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भय का भूत भगाएँ, खुद पर भरोसा जगाएँ - पूज्य श्री चन्द्रप्रभ जी


जीवन में सदा याद रखें- जो डर गया, वो मर गया। जीवन में आने वाली बाधाओं को देखकर वे ही लोग डरा करते है जिन्हे दूध फटने पर रसगुल्ला बनाना नहीं आता। अपनी बात एक घटना से प्रारंभ करूँगा। सम्राट संजय हरिणों का शिकार खेलने के लिए अपने नगर से रवाना हुए। कांपिल्य नरेश ने सारे जंगल को छान मारा, मगर उन्हें शिकार नसीब न हुआ। उनका घोड़ा सरपट दौड़ता रहा। अचानक उन्होंने केशर-उद्यान में प्रवेश किया कि उनकी नजर हरिणों के एक झुंड पर पड़ी।

घोड़े की टापों की आवाज़ सुनकर हरिणों में भगदड़ मच गई। वे भाग खड़े हुए। एक गर्भवती हिरनी तेज़ी से भागने में असमर्थ थी। वह पूरी कुलांचें नहीं भर पा रही थी। सम्राट संजय ने अपना तीर-कमान उठा लिया। तीर उसके हाथ से छूटा और सीधा गर्भवती हिरनी के पेट में जा धँसा। वह दर्द से कराह उठी, फिर भी दौड़ती रही। हिरनी आगे-आगे, सम्राट का घोड़ा पीछे-पीछे। अचानक हिरनी एक पेड़ की छाँव में पहुँची और वहाँ साधनारत संत गर्दभिल्ल के चरणों में जा गिरी। संत के चरणों में घायल हिरनी ने अंतिम साँसें लीं। संत की आँखें खुलीं, तो अपने सामने एक मृत हिरनी को पाया। तभी देखा कि कोई शिकारी सम्राट, इसी हिरनी का पीछा करता हुआ इसी ओर चला आया है। सम्राट ने भी अपने सामने एक संत, एक मुनि को पाया। सम्राट के कदम रुक गए। वह चौंका, 'ओह, मेरे द्वारा तो महान अनर्थ हो गया। मैंने मुनि की हिरनी की हत्या कर डाली। अब मुझे निश्चय ही मुनि के अभिशाप का पात्र बनना पड़ेेगा। संत का शाप कभी निष्फल नहीं जाता और आज मुझे यह शाप देकर ही रहेंगे। संत गर्दभिल्ल की दया-भरी दृष्टि हिरनी पर पड़ी। सारे संसार से निर्लिप्त और अनासक्त होने के बावजूद किसी को अपने पाँवों में गिरकर प्राणों की आहुति देते देखकर संत की आँखें भर आईं। संत के हृदय में उमड़े उन आँसुओं ने हिरनी के मस्तक का अभिषेक किया। सम्राट संजय मुनि के पाँवों में गिर पड़े, 'मुझसे जो अपराध हुआ है, उसके लिए सम्राट अपना मुकुट आपके चरणों में रखकर मा$फी चाहता है। क्षमा करें मुनिवर! क्षमा करें। सम्राट की याचना सुनकर संत ने जो शब्द कहे, वे आज भी प्रेरणादायी हैं। वे शब्द विश्व-शांति और विश्व-प्रेम का आधार बन सकते हैं। संत ने कहा, 'ओ पार्थिव, अगर तू किसी से अभय चाहता है, तो तू स्वयं अभयदाता बन। इस अनित्य जीव-लोक में तू क्यों हिंसा में आसक्त हुआ चला जा रहा है? चार दिन का जीना तेरा है और चार दिन किसी अन्य का। इन चार दिन के जीवन में तू क्यों अपने आपको हिंसा, परिग्रह और वैमनस्य में झोंक रहा है? अगर तू अपने लिए अभयदान चाहता है, तो तू भी इन सारे निरीह प्राणियों का अभयदाता बन।

अहिंसा - अभय की नींव


हिंसा भय को जन्म देती है और अहिंसा अभय को। अहिंसा अभय की नींव है और अभय अहिंसा की अभिव्यक्ति। जो भयभीत है, उसकी अहिंसा कायरता है। जो निर्भय है, उसकी अहिंसा आत्मगौरव है। यदि कोई भयवश ईश्वर को शीश नवाता है, तो उसकी आस्थाएँ कभी भी खंडित हो सकती हैं। जो भय के कारण पाप से डरता है, उसके पुण्य में भी पाप छिपा रहता है। डरपोक लोगों को जीने का हक नहीं है। उन्हें लोग जीने भी नहीं दे सकते। भय का भूत भागे, तो सफलता का सूर्योदय संभव हो सकेगा। अहिंसा की विजय 'हिंसा की रोकथाम के नारों से नहीं होती। जीवन में हिंसा का आमूलचूल मिटाव करने से ही अहिंसा की विजय संभावित है। सम्राट अशोक कलिंग युद्ध में अपनी विजय के बाद तंबुओं में विजय उत्सव मना रहे थे। रात का घुप्प अँधेरा था, लेकिन अशोक के शामियानों में रोशनी जगमगा रही थी। तभी एक सेवक सम्राट अशोक के तंबू में प्रविष्ट हुआ और कहा कि कोई बौद्ध भिक्षु आपसे इसी समय मिलना चाहते है। सम्राट ने अनुमति दे दी। भिक्षु ने कहा, 'सम्राट, आज विजय का उत्सव मनाया जा रहा है, लेकिन इस समारोह का उचित स्थान यह तंबू नहीं है। आप मेरे साथ चलिए, मैं आपको वहाँ ले चलता हूँ, जहाँ विजय का असली उत्सव मनाया जाना चाहिए।

सम्राट अशोक भिक्षु के साथ चल दिए। बौद्ध भिक्षु सम्राट को कलिंग की रणभूमि में ले आए। युद्ध के प्रांगण में सम्राट को खड़ा करके भिक्षु ने कहा, 'सम्राट तुम किसका विजय-उत्सव मना रहे हो? क्या इन अबलाओं के सिंदूर उजड़ जाने का, क्या इन बहनों का अपने भाइयों से सदा-सदा बिछुड़ जाने का, क्या इन माताओं की गोद सूनी हो जाने का? तुमने निर्दोष लोगों का कत्ल करके उचित नहीं किया है।

भिक्षु की बात सम्राट सिर झुकाए सुनता रहा। भिक्षु ने कहा, 'सम्राट, यह सारी मानवता तुम्हें अपने शीश पर बैठाए रखना चाहती है। यह तभी संभव है, जब तुम हिंसा न करो, अहिंसा की प्रतिमूर्ति बनो। तब एक ऐसे सम्राट का जन्म हुआ, जिससे अहिंसा गौरवान्वित हुई। तब धरती पर वो अशोक प्रकट हुआ, जिसने शांति और अहिंसा के लिए अपनी सारी शक्ति, सारी संपदा का उपयोग किया। सम्राट अशोक अभय और अहिंसा के सम्राट कहलाए। एक ओर है संत गर्दभिल्ल, तो दूसरी ओर हैं भिक्षु बोधिसत्व, एक तरफ है सम्राट संजय, तो दूसरी तरफ हैं सम्राट अशोक। सम्राट संजय ने जहाँ सदा-सदा के लिए शिकार को वर्जित किया और समस्त निरीह प्राणियों के लिए अभयदान की घोषणा की, वहीं सम्राट अशोक ने संपूर्ण साम्राज्य में अयुद्ध की घोषणा की। एक ओर अहिंसा और दूसरी ओर अभय। अहिंसा और अभय दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं, एक -दूसरे के पर्याय हैं।

अहिंसा और अभय - वीरों का आभूषण


अहिंसा और अभय भगोड़ों या पलायनवादियों का काम नहीं है। यह तो वीरों का आभूषण है। वह आदमी अपने जीवन में धर्म को नहीं जी पाता, जिसके लिए 'अहिंसा परमो धर्म: नहीं है। वह आदमी साधना को नहीं जी पाता, जिसके जीवन में अभय दशा उन्नत नहीं हुई है। साधना के द्वार पर तो यक्ष, किन्नर, देव, दानव और न जाने क्या-क्या, किन-किन के घोर परिषह, घोर उपद्रव आते हैं। भगवान महावीर पर केवल एक रात में बीस-बीस घोर उपसर्ग, घोर परिषह हुए थे। हम ज़रा अपनी साधना को, अपनी जीवन-शैली को, अपनी अहिंसा को कुछ ईमानदारी के साथ परखें। हमें पता चलेगा कि क्या हम किसी देव-दानव के दिए जाने वाले परिषह में कामयाब हो सकते हैं? एक चूहे से, एक छिपकली से भय खाने वाला आदमी क्या किसी यक्ष, किन्नर, देव, दानव, भूत-प्रेत के उपद्रव को सहन कर पाएगा? व्यक्ति जब लॉयन्स क्लब का सदस्य बनता है, तो लॉयन कहलाता है। सदस्य बनकर उसे स्वयं में छिपे हुए सिंहत्व को, पुरुषत्व को सार्थक करना होता है; मगर वह दीवार पर चलती हुई एक छिपकली से घबरा जाता है। वह आदमी 'शेर की संतान कहलाने का अधिकारी कैसे हो सकता है, जो एक छोटे-से कीड़े से घबरा जाए।

साधना का सोपान - अभय


बहुत वर्षों पहले हमें हम्पी की कंदराओं में रहने का सौभाग्य मिला। वहाँ एक बहुत बड़े साधक हुए योगिराज सहजानंदघन। वे अपने पूर्व नाम से भद्रमुनि कहलाते थे। अब तो हम्पी में देशी-विदेशी पर्यटक दिन-रात पड़े ही रहते हैं, लेकिन मैं तो बात कर रहा हूँ पच्चीस-तीस साल पहले की। उस समय वे साधक अकेले ही वहाँ की कंदराओं में रहते थे। कोई भूला-भटका दर्शनार्थी ही उनके पास पहुँचता था। जब दस साल पहले हम हम्पी में थे, तो मैंने अपनी आँखों से वहाँ पर शेर, बाघ, साँप-बिच्छू देखे थे। ज़रा कल्पना कीजिए आज से पच्चीस-तीस साल पहले उस साधक ने कंदराओं में कैसे साधना की होगी? ऐसी निर्भय दशा के, निर्भय चित्त के स्वामी को शायद ही मैंने देखा हो। मैं योगी सहजानंदघन की निर्भय चेतना से सहज ही प्रेरित-प्रभावित हुआ।

मैं योगिराज शांतिविजय महाराज की भी निर्भय-दशा का अनुमोदन करूँगा। मुझे उनकी गुफाओं में भी जाने और रहने का अवसर मिला। व्यक्ति कोई भी क्यों न हो, ऐसे अभय चेतनाशील पुरुष ही साधना के शिखरों को छू सकते हैं। तेनसिंह और हिलेरी जैसे लोग, जिन्होंने एवरेस्ट की चढ़ाई की, मार्ग में सफेद भालू मिले, पर वे जिनके चित्त से भय भाग गया, अभय हो गया, भला साँप, बिच्छू, भालू उनके भय का निमित्त कैसे बनेंगे!

व्यक्ति जानवरों से भयभीत रहता है, पर मैंने नहीं सुना कि आज तक किसी शांत बैठे हुए इंसान को किसी भी साँप ने काटा हो। कोई भी साँप इंसान को तभी काटता है, जब इंसान का पाँव सर्प पर पड़ जाए और सर्प भयभीत हो जाए। मैंंने कई-कई बार अपने पास से सर्प को गुजरते हुए देखा है। जैसे ही पाया कि कोई साँप गुज़र रहा है, जहाँ थे, वहीं खड़े हो गए। सर्प आया और पास से गुज़र गया, आगे बढ़ गया। ज्यों ही आप सर्प से भयभीत होंगे, सर्प चौंक उठेगा और डस लेगा, कुत्ते से भयभीत होंगे, तो वह पीछे दौड़ेगा, काट खाएगा।

भूत - भय का पिछलग्गू


कहते हैं कि स्वामी विवेकानंद बहुत डरा करते थे, जल्दी भयभीत हो जाते थे। एक बार वे किसी जंगल से गुज़र रहे थे। चलते-चलते का$फी थक चुके थे, इसलिए एक पेड़ के नीचे पहुँचे विश्राम करने के लिए, मगर जैसे ही वहाँ बैठने लगे कि तभी देखा उस पेड़ के ऊपर आठ-दस बंदर बैठे हैं। जैसे ही वह बैठे कि ऊपर से एक बंदर नीचे आता दिखाई दिया। वह घबराए और वहाँ से दौड़ पड़े।

स्वामी विवेकानंद के दिल की धड़कन बढ़ गई। जैसे ही वे दौड़े कि सारे बंदर नीचे उतर आए और उनके पीछे हो लिए। विवेकानंद आगे-आगे, बंदर पीछे-पीछे। दौड़ते-दौड़ते वह थककर चूर हो गए। अब उनसे दौड़ पाना कठिन था। वह वहीं खड़े हो गए। उनके खड़े होते ही बंदर जहाँ थे, वहीं रुक गए। वह चौंके, सूत्र उनके हाथ लगा, मेरे रुकने से बंदर भी रुक गए। अगर मैं एक कदम इनकी तर$फ बढ़ाऊँ, तो क्या ये भी एक कदम पीछे चले जाएँगे? उन्होंने साहस करके एक कदम बंदरों की तरफ बढ़ाया, बंदर पीछे हट गए। बस, जीवन में अभय दशा को लाने का सूत्र मिल गया कि तुम भय से भागो मत। भय अपने आप ही भाग जाएगा। तुम अभय हो जाओ। कहते हैं कि तब विवेकानंद बड़े आराम से चलकर उस वृक्ष के पास लौटे। बंदर धीरे-धीरे वृक्ष पर चढ़ गए। विवेकानंद आराम से उस वृक्ष के नीचे सोए, चैन की नींद ली।

भय के भूत उतने ही सवार होंगे, जितने कि आप उन भूतों से घबराएँगे। जितने हम निर्भय होते चले जाएँगे, भय के भूत हमसे उतने ही भागते चले जाएँगे। कोई कहता है कि अमुक मकान में मत जाना, उसमें भूत रहते हैं। कोई कहता है कि रात को सोए-सोए ही मुझे भूत दिखाई देता है। कोई कहता है कि मैंने देखा, अपने मोहल्ले में दूर एक सफेद-सा भूत हिल रहा था। उनसे पूछा जाए कि भूत हिल रहा था या किसी आदमी की धोती हिल रही थी? दूर से भूत दिखाई देते हैं, लेकिन जैसे ही उनके पास जाओ, यथार्थ सामने आ जाता है, कथित भूत भाग जाता है। आपने किसी समय शोले फिल्म देखी होगी। उसका प्रसिद्ध डायलोग है: जो डर गया, समझो मर गया। यह डायलोग याद रखने जैसा है। विदेशी पर्यटक हमारे देश में आते हैं। वे बगैर डर के हमारे यहाँ घूमते-फिरते हैं। हिमालय के पहाड़ों पर भी अकेले चले जाते हैं। उनसे हम उनकी इस निर्भयता की प्रेरणा लें।

भय - मन का संवेग


अगर आदमी भय से ग्रस्त रहता है। तो उसकी वजह है: उसके जन्मजात संवेग। जिनके चलते आदमी भय की जकड़ में आता है? फ्रायड को पढ़ो या दूसरे मनोवैज्ञानिकों को, वे कहते हैं कि मनुष्य जब से जन्म लेता है, भय की दशा उसके चित्त में रहती है। मनुष्य अपने साथ मूलत: तीन संवेगों को लेकर जन्म लेता है : पहला है प्रेम, दूसरा है भय और तीसरा है क्रोध। मनुष्य के संपूर्ण जीवन में ये तीन संवेग काम करते हैं।

आपने पाया होगा कि जैसे ही बच्चा रोता है, माँ उसे छाती से लगाती है। प्रेम का संवेग उठा, उसकी पूर्ति हुई, बच्चा शांत हो गया। बच्चा सोया हुआ था कि तभी आपके हाथ से गिलास छूट गया, ज़ोर की आवाज़ हुई, बच्चा चौंक उठा, रो पड़ा। यह मनुष्य के भय का संवेग हुआ। आपने बच्चे के हाथ से उसका खिलौना छीन लिया, अब देखो बच्चा किस तरह से हाथ-पाँव पटकता है, किस तरह से छाती पीटता है। यह हुआ उसके क्रोध का संवेग। मनुष्य जन्म के साथ ही प्रेम, भय और क्रोध को लेकर आता है। हमारे अपने ही चित्त में प्रेम है, भय है और इसी में क्रोध है।

भय से शक्ति का क्षय


भय मनुष्य का सबसे बड़ा घातक शत्रु है। विश्वास और विकास दोनों ही इससे कुंठित हो जाते हैं। भय मानसिक कमजोरी है। मन दुर्बल हो जाए, तो शरीर भी दुर्बल हो जाता है। निर्भय मन स्वस्थ शरीर का आधार बनता है। रोग कटते हैं मनोबल और आत्मविश्वास के बूते पर। इसलिए भय से मुक्त होना स्वस्थ जीवन का सरलतम मंत्र है। जो किसी भी परिस्थिति में नहीं घबराते, वे भूत-बँगले से भी नहीं घबराते। जो भयभीत हैं, वे अपने आस-पास हवा से हिल जाने वाले पत्तों से भी घबरा जाते हैं। इतना ही नहीं, तुम जैसे ही घबराते हो, तुम्हारी शक्ति का क्षय होना शुरू हो जाता है। तुम्हारा पाचन-तंत्र, हृदय-तंत्र भी असंतुलित हो उठते हैं। इसीलिए तो कहते हैं, 'मन के हारे हार है और मन के जीते जीत। मान लिया तो हार गए और ठान लिया तो जीत गए। अब तक जो भी हारे हैं, कमजोर मन के कारण हारे हैं और जो भी जीते हैं, वे अपने मनोबल के कारण जीते हैं। कमजोर शरीर और बलवान मन तो चल जाएगा, पर बलवान शरीर और कमजोर मन कभी भी कारगर नहीं हो पाएँगे।

जीवन में बाधाएँ तो आएँगी। बाधाओं से डरना कैसा! दुनिया में ऐसा व्यक्ति कौन है जिसे किसी-न-किसी बाधा का सामना करना न पड़ता हो। हकीकत तो यह है कि हर रोज किसी न किसी दिक्कत का सामना करना ही पड़ता है।

वह पथ क्या, पथिक कुशलता क्या, जब उसमें बिखरे शूल न हों। नाविक की धैर्य-कुशलता क्या, जब धाराएँ प्रतिकूल न हो। नाविक को प्रतिकूल धाराओं का सामना करना पड़ता है और हमें जीवन में बाधाओं का। मेरी समझ से दूध फटने पर वे ही लोग भयभीत होते हैं जिन्हें रसगुल्ला या पनीर बनाना नहीं आता। मेरी समझ से जीवन में आने वाली बाधाओं से डरने की बजाय अपनी श्रेष्ठ बुद्धि का धैर्यपूर्वक इस्तेमाल करना आना चाहिए। आप जब भी परेशान हों तो आइने के सामने जाकर खड़े हो जाएँ, उसमें आपको वह व्यक्ति नजर आएगा जो आपकी हर समस्या का समाधान निकाल देगा।

आपके समाधानकत्र्ता आप स्वयं है। भयभीत रहने वाला समाधान से वंचित रहेगा। याद रखो जो डर गया, सो मर गया।

बीन बजाएँ निर्भयता की


हाँ, अगर डरना है तो अपयश से डरो, पाप से डरो, और किसी से डरने की ज़रूरत नहीं। जब तक भय निकट न आया हो, तब तक ही उससे डरना चाहिए, पर आ जाने के बाद तो नि:शंक होकर उस पर प्रहार कर देना चाहिए। तुम न मित्र से घबराओ, न परिवार से, न शत्रु से घबराओ, न भूत से। घबराना तुम्हारे स्वभाव में ही न हो। जहाँ घबराए, समझो लक्ष्य की नाव वहीं डूब गई।

त्यागें हृदय की नपुंसकता


आप अभी, इसी समय पड़ताल कर लें कि आपके मन में किसी तरह की भयजनित दुर्बलता या नपुंसकता तो नहीं है? स्वयं में अगर कायरता या नपुंसकता आ जाती है, तो आदमी भयग्रस्त रहता है। शक्तिहीन होने के विचार मात्र से व्यक्ति भयग्रस्त हो जाता है। जब महाभारत का संग्राम छिडऩे को था, तो अर्जुन जैसा समर्थ व्यक्ति भी अपने शस्त्रों को नीचे गिरा बैठा। कृष्ण ने क्या किया? केवल अर्जुन के चित्त में आ चुकी कायरता, नपुंसकता को दूर किया और गीता के रूप में जीवन का एक महान पाठ दिया। मुझ पर गीता का प्रभाव रहा है। मेरे हृदय में अभय का दीप जलाने में उसने मदद की है। ऐसा हुआ भी। बहुत वर्ष पहले की बात है। हम कच्चे रास्ते से माउंट आबू पर चढ़ रहे थे, यात्रा चल रही थी। न जाने क्यों मुझे यह एहसास हो रहा था कि कुछ अनिष्ट होने वाला है। मैं निरंतर सचेत, सजग रहा। मैंने सभी को रोक लिया और निवेदन किया कि वापस सब लोग नीचे उतर जाएँ, क्योंकि मुझे कुछ अनहोनी-सी स्थिति लग रही है। काफी चढ़ाई चढ़ चुके थे, पर मेरे निवेदन पर सभी जन नीचे उतर आए।

तीन दिन बाद वापस चढऩा शुरू किया। कोई छ: से सात किलोमीटर की यात्रा पूरी की होगी कि अचानक तेज सनसनाहट के साथ हवा आई और उस तेज़ हवा के साथ एक भयंकर मूठ आकर मुझ पर गिरी। मैं वहीं धड़ाम से गिर पड़ा। मुँह से खून की उलटी होने लगी। मैंने अपनी पराशक्ति का स्मरण किया। न जाने कहाँ से जलती हुई आग मेरे हाथों में आई और मैंने उस आग से मूठ की काट की। सारा रास्ता जैसे-तैसे कर पार हो गया, लेकिन फिर तो मेरी हालत यह हो गई कि मुझे लगा कि दिन हो या रात, कभी भी किसी भी क्षण, कुछ भी हो सकता है। अपनी सारी योग-शक्तियाँ लगाने के बावजूद मुझे लगा कि मेरे साथ कुछ ऐसा हो रहा है, जिसे मैं जीत नहीं पा रहा हूँ। मेरे चित्त में भय की ग्रंथि बन चुकी थी।

बाद में तो स्थिति यह हो गई कि अगर में जंगल से गुज़रता और तेज़ हवा भी चल पड़ती, तो मुझे लगता कुछ-न-कुछ गड़बड़ी है। मेरे लिए अब बड़ा मुश्किल हो गया। इसी तरह पाँच-छ: महीने बीते कि तभी संयोग से मुझे एक ऐसी पुस्तक मिली कि मेरे मन का कायाकल्प हो गया। यह पुस्तक थी 'श्रीमद्भगवद्गीता। मैंने उसे खोला, दृष्टि दूसरे अध्याय के एक श्लोक पर जा टिकी। उस श्लोक ने मेरे चित्त की अभय-दशा को जाग्रत कर दिया, मेरी अंतरात्मा में पुरुषत्व को जगा दिया। मेरे मन में घर कर चुकी नपुंसकता दूर हो गई। मैंने स्वयं यह संकल्प लिया, खड़ा हुआ और कहा कि देखता हूँ, अब कौन-सी ताकत है, जो मुझसे बढ़कर निकल सके। गीता का वह श्लोक मेरे जीवन के पुरुषार्थ को जगाने का परम आधार बना। वह सूत्र था-

क्लैव्यं मा स्म गम: पार्थ, नैतत्त्वय्युपपद्यते। क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं, त्यक्त्वोतिष्ठा परंतप:।।

श्री कृष्ण ने कहा, 'ओ मेरे पार्थ, अपने हृदय की तुच्छ दुर्बलता का त्याग कर। हृदय की यह नपुंसकता तुझे शोभा नहीं देती। खड़ा हो और देख, तुझे युद्ध के लिए पुकारा जा रहा है। तू अपने कर्तव्य के लिए सन्नद्ध हो जा। जाग्रत हो और अभय-दशा को प्राप्त कर। मैं तेरे साथ हूँ।

विश्वास जगाएँ, भय भगाएँ


गीता के इस श्लोक का मुझ पर बड़ा उपकार रहा। इसी से उऋण होने के लिए ही मैंने दो वर्ष पूर्व श्रीमद्भगवद्गीता पर विशेष प्रवचन भी दिए। अगर व्यक्ति पुरुषत्वहीन हो जाए, पौरुष शिथिल पड़ जाए, तो उसके चित्त में भय की ग्रंथि बन जाती है। एक बार भय की ग्रंथि निर्मित हो जाए तो आदमी छोटा-सा निमित्त पाकर भी घबरा जाता है। तब आदमी निरंतर भय का ही चिंतन करता है। वह इहलोक और परलोक के भय से ग्रस्त रहता है, वह मृत्यु और वेदना के भय से ग्रस्त रहता है। इसने मुझे ऐसा कह दिया, वह मुझे ऐसा कह देगा, आदमी इन्हीं कल्पनाओं के चलते भयग्रस्त होता रहता है।

भय, डर, खौफ को दूर करने के लिए हम अपने सोए पौरुष को जगाएँ। जीवन में महाभारत का वातावरण बनना स्वाभाविक है, मनुष्य के रूप में किसी भी अर्जुन का विचलित होना भी नैसर्गिक है। हार उसी समय हमारे हाथ में चली आती है, जैसे ही हम किसी भी श्ंका-आशंका से घिर जाते हैं। वहीं जैसे ही सामना करने का साहस लौट आता है, जीत बिन माँगे ही झोली में चली आती है। भय मात्र मन की दुर्बलता है। हम जीवन में साहस, शौर्य, ऊर्जा, उत्साह का संचार करें, सचमुच अगले ही पल आप बहादुर और शक्तिवान बन चुके होंगे। निरपेक्ष रहें निंदा के भय से

आदमी को एक और जो सबसे बड़ा भय सताता है, वह है निंदा का भय, लोक-लाज का भय। वह डरता है कि समाज में उसकी निंदा न हो जाए, अगर मैंने ऐसा कर लिया, तो लोग क्या कहेंगे? इसीलिए तो आदमी पाप हमेशा छिपकर करता है और पुण्य हमेशा खुलकर। वह सोचता है कि खुलेआम पुण्य करने से उसकी स्तुति होगी, अभिनंदन होगा। पाप छिपकर करता है कि कहीं कोई देख न ले, जबकि मैं यह कहना चाहूँगा कि आदमी एक दफा पाप भले ही सरेआम कर ले, पर पुण्य छिपकर करे। किए हुए पाप को सरेआम स्वीकार कर लिया, तो पाप का प्रायश्चित्त हो गया। छिपकर करने से पाप दोगुना हो जाएगा। ज़हर चाहे छिपकर पियो या सबके सामने, वह अपना असर तो दिखाएगा ही। अच्छा होगा कि आदमी पुण्य छिपकर करे, ताकि पुण्य का स्तुतिगान न हो, वह हमारा कीर्तिगान न बने वरन् पुण्य भी हमारे जीवन के उद्धार का आधार बन जाए। इसी तरह दान देना हो, तो इस हाथ से दो और उस हाथ को पता भी न चले। किसी की सेवा करो तो इस हाथ से करो, उस हाथ को पता न चले। अभी दो दिन पहले की बात है। निराश्रित बच्चों के लिए विद्यालय चलाने वाले एक सज्जन आए और कहा कि पंद्रह अगस्त का दिन आ रहा है। हम चाहते हैं कि उस दिन यहाँ वालों की ओर से सभी बच्चों के लिए यूनीफॉर्म की व्यवस्था हो इसलिए चंदा-चिट्ठा लिखवा दिया जाए। मैंने कहा, इसके लिए चंदे की क्या ज़रूरत? आप जाइए, व्यवस्था हो जाएगी और व्यवस्था करवा दी गई। ऐसा पुण्य करो कि किसी को पता भी न चले, तो उसमें मज़ा है।

सहजता से लें हर टिप्पणी


आदमी भयभीत है, निंदा के भय से, आलोचना-टिप्पणी के भय से। लोक-लाज व्यक्ति को हर गलत कार्य करने से रोकता है। लोकलाज की मर्यादा सामाजिक दृष्टि से ठीक है, पर सच्चे को कैसा डर! एक बहुत प्यारी-सी घटना कहना चाहूँगा, एक ऐसी घटना, जिसे सारे संसार को सुनाया जाना चाहिए। वह घटना है संत हाकुइन के जीवन की। कहते हैं कि संत हाकुइन अपनी छोटी-सी झोंपड़ी बनाकर किसी गाँव में रहा करते थे। उनके पड़ोस में और भी मकान थे। उसी गाँव में एक कुँआरी युवती गर्भवती हो गई। उस युवती के माता-पिता ने उसे बहुत लताड़ा, मारा-पीटा और पूछा कि तेरी कोख में किसका पाप है? युवती से और कोई नाम लेते न सूझा। उसने झट से संत हाकुइन का नाम ले लिया।

युवती के माता-पिता और परिजन संत हाकुइन के पास पहुँचे और जाकर अपनी बेटी की सारी बात कही। तब संत हाकुइन ने जो शब्द कहे, वे ध्यान देने योग्य हैं। संत हाकुइन ने कहा, 'ओह, तो ऐसी बात है (इट्स दैट सो)! जब नौ माह पूरे हुए, तो प्रसव हुआ। वह संतान नियम के अनुसार संत हाकुइन को लाकर सौंप दी गई, 'तुम्हारी संतान है, तुम्हीं सँभालो। संत ने बड़े प्रेम-भाव के साथ उसे स्वीकार कर लिया। बच्चे के लालन-पालन के लिए दूध आदि की जो व्यवस्था होनी चाहिए थी, वह व्यवस्था संत जुटा लेते। बच्चे का पालन-पोषण होने लगा।

बच्चा चार-पाँच वर्ष का हो गया। एक दिन युवती की तबीयत बिगडऩे लगी, वह मरणासन्न स्थिति में पहुँच गई। उसने अपने घर के सारे सदस्यों को बुलाया और कहा, 'मैं निरंतर इसलिए रुग्ण होती जा रही हूँ क्योंकि मैंने एक पवित्र आत्मा पर झूठा आरोप लगाया है। घर वाले उसकी बात सुनकर आश्चर्यचकित थे, 'क्या कहती हो तुम? युवती ने कहा, 'हाकुइन के पास जो बच्चा है, वह हाकुइन का नहीं है। मैंने अपने प्रेमी को निंदा और अपयश से बचाने के लिए संत हाकुइन का नाम ले लिया था, लेकिन वह संत इतना महान है कि उसने अपने पर लगाए गए इस आरोप को, इस झूठे लांछन को भी सह लिया, स्वीकार कर लिया। मैं मृत्यु से पहले इसका प्रायश्चित्त करना चाहती हूँ।

युवती के परिजन फिर संत हाकुइन के पास पहुँचे, ये सारी बात बताई, सारा यथार्थ सुनाया। संत मुस्कराए और कहा, 'ओह, तो ऐसी बात है (इट्स दैट सो)! तुम अब क्या चाहते हो? वे बोले, 'हम चाहते हैं कि बालक को वापस ले जाएँ। संत ने कहा, 'ओह, तो ऐसी बात है। ठीक है, ले जाओ। यह जीवन की साधना की परम स्थिति है, जहाँ अगर इलज़ाम भी लगा, तब भी आनंद; इलज़ाम वापस ले लिया गया, तो भी आनंद, ओह, तो ऐसी बात है। जहाँ दोनों स्थितियों में समान आनंद का भाव है, वहीं तो आदमी अभय-दशा में जीता है। जो आदमी यह सोचता है कि लोग क्या कहेंगे, समाज क्या कहेगा, वह आदमी अपने जीवन में समता और सामायिक को नहीं जी सकता। एक बहुत बड़े संत हुए, स्वामी आनंद, जिन्होंने हिन्दुस्तान में सबसे पहले 'नारी निकेतन खोला, जहाँ उपेक्षित, लांछित, विधवा और निराश्रित महिलाओं को आश्रय दिया जाता था। एक बार एक नारी उनके पास आई और कहा, 'एक युवक के साथ मेरे प्रेम-संबंध थे। वह युवक मुझे छोड़कर भाग गया। उसकी संतान मेरे पेट में है। मेरे पीछे और छ: बहनें हैं। अगर उस युवक ने मुझे स्वीकार नहीं किया, तो मेरी उन बहनों की सगाई और शादी नहीं हो पाएगी। मेरा तो जो होगा, सो होगा, पर मेरी बदनामी मेरी बहनों की जि़ंदगी तबाह कर देगी।

युवती की बात सुनकर स्वामी आनंद ने पूछा, 'तुम अब क्या चाहती हो? युवती का उत्तर था, 'मैं चाहती हूँ कि कोई भी युवक मुझसे विवाह कर ले। स्वामी आनंद ने अपने कई शिष्यों को समझाया, मगर कोई भी तैयार न हुआ। आिखर पूरे समाज में बात फैल गई। बात कचहरी और पुलिस तक पहुँची। तारीख आ गई और स्वामी आनंद उस युवती को आश्वासन दे चुके थे कि तुम्हारी लाज किसी तरह मैं बचाऊँगा, तुम कोर्ट में पहुँच जाना। अगले दिन कोर्ट में दोनों आमने-सामने थे। युवती ने कार्यवाही से पहले पूछा, 'महोदय, क्या कोई तैयार हुआ? स्वामी आनंद के चेहरे पर उदासी छा गई। उन्होंने कहा, 'मैं क्षमा चाहता हूँ। कोई भी तैयार न हुआ।

स्वामी आनंद की बात सुनकर युवती चिंतित हो गई। स्वामी आनंद ने कहा, 'तुम मुझसे अब क्या चाहती हो? वह बोली, 'मैं इतना ही चाहती हूँ कि कोई भले ही जि़ंदगी-भर मेरे साथ न रहे, मगर कोर्ट में इतना भर कह दे कि मैं इसका पति हूँ। इससे समाज में मेरी अपकीर्ति होने से बच जाएगी। स्वामी आनंद ने कुछ सोचा और कहा, ' तू जा कोर्ट के भीतर, तेरी यह व्यवस्था हो जाएगी। तब उस भरी मजलिस में स्वामी आनंद ने घोषणा की कि 'मैं इसका पति हूँ। यह बात सर्वत्र पहुँचा दी जाए। सारी सभा सन्न रह गई। युवती की आँखों से आँसू झरने लगे, उसकी लाज बच गई थी। क्या स्वामी आनंद इतने महान थे? इतना बड़ा लांछन अपने पर ले लिया! युवती कोर्ट से बाहर आई, तो स्वामी आनंद उसके पाँवों में गिरकर प्रणाम करके कहने लगे, 'माँ, अब तू हमेशा प्रसन्न रहना। मुझे खुशी है कि लोग भले ही मुझे निंदित करें, अपमानित करें, लेकिन मैंने एक अबला की आबरू को बचा लिया। बस, स्वामी आनंद को इतने से ही संतुष्टि और तृप्ति है। बाकी तो संत की क्या निंदा, क्या यश-अपयश? शक्ति जगाएँ आत्मविश्वास की आदमी न तो निंदा के भय से घबराए, न ही अपयश के भय से, न ही इहलोक के भय से और न ही परलोक के भय से। जो चलेगा, वही गिरेगा। जो चलने से ही कतराएगा, मात्र अडिय़ल टट्टू बना रहेगा। तुम साहस बटोरो और कर्तव्य-पथ की ओर नि:शंक होकर बढ़ चलो। भय से आदमी मुक्त रहे, इसके लिए आदमी सदा आत्मविश्वास से भरा हुआ रहे। आदमी यह ठान ले कि दुनिया में मैं स्वयं सर्वश्रेष्ठ प्राणी हूँ, मेरा मस्तिष्क, मेरा हृदय, मेरा शरीर अपने आप में परमात्मा की सबसे बड़ी सौगात है। आदमी को सदा आत्मविश्वास से भरा रहना चाहिए।

भला हम किस बात से भयभीत हैं? होनी को टाला नहीं जा सकता और अनहोनी से तू क्यों घबराता है? नेपोलियन बोनापार्ट जब पर्वतों को लाँघ रहा था, तो बुढिय़ा ने कहा था, 'नेपोलियन, तुम वापस चले जाओ, क्योंकि इस पर्वत को कोई नहीं लाँघ पाया है। पर्वत के बाद फिर उफनती नदी है। उसे भी न लाँघा जा सकेगा। यह संभव ही नहीं है। तब नेपोलियन ने कहा था, 'माँ, नेपोलियन के लिए असंभव जैसा कोई शब्द नहीं है। ऐसा कौन-सा कठिन काम है, जिसे इन्सान करना चाहे और पूरा न कर सके? बुढिय़ा ने कहा, 'जिस आदमी के पास इतना परम आत्मविश्वास है कि दुनिया में असंभव जैसा कोई शब्द नहीं, जा तू जीतेगा, यह आल्पस तो क्या, कोई भी ऐसा पर्वत नहीं है, जिसको आत्मविश्वास से न हटाया जा सके। आत्मविश्वास के पास यही तो सबके बड़ी ताकत है। माना आत्मविश्वास के पास सफलता की कोई गारंटी नहीं है, पर सफलता के लिए संघर्ष करने की शक्ति तो अवश्य है। आत्मविश्वास उस छाते की तरह होता है जो बारिश को भले ही न रोक पाए, पर बारिश में खड़े रहने का हौंसला तो अवश्य देता है।

हातिमताई इतना अधिक मानसिक शक्ति और आत्मविश्वास का स्वामी बन गया था कि उस जैसे लोगों के सामने से तो पहाड़ खुद ही हट जाया करते थे। संभव है, भौतिक शक्ति भले ही सीमित हो, पर जिसके पास मन की शक्ति है, संकल्प-शक्ति है, मनोबल है, प्रकृति उसके प्रभाव को सौ गुना बढ़ा देती है।

आत्मविश्वास जाग्रत हो, आदमी सत्यनिष्ठ बने, अपने ईमान पर अडिग रहे। जो झूठा होता है, वह डरता है। जो आदमी सत्यनिष्ठ होगा, वह किसी से क्यों भय खाएगा? जीवन में सदा सजगता रहे, ईमान रहे, निर्भयता रहे, इन सबके लिए आधार-सूत्र है, आदमी स्वयं को सदा आत्मविश्वास से भरा हुआ पाए। प्रकृति की व्यवस्थाओं को स्वीकार करो। जो होनी है, उसको भी स्वीकार करो। जीवन तो किसी बाज़ीगर का सौदा है। यहाँ रिस्क तो उठानी ही पड़ती है। जो यह जानकर कि मधुमक्खियों के डंक हैं, शहद के छत्ते के पास नहीं जाता, वह शहद पाने के योग्य नहीं होता। तुम भयभीत मत होओ। अपना मनोबल जाग्रत करो। सृष्टि को तुम्हारी ज़रूरत है। तुम सृष्टि की आवश्यकता हो। अगर आवश्यक न होते, तो सृष्टि तुम्हें जन्म ही क्यों देती! तुम धरती के लिए उपयोगी हो। अपनी उपयोगिता सिद्ध करो। बाँधें बिखरे सुरों को

जहाँ अभय-दशा है, वहीं अहिंसा की दशा है। जहाँ अभय और अहिंसा दोनों हैं, वहाँ साधना और सफलता स्वयं ही अपना परिणाम देने के लिए तत्पर रहती है। दो ही आधार हैं, अभय और अहिंसा। दोनों एक-दूसरे के पूरक और पर्याय बनकर ही दुनिया में फिर से किसी संजय, किसी सम्राट अशोक जैसे को जन्म देते हैं। हम अपने जीवन को अभय और आत्मविश्वास से आपूरित करें।

व्यर्थ कोई भाग जीवन का नहीं है, व्यर्थ कोई राग जीवन का नहीं है। बाँध दो सबको सुरीली तान में तुम, बाँध दो बिखरे सुरों को गान में तुम।। जीवन को हम सुरीली तान से भरें। अपने बिखरे स्वरों को गीतों में बाँधे। जीवन संगीत और सौंदर्य से भरा जा सकता है। बस, आत्मविश्वास चाहिए, अभय-दशा चाहिए। ध्यान रखो, मौत जीवन में एक बार ही आती है, और वह भी उसी दिन, जिस दिन आनी है। फिर भय किस बात का, चिंता किस बात की। सदा मस्त रहो, निर्भय और आत्मविश्वास के स्वामी बनो।




गुरुदेव श्री

श्री चन्द्रप्रभ सागर जी म. :- विचार और व्याख्यान


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