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टूट चुके बहुत, अब जुडने की बात हो - संत श्री ललितप्रभ जी


हमने पिछले पच्चीस सौ सालों तक लड़-लड़कर खोया ही खोया है, अब हम केवल पच्चीस सालों के लिए सारे भेदभावों को भुलाकर एक हो जाएँ तो मात्र पच्चीस सालों में दुनिया में सिरमोर हो जाएँगे

एकता समाज की सबसे बड़ी ताकत है। जब तक लकडियाँ इकठ्ठी रहती है तब तक उसे पहलवान भी तोड़ नहीं पाता है और उनके अलग-अलग होते ही उनको बच्चा भी तोड़ देता है। जैसे हजार का नोट मुड़ जाए, गल जाए, मिट्टड्ढी में मिल जाए और कुचल जाए तब भी उसकी कीमत में कोई अंतर नहीं आता, पर उसके दो टुकड़े हुए कि उसकी कीमत के भी टुकड़े-टुकड़े हो जाते हैं ठीक वैसे ही जिस जाति-धर्म के लोग संगठित रहेंगे तो उनके वोट, नोट और सपोट की सब जगह पूछ होगी नहीं तो उन्हें कोई नहीं पूछेगा। आजकल नेता लोग भी अच्छी बस्तियों की बजाय कच्ची बस्तियों के लोगों को ज्यादा खुश रखते हैं क्योंकि उनमें एकी है। देश में एक कौम के यहाँ पुलिस नहीं जाती, छापे नहीं पड़ते, उनके लोग संसद तक पहुँचे हुए हैं, कारण एक मात्र इतना-सा कि वे संगठित हैं वहीं दूसरी कौम जिसके पास देश की बहुत बड़ी अर्थव्यवस्था है, लेकिन संगठित न होने की बजह से संसद में उनके दस प्रतिशत भी लोग नहीं है। याद रखें, टूटे हुए लाखों लोगों पर एकत्रित मुठ्ठी भर लोग भारी पड़ते हैं। कहावत भी है बँधी मुठ्ठड्ढी लाख की, खुल गई तो खाक की टूटे बहुत, अब जुडने की बात हो - हमने पिछले पच्चीस सौ सालों तक तेरा मंदिर-मेरा मंदिर, तेरे गुरु-मेरे गुरु, गच्छ-सम्प्रदाय, पंथ-ग्रंथ, मूर्ति-मुहपत्ति, वस्त्र-शास्त्र के नाम पर लड़-लड़कर खोया ही खोया है, अब हम केवल पच्चीस सालों के लिए इन सब भेदभावों को भुलाकर एक हो जाए तो मात्र पच्चीस सालों में दुनिया में सिरमोर हो जाएंगे। जरूरत केवल इतनी-सी है कि हम एक-दूसरे की आलोचना करने की बजाय अच्छाइयाँ देखें और निकट आने की कोशिश करें। हमसे धर्म-कर्म हो तो ठीक, न हो तो कोई दिक्कत नहीं, पर हम उदार बनें और सोच को सकारात्मक बनाएँ यही सबसे बड़ा धर्म है। अगर हमारे प्रवचनों में छत्तीस कौम के लोग आते हैं तो उसका एक मात्र कारण अपने नजरिये को विराट बनाना है। याद रखें, छोटे केनवास पर कभी बड़े चित्र बनाए नहीं जा सकते, चित्रों को बड़ा बनाना है तो कृपया अपने केनवासों को बड़ा बनाएं।

एकांत दृष्टि हटाएँ, अनेकांत दृष्टि अपनाएँ- हमारी समझ से समाज की टूटन का मुख्य कारण है-एकांत दृष्टि। मैं और मेरा ही सच्चा यह एकांत है, वह और उसका भी सच्चा यह अनेकांत है। हम अनेकांत को पुनर्जीवित करें। एक-दूसरे के विचारों का सम्मान करना सीखें। जिस बिन्दू पर विचार मेल न खाएँ तो उस बिन्दू से दूर हो जाएँ, पर दुराग्रह न पालें।

सामाजिक एकता के लिए अपनाएँ चार सूत्र - पहला सूत्र है-हम समाज को संगठित करें। हम समाज में ऐसे संतों को लाएं जो टूटे हुओं को जोडने में विश्वास रखते हैं। जो समाज को जोड़े वही सच्चा संत है। तोडने वाला कभी सच्चा संत नहीं हो सकता। हम उन संतों और ग्रंथों का सम्मान करें जो हमें प्रेम का पाठ पढ़ाते हो। ऐसे लोगों को आगे बढ़ाएँ जिनके भीतर कुछ कर गुजरने का जज्बा हो। कुछ चवन्नी छाप लोग खुद तो सिक्का बन जाते हैं और धर्म व समाज को चवन्नी जितना बना देते हैं। इस तरह अपनी तूती बजाने वाले और गंदी राजनीति खेलने वाले इन आगेवान 10 प्रतिशत लोगों को अगर साइड कर दिया जाए पूरा समाज एक होना चाहता है। अच्छे लोगों को चाहिए कि अगर कभी पद का त्याग करने से एकता बनी रहे तो उसे भी त्याग करने में संकोच नहीं खाना चाहिए क्योंकि पद से बड़ा पे्रम होता है। अगर कभी समाज में अध्यक्ष बनाने की बात आए तो चुनाव करने की बजाय उस व्यक्ति को अध्यक्ष बनाया जाए जिसके घर में सभी भाई संगठित हैं। जो घर को भी एक न रख पाया वह समाज को क्या एक रख पाएगा। याद रखें, बड़ा वही होता है जो घर या समाज को एक रखने के लिए समय आने पर बड़प्पन दिखाता है।

दूसरा सूत्र है - समाज में सहयोग की भावना बढ़ाएँे। हम समाज के कमजोर भाई-बहिनों को ऊपर उठाएं। हर समाज छोटे-छोटे बैंक बनाए और जरूरतमंद लोगों को ब्याजमुक्त लोन दे। धर्म के नाम पर इकठ्ठड्ढे किए गए धन को बैंकों में डालने की बजाय समाज-कल्याण में लगाएं। अगर संस्थाओं में धन रहेगा तो पदों के लिए मारामारी मचेगी। याद रखें, मंदिर बनाने से भी ज्यादा पुण्यकारी है अपने गरीब भाईयों को पाँवों पर खड़ा करना।

तीसरा-चैथा सूत्र है - समाज में समानता और समन्वय बढ़ाया जाए। याद रखें, वह समाज श्रेष्ठ होता है जहाँ अमीर-गरीब में भेदभाव नहीं किया जाता। आखिर मुठ्ठी भर अमीरों के बल पर समाज को कब तक ढोया जाएगा। गरीबों को आगे आने का अवसर दिया जाना चाहिए। संतों को भी चाहिए कि वे अमीरों के महाराज बनने की बजाय गरीबों के महाराज बनें। सम्पन्न लोग तो जहाँ जाएंगे वहाँ सम्मान पा लेंगे, पर संतों का द्वार तो कम-से-कम ऐसा होना चाहिए जहाँ गरीबों को भी पूर्ण सम्मान मिले। याद रखें, अमीरों के बलबूते पांडाल बांधा तो जा सकता है पर उसे भरने के लिए तो आमजनता के बीच ही आना होगा। अमीर लोग चातुर्मास तो करवा सकते हैं, पर चातुर्मास में रौनक तो आम लोगों के आने से ही होगी। अब संतों को भी निकट आने की जरूरत है। जब नाई-नाई, धोबी-धोबी आपस में मिलते हैं तो प्रणाम करते हैं फिर संत संत को देखकर मुँह क्यों फेर लेता है। सामाजिक समन्वय के लिए जरूरी है कि हम दूसरे के द्वारा किये जाने वाले कार्यक्रमों की खिल्ली न उड़ाएँ और एक-दूसरे के धार्मिक-सामाजिक कार्यक्रमों में शरीक हों । बालोतरा शहर हम सबके लिए आदर्श है जहाँ अमीर-गरीब घरों में शादियाँ एक खर्चे से होती है और शादी में 11 से ज्यादा आइटम कभी नहीं बनते। अमीरों को चाहिए कि वे ब्याह शादियों में फिजूलखर्ची को रोकें ताकि गरीब भी अपने बेटे-बेटियों की शादी सादगी से कर सकें। अगर एक अमीर आदमी अपने समाज के किसी गरीब परिवार को गोद ले ले तो समाज की सारी समस्याएं स्वतरूदूर हो जाएगी। अमीरों को मंदिरों के साथ समाज के विद्यालय और चिकित्सालय भी बनाने चाहिए ताकि आम लोगों का जीवन-स्तर ऊपर उठ सके।

संत लोग एकता की लहर पैदा करें - अभी हाल ही में हमने आदरणीय मुनिश्री तरूण सागर जी महाराज के साथ जयपुर के एस एस एम ग्राउंड में एक साथ चातुर्मास कर, एक मंच पर प्रवचन कर अनुपम आदर्श प्रस्तुत किया। इससे समाज का गौरव कितना बढ़ा इसकी कल्पना तक नहीं की जा सकती। अगर वैसा ही आदर्श दूसरे संत भी मिलकर प्रस्तुत करे तो एकता की नई लहर पैदा की जा सकती है। हम नारंगी और खरबूजे का उदाहरण सदा सामने रखें। नारंगी बाहर से एक, पर छिलका उतरते ही टुकड़ों में विभाजित हो जाती है और खरबूजा बाहर से अलग होता है, पर छिलका उतरते ही एक हो जाता है। हम नारंगी बन चुके समाज को खरबूजा बनाने की कोशिश करें।

सार रूप में कहा जाए तो भगवान को सबसे ज्यादा खुशी तब होती है जब उनके सारे संत मिलजुलकर अहिंसा और एकता की बात करते हैं। हम अपने दिल-दिमाग को जितना विशाल करेंगे हम इंसानियत का उतना ही अधिक भला कर पाएँगे।


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