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श्री जितयशा फाउंडेशन


सत्साहित्य प्रकाशन के क्षेत्र में अपनी अग्रणी भूमिका निभाने वाली श्री जितयशा फाउंडेशन की स्थापना राष्ट्र-संत श्री ललितप्रभ जी एवं राष्ट्र-संत श्री चन्द्रप्रभ जी की प्रेरणा से हुई है। यह फाउंडेशन अब तक राष्ट्र-संतों की सैकड़ों पुस्तकों का प्रकाशन कर चुका है। अल्पमोली, श्रेष्ठ तथा सुंदर साहित्य के प्रकाशन में यह संस्थान पूरे देश भर में लोकप्रिय है। संतश्री ने गीताप्रेस, गोरखपुर से प्रेरणा लेकर इस फाउंडेशन का गठन किया। जीवन-विकास, संस्कार-निर्माण, कॅरियर-निर्माण, स्वास्थ्य लाभ, पारिवारिक समन्वय, राष्ट्र-निर्माण के साथ धर्म, अध्यात्म और ध्यान योग साधना पर इस संस्थान ने बहुतेरे प्रकाशन किए हैं। हालाँकि राष्ट्र-संतों के साहित्य को देश के कई वरिष्ठ प्रकाशकों ने भी प्रकाशित किया है, तथापि उनका अधिकांश साहित्य इसी फाउंडेशन से प्रकाशित हुआ है। फाउंडेशन से प्रकाशित अल्पमोली साहित्य आमजनमानस में इतना लोकप्रिय होता है कि कोई भी पुस्तक एक वर्ष पूर्ण होने से पहले ही समाप्त हो जाती है। इण्डिया टूडे प्रकाशन समूह ने तो इस फाउंडेशन को अपने मुखपृष्ठ पर जगह दी है और इसे देश का गरिमापूर्ण प्रकाशक स्वीकार किया है।

संबोधि साधना मार्ग और व्यक्तित्व-निर्माण से जुड़े दिव्य वचनों को आम जनमानस तक पहुँचाने के लिए संबोधि टाइम्स नामक विचारप्रधान पत्रिका का प्रकाशन भी यही फाउंडेशन करता है जिसके पूरे देश में तकरीबन दो लाख पाठक हैं । देशभर में लाखों लोगों के विचारों को प्रभावित एवं प्रेरित करने वाली इस मासिक पत्रिका में श्रेष्ठ ज्ञान एवं पवित्र चिंतन को समाहित किया जाता है। जिंदगी को चार्ज करने वाली इस पत्रिका के पहले पृष्ठ पर राष्ट्र-संतों के प्रकाशित होने वाले प्रेरक वक्तव्य आम जिंदगी को नई दिशा देते हैं।

जैन म्यूजियम का निर्माण भी इसी फाउंडेशन ने करवाया जो कि पूर्वी भारत में अपने आप में अनूठा और अद्भुत है।

जैन म्यूजियम


भारतीय दर्शन में संस्कृति का हर दृष्टिकोण से महत्त्वपूर्ण स्थान है। आम जनमानस को हमारे सांस्कृतिक वैभव से परिचित करवाने के लिए राष्ट्र-संतों के निर्देशन में झारखंड के सम्मेतशिखर महातीर्थ में सर्वप्रथम भव्य जैन म्यूजियम की स्थापना हुई, जहाँ प्रतिवर्ष हजारों श्रद्धालु पहुँचकर जैन संस्कृति से रूबरू होते हैं। जैनत्व को मानवीय एवं आध्यात्मिक दृष्टि से जनमानस को परिचित कराना जैन म्यूजियम का मुख्य उद्देश्य है। म्यूजियम के बाहर भगवान महावीर की मनोरम ध्यानस्थ प्रतिमा और भगवान पाश्र्वनाथ की योगमय दिव्य प्रतिमा विराजमान है। म्यूजियम में प्रवेश करते ही तीर्थंकरों एवं आदर्श पुरुषों के प्राचीन स्वर्ण-चित्र, ताड़पत्र पर लिखित शास्त्रों के नमूने, हाथीदाँत पर नक्काशी की गई जिन प्रतिमाएँ, चंदन काष्ठ पर अंकित शिल्प वैभव, देश व विदेश द्वारा जैन धर्म पर जारी डाक टिकटों का अनोखा संकलन दर्शित होता है। सूक्ष्म लिपिपत्र एवं चित्र, चावलों के दाने पर तीर्थंकरों की छवियों का अंकन, बदाम व काजू की आकृति में जिनत्व का परिदर्शन, प्रभावी चमत्कारी यंत्र, विविध प्रकार की मालाएँ, ताम्र एवं रजत पत्रों पर भगवान ऋषभ, लक्ष्मी, सरस्वती, पद्मावती आदि की उभरती छवियों से म्यूजियम में जैन संस्कृति का दिग्दर्शन छिपा हुआ नजर आता है।

राष्ट्र-संतों की प्रेरणा से म्यूजियम में जैन तीर्थंकरों एवं महापुरुषों के जीवन से जुड़ी विभिन्न घटनाक्रमों को झाँकियों के माध्यम से संजीवित किया गया है।

श्री जितयशा फाउंडेशन की आजीवन मेम्बरशीप योजना


एक बार मात्र 4100 रुपये दीजिए और पूज्य श्री ललितप्रभ जी एवं पूज्य श्री चन्द्रप्रभ जी की घर बैठे जीवन भर किताबें व मेग्जीन मंगवाइए।

1. 35-40 किताबों का सेट तुरंत मिलेगा।

2. जिंदगी भर हर चार महिनों में एक नई पुस्तक।

3. जिंदगी भर हर महिने संबोधि टाइम्स पत्रिका।

4. 13 टेबल कैलेण्डरों का सेट।

5. 50 प्रवचनों की वीसीडी का सेट

खुद भी लाभ उठाइए और औरों को भी लाभ दिलाइए।

ड्राप्ट, चेक अथवा मनीआर्डर श्री जितयशा श्री फाउंडेशन के नाम से भेजें। सम्पर्क - 09414255471, 0291-2060352


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