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दीपावली पर बनाएँ मिशन, एक गरीब के घर को करेंगे रोशन - संत श्री चन्द्रप्रभ जी


दीपावली पर हम एक मिशन बनाएँ कि हम कम-से-कम एक गरीब के घर को रोशन जरूर करेंगे। हम दीपावली पर अपने घर को तो रोशन करेंगे ही, पर हमारे से सहयोग किसी गरीब या जरूरतमंद के घर खुशियों भरी दीपावली बन जाए, उसका घर रोशन हो जाए तो समझना हमारी दीपावली धन्य हो गई। हम खुद भी समृद्ध बनें और दीपावली पर संकल्प लें कि एक गरीब को भी समृद्ध बनाएँगे।

दीपावली सुख, शांति, समृद्धि और मुक्ति का पर्व है। भगवान श्री राम ने वनवास की यात्रा पूर्ण की और भगवान श्री महावीर ने जन्म-मरण की यात्रा पूर्ण की। भगवान राम ने इंसान को मर्यादा का पाठा पढ़ाया और भगवान महावीर ने त्याग और तप का। भगवान महावीर कहते हैं, श्व्यक्ति केवल अर्जन ही न करे बल्कि विसर्जन भी करे। केवल स्वार्थ और मोह में उलझकर अर्जन ही करते जाना परिग्रह है वहीं मानव-हितों के लिए, समाज की शिक्षा, संस्कार, स्वावलंबन और चिकित्सा के लिए सहयोग एवं विसर्जन करना अपरिग्रह है। वैसे मैं समृद्धि का समर्थक हूँ। गरीबी और अभाव इंसानियत के लिए अभिशाप हैं। सादगी का आनंद तो मानव-समाज ने हजारों वर्षों से लिया ही है, अब जरा नये युग की प्रगति का आनंद भी ले लिया जाना चाहिए। दुनिया को परिवर्तन पसंद है। आज नहीं तो कल जब इंसान वैभव से ऊब जाएगा तो संयम, सादगी और त्याग की ही शरण में आएगा। वैभव के बाद त्याग हो, तो वह त्याग इंसान को सच्चे अध्यात्म की ओर ले जाएगा। जिसके पास कुछ था ही नहीं, उसका त्याग त्याग की श्रेणी में ही नहीं आएगा।

आर्थिक विकास और अपरिग्रह दोनों एक-दूसरे के पूरक और पोषक हैं। आर्थिक विकास अगर हमारे जीवन का पाँव है तो अपरिग्रह उस पर अंकुश लगाने वाली आँख है। समृद्ध लोग तो महावीर के युग में भी थे। महावीर ने उनकी समृद्धि का कभी विरोध नहीं किया। महावीर ने उन्हें अपरिग्रह के आध्यात्मिक अर्थ को जीने के लिए प्रेरित किया। अपरिग्रह का आध्यात्मिक अर्थ है अनासक्ति। महावीर साफ कहते हैं - मुच्छा परिग्गहो वुत्तो। मूच्र्छा ही परिग्रह है। मूच्र्छा यानी पकड़। जब भगवान आदिनाथ की दृष्टि में चक्रवर्ती भरत और भगवान कृष्ण की दृष्टि में महाराजा जनक अनासक्त और आध्यात्मिक चेतना के मालिक हो सकते हैं तो फिर आज की समृद्धि का अपरिग्रह से विरोध क्यों होगा? पहले 20 प्रतिशत समृद्ध होते थे और 80 प्रतिशत कमजोर। हम अपने युग की पीठ थपथपाएँगे कि आज 80 प्रतिशत लोग मजबूत हैं और मात्र 20 प्रतिशत लोग कमजोर। यह युग केवल समृद्ध ही नहीं है बल्कि तार्किक और वैज्ञानिक भी है। आज के बच्चे केवल किसी बात को केवल इसलिए नहीं मान सकते कि यह बात पुरखों ने कही है या परम्परा से चली आ रही है। धर्म की बातों को अगर युग के अनुरूप नहीं ढाला गया तो धर्म किसी गुफा में समाधिस्थ हो जाएगा और युग अपनी नई करवट बदल बैठेगा।

महावीर की अहिंसा, अपरिग्रह और अनेकांत को पूरी दुनिया में फैलाया जाए-महावीर की अहिंसा, अपरिग्रह और अनेकांत जैसी बातें प्रेक्टिकल लाइफ के साथ जोड़ते हुए पूरी दुनिया में फैलाई जाए। महावीर की बातों का जितना मूल्य महावीर के समय में था, आज के युग में उन्हें लागू करने की हजार गुना ज्यादा जरूरत है। दुनिया में फैल रही हिंसा, कू्रता और आतंक को मिटाने के लिए अहिंसा को बहुत अधिक इमोशनल बनाकर पेश किये जाने की जरूरत है, कमजोर लोगों को ऊपर उठाने के लिए अपरिग्रह की अंगुली थामने की जरूरत है, जाति, पंथ और परम्पराओं में जकड़े मानव-समाज को इंसानियत का पाठ पढ़ाने के लिए अनेकांत को लागू करना जरूरी है। महावीर और बुद्ध जैसे करुणाशील महापुरुषों ने उस समय भी दुरूह रास्तों को पार करके देश-विदेश में अहिंसा और अमारी घोषणाओं को लागू करवाने के लिए प्रयास किया था। आज तो हर तरह के साधन उपलब्ध हैं। हमें दुनिया में हो रही बड़ी हिंसाओं को रोकने के लिए दया, करुणा और प्रेम को पुनर्जीवित करना चाहिए। महावीर आज भले ही मोक्ष से हमारे लिए पुनर्जन्म न ले सकते हों, पर हम सब इस युग के महावीर बनें, ऐसा कोई प्रयास तो किया ही जा सकता है।

मानव-समाज के लिए त्याग और अपरिग्रह के मील के पत्थर की तरह-याद रखें, धन की तीन ही गतियाँ होती हैं-1. भोग, 2. दान और 3. नाश। कहावत है - पूत सपूत तो का धन संचै। बेटा अगर सपूत है तो आपकी कौड़ी को भी करोड़ तक पहुँचा देगा और बेटा ही अगर कपूत है तो करोड़ को भी दो कौड़ी का नहीं छोड़ेगा। मैं चाहूँगा अमीर लोग इस देश के महान उद्योगपति घनश्यामदास जी बिड़ला से प्रेरणा लें जिन्होंने अपनी हर फैक्ट्री का एक हिस्सा ईश्वर और इंसानियत के नाम पर निकाला। हाल ही विश्व के सबसे अमीर आदमी बिल गेट्स ने अपनी कमाई पूँजी में से दो लाख करोड़ रुपये से ज्यादा धन चैरिटी के नाम कर दिया। यह एक अद्भुत मिसाल है। अनार्य देश में रहकर भी त्याग का इतना ऊँचा आदर्श! सचमुच अपरिग्रह आज भी जीवित है! विप्रो के चेयरमेन अजीम प्रेमजी, टाटा के मालिक श्री रतन टाटा, अमेरिका के वॉरेन बफे जैसे अमीर लोग हजारों करोड़ रुपये शिक्षा, चिकित्सा और इंसानियत की सेवा के लिए डोनेट कर चुके हैं। उन्होंने बेहिसाब पैसा कमाकर अपनी पूँजी का केवल अपने लिए उपयोग नहीं किया, बल्कि अपने धन को इस तरह मैनेज किया कि वे सारी दुनिया के लिए उदाहरण बन गए। ऐसे अमीर लोगों के बलबूते ही चैरिटी के बड़े-बड़े कार्य निष्पादित हो पाते हैं। इन भामाशाहों की धन के प्रति जगी विरक्ति और परमार्थ के प्रति जगी अनुरक्ति सारे मानव-समाज के लिए त्याग और अपरिग्रह के मील के पत्थर की तरह है। जिनके पास करोड़ों-अरबों की सम्पत्ति है, उन्हें चैरिटी के लिए आगे आना चाहिए।

ऐसा करें कि पूरी दुनिया याद रखें-आप अगर अपने धन को केवल अपने बच्चों के लिए छोड़ेंगे तो आपको याद करने वाले दो-चार लोग होंगे, पर अगर दुनिया के लिए कुछ करोगे तो आपको याद करने वाली पूरी दुनिया होगी। बागवान की कहानी हमें समझाती है कि केवल अपनी संतानों के लिए करते रहोगे तो एक दिन स्वार्थ पूरा होने पर वे आपको दुत्कार सकते हैं, पर अगर किसी गैर या अनाथ के लिए कुछ कर डाला तो मुमकिन है वह अपना ऋण उतारने के लिए आपके बुढ़ापे की बैशाखी बन जाए। अगर हम उदारता का ऐसा मार्ग जीवन में आत्मसात करते हैं तो इससे न केवल दीपावली का पर्व धन्य होगा वरन् भगवान महावीर और भगवान राम सच्चे अर्थों में हमारे जीवन में अवतरण हो जाएगा।




गुरुदेव श्री

श्री चन्द्रप्रभ सागर जी म. :- विचार और व्याख्यान


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