट्ठा हुआ था। सबके लिए कड़ाही में खीर बन रही थी। उस समय गुरुदेव श्री चन्द्रप्रभजी मात्र डेढ़-दो साल के थे। अचानक कड़ाही के नीचे रखी एक ईंट खिसकी कि कड़ाही का संतुलन बिगड़ गया और सारी खीर उछल पड़ी। पास में ही खेल रहे चन्द्रप्रभजी पर वह गर्मागर्म खीर आकर गिर पड़ी। उनकी छाती और पेट के पूरे भाग पर फफोले ही फफोले हो गए। उन्हें हॉस्पिटल ले जाया गया। डॉक्टर ने इलाज किया। उस समय सुविधाएँ न के बराबर थीं, डॉक्टर ने माताजी महाराज से कहा - अगर इनमें से एक भी फफोला फूट गया तो जि़ंदगी भर के लिए दाग रह जाएगा, इसलिए आप बच्चे का पूरा ध्यान रखना ताकि यह एक बार भी उल्टी करवट न ले ले।

भोजन-पानी-नींद-आराम इत्यादि सारी चिंताएँ छोड़ कर माताजी महाराज ने दो साल तक लगातार चन्द्रप्रभजी का ध्यान रखा, फिर भी कुछ फफोले...! जब गुरुदेवश्री ने यह घटना सुनाई तो हम सब सुनकर दंग रह गए कि एक माँ का बच्चे के प्रति इतना अद्भुत त्याग!

एक प्रसंग के दौरान गुरुदेव श्री चन्द्रप्रभ जी ने बताया कि एक बार माताजी महाराज रोते हुए मेरे पास आए और मुझसे क्षमा माँगने लगे। यह देख कर मैं असहज हो गया और मैंने पूछा - माँ, आपको क्या हुआ और किस बात की क्षमा? माँ ने कहा - बेटा, मैंने प्रयास तो खूब किया, लेकिन फिर भी कुछ फफोले फूट गए और तेरी छाती पर हमेशा के लिए निशान रह गए। मुझे माफ कर देना कि मैं तुझे पूरी तरह बेदाग नहीं रख पाई। यह सुनना था कि चन्द्रप्रभजी की आँखों में आँसू आ गए। चन्द्रप्रभजी ने कहा - माँ, मैं धन्य हुआ आप जैसी माँ पाकर। जब यह घटना हमने सुनी तब हमें पता चला कि किसे कहते हैं माँ की ममता।

गृहस्थ जीवन में माताजी महाराज के तीन देवरानी, तीन जेठानियाँ थीं और सभी के मिलाकर कुल पन्द्रह-बीस बच्चे। पूरा परिवार एक साथ रहता था। एक बार मैंने उनसे पूछा - जब आप गृहस्थ-जीवन में थे, तब आप को कभी जोर से गुस्सा आया? माताजी महाराज ने कहा - कभी नहीं? मैंने पूछा - इतना बड़ा परिवार! कभी बड़ों ने आपको डाँट भी लगाई होगी तो बच्ïचों ने कभी गलतियाँ और बदमासियाँ भी की होंगी, फिर ऐसा कैसे हो सकता है? पते की बात बताते हुए माताजी महाराज ने कहा कि जब भी मुझे बड़े डाँट लगाते तो मैं यह सोचती कि अब भला बड़े नहीं कहेंगे तो कौन कहेगा और जब भी छोटों से गलती होती तो मैं यह सोचती कि बच्चे छोटे हैं अब भला बच्चों से गलतियाँ नहीं होंगी तो किससे होंगी। बस इसी मंत्र ने गुस्से को जीतने में मेरी मदद की।

एक बार मैंने माताजी महाराज से पूछा - आप में दीक्षा लेने की भावना कैसे जागृत हुई? माताजी महाराज ने कहा - मेरे पतिदेव श्री मिलापचंद जी की 52 वर्ष की उम्र में अचानक यह भावना प्रबल हो गई कि मैं संत-जीवन स्वीकार करूँगा। जब मैंने यह सुना तो मुझे जोर की हँसी आई कि आप और दीक्षा लेंगे! चार दिन भी टिक नहीं पाएँगे। मैं जानती हूँ ना कि आपका नेचर कैसा है?

पतिदेव धुन के धनी निकले और दीक्षा लेने के लिए प.पू. विमलसागर जी महाराज के पास बाड़मेर पहुँच गए। दीक्षा की तिथि निश्चित हो गई। मैं उन्हें पुन: समझाने के लिए बाड़मेर पहुँची। उन पर तो मेरा रंग नहीं चढ़ा, पर मुझ पर उनका रंग चढ़ आया। मेरी भावना देख पतिदेव ने मुझे समझाया - आप घर चले जाओ, दीक्षा लेना कोई हँसी-खेल नहीं है। पैदल विहार करना होगा, बालों का लोच करवाना होगा, घर-घर से गौचरी लानी होगी। क्या तुम इस उम्र में यह सब कर पाओगी?

माताजी महाराज ने उनसे कहा - मुझे सब मंजूर है, जब गृहस्थ-जीवन साथ-साथ जिया है तो संत-जीवन में भी मैं आपके पदचिह्नों का अनुसरण करूँगी।

इस तरह किसी राजुल ने नेमिनाथ के पदचिह्नों का अनुसरण कर फिर से इतिहास को संजीवित कर डाला और बाड़मेर के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ जब एक ही परिवार से पति-पत्नी और पुत्र के रूप में तीन दीक्षाएँ एक साथ सम्पन्न हुईं।

माताजी महाराज ने 48 वर्ष की उम्र में प्रवर्तिनी साध्वी श्री विचक्षण श्री जी महाराज के पास साध्वी-जीवन स्वीकार किया था। गुरुवर्या ने उन्हें पहली प्रेरणा दी कि आप साधु पंच प्रतिक्रमण सूत्र याद कर लें। माताजी महाराज ने कहा - जैसी आपकी आज्ञा। उन्हें सूत्र-पाठ लेने व सुनाने के लिए साध्वीजी निपुणाश्री जी महाराज के पास भेजा गया। वे हमेशा उनसे कुछ सूत्र-पाठ लेते और शाम को वापस सुना देते। साध्वीजी ने गुरुवर्या से कहा कि साध्वी जितयशाजी में प्रतिक्रमण-पाठ याद करने की ललक गजब की है। इस उम्र में भी उन्होंने मात्र तीन महिने में सम्पूर्ण प्रतिक्रमण-पाठ याद कर सुना दिया है।

दीक्षा के 5-6 वर्ष बाद माताजी महाराज के घुटनों ने जवाब दे दिया। उनके घुटनों में बहुत ज़्यादा दर्द रहने लगा। उन्हें उठने, बैठने, चलन-फिरने में बड़ी दिक्कत होती। अंतत: उनके घुटनों का ऑपरेशन करवाया गया।

माताजी महाराज का ऑपरेशन करने वाले डॉक्टर प्रकाश बांगानी ने माताजी महाराज से साफ तौर पर कह दिया कि अब आप कभी नीचे नहीं बैठ पाएँगे और न ही कभी घुटनों को मोड़ पाएँगे। माताजी महाराज को बड़ी साध्वियों के सामने ऊपर बैठना अच्छा नहीं लगता था। उन्होंने संकल्प ले लिया कि जो भी हो मैं गुरुबहनों के सामने पट्टे पर नहीं बैठूँगी। मेरे लिए बड़ों के प्रति विनम्रता रखना पहले है और घुटनों की हिफाजत करना बाद में। सबके मना करने के बावजूद वे धड़ाम से नीचे बैठ जाते, थोड़े-थोड़े घुटने भी मोड़ लेते। कुछ समय बाद परिणाम ये आया कि जिन डॉक्टरों ने उन्हें नीचे बैठने के लिए सख्त मना किया था, वे भी यह देखकर आश्चर्य चकित रह गए कि माताजी महाराज आराम से घुटने मोड़कर नीचे बैठ जाते हैं। डॉक्टर बांगानी को भी कहना पड़ा - मैंने अपनी जि़ंदगी में पहले ऐसे पेशेंट को देखा है जिसके घुटनों का ऑपरेशन होने के बावजूद वह आराम से नीचे बैठ सकता है। यह था माताजी महाराज के मजबूत मन का संकल्प और विनम्रता का संस्कार।

माताजी महाराज के घुटनों का ऑपरेशन इंदौर में हुआ था। ऑपरेशन के बाद वे लगभग दो वर्ष तक जैन दादाबाड़ी में रहे। काफी समय रहने की वजह से अनेक गुरुभक्त भाई-बहनों ने उनकी तबियत से सेवा संभाली। जिन्हें निकटता से माताजी महाराज के पास रहने का अवसर मिला उनमें सुश्री विजयलक्ष्मीजी जैन, श्रीमती कुसुमजी जैन, श्रीमती लताजी भंडारी, श्रीमती आशाजी कोठारी, श्रीमती रेणुकाजी जैन, श्रीमती मंजूजी जैन आदि की सेवाएँ विशेष रूप से अनुमोदनीय रहीं।

लगभग दस वर्ष बाद इंदौर से एक परिवार माताजी महाराज व गुरुदेवश्री के दर्शनार्थ संबोधि धाम जोधपुर आया। उन्होंने माताजी महाराज के दर्शन किए और एक सज्जन ने जब उन्हें पानी पीते हुए देखा तो आश्चर्यचकित रह गया। कारण था दस साल पहले इंदौर में जिस गिलास में उन्हें पानी पीते हुए देखा था वे आज भी उसी गिलास से पानी पी रहे थे। उन्होंने माताजी महाराज से पूछा - आपकी ये गिलास आज भी चल रही है? माताजी महाराज ने कहा - इस गिलास को 10 नहीं, 22 साल हो चुके हैं। यह सुन सबके मुँह से निकला - क्या? 22 साल! यह थी माताजी महाराज की वस्तुओं को सार-संभाल कर रखने के प्रति जागरूकता।

4 अप्रेल, 2014 का दिन। सुबह के 6 बजे की बात। माताजी महाराज हमेशा की भाँति 4 बजे जगे। निवृत्त हुए। धर्म-आराधना, माला, मंत्र-पाठ सब किया। चूँकि पिछले दो दिनों से उन्हें साँस लेने में दिक्कत हो रही थीं, परिणाम स्वरूप तन में दुर्बलता बढ़ चुकी थी। माताजी महाराज ने गुरुदेव ललितप्रभ जी को संकेत दिया। गुरुदेवश्री ने उन्हें प्रतिक्रमण करवाया। माताजी महाराज ने लेटे-लेटे पूरी जागरूकता और आत्म-भावे प्रतिक्रमण किया। सिद्धाचल गिरी विमलाचल गिरी भेट्यारे धन्य भाग्य हमारा... भजन गुनगुनाया। थोड़ी देर बाद उन्हें बेचैनी थोड़ी ज़्यादा महसूस होने लगी, पूरा शरीर पसीने से तरबतर हो गया। तब तक सूर्योदय हो चुका था। आरदणीय बहिन योगिताजी ने माताजी महाराज से निवेदन किया - दवाइयों की वजह से आपके शरीर में गर्मी बहुत ज़्यादा बढ़ गई है, आप पानी पी लीजिए।

माताजी महाराज ने कहा - अभी नवकारसी (सूर्योदय के 48 मिनट बाद भोजन-पानी लेने का व्रत) कहाँ आई है? योगिताजी ने - सूर्योदय तो हो गया है। अब आप पानी तो ले ही सकते हैं। पानी पीने से शरीर में थोड़ी राहत आ जाएगी। माताजी महाराज ने कहा - मेरे लिए नवकारसी का व्रत पहले है और देह-रक्षा बाद में। माताजी महाराज अंत तक अपने व्रत पर अडिग रहे और इसी त्याग-भाव में अपनी पार्थिव देह का सदा-सदा के लिए त्याग कर दिया।

श्रीमती सीतादेवी चौहान माताजी महाराज की खूब सेवा संभालती थीं। एक दिन उन्होंने माताजी महाराज से घर पधारने का आग्रह किया। माताजी महाराज उनके घर पधारे, दो दिन रहे। जाते-जाते उन्होंने सीताजी के पति हनुमानप्रसादजी चौहान से कहा - मुझे गुरु-दक्षिणा में क्या दोगे? उन्होंने कहा - जो आप आज्ञा दें। माताजी महाराज ने उनसे कहा - क्या आप कोई नशा करते हैं? उन्होंने कहा - नशा तो नहीं करता, पर नशे के नाम पर चाय का सेवन जरूर करता हूँ। माताजी महाराज ने प्रेरणा दी कि आज से चाय का भी त्याग कर दीजिए।

हनुमान जी बताते हैं - माताजी की प्रेरणा ऐसी काम कर गई कि मैं जिस चाय को चाहते हुए भी छोड़ नहीं पा रहा था वह भी छूट गई और उस बात को आज दस साल हो चुके हैं, मैं आज भी अपने संकल्प पर मजबूत हूँ। चाय के बहाने मुझे माताजी महाराज सदा याद रहेंगे।

शमाताजी महाराज के तन में कुछ बीमारियों ने डेरा डाल रखा था। डायबिटिज, ब्लडप्रेशर, पाँवों में झनझनाहट, आँखों में धुँधलापन! फिर भी माताजी महाराज ठहरे धुन के धनी। पूरी तरह से सक्रिय जीवन। अपना हर काम अपने खुद के हाथों से करना। मैं तब-तब आश्ïचर्यचकित रह जाता जब-जब इस स्थिति में भी उन्हें संबोधि धाम की 70 फुट ऊँची पहाड़ी पर बने अष्टापद मंदिर के दर्शन करने जाते हुए देखता।

एक बार मैंने माताजी महाराज से पूछा - आपके तन में इतनी कमजोरी है, फिर आप इतना ऊपर क्यों चढ़ते हैं? माताजी महाराज ने छूटते ही कहा - बीमारी तन में है तो क्या हुआ मन में थोड़े ही है। अपने मजबूत मन के चलते न केवल इतने ऊँचे बने मंदिर में रोज जाते, बल्कि अष्टमी-चतुर्दशी को एकासन भी अनिवार्य रूप से करते।

माताजी महाराज सन् 2002 से संबोधि धाम की शोभा बढ़ा रहे थे। शारीरिक अनुकूलता न होने के कारण उनके लिए पैदल विहार कर पाना संभव नहीं था। वे अन्यत्र जाना बहुत कम पसंद किया करते थे। उनकी अंतिम इच्छा थी कि उनके प्राण संबोधि धाम की तीर्थभूमि में ही निकले। जब-जब भी वे अस्वस्थ होते तो मजबूरीवश उन्हें डॉक्टरों को दिखाने के लिए गाड़ी में ले जाना पड़ता। गाड़ी में जाना उन्हें बिल्कुल भी पसंद नहीं था।

अंतिम दिन की बात। जब उनके शरीर में बेचैनी ज़्यादा बढ़ गई तो हम उन्हें हॉस्पिटल चेक करवाने के लिए ले जाने की तैयारी करने लगे। उन्होंने मना कर दिया था कि मुझे हॉस्पिटल मत ले जाना। मैं इसी भूमि में अपना प्राणों का विसर्जन करना चाहती हूँ, पर हमारा मन न माना। हमें लगा कि डॉक्टर को बताकर अभी वापस आ जाएँगे, पर हमें क्या पता था...। जैसे ही उन्हें गाड़ी में बिठाया गया कि उन्होंने इतना ही कहा कि जीव अकेला आता है और अकेला जाता है और अब मैं भी अकेली ही जा रही हूँ। यह कहते हुए वे एकत्व-बोध में लीन हो गईं। उन्होंने बीच आँगन से ले जाते समय दूर से ही आदिनाथ भगवान के मंदिर को देखकर प्राणाम किया और णमो अरिहंताणं, णमो अरिहंताणं कहते हुए मौन हो गए।

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