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भगवान महावीर का साधनामय जीवन


आज हम एक ऐसे दिव्य पुरुष पर परिचर्चा करेंगे जिनके साधनामय जीवन से हमें रोशनी मिल सकती है। महापुरुष कोई भी क्यों न हों, हर महापुरुष के जीवन में कुछ विलक्षण आध्यात्मिक दिव्यता अवश्य होती है। महापुरुषों के जीवन से आध्यात्मिक प्रेरणा और प्रकाश ग्रहण करना ही उन पर परिचर्चा करने का उद्देश्य होता है। आज हम भगवान महावीर के साधनामय जीवन से कुछ पे्ररणा लेने की कोशिश करेंगे।

भगवान महावीर साधना के शिखर-पुरुष हैं। वे हमारे लिए किसी दीप-शिखा और प्रकाश-स्तम्भ की तरह हैं। उनका साधनामय जीवन हमारे लिए आध्यात्मिक संबल बन सकता है। महावीर की साधना 'संवर और 'निर्जरा की साधना है। संवर का सम्बन्ध नए कर्म न बँधे इस बात की जागरूकता से है और निर्जरा का सम्बन्ध पूर्व बद्ध कर्मों के क्षय करने से है। संवर एक तरह से जीवन के अश्व पर लगाई गई लगाम है, जबकि निर्जरा जीवन की आंतरिक शुद्धि है। संवर को हम दूसरे शब्दों में संयम भी कह सकते हैं। महावीर ने अहिंसा, सत्य, अचौर्य, अपरिग्रह और ब्रह्मïचर्य की बात कहकर एक तरह से संवर मार्ग की ही स्थापना की है। यदि हम किसी की हिंसा नहीं करते, झूठ नहीं बोलते, चोरी नहीं करते, परिग्रह-बुद्धि नहीं रखते और मैथुन का सेवन नहीं करते तो ऐसा करके हम नए कर्मों के आगमन के द्वारों को अवरुद्ध कर डालते हैं। नए कर्म न बँधे यह साधक की पहली सचेतनता हो और पहले से बँधे कर्मों को कैसे काटा जाए यह साधक की दूसरी सचेतनता हो।

महावीर ने संवर-मार्ग को जीने केलिए संयम को अपनाया और निर्जरा तत्त्व को जीने के लिए तप और ध्यान का मार्ग स्वीकार किया। महावीर की साधना का मूल आधार ही ध्यान है। तपस्या तो उनके लिए ध्यान में सहयोगी की तरह है। उन्होंने तपस्या की नहीं, बल्कि ध्यान-साधना में अपना अधिकतम समय समर्पित करने के कारण तपस्या अपने-आप हो गई। कोई अगर जानना चाहे कि महावीर ने संन्यास लेने के बाद अपने साधना-काल केदौरान क्या किया तो $जवाब होगा उन्होंने लगातार एकमात्र ध्यान किया। अपने साधना-काल के साढ़े बारह वर्षों में उन्होंने ध्यान के सिवा और कुछ नहीं किया। चूंकि ध्यान महावीर का मूल मार्ग है, इसलिए अगर किसी को महावीर तक पहुँचना है तो उसे महावीर के मूल मार्ग को अपनाना होगा। पूजा-पाठ, आराधना करना हमारी श्रद्धा की अभिव्याक्ति अवश्य है, पर महावीर को अगर पाना है तो महावीर के मूल मार्ग अर्थात ध्यान को अधिक से अधिक जीना होगा । महावीर नहीं चाहते कि कोई व्यक्ति महावीर का भक्त बने। महावीर चाहते हैं हर व्यक्ति स्वयं महावीर बने। महावीर का मार्ग जैन होने का मार्ग नहीं है। महावीर का मार्ग जितेन्द्रिय होने का मार्ग है। वे स्वयं भी अरिहंत बने और हमारे लिए भी अरिहन्त होने का मार्ग प्रशस्त कर गए। अरिहंत का मतलब होता है अपने आपको जीतना, अपने आंतरिक शत्रुओं पर विजय प्राप्त करना।

महावीर ने सिद्धों को नमस्कार करके महान दीक्षा धारण की थी। हम भी सिद्ध-बुद्ध-मुक्त आत्माओं के प्रति अपने हृदय में आदर और सम्मान का स्थान दें और अपनी साधना की हर बैठक से पूर्व सिद्धों का स्मरण करके उन्हें अपने अंतरमन के प्रणाम समर्पित करें और फिर अपनी साधना में स्थित हों। नमन करने का उद्देश्य है : अपने अहम्-भाव को विनम्र करना, विनय-भाव को हृदय में स्थान देना।

महावीर का साधनामय जीवन


महावीर साधनागत एकाग्रता केलिए आलम्बनों को भी अपनाते थे और आलम्बनों से मुक्त होकर भी ध्यान करते थे। वे कभी नदी-तट पर खड़े होकर जल की लहरों का आलम्बन लेकर ध्यान करते तो कभी चैत्य में ठहरे हुए होने के कारण चैत्य की आड़ी-तिरछी दीवारों को आलम्बन बना कर ध्यान करते थे। वे कभी आकाश और बादलों पर त्राटक करते तो कभी तारों-सितारों पर आँखें गड़ा कर अंतर-आत्मा में ध्यान करते थे। वे कभी पूर्व दिशा की ओर मुँह करके ध्यान करते तो कभी पश्चिम दिशा की तरफ। कभी उत्तर की तरफ ध्यान करते तो कभी दक्षिण की ओर। वे ईशान, नैऋत्य और अग्निकोण आदि अनुदिशाओं की ओर बैठकर ध्यान करते थे। जो लोग मानते हैं कि पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुँह करके ध्यान करना चाहिए उन्हें महावीर की साधनागत स्थिति से यह पे्ररणा लेनी चाहिए कि हमें दिशा को महत्त्व देने की ब$जाय अपनी साधनागत-अंतरलीनता को महत्त्व देना चाहिए। अंतर-आत्मा में अगर तल्लीनता है तो हम किसी भी दिशा में बैठकर ध्यान करें इससे क्या फर्क पड़ता है। मन में अगर एकाग्रता और लयलीनता न हो और पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुँह करके बैठ गए तो इससे कौनसा लाभ मिल जाएगा?

महावीर ज्यादातर खड़े होकर ध्यान करते थे। खड़े होकर ध्यान करना साधना का सर्वोच्च आसन है। खड़े होकर ध्यान धरने से अंतर-जागरुकता अधिक रहती है। जो लोग खड़े होकर ध्यान नहीं कर सकते, इतना शारिरिक बल न हो तो बैठकर ध्यान कर सकते हैं। महावीर बैठकर भी ध्यान करते थे। वे पदï्मासन और उकड़ू आदि आसन में बैठकर ध्यान करते थे। ध्यान के लिए अगर हमसे पदï्मासन लगता हो तो अति उत्तम, पर यदि पदï्मासन के कारण पाँवों की मांसपेशियों में दर्द या खिंचाव महसूस हो, तो सहज सुखासन में बैठ सकते हैं। वास्तव में ध्यान के लिए आसन ऐसा होना चाहिए जिससे शरीर में किसी तरह का तनाव या पीड़ा नहीं होनी चाहिए। जिस स्थिति में हम दो घड़ी या उससे ज्यादा देर तक सहजता से बैठ सकते हों ध्यान केलिए वही स्थिति या आसन बेहतर है। बस ऐसा आसन नहीं होना चाहिए जो प्रमाद को बढ़ावा न दे। ध्यान में बैठने के बाद हमें हिलना-डुलना नहीं चाहिए। शरीर, वाणी और मन तीनों को शांत, एकाग्र और स्थित कर लेना चाहिए।

मैं लेटकर ध्यान करने का निषेध करता हूँ। लेटकर ध्यान तभी करना चाहिए जब शरीर रुग्ण हो अथवा बहुत थका हुआ हो। मेरी समझ से अगर शरीर अधिक परिश्रांत हो तो ध्यान करने की ब$जाय कायोत्सर्ग या योगनिद्रा का अभ्यास करना चाहिए। इसके तहत ध्यान नहीं किया जाता, बल्कि शांत मन:स्थिति से शरीर का शिथिलीकरण, रिलेक्शेसन किया जाता है। विशेष थकावट की स्थिति में ध्यान की बजाय विश्राम ही श्रेष्ठ विकल्प है।

ध्यान-मुद्रा


महावीर ध्यान के समय अपनी कमर, पीठ, गर्दन और मस्तक को सहज सीधा रखते थे - सीधी रेखा की तरह। कन्धे, हाथ और शरीर के अन्य अंगों को वे शिथिल अवस्था में रखते यानी पूरी तरह खिंचाव और दबाव से मुक्त। जैसे खूंटी पर टँगी कमीज का बीच का हिस्सा बिलकुल सीधा रहता है बाकी का सारा भाग शिथिल और लटका हुआ रहता है, ऐसे ही हम भी जब भी ध्यान में बैठें सीधी कमर बैठें, सीधी रेखा की तरह, कमर, पीठ, गर्दन और मस्तक को सीधा रखें।

ध्यान-विधि


महावीर ध्यान के लिए अपनी दृष्टिï को नासाग्र पर केन्द्रित रखते थे। नासाग्र का मतलब है नासिका का वह अग्रभाग जहाँ से शरीर में श्वास का प्रवेश होता है। नासाग्र पर ध्यान केन्द्रित करने से दिमाग में किसी भी तरह का खिंचाव व तनाव नहीं होता। नासिका-प्रदेश हमारी चित्त-धाराओं से सबसे करीब है। नासाग्र पर ध्यान धरने पर हम सीधे अपनी साँस-धारा से जुड़ते हैं। श्वास का सीधा सम्बन्ध हमारी चित्त और चेतना दोनों से हैं। चित्त-धाराएँ श्वास की गति को प्रभावित करती हैं। श्वास पर नियन्त्रण करने से चित्त-धाराओं पर नियन्त्रण अपने आप होने लगता है। ध्यान साधक के लिए श्वास उसका मास्टर है, उसका गुरु है। चेतना स्वयं साँस लेती है और साँसों में प्राण-शक्ति व्याप्त रहती है। साँस एक तरह से हमारी जीवन-शक्ति को, चेतना की बैटरी को चा$र्ज करती रहती है। साँस-धारा पर अपनी आत्म-स्मृति को कायम करना ध्यान में स्थित होने का सर्वोत्तम साधन है। जो लोग सीधे श्वास पर सचेतन होने पर सफल नहीं हो पाते है उनके लिए मन्त्र-ध्यान है। ऐसे लोग मन को केन्द्रित करने के लिए साँस को गहरी करते हुए हर आती-जाती श्वास के साथ ओम् या सोहम् का स्मरण करें और श्वासों में डूबते जाएँ, डूबते जाएँ, इतने डूबते चले जाएँ कि साँस विलीन हो जाए और केवल डूबना ही शेष रह जाए।

ध्यान के लिए महावीर अनेक दफा अद्र्धोन्मीलित अवस्थ भी रखते थे अर्थात ध्यान के समय आँखें आधी बन्द और आधी खुली। जो साधक इस प्रयोग को करना चाहे, जिन्हें अनुकूल लगता हो वे महावीर की इस अवस्था को प्रयोग के रूप में अपनी साधना से जोड़ सकते हैं। आँखें आधी बन्द इसलिए ताकि बाहर की गतिविधियाँ, बाहर के दृश्य प्रभावित न कर पाएँ और आधी खुली इसलिए ताकि निद्रा हम पर हावी न हो जाए। आँखों को आधी बन्द और आधी खुली रखकर नासाग्र पर ध्यान धरने से हमें अपने आभामंडल और अपने चित्त की लेश्याओं का रंगबोध भी हो सकेगा। जिसे अपने आभामंडल में कालापन का अहसास हो वह कृष्ण लेश्या से घिरा हुआ है। नीले रंग का अहसास होने का मतलब है हमारी नील लेश्या है। कबूतरी रंग का अनुभव हो जाने पर कापोत लेश्या है। पीले रंग या सूर्य की लालिमा जैसे रंग का अनुभव हो तो इसका मतलब है हममें पीत लेश्या की अधिकता है। गुलाबी रंग पद्म लेश्या का परिचायक है तो सफेद और उजास भरा प्रकाश का रंग शुक्ल लेश्या का प्रतीक है। जिन्हें आँखों को आधी बन्द या आधी खुली रखने से आँखों की कोशिकाओं में खिंचाव या बोझिलता महसूस होने लगे वे पलकों को पूरा झुका कर यानी आँखों को बन्द करके ध्यान करें। ध्यान के लिए शरीर और उसके सभी अंगों का तनाव और पीड़ारहित होना अनिवार्य है।

महावीर ध्यान में मंद मंद श्वासोच्छ्वास लेते। इसका मतलब यह है कि महावीर श्वास की गति को धीमी करते और बहुत ही शांत और धीमी साँस लेते। मंद-मंद श्वासोच्छ्वास लेना ध्यान केलिए एक श्रेष्ठï भूमिका का काम करता है। तेज साँस चित्तको उद्वेलित कर सकती है। इसीलिए मंद-मंद श्वासोच्छ्वास का मार्ग सुझाया गया है। वैसे मैं व्यक्तिगत सलाह यह दूँगा कि जब भी ध्यान में बैठें ध्यान में प्रवेश केलिए पहले शांत गति की गहरी साँस लिया करें। गहरी साँस हमारे शरीर में अतिरिक्त प्राण शक्ति का संचार करती है। हमें इससे अतिरिक्त ऑक्सीजन मिलता है। गहरे श्वासोच्छ्वास से चित्त में अपने आप लयलीनता बनने लगती है।

दीर्घ श्वास लेना और छोडऩा एक तरह से सचेतन प्राणायाम है। और प्राणायाम पंतजलि की दृष्टि में प्रत्याहार का आधार बनता है। पहले लगभग 5 मिनट तक शांत गति की गहरी साँस लें, फिर करीब 5 मिनट तक श्वास पर संयम करते हुए मंद-मंद श्वासोच्छ्वास लें और फिर अपनी सहज नैसर्गिक साँसों में डूबते जाएँ। इस डूबने को ही लयलीनता कहते हैं। हम मनोयोग पूर्वक डूबते ही जाएँ, डूबने को आत्मसात करते जाएँ। जब हम मन, वचन और काया से बहिरात्म-भाव को त्यागकर अंतर-आत्मा में डूबते चले जाते हैं तो संवर और निर्जरा खुद-ब-खुद हममें आत्मसात होने लग जाते है। हम आत्म-ज्ञान और आत्मानुभूति में स्थित होते चले जाते हैं।

ध्यान के लिए महावीर के तीन शब्द बड़े महत्त्वपूर्ण और मूल्यवान हैं - ठाणेणं यानी स्थित हो जाओ। मोणेणं - मौन हो जाओ। झाणेणं - ध्यानस्थ हो जाओ। अर्थात ध्यान के लिए शरीर को स्थित करो। ध्यान में बैठो तो शरीर हिले-डुले नहीं। शरीर के हलन-चलन को बन्द करके पूरी तरह निश्चल हो जाओ। भीतर बाहर से मौन हो जाओ और श्वासोच्छ्वास पर सचेतन होते हुए, श्वासों में डूबते हुए ध्यानस्थ हो जाओ। महावीर के ध्यान के स्वरूप का यही सार है।

भगवान महावीर की परम्परा में पिंडस्थ पदस्थ, रूपस्थ और रूपातीत के नाम से ध्यान के चार चरणों की प्ररूपणा हुई है। पिंडस्थ ध्यान में हम कायानुपश्यना करते हैं। इसके अंतर्गत हम सिर से लेकर पाँव के अंगूठे तक प्रत्येक अंग और शरीर की हर संवेदना की अनुभूति करते हैं। पहले मस्तक का शिखा-प्रदेश फिर क्रमश: ललाट, आँखें, नाक, होंठ, जीभ, गला, कन्धे, हाथ, कोहनी, कलाई, हथेली, अँगुलियाँ, छाती, आँत, नाभि, पेट, जँघा, घुटने, पिंडली, एड़ी, पगथली, अँगुलियाँ, बैठक, मेरुदण्ड, कमर, पीठ, गर्दन, कान, मस्तिष्क।

पदस्थ-ध्यान में हम मैं कौन हुँ? कहाँ से आया हूँ? कहाँ जाऊँगा? मेरा वास्तविक स्वरूप क्या है? या सोहम जैसे किसी आध्यात्मिक पद का अंतरमन में स्मरण करते हैं, उसमें डूबते है, उसकी गहराई में उतरते हैं। रूपस्थ ध्यान में हम वीतराग-स्वरूप या इष्टï प्रभु की छवि का ध्यान करते हैं। रूपातीत ध्यान में हम हर शब्द, आरोपण और अनुभूति से मुक्त हो जाते हैं। हम देहातीत अवस्था को उपलब्ध होते हैं। हम केवल आत्मस्थ होते हैं।

महावीर की यह विशेषता थी कि जब वे ध्यान करते तब केवल उसी समय ध्यानस्थ नहीं होते बल्कि जब वे चलते तब भी ध्यानपूर्वक ही चलते। उन्होंने अपने शिष्यों और अनुयायियों से भी यतनापूर्वक चलने, बैठने, बोलने और खाने-पीने की पे्ररणा दी। यतना का अर्थ है किसी भी क्रिया को ध्यानपूर्वक, जागरूकतापूर्वक सम्पादित करना। महावीर ध्यानपूर्वक चलते थे। वे चलते समय इधर-उधर नहीं देखते। न किसी के पुकारने पर बोलते थे। मौनपूर्वक, मार्ग को देखते हुए चलते थे। समिति-गुप्ति का पालन करते थे। समिति का अर्थ है सम्यक् प्रवृत्ति और गुप्ति का अर्थ है मन-वचन-काया पर नियंत्रण।

यदि हम महावीर के साधनामय जीवन पर थोड़ा और ध्यान दें तो हमें हमारे जीवन के लिए और अधिक आध्यात्मिक रोशनी मिल सकती है। हम समझें कि महावीर का आहार, विहार, निद्रा, वाणी-व्यवहार, यात्रा-प्रवास, भावना, वृत्ति और तप: साधना कैसी थी।

धमहावीर का आहार


महावीर कुल 72 वर्ष तक धरती पर सशरीर रहे, जिनमें साढ़े बारह वर्ष तो उनका साधना काल में बीता। साधना-काल के कुल 4515 दिनों में मात्र 341 दिन ही महावीर ने आहार लिया। 4226 दिन वे निराहार रहे। ऐसा नहीं है कि महावीर को आहार-संज्ञा नहीं थी। वास्तव में महावीर इतने अधिक ध्यान-दशा में रहते कि उन्हें देह के गुण धर्म प्रभावित ही नहीं कर पाते। हम ध्यान कम करते हैं इसलिए हमें शरीर के गुण-धर्म, आहार, निद्रा, भय, मैथुन की संज्ञाएँ प्रभावित कर लेती हैं। कंठ-कूप में ध्यान करने से जहाँ शरीा की ऊर्जा की शुद्धि होती है वहीं भूख-प्यास से भी निवृति होती है। महावीर जब भी आहार लेते तो सामान्य तौर पर रूखा आहार ही लिया करते थे। अधिक चिकना या गरिष्ठï भोजन वे ग्रहण नहीं करते थे। शुद्ध, सात्विक और संयमित आहार लेना ही अपन सब साधकों का विवेक हो।

महावीर सूर्य-आतापना भी लेते थे। सूर्य स्वयं ऊर्जा का पिंड है, शक्ति का भंडार है। वे घंटों सूर्य की ओर मुँह करके बैठ जाते। इससे उन्हें सूर्य की ऊर्जा पर्याप्त मात्रा में मिल जाती। अभी हाल ही माणकचंद भाई नाम के एक सज्जन मिले जिन्होंने पिछले 4 वर्षो से अन्न-जल ग्रहण नहीं किया। वे प्रतिदिन दो घंटे सूर्य आतापना लेते हैं। हालांकि यह सबके लिए पे्रक्टिकल नहीं है। निश्चित तौर पर यह एक अत्यन्त दुष्कर कार्य है, पर फिर भी कुछ लोग ऐसे होते हैं जिन्हें आहार-संज्ञा कम या अत्यन्त अल्प होती है।

हमें महावीर की साधना से प्रेरणा लेते हुए महिने में एक उपवास या एकासन-व्रत करना चाहिए। दिन में दो बार खाने से अगर चल जाए तो तीसरी बार खाने पर संयम कर लेना चाहिए। कम-से-कम सूर्यास्त से सूर्योदय तक अर्थात रात्रि-भोजन न करने का मानस तो अवश्य बना लेना चाहिए। ख्राने के लिए भला क्या मरना। सुबह तो उसे निकालना ही होता है। ज्यादा खाते रहना कोई पुण्य कार्य तो है नहीं कि जिसे हम दिनभर और देर रात तक करते रहें। हाँ, भूख से दो कौर कम खाना ऊनोदरी-तप अवश्य है।

निद्रा


जिन्हें आहार-संज्ञा होती है उन्हें निद्रा-संज्ञा भी होती है। जो आहार-संज्ञा पर विजय प्राप्त करने में सफल हो जाते हैं वे निद्रा-संज्ञा पर भी वियज प्राप्त करने में सफल हो जाते हैं। भगवान महावीर ने न के बराबर नींद ली। प्रमाद को वे साधना का शत्रु मानते थे और निरन्तर अप्रमत्त योगी बनकर विचरण करते थे। उन्हें जब भी नींद आती तो वे क्षण भर नींद लेकर पुन: जागृत हो जाते। कभी-कभी रात में नींद आने पर घड़ी दो घड़ी बाहर भ्रमण कर लेते और फिर ध्यानस्थ हो जाते। चाहे रात हो या दिन महावीर लगातार ध्यान ही करते रहे। मान्यता यह रही है कि महावीर ने अपने 4515 दिन के साधना-काल में केवल तीन घन्टे नींद ली - यह बड़े आश्चर्य की बात है। अपन जैसे लोगों के लिए तो संभव नहीं है।

वाणी-व्यवहार


महावीर की एक खास बात और है कि वे अधिक बोलने के आदी नहीं थे। परम ज्ञान की प्राप्ति के बाद तो उन्होंने जनमानस को खूब सम्बोधित किया, पर इससे पूर्व अपने साधना-काल में वे अधिकतम मौन ही रहे। विशेष आवश्यक हो तो ही वे वाणी का उपयोग करते थे। बाकी वे एकान्त, मौन और ध्यान को ही जीते थे। आचारांग सूत्र में उन्हें 'अबहुभाषी कहा गया है। अगर वे कहीं ठहरे हों और अगर कोई पूछे कि अंदर कौन है? तो इतना ही कहते - मैं मुनि हूँ।

भगवान के सुदीर्घ मौन से हमें प्रतिदिन दो घन्टा मौन व्रत लेने की प्रतिज्ञा लेनी चाहिए। सामायिक करने की परम्परा तो समाज में कायम है, लेकिन यदि हम मौन का अभ्यास भी शुरू कर लें तो इससे जहाँ अंतरमन में शांति आएगी वहीं क्रोध, कषाय तथा घर-गृहस्थी की कई सरपच्चियों से मुक्ति मिल जाएगी।

प्रवास


महावीर के लिए एक प्रश्न बड़ा महत्त्वपूर्ण है कि दीक्षित होने के बाद महावीर कहाँ ठहरते थे। महावीर प्राय: जंगल में या गाँव के बाहर रुका करते थे। वे अपन लोगों की तरह शहर या बस्ती में नहीं ठहरते। वे अपने मस्ती के और साधना करने वाले संत थे। वे शून्य स्थानों में ठहरते ताकि वे एकांत में अपनी साधना कर सकें । शहर या गाँव में रहकर तो घर-गृहस्थियों के साथ मुलाकात और संवाद करने में ही समय बीत जाता है। महावीर तो एकान्तवासी थे। आज सारे साधु-साध्वी जी महाराज शहरवासी हो गए हैं। ध्यान का मार्ग उनसे छूट गया है। वे पूजा, प्रतिष्ठा, गौतम-प्रसादी या बाह्य क्रिया-कलापों में ही उलझ गए हैं। मोक्ष का पथ कुछ और था और हमने कुछ और ग्रहण कर लिया है। एकान्त या अरण्य में अब साधुजन नहीं रहते। पहले महावीर और उनके मुनि गुफाओं में रहते थे, श्मशानों में साधना करते थे, वृक्षों के नीचे बैठकर ध्यान करते थे। अब ये बातें केवल शास्त्रों में लिखी हुई बातें रह गई हैं। अब या तो ऐसी प्रेरणाएँ रही नहीं है या फिर वैसे पुरुषार्थशील लोग नहीं रहे हैं। अगर भगवान महावीर से पे्ररणा लेकर कुछ संत लोग तप, त्याग और साधना का ऐसा कोई संकल्प लेते हैं और अपनी आध्यात्मिक साधना के लिए एकान्तवासी बनते हैं तो इससे न केवल स्वयं धन्य होंगे बल्कि उनका धर्म और यह युग भी धन्य होगा।

भावना


यदि हम भगवान महावीर की भाव-दशा पर गौर करें तो पाएँगे कि वे एकत्व-भावना में लीन रहते थे। एकत्व-भावना का अभिप्राय है संसार में जीव अकेला आता है, अकेला जाता है, शेष सब संबंध संयोग मात्र हैं। महावीर अपनी आत्म-निजता को छोड़कर अपने शरीर तक को भी पर-पदार्थ मानते थे। महावीर कहा करते थे - जे एगं जाणई से सव्वं जाणई - जो एक को जानता है वह सारे संसार को जान लेता है। महावीर एकत्व-भाव में अर्थात आत्म-भाव में लीन रहते थे, शेष सभी वस्तुओं, व्यक्तिओं और परिस्थितियों के प्रति उदासीनता / उपेक्षा-भाव रखते थे। अपेक्षा दु:ख और कषाय का कारण बनती है और उपेक्षा शांति का। उपेक्षा यानी उदासीनता, निरपेक्षता। अपने इसी उपेक्षा-भाव के चलते महावीर बड़े से बड़ा कष्टï, उपद्रव और परिषहों का सामना करने में सफल हुए थे।

वृत्ति


अंतिम बात, महावीर की एक सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे किसी भी बात का आग्रह-दुराग्रह नहीं रखते थे। वे अनाग्रह-वृत्ति के मालिक थे। इसी वृत्ति के चलते उन्होंने स्याद्वाद और अनेकांत जैसे उदारवादी सिद्धान्तों को जन्म दिया। स्याद्वाद का मतलब है : शायद तुम्हारी बात भी ठीक है। अपनी बात का दुराग्रह करना एकांतवाद है और सामने वाले की बात का सम्मान करना स्याद्वाद है।

महावीर की यह सबसे खास बात है कि उन्होंने अपना सहज जीवन जीया। वे न भोजन के प्रति आग्रह रखते थे, न वस्त्र के प्रति। जब दीक्षा धारण की तो सम्पूर्ण राजकीय पौशाक उतार दी और निर्वस्त्र हो गए। दीक्षा के उपरांत देवराज इन्द्र ने उन्हें देवदुस्य वस्त्र दिया तो उसे अपनी सहज और अनाग्रह वृत्ति के चलते कंधे पर सहजतय धारण कर लिया। उन्होंने ऐसा कोई दुराग्रह नहीं रखा कि निर्वस्त्र हो गया हूँ तो अब कोई वस्त्र धारण नहीं करूँ गा। बाद में सोमिल ब्राह्मïण उनसे सहयोग की याचना करने आया तो उसे सहजभाव से कंधे पर ओढ़ा हुआ बहूमूल्य वस्त्र प्रदान कर दिया। एक गाँव से दूसरे गाँव जाते हुए अगर बीच में नदी आई तो ऐसा काई आग्रह नहीं रखा कि पैदल ही रास्ता पार करूँगा। नदी पार करने केलिए उन्होंने बेझिझक नौका का भी उपयोग कर लिया। हालांकि यह एक विचारणीय बिन्दु है कि भगवान महावीर आज होते तो एक गाँव से दूसरे गाँव जाने के लिए पैदल ही यात्रा करने का आग्रह रखते या जरूरत पडऩे पर अन्य साधनों का भी उपयोग कर लेते।

निश्चित तौर पर महावीर ने सहजता को मूल्य दिया। वे आग्रह और अनाग्रह दोनों से ही मुक्त थे। वे विकल्पों से ही नहीं, संकल्पों से भी मुक्त थे।

सचमुच, महावीर दिव्य मूर्ति थे, साधना-मूर्ति थे, तपोमूर्ति थे। उनका साधनामय जीवन हमारे लिए आध्यात्मिक प्रकाश-स्तम्भ का काम करता है। महावीर महापुरुष हैं और हमें महापुरुषों से अपने जीवन के लिए पे्ररणा की रोशनी लेनी चाहिए। प्रयास कुछ ऐसा हो जिससे हमारी साधना में और निखार आए, दृढ़ता आए, परिपक्वता आए। सार इतना ही है कि महावीर चाहते हैं कि तुम महज महावीर-भक्त नहीं, स्वयं महावीर बनो। तुम महावीर की संतान हो तो महावीरत्व से कम में समझौता मत करो।अपनी ओर से प्रेमपूर्वक इतना ही निवेदन है।




गुरुदेव श्री

श्री चन्द्रप्रभ सागर जी म. :- विचार और व्याख्यान


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