slide3-bg



होली पर हैप्पीमैन बनने का लें संकल्प - संत चन्द्रप्रभ


होली पर हैप्पीमैन बनने का संकल्प लीजिए। जैसे होली पर्व पर कोई हमारी कैसी भी और कितनी भी मजाक करे फिर भी हम उसका बुरा नहीं मानते और यही सोचते हैं कि बुरा न मानो होली है। ठीक वैसे ही अगर हम हर दिन को होली मानकर जिए और जीवन में आने वाली हर परिस्थिति का हँसी-खुशी से स्वागत करें तो हमारा जिंदगी भी गुलाल और इन्द्रधनुष की तरह रंगीन हो जाएगी।

खुद को हैप्पीमैन बनाइए, एंग्रीमैन नहीं। फिल्मों में एंग्रीमैन की भूमिका निभाने वाले भी अपनी रियल लाइफ में हैप्पीमैन ही होते हैं। हैप्पीमैन चंदन की तरह होता है जो खुद भी महकता है और दूसरों को भी महक देता है। एंग्रीमैन तो वह अंगारा है जो खुद भी जलता है और दूसरों को भी जलाता है। कृपया होली पर अपनी इमेज सुधारिए और एंग्रीमैन बन चुके खुद को नेचर को आज से ही हैप्पीमैन बना लीजिए।

खुश रहना मेरा फैसला है और अपने फैसले पर हर हाल में अडिग रहना मेरा अपना दायित्व है। आप भी अगर हर हाल में मस्त रहने की कला अपने जीवन में डेवलप कर लें तो आपके जीवन में भी खुशियों का खजाना हाथ लग जाएगा। मेरी दृष्टि में, स्वर्ग पाने की चीज नहीं है, बल्कि तन-मन-आत्मा में जीने की चीज है। हम अगर दुनियादारी के छातीकूटों से खुद को फ्री कर लें तो मुक्ति और मोक्ष हमारे जीवन के खुद-ब-खुद हमसफर बन जाएँगे।

मुस्कान हमारे जीवन के खेत में बोये गए अच्छे बीज की तरह है। हम अगर उसमें अच्छे बीजों को बोने के प्रति जागरूकता रखेंगे और उन्हें सींचते रहेंगे तो निश्चय ही वे फसले लगेंगी, जिन्हें हम खुशियों और आनंद के फूल कह सकते हैं। हँसी की बात आने पर तो हर कोई हँसता है, पर जो बगैर बात के भी हँसता-खिलता हुआ गुलाब का फूल बनकर जीता है वही तो आनंदपुरुष और लॉफिंग बुद्धा होता है। हम दूसरों के द्वारा दिए जाने वाले सम्मान और अपमान को अपनी नहीं बल्कि सामने वाले की ही विशेषता या कमजोरी समझें। काँटे के बदले काँटा तो हर कोई गड़ा सकता है, हम काँटे के बदले में फूल लौटाएँ तभी काँटे गड़ाने वाले के दिल में भी हमारी जगह बनेगी। होली पर दुश्मनी को प्यार-मोहब्बत में बदलें-अगर हमारी किसी से दुश्मनी है अथवा किसी के प्रति मन में दूरियाँ हैं तो उसे होली पर्व के बहाने प्यार-मोहब्बत में बदल लें। याद रखें, मंदिर में मत्था टेक आना या गुरुजनों की चरण-वंदना कर आना ये धर्म-कर्म का एक बहुत सामान्य चरण है, असली धर्म-कर्म तो है किसी के प्रति राग-द्वेष न रखना, वैर-वैमनस्य न रखना। जो हमें अपना दुश्मन मानता है उसके प्रति भी प्यार-मौहब्बत रखना। किसी बड़े तीरथ की दो-सौ किलोमीटर की पैदल यात्रा कर आने से पहले कहीं जरूरी यह है कि हम पाँच कदम चलकर उस व्यक्ति से हाथ मिला आएँ जिसके हमारे बीच खाई खुद गई हो।




गुरुदेव श्री

श्री चन्द्रप्रभ सागर जी म. :- विचार और व्याख्यान


Our Lifestyle

Features