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महावीर के संदेशों को चारदीवारी से बाहर निकालकर विश्वभर में फैलाएँ - पूज्य श्री ललितप्रभ


अगर हमारे शरीर में केवल पिन चुभ जाए तो हम कराह उठते हैं, सोचो जिन जीवों पर कटार चलती है उन्हें कितनी पीड़ा होती होगी? अगर हम एक मांसाहारी को प्रेरणा देकर शाकाहारी बनाने में सफल हो जाते हैं तो हमें अड़सठ तीर्थों की यात्रा जितना पुण्य घर बैठे मिल जाएगा।

महावीर साधना के शिखर पुरुष हैं। जैसे पर्वतचोटियों में माउंट एवरेस्ट और नक्षत्रों में धू्रव नक्षत्र सर्वश्रेष्ठ हैं ठीक वैसे ही महापुरुषों में महावीर हैं। वे केवल जैनों के नहीं वरन सम्पूर्ण मानवता के भगवान हैं। महावीर उन्हीं लोगों के काम के हैं जो ज्योर्तिमयता में विश्वास रखते हैं। वे ही पहले ऐसे महापुरुष थे जिन्होंने सरे बाजार में बिकने वाली नारी को बिक्री की वस्तु से हटाकर उसे आमजन मानस में गौरवपूर्ण स्थान दिलवाया। आज जरूरत केवल इतनी-सी है कि भगवान महावीर में आस्था रखने वाला लोग केवल मंदिरों में उनकी पूजा-आरती न करते रहें, अपनी पंथ-परम्पराओं की चारदिवारी में बंधकर न रहें, वरन् उनके द्वारा दिए गए अहिंसा, अनेकांत, समता, समानता, सहयोग जैसे संदेशों को विश्वभर में फैलाने की जी-जान से कौशिश करें फिर वह दिन दूर नहीं जब संयुक्त राष्ट्र संघ में शांति और मैत्री की केवल बातें नहीं होगी वरन् विश्व मैत्री और विश्व शांति का सपना साकार होता दिखेगा। माना कि अहिंसा में आस्था रखने वाले संख्या में थोड़े होंगे पर ध्यान रखना जिस पेड़ से हजारों तीलियाँ बनती है अगर वही तीली ठान ले तो हजारों पेड़ों को भस्म भी कर सकती है।

महावीर का म कहता है महान बनो - जहाँ भगवान श्री राम दिए हुए वचन को निभाने की प्रेरणा देने वाले आदर्श-स्तंभ हैं वहीं भगवान श्री महावीर लिए हुए संकल्प पर दृढ़ रहने के आदर्श स्रोत हैं। स्वयं महावीर शब्द में गूढ़ रहस्य छिपा हुआ है। महावीर का म महान बनने, ह हिम्मत रखने व वचन निभाने और र रमन करने का पाठ सिखाता है। भले ही सिकन्दर ने पूरी दुनिया को जीता, पर सिकन्दर बनकर दुनिया को जीतना सरल है, पर उसी सिकन्दर के लिए स्वयं को जितना बड़ा मुश्किल है। जो स्वयं को जीतते हैं वही दुनिया में वीरों के वीर महावीर कहलाते हैं। जैसे राम ने रावण का और कृष्ण ने कंस का संहार किया वैसे ही महावीर ने क्रोध और कषाय के कंस का एवं राग और द्वेष के रावण का अंत कर धरती पर प्रेम, शांति, करुणा और आनंद के साम्राज्य को स्थापित कर दिखाया था।

भारत के प्राण हैं महावीर - महात्मा गांधी भारत के राष्ट्रपिता कहलाते हैं, पर कोई मुझसे पूछे कि भगवान महावीर भारत के क्या लगते हैं तो मैं कहूँगा वे भारत के प्राण हैं और जिस दिन प्राण चले जाते हैं उस दिन केवल ढांचा बच जाता है जो किसी काम का नहीं होता। जैसे गांधी ने महावीर द्वारा प्रदत अहिंसा के अस्त्र का उपयोग कर भारत को आजादी दिलाई ठीक वैसे ही हम भी अहिंसा को पे्रक्टिकल रूप में फैलाना शुरू कर दें तो विश्व को आतंकवाद, उग्रवाद, आत्महत्या और मांसाहार से आजादी दिला सकते हैं। महावीर के संदेश तब भी उपयोगी थे आज भी उपयोगी हैं और सदा उपयोगी बने रहेंगे। वे कभी आउट ऑफ डेट नहीं होंगे, सदा अप-टू-डेट बने रहेंगे।

महावीर को मंदिर में नहीं मन में बिठाएँ - महावीर के अनुयायियों से महावीर कहते हैं कि नेता को वोट, अमीर को नोट, और आगे बढने वालों को सपोट चाहिए, पर मुझे केवल आपकी खोट चाहिए, ताकि मैं आपको खरा बना सकूँ। महावीर को भीड़ नहीं, भाव चाहिए। सिक्के नहीं, श्रद्धा चाहिए। उनकी मंदिरों में प्रतिष्ठा तो बहुत हो चुकी अब जरूरत उन्हें मन में प्रतिष्ठित करने की है। श्रद्धालु महावीर को मंदिरों में सजाते हैं, उन पर सोने-चाँदी के मुकुट चढ़ाकर वैभवयुक्त दिखाते हैं, पर उन्हें क्या मालूम कि महावीर तो वैभव का त्याग करके आए थे। अगर हकीकत में उन्हें कुछ चढ़ाना चाहते हो तो अपनी कोई भी एक बुरी आदत को चढ़ाओ ताकि आपका जीवन निर्मल और पवित्र बन सके।

महावीर का एक ही संदेश-जियो और जीनो दो - अगर सुख पाना चाहते हो तो महावीर के केवल एक मंत्र को अपना लो और वह है जियो और जीने दो। सदा याद रखो, सुख पाने का एक ही मंत्र है दूसरों को दुरूख देना बंद करो। खुद भी सुख से जियो और औरों की भी सुख से जीने की व्यवस्था करो। जो तुम अपने लिए चाहते हो वही दूसरों के लिए भी चाहो। उदाहरण के तौर पर अगर आप चाहते हैं कि आपकी बेटी ससुराल में सुखी रहे तो जरूरी है आप अपनी बहू को सुखी रखें और अगर आप चाहते हैं कि आपकी भाभी पीहर में आपकी माँ का ध्यान रखे तो जरूरी है आप भी ससुराल में अपनी सास का पूरा ध्यान रखें।

बैनरबाजी बहुत हो चुकी, अब अहिंसा उतरकर आए जीवन-शैली में - जब तक अहिंसा जीवनशैली में उतरकर नहीं आएगी तब तक केवल बैनरबाजी से कुछ नहीं होने वाला है। कितनी बड़ी गजब की बात है कि शोभायात्रा और रैलियों में चलते हुए हाथों में अहिंसा के बैनर, मुँह से शाकाहार अपनाओ के नारे और पाँवों में चमड़े के जूते! याद रखना, चमड़े की वस्तुओं का उपयोग करने वाले भी उतने ही दोषी हैं जितना माँस खाने वाले। आखिर चमड़ा बनता तो पशुओं से ही है। रेग्जीन, रबड़, प्लास्टिक, कपड़े की बहुत सुंदर और टिकाउ वस्तुएँ आती है। बहिनों से कहना चाहूँगा कि वे सुंदरता बढ़ाने के लिए मंहगी साडियाँ, सौन्दर्य प्रसाधन आदि भले ही खरीदें, पर पहले देख लें कि ये हिंसक हैं या अहिंसक। कहीं ऐसा न हो कि हमारी सुंदरता का मौल पशु-पक्षियों को अपनी जान देकर चुकाना पड़े। बस खरीदते समय समय विवेक रखने की जरूरत है। हो सके तो हम शाकाहार का अभियान भी चलाएँ। हमसे जुड़े लोग जो मांसाहार करते हैं उन्हें शाकाहार की प्रेरणा दें। याद रखें, जानवर बेजुबान तो होते हैं, पर बेजान नहीं। अगर हमारे शरीर में केवल पिन चुभ जाए तो हम कराह उठते हैं, सोचो जिन जीवों पर कटार चलती है उन्हें कितनी पीड़ा होती होगी? अगर हम एक मांसाहारी को प्रेरणा देकर शाकाहारी बनाने में सफल हो जाते हैं तो हमें अड़सठ तीर्थों की यात्रा जितना पुण्य घर बैठे मिल जाएगा।

हर कार्य विवेक पूर्वक करें - महावीर की अहिंसा को प्रेक्टिकल लाइफ से जोड़ें। अगर आप बाइक से सड़क पार कर रहे हैं और सामने कीड़े चलते हुए दिखाई दे दे तो बाइक को रोक दें, कीड़ों को रूमाल से हटाएँ और फिर आगे बढ़ जाएँ, मुश्किल से आधा मिनिट ही लगेगा, पर ऐसा करके आप मंदिर जाने का फ्री में सौभाग्य प्राप्त कर लेंगे। हम महावीर की अहिंसा को मंदिर से किचन में भी ले आएं। चूल्हा जलाने से पहले, बेसन में पानी गिराने से पहले, चावल भिगोने से पहले, नहाने से पहले, यहाँ तक डब्लूसी में बैठने से पहले भी एक बार देख लें कही जीव तो नहीं आए हुए हैं। पहले उन्हें हटाएं, फिर आगे का काम करें। इस तरह अगर आप हर कार्य विवेक पूर्वक करते हैं तो समझना हम महावीर जयंती का पर्व मनाकर हर पल उन्हें साकार कर रहे हैं।


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