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श्री ललितप्रभ सागर जी म.

जन्म - संवत 2022, पौष सुदी दसम, 2 जनवरी 1966

मातृभूमि - बीकानेर (राजस्थान) , माता-पिता - श्रीमती जेठी देवी, श्री मिलापचंद जी दफ्तरी, दीक्षा - संवत 2035, जेठ सुदी एकादशी, 17 जून 1978 बाड़मेर (राजस्थान) गुरु - आचार्य प्रवर श्री जिन कांतिसागर सूरि जी महाराज , दीक्षा का कारण - पिताजी-माताजी की दीक्षा की भावना से प्रेरित होकर एवं उनकी सेवा के लिए उनके साथ दीक्षा लेना, परम्परा - श्वेताम्बर मूर्तिपूजक का खरतरगच्छ आम्नाय, अध्ययन - अहमदाबाद, दिल्ली, पाश्र्वनाथ शोध संस्थान,बनारस, भाषा-ज्ञान - संस्कृत, प्राकृत, हिन्दी, प्राचीन राजस्थानी, गुजराती, अंग्रेजी,प्राचीन लिपी आदि, अनुसंधान - आगम, वेद, दर्शन, इतिहास, मनोविज्ञान, काव्यशास्त्र, पिटक, उपनिषद्, विधि-विधान, व्याकरण शास्त्र, मार्गदर्शन - डॉ. सागरमल जैन, प्रो. भगवानदास जैन, डॉ. ओमप्रकाश शास्त्री, डॉ. छगनलाल शास्त्री, आचार्य विश्वनाथ द्विवेदी, श्री भँवरलाल नाहटा, प्रो. श्री नारायण मिश्र आदि, शोध-प्रबंध - उपाध्याय देवचन्द्र : व्यक्तित्व एवं कृतित्व, साहित्य सर्जन -चिंतन एवं दर्शन पर अनेक पुस्तकों का लेखन, लेखन- धर्म, शिक्षा, नारी, अध्यात्म, ध्यानयोग, व्यक्तित्व-निर्माण, परिवार, स्वास्थ्य, मानवीय एकता, प्रेम, विश्वशांति, राष्ट्र-निर्माण पर अब तक अनेक पुस्तकें प्रकाशित।

स्थापना- सम्मेतशिखर महातीर्थ में भव्य जैन म्यूजियम, जोधपुर में साधना तीर्थ संबोधि धाम, श्री जितयशा फाउंडेशन।

वीसीडी - विविध विषयों पर लगभग 1000 से अधिक प्रवचन।

पदयात्रा - गुजरात, महाराष्ट्र,कर्नाटक,तमिलनाडू,आंध्रप्रदेश,पश्चिम बंगाल बिहार, उत्तरप्रदेश, उत्तरांचल, राजस्थान, मध्यप्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, झारखंड में लगभग तीस हजार किलोमीटर।

चातुर्मास - 1978 में नागौर, 1979 में जोधपुर, 1980 में पालीताणा, 1981 में अहमदाबाद, 1982 में दिल्ली,1983 व 1984 में वाराणसी,1985 में कलकत्ता, 1986 व 1987 में मद्रास, 1988 में पूना, 1989 में उदयपुर, 1990 में जोधपुर, 1991 में ऋषिकेश, 1992 में आगरा, 1993 में इंदौर, 1994,1995 व 1996 में जोधपुर, 1997 में बीकानेर, 1998 में नागौर, 1999 में जयपुर, 2000 में अजमेर, 2001 में श्री नाकोड़ा तीर्थ, 2002 में नीमच, 2003 में जयपुर, 2004 में भीलवाड़ा, 2005 में बाड़मेर, 2006 में जोधपुर, 2007 में भीलवाड़ा, 2008 में जोधपुर, 2009 में इंदौर, 2010 में अजमेर, 2011 में उदयपुर, 2012 में जोधपुर, 2013 में जयपुर, 2014 में इंदौर, 2015 में भीलवाड़ा ।

धरती के अद्भुत और अनूठे प्रवचनकार राष्ट्र-संत श्री ललितप्रभ सागर जी


महोपाध्याय श्री ललितप्रभ सागर जी धरती के वे अद्भुत और अनूठे संत हैं जिन्होंने अपने जीवन और जादुई प्रवचनों से जन-जन के हृदय को चमत्कृत किया है। उनके जीवन की सरसता और सरलता दिल को छू लेने वाली है। उनका कुछ पल का सान्निध्य व्यक्ति को प्राणवंत कर देता है। उनके वचनों में ऐसी रसमयता होती है कि चाहे बच्चा हो या बड़ा, प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाता। उनके साहित्य को पढ़ते हुए पाठक उसमें ऐसा डूब जाता है जैसे वह गंगा में डूबकी लगा रहा हो। उनके अमृत प्रवचनों को सुनते हुए ऐसा लगता है मानो ग्रीष्म ऋतु में झुलसे तन-मन पर अमृत की बौछारें गिर रही हों।

अपने प्रभावी व्यक्तित्व और विशिष्ट प्रवचन-शैली के लिए देशभर में लोकप्रिय संत श्री ललितप्रभ जी जहाँ भी जनमानस को संबोधित करते हैं वहाँ की आबोहवा ही बदल-सी जाती है। लोग जात-पांत, पंथ-परम्पराओं के गलियारों से बाहर निकलकर ऐसे खींचे चले आते हैं जैसे कोई दिल के तार छेड़ रहा हो। वे सीधे दिल से बोलते हैं और बात सीधी दिल में उतर जाती है। देश के लगभग हर बड़े शहर में संतप्रवर की विराट प्रवचनमालाएँ हुई हैं जिसमें हर रोज बीस-पच्चीस हजार लोगों की उपस्थिति देखी गई है।वे कहते हैं, श्उपाश्रय, स्थानक, सत्संग-भवन एवं धर्मस्थानों में केवल पुरानी पीढ़ी के लोग आते हैं। हम सार्वजनिक मैदानों में प्रवचन इसीलिए देते हैं ताकि आम व्यक्ति लाभान्वित हो सके और सीधे जीवंत धर्म से जुड़ सके।्य मात्र पाँच दिनों में उनकी वाणी का जादुई असर ऐसे फैलता है कि बड़े से बड़ा पांडाल भी छोटा पड़ जाता है। चातुर्मासों में तो ऐसे दृश्य देखने को मिलते हैं कि चाहे तेज धूप हो या मुसलाधार बारिश, जनता उनके सत्संग एवं प्रवचनों को सुनने के लिए बेताब रहती है। घर-घर और व्यक्ति-व्यक्ति के मुँह पर प्रवचनों की ही चर्चा होती है, यहाँ तक कि श्मशान में किसी का दाह-संस्कार हो तब भी वहाँ पर एक ही जिक्र चलता है कि आज महाराजश्री ने यह कहा। श्री ललितप्रभ जी के प्रवचनों में जिस तरह से हजारों-हजार युवक-युवतियाँ उमड़ती हैं उससे यह सिद्ध होता है कि उनकी बातें आज के युग के अनुरूप और आम आदमी की जिंदगी के बेहद करीब हैं। प्रवचनों में चाहे नेता आए या अभिनेता, उद्योगपति आए चाहे बड़ी संस्थाओं के अध्यक्ष, वे समय के बड़े पाबंद रहते हैं। यही कारण है कि उस समय गलियाँ ऐसे सुनसान हो जाती हैं जैसे कभी रामायण के धारावाहिक के समय हुआ करती थीं। उनके प्रवचनों में जैन, हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई सभी आते हैं। उनका यह कमाल है कि जैनी मिलकर जन्माष्टमी पर्व मनाते हैं और हिन्दू मिलकर पर्युषण पर्व। उनकी प्रेरणा से अब तक लाखों जैनी गायत्री मंत्र सीख चुके हैं और लाखों हिन्दू नवकार मंत्र। संतप्रवर का मानना है, श्हमने पिछले पच्चीस सौ सालों तक मंदिर-मस्जिद, पंथ-ग्रंथ, मूर्ति-मुँहपत्ति, वस्त्र-शास्त्र के नाम पर लड़-लड़कर खोया ही खोया है, अब हम केवल पच्चीस सालों के लिए इन सब भेदभावों को भुलाकर एक हो जाएँ तो धर्म दुनिया के लिए सबसे बड़ा वरदान साबित हो सकता है।्य उनसे प्रेरित होकर हजारों लोग मांसाहार और दुव्र्यसनों का त्याग कर चुके हैं जो कि अपने आप में बहुत बड़ी उपलब्धि है। इससे बढ़कर क्या आश्चर्य होगा कि कई शहरों में उनके प्रवचन मुस्लिम भाइयों की ओर से आयोजित हो चुके हैं।

संत श्री ललितप्रभ जी जीवन-निर्माण, व्यक्तित्व-विकास, केरियर-निर्माण, स्वास्थ्य, पारिवारिक प्रेम, सामाजिक समरसता, नैतिक मूल्य, योग, ध्यान और अध्यात्म से जुड़े हर विषय पर बेहतरीन प्रवचन देते हैं। जब उनके जीवन-निर्माण, व्यक्तित्व-विकास और पारिवारिक प्रेम से जुड़े विषयों पर प्रवचन होते हैं तो विशेषकर युवा पीढ़ी सकारात्मक ऊर्जा और आत्मविश्ड्ढवास से भर उठती है, रिश्तों में आई दरारें दूर हो जाती हैं, परिवारों में खुशियाँ बढ़ जाती हैं, लोग अपने माता-पिता, बड़े-बुजुर्गों की सेवा के प्रति जागरूक हो जाते हैं और प्रत्येक व्यक्ति के जीवन जीने का स्तर कई गुना निखर जाता है। वे युवाओं से कहते हैं, जीवन में विपत्ति आए तो आपत्ति मत कीजिए। दूध फटने पर वे ही लोग उदास होते हैं, जिन्हें रसगुल्ला बनाना नहीं आता।

श्री ललितप्रभ जी के द्वारा सभी धर्मों के अमृत संदेशों पर दिए गए प्रवचनों से तो देश भर में सर्वधर्म समन्वय का अद्भुत वातावरण निर्मित हुआ है, साम्प्रदायिक संकीर्णताएँ कम हुई हैं, लोग सभी धर्मों और सभी महापुरुषों के प्रति गुणानुरागी बने हैं। उनकी साम्प्रदायिक कट्टरता को हिलाने वाली यह बात जन-जन में समादृत हुई है कि पंथ-सम्प्रदायों की संकीर्णता तो देखो कि आज अमुक गली से रामनवमी पर राम की शोभायात्रा नहीं गुजर सकती तो अमुक गली से मोहर्रम पर ताजिया नहीं गुजर सकता, पर हमारी यह विडंबना ही है कि उन दोनों गलियों से कचरे से भरा नगरपालिका का ट्रेक्टर तो आराम से गुजर जाता है, जिस पर हमें किंचित भी आपत्ति नहीं होती। हम धर्म के नाम पर नफरत घोलने की बजाय प्रेम घोलें क्योंकि प्रेम ही परमात्मा की सच्ची इबादत है। बौद्ध धर्म के गुरु दलाई लामा भी संतप्रवर के धार्मिक सद्भाव से बेहद प्रभावित हुए हैं।

संत श्री ललितप्रभ जी लोगों को धर्म और अध्यात्म की पुरातन या परंपरागत समझ देने की बजाय प्रेक्टिकल समझ देते हैं। उनका कहना है, मंदिर बनाना हिन्दुओं का, मस्जिद बनाना मुसलमानों का, गुरुद्वारा बनाना सिखों का और चर्च बनाना ईसाइयों का धर्म है, पर अपने जरूरतमंद भाई को सहयोग कर ऊपर उठाना मानवता का धर्म है।

संतप्रवर राष्ट्र से भी अगाध प्रेम रखते हैं। उन्होंने आम जनमानस में राष्ट्रीय चेतना का भी शंखनाद किया है। देश की हकीकत बयां करते हुए उन्होंने कहा है, जब सबने मिलकर देश-हित के बारे में सोचा तो हमें आजादी मिली, पर जब से हम खुद के बारे में सोचने लगे हैं तब से हमारे हाथ में केवल देश की बर्बादी आ रही है। हम संकल्प लें कि हम अपने देश और नैतिक मूल्यों के साथ कभी धोखा नहीं करेंगे। आपने अगर दूसरे को धोखा दिया तो एक को धोखा देने का पाप लगेगा, पर अपने देश को धोखा दिया तो सवा सौ करोड़ लोगों को धोखा देने का पाप लगेगा। वे स्वयं कर्मयोगी हैं और लोगों को अपने पुरुषार्थ पर विश्वास करने का पाठ पढ़ाते हैं। उनका कहना है, मांगकर दूध पीने की बजाय मेहनत का पानी पीना कहीं ज्यादा श्रेष्ठ है। संतप्रवर की प्रेरणाओं से राष्ट्रीय आपदाओं में भी समय-समय पर अथक सहयोग पहुँचाया गया। वास्तव में आपका राष्ट्रीय समर्पण सभी संतों के लिए अनुकरणीय आदर्श है।

मदर टेरेसा द्वारा की गई मानव-सेवा से प्रभावित होकर पूज्य संत श्री ललितप्रभ जी ने मानव कल्याण के अनेक कार्य सम्पादित किए। संत श्री ललितप्रभ जी के मार्गदर्शन में ऐसी पच्चीसों संस्थाओं का गठन हुआ है जो कि आज सत् साहित्य, कला, संस्कार, संस्कृति, स्वास्थ्य, मानव-सेवा, जीव रक्षा जैसे क्षेत्रों में योगदान देकर धर्म, समाज एवं राष्ट्र का गौरव बढ़ा रही हैं।

श्री ललितप्रभ जी की प्रेरणा से जोधपुर में निर्मित अंतरराष्टीय साधना केन्द्र संबोधि धाम आज सत्संग एवं साधना का पवित्र तीर्थ बन चुका है। वहाँ प्रतिवर्ष कई ध्यानयोग शिविर आयोजित होते हैं। इन शिविरों में अब तक लगभग हजारों भाई-बहिन जीवन का कायाकल्प कर चुके हैं। संबोधि साधना का रहस्य बताते हुए संतप्रवर कहते हैं, संबोधि साधना आँख बंद करके नहीं, आँख खोल कर जीना सीखाती है। जैसे महिला पापड़ सेकते हुए जितनी जागरूक रहती है ठीक वैसे ही जीवन की हर छोटी से छोटी गतिविधि को भी पूर्ण होश और बोध के साथ संपन्न करना संबोधि साधना की मूलभूत सिखावन है।

संत श्री ललितप्रभ जी राष्ट्रीय उन्नयन, मानवीय-सेवा, सद्विचारों के प्रचार-प्रसार के लिए अहर्निश प्रयासरत हैं। उनका एक ही सपना है रू हर इंसान हँसता-मुस्कुराता बुद्ध पुरुष बने। वे समृद्ध एवं संबुद्ध विश्व के निर्माण में अपनी जो अप्रतिम सेवाएँ समर्पित कर रहे हैं वे लोगों को सत्कार्यों के लिए सदा आत्मप्रेरित करती रहेंगी। सार रूप में कहा जाए तो मानव-जाति के लिए उनका होना ठीक वैसा ही है जैसे कि अंधकार को दूर करने वाला प्रकाशवाही चिराग। निश्चय ही, वे राष्ट्र-संत हैं, समाज के सजग प्रहरी हैं, धर्म-पथ को युग के अनुरूप प्रकाशित करने वाले धु्रव नक्षत्र हैं। उनकी पचासों पुस्तकें और हजारों प्रवचन वीसीडीज देश-विदेश में प्रेम से पढ़ी-सुनी जाती हैं।


प्रेम और ज्ञान के महासागर पूज्य श्री ललितप्रभ सागर


लोकप्रिय राष्ट्र-संत महोपाध्याय श्री ललितप्रभ सागर जी म. का प्रेम और ज्ञान के महासागर है। पूज्य श्री ललितप्रभ जी का सौम्य व्यवहार और मधुर वाणी किसी को भी बरबस अपनी ओर खींच लेने में समर्थ है। कहने को तो वे जैन संत हैं, मगर वास्तव में वे एक लोकप्रिय जन-संत हैं। उन्होंने अपने धाराप्रवाह प्रवचनों एवं साहित्य-लेखन के द्वारा पूरे देश में अपनी खास पहचान बनाई है। देश के बड़े से बड़े संत अपने प्रवचनों में पूज्य श्री ललितप्रभ जी के अमृत वचनों, संदर्भों और उदाहरणों को समाहित करते हैं। आज वे देश के एक सर्व समादृत राष्ट्र-संत के रूप में प्रतिष्ठित हैं।

पूज्य श्री ललितप्रभ जी ने जन-जन में पारिवारिक प्रेम की रसधार बहाई है, सामाजिक समरसता का वातावरण तैयार किया है, जैन एकता के मामले में वे मील के पत्थर और प्रकाश-स्तम्भ साबित हुए हैं। हजारों टूटे हुए परिवारों को उन्होंने आपस में जोड़ा है, हजारों लोगों को मांसाहार और दुव्र्यसनों का त्याग करवाया है। एक सच्चे संत की तरह उन्होंने हमेशा समाज में प्रेम, शांति और भाईचारे के ही बीज बोए हैं।

पूज्यश्री से मिलना अपने आप में सुखद अनुभव है। उनसे किसी भी विषय पर सार्थक वार्ता की जा सकती है। उनका मानना है कि संत आत्म-कल्याण के साथ-साथ विश्ïव-कल्याण के लिए भी अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

हिमालय की पदयात्रा सहित देशभर में करीब पïचीस ह$जार किलोमीटर की पदयात्रा करने वाले श्री ललितप्रभ जी का जन्म पौष शुक्ïला दशमी वि.सं. 2022 अर्थात 2 जनवरी 1966 को बीकानेर में हुआ। उन्होंने मात्र बारह वर्ष की उम्र ही अपने पूज्य माताजी एवं पिताजी के साथ मुनि जीवन स्वीकार किया। देश के महान दार्शनिक एवं विश्व के महान चिंतक पूज्य श्री चन्द्रप्रभ जी आपके ही अग्रज भाई हैं।

पूज्य श्री ललितप्रभ जी मानवतावादी सिद्धांतों में विश्वास रखते हैं। वे अपनी धर्म-परम्परा का सम्मान करते हैं पर अन्य धर्म-परम्पराओं के प्रति उनका उदारवादी नजरिया उन्हें एक सच्चा अनेकांतवादी सिद्ध करता है। सबसे प्रेम करना, सबको सम्मान देना और सबको साथ लेकर चलना उनके जीवन का पहला उसूल है।

कई टी.वी. चैनल्स पर उनके प्रवचन प्रसारित होते हैं और हजारों तरह के प्रवचन कैसेट्ïस देशभर में सुने जा रहे हैं। वे प्रवचनों में जहाँ धर्म-अध्यात्म को पुनर्जीवित करते हैं, वहीं सकारात्मक सोच, सफलता के मापदंड और पारिवारिक प्रेम का रास्ता भी प्रभावी ढंग से सुझाते हैं। उनके प्रवचनों से श्रोताओं को अद्ïभुत मानसिक शांति की अनुभूति होती है। हँसते-हँसाते उनके प्रवचन इतने सरल तरीके से लोगों के ज़ेहन में उतर जाते हैं मानो जीवन का ज्ञान देने के लिए कोई लाफिंग बुद्धा धरती पर अवतरित हुआ हो।




गुरुदेव श्री

श्री ललितप्रभ जी के 52 अमृत वचन


  •  ईश्वर पर सदा भरोसा रखिए, वह निन्यानवे द्वार बंद कर देता है, पर भाग्य का एक द्वार फिर भी खुला रखता है।
  •  घर में कोई बूढ़ा है तो उसे भार की बज़ाय भाग्य मानिए। बूढ़ा पेड़ फल नहीं देता, पर छाया तो देता ही है।
  •  जब हम औरों के काम आते हैं तो ईश्वर के काफी करीब होते हैं।
  •  आप जीवन में इतनी ऊँचाइयाँ अवश्य छू लें कि लोग आपके माता-पिता से पूछें कि आपने ऐसे क्या पुण्य किए जो ऐसी अच्छी संतान हुई।
  •  स्वर्ग भले ही आसमान में हो, पर उसका सुकून माँ के चरणों में ही है।
  •  सुबह जल्दी जगने की आदत डालिए, ताकि आप केवल डूबता हुआ सूरज ही नहीं, भाग्य के उगते हुए सूरज को भी देख सकें।
  •  औरों की भलाई कीजिए। भलाई का हर कदम हमें स्वर्ग के करीब ले जाता है।
  •  पत्नी गुस्से में कहे - तुम जानवर हो। आप मुस्कुराकर कहिए - तुमनेेे सच कहा, तू मेरी जान और मैं तेरा वर दोनों मिलकर बन गए जानवर। यह है तरीका, गुस्से को मिटाने का।
  •  बीते कल की चर्चा मत कीजिए और आने वाले कल की चिंता। सुखी जीवन का राज है : आज की सोचिए, आज को सँवारिए, आज को सार्थक कीजिए।
  •  ज्ञान धन से ज्य़ादा महान है। धन की हमें रक्षा करनी पड़ती है, जबकि ज्ञान हमारी रक्षा करता है। लॉटरी खुल जाए तो गरीब एक पल में अमीर हो सकता है, पर ज्ञानी होने के लिए पूरे जीवन भर श्रम करना पड़ता है।
  •  अपने घर को मंदिर जैसा पवित्र मानिए और माता-पिता को मंदिर की मूरत। संकल्प लीजिए हम उनसे कभी जुदा नहीं होंगे, अपितु उनकी सेवा को ईश्वर की पूजा मानेंगे।
  •  रिश्तों को रिसने मत दीजिए। दूब को हरा रखने के लिए पानी डालना पड़ता है और रिश्तों को मिठास भरा बनाने के लिए प्रेम समर्पित करना होता है।
  •  बच्चों को कार नहीं संस्कार दीजिए। इससे आपका गौरव बढ़ेगा और बच्चे बेहतर नागरिक बनेंगे।
  •  जिन मूर्तियों को हम बनाते हैं, हम उनकी तो पूजा करते हैं, पर जिन्होंने हमें बनाया हम उन माता-पिता की पूजा क्यों नहीं करते?
  •  बहूरानी, अपनी सासू माँ को उतने वर्ष जरूर निभा लेना जितने वर्ष का उन्होंने तुम्हें पति दिया। सास का सदा सम्मान करना क्योंकि यही वह महिला है जिसकी कोख में तुम्हारा सुहाग पला है।
  •  जहाँ केवल बीवी-बच्चे रहें वह मकान होता है, जहाँ माँ-बाप को सम्मानपूर्वक रखने की जगह हो, वह घर है। जहाँ भाई-बहिनों को भी प्रेमपूर्वक रखा जाता हो, वह परिवार है। अपने घर को मकान नहीं, परिवार बनाइए।
  •  सुबह उठकर माता-पिता को प्रणाम कीजिए, ताकि उनकी दुआओं की दौलत से दिन की शुरुआत हो। रात को सोने से पहले उनकी सेवा कीजिए ताकि अंधेरी रात में भी उनके आशीर्वाद का प्रकाश हमारे साथ हो।
  •  अगर आप एक घर में रहते हैं पर परस्पर बोलते नहीं, मुस्कुराते नहीं तो आपका घर कब्रिस्तान की तरह है। कब्रों में रहने वाले लोग भी बोलते नहीं, मुस्कुराते नहीं तो घर के कमरों में और कब्रिस्तान की कब्रों में क्या फ़ऱ्क है।
  •  मंदिर में हम आधा घंटा रहते हैं पर घर में हम 24 घंटे रहते हैं। अपने घर्म की शुरुआत घर से ही कीजिए। घर में मंदिर नहीं घर को ही मंदिर बना लीजिए।
  •  सच्चा भाई वही होता है जो दु:ख में भी भाई का साथ देता है। समाज में खड़े होकर दान बाद में दीजिए, पहले अपने जरूरतमंद सगे भाई को सहयोग दीजिए।
  •  परिवार में जब भी धन का बँटवारा हो तो अपने हिस्से में एक धन जरूर लीजिए वह है माता-पिता की सेवा। दूसरे धन तो धूप-छाँव के खेल की तरह है, पर माता-पिता की सेवा इस जन्म में भी काम आएगी और अगले जन्म में भी।
  •  ईश्वर उन्हीं का साथ देते हैं जो मजबूत संकल्प से धनी होते हैं। चट्टान मजबूत होती है, पर इसे लोहा तोड़ देता है। लोहा मजबूत होता है, पर उसे अग्नि पिघला देती है। अग्नि को पानी बुझा देता है, पर आदमी का संकल्प पानी की धार को भी मोड़ देता है।
  •  तलहटी पर भले ही खड़े रहो, पर सपने सदा शिखर के देखो। घुप्प अंधेरा है और लालटेन की रोशनी धीमी है तब भी हताश न हों । जैसे-जैसे आप आगे बढ़ेंगे, लालटेन की रोशनी भी आगे बढ़ती जाएगी।
  •  हाथ का उपयोग मेहंदी के लिए नहीं, मेहनत के लिए कीजिए। मेहंदी का रंग 7 दिन में फीका पड़ जाता है पर मेहनत का रंग जीवनभर परिणाम दिया करता है।
  •  जिंदा रहने के लिए भोजन जरूरी है। भोजन से भी ज्यादा पानी जरूरी है। पानी से ज्यादा वायु जरूरी है। वायु से ज्यादा आयु जरूरी है। पर आयु से ज्यादा आत्मविश्वास जरूरी है।
  •  कामयाबी न तो माँ के पेट से पैदा होती है, न जमीन को फाड़कर। हमारा प्रयास ही हमें परिणाम देता है। आप उन लोगों के जीवन से प्रेरणा लीजिए जो एक दिन जीरो थे, पर अपने बेहतर लक्ष्य, कार्यशैली, आत्मविश्वास और महान सोच के चलते आज दुनिया के हीरो बन गए हैं।
  •  जीवन में सफल होने के लिए उत्साह और उमंग से भरे रहिए। हर गरीब हैं या अमीर, अपने मन को मायूस मत कीजिए। कभी-कभी किस्मत हाथ भर दूरी पर होती है, पर हमारा मायूस मन उसे देख नहीं पाता।
  •  हताश मत होइये, विश्वास बढ़ाइए। भले ही 99 द्वार बंद क्यों न हो जाएँ, फिर भी 1 द्वार कहीं-न-कहीं से अवश्य खुला होगा।
  •  छूना है तो केवल आसमान छुओ। जलना है तो दीपक की तरह जलो। दूसरों से जलकर तो खुद को ही जलाओगे।
  •  दूसरों की भूलें देखने के लिए दूरबीन का उपयोग करने की बजाय अपनी भूलें देखने के लिए दर्पण का उपयोग कीजिए। दूसरों को सुधारने से पहले खुद को सुधारना अधिक बेहतर है।
  •  एक अच्छी आदत आदमी का भाग्य सुधारती है, वहीं एक बुरी आदत उसका भाग्य डुबो देती है। अच्छे परिणाम पाने के लिए अच्छे बीज बोएँ।
  •  स्टुडियो में फोटो खिंचवाते समय फोटोग्राफर कहता है - स्माइल प्लीज। सोचिए, पाँच सैकंड के लिए मुस्कुराते हैं तो फोटा सुंदर आता है। हर पल मुस्कुराएंगे तो जि़ंदगी कितनी सुंदर हो जाएगी।
  •  जीवन में विपत्ति आए तो कोई आपत्ति मत कीजिए। उसका धैर्यपूर्वक सामना कीजिए। दूध फटने पर वे ही लोग उदास होते हैं जिन्हें रसगुल्ले बनाने नहीं आते।
  •  क से किस्मत भी होती है और कर्मफूटा भी, याद रखिए कर्म फूटा भी अगर कर्मयोग करे तो अपनी किस्मत को जगा सकता है।
  •  जीवन में विपति आना 'पार्ट ऑफ लाइफ है, विपत्ति में भी मुस्कुरा कर शांति से बाहर निकलना 'आर्ट ऑफ लाइफ है।
  •  लोग कहते हैं जब कोई अपना दूर चला जाता है तो तकलीफ होती है। परंतु असली तकलीफ तब होती है जब कोई अपना पास होकर भी दूरियाँ बना लेता है।
  •  जिंदगी में सबसे सस्ती चीज है - सलाह। एक से माँगो, हजार से मिलती है, जिंदगी में सबसे महँगा है- सहयोग। हजार से माँगो, एक से मिलता है। कितना अच्छा हो हम सलाह की बजाय सहयोग देना शुरु करें।
  •  बड़ी सोच के साथ दो भाई 40 साल तक साथ रह सकते हैं वहीं छोटी सोच उन्हीं भाइयों को 40 मिनट में अलग कर सकती है। भाई के प्रति हमेशा बड़ी सोच रखिए, क्योंकि दुख-दर्द में वही आपका सबसे सच्चा मित्र साबित होगा।
  •  एक मिनट में जि़ंदगी नहीं बदलती, पर एक मिनट में सोचकर लिया गया फैसला पूरी जि़ंदगी बदल देता है।
  •  केवल किस्मत के भरोसे मत बैठे रहिये। जीवन में योग्यताओं को हासिल कीजिए। किस्मत से कागज उड़ तो सकता है, पर पतंग तो काबिलियत से ही उड़ेगी।
  •  दो अक्षर का लक, ढाई अक्षर का भाग्य, तीन अक्षर का नसीब और साढ़े तीन अक्षर का किस्मत होता है, लेकिन ये सब तभी परिणाम देते हैं जब चार अक्षर का मेहनत इनके साथ जुड़ जाए।
  •  भाग्य हाथ की रेखाओं में नहीं अपितु व्यक्ति के पुरुषार्थ में छिपा है। इस दुनिया में नसीब तो उनका भी होता है जिनके हाथ नहीं होते।
  •  हार और जीत हमारी सोच पर निर्भर है। मान लिया तो हार और ठान लिया तो जीत।
  •  लगातार मिल रही असफलताओं से निराश नहीं होना चाहिए। कभी-कभी गुच्छे की आखिरी चाबी भी ताला खोल देती है।
  •  भाग्य को हरा-भरा रखने के लिए सदा सत्कर्म का पानी डालते रहिये। आखिर हरी घास तभी तक हरी रहेगी, जब तक उसे पानी मिलता रहेगा।
  •  मंदिर बनाना हिन्दू, जैन और बौद्धों का धर्म है, मस्जिद बनाना मुसलमानों का, गिरजे बनाना ईसाइयों का धर्म है और गुरुद्वारे बनाना सिक्खों का, पर इंसान होकर इंसान के काम आना हर इंसान का धर्म है। आप हर इंसान के काम आइए, ईश्वर आपके काम सँवारेगा।
  •  जो भला करने वाले का बुरा करे वह शैतान है, जो भला करने वाले का भला करे वो इंसान है पर जो बुरा करने वाले का भी भला करे वही तो भगवान है।
  •  दो में से एक काम जरूर कीजिए - या तो सौ किताबें लिखकर जाइए, ताकि उन्हें पढ़कर लोग आपको याद कर सकें, या अपनी जिंदगी इस तरह जीकर जाइए कि आप पर सौ किताबें लिखी जा सकें।
  •  रिश्ते चाहे कितने ही बुरे हों उन्हें तोडऩा मत क्योंकि पानी चाहे कितना भी गंदा हो अगर प्यास न भी बुझा पाये पर आग तो बुझा ही सकता है।
  •  जो लोग अपने हाथों का उपयोग हाथ पर हाथ रखने के लिए करते हैं, वे हमेशा खाली हाथ ही बैठे रहते हैं। भाग्य की रेखाएँ चमकाने के लिए लक्ष्य के साथ मेहनत कीजिए, आप पाएँगे आपकी किस्मत केवल चार कदम दूर थी।
  •  पैर में मोच और दिमाग में छोटी सोच आदमी को कभी आगे नहीं बढऩे देती। कदम हमेशा सम्हलकर रखिए और सोच हमेशा ऊँची।
  •  जीवन मिलना भाग्य की बात है, मृत्यु आना समय की बात है, पर मृत्यु के बाद भी लोगों के दिलों में जीवित रहना हमारे श्रेष्ठ कर्मों की बात है।
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