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माँ मुक्ति चाहिए तो महावीर की अंगुली थामिए - पूज्य श्री ललितप्रभ


भगवान महावीर ने जितने महान संदेश दिए उतना ही महान जीवन भी जिया इसी कारण वे कभी आउट आफ डेट नहीं हो सकते वरन सदा अप टू डेट रहेंगे। महावीर को पढ़ा और सुना जाए तो मन पवित्र होता है और उनके संदेशों को जिया जाए जीवन धन्य होता है। इसलिए महावीर जैन नहीं जिन थे। वे केवल जैनों के नहीं वरन सम्पूर्ण मानवता के भगवान हैं। अगर उनके अहिंसा, अनेकांत, समता, समानता, सहयोग जैसे संदेशों को विश्वभर में फैला दिया जाए तो विश्व मैत्री और विश्व शांति का सपना शीघ्र साकार हो सकता है। महावीर शब्द की व्याख्या करें तो पता चलेगा कि महावीर का म महादेव का, ह हनुमान का, व विष्णु का व र राम का वाचक है। महावीर का नाम लेने से चारों महापुरुषों को एक साथ प्रणाम हो जाता है। हमें महावीर का म महान बनने, ह हिम्मत न हारने, व वचन निभाने और द जीवों पर दया करने की प्रेरणा देता है। जैसे राम ने रावण का और कृष्ण ने कंस का संहार किया वैसे ही वद्धर्मान ने क्रोध और कषाय के कंस का एवं राग और द्वेष के रावण का अंत कर वीरों के वीर महावीर बन गए।

महात्मा गांधी भारत के राष्ट्रपिता हैं, पर भगवान महावीर भारत के प्राण हैं क्योंकि गांधी ने महावीर द्वारा प्रदत अहिंसा के अस्त्र से ही भारत को आजादी दिलवाई थी। महावीर के अनुयायियों इस बात का सदा ध्यान रखे कि नेता को वोट, अमीर को नोट, और आगे बढने वालों को सपोट चाहिए, पर महावीर को केवल आपकी खोट चाहिए। उन्हें वैभव चढ़ाने की बजाय अपनी बुरी आदतें चढ़ाएँ ताकि आपका जीवन निर्मल और पवित्र बन सके। आज के युग में महावीर चाहते हैं कि हम दूसरों के जीवन में आग लगाने की बजाय बाग लगाएँ। किसी विद्यालय, अनाथालय, वृद्धाश्रम, हॉस्पिटल में कमरा बनाएँ, ऐसा न कर सकें तो किसी अपाहिज को व्हीलचेयर दिलाएँ, छोटी-सी प्याऊ खोल दें, किसी को अच्छी पुस्तक पढने के लिए दे दें, एक पेड़ लगा दें, ये भी न कर सकें ऐसी अच्छी बातों को दूसरों को बता दें, महावीर खुश हो जाएँगे।

गृहस्थ का धर्म है दान और पूजा - भगवान महावीर ने कहा है कि संत के दो धर्म है ज्ञान और ध्यान और गृहस्थ के दो धर्म है दान और पूजा। हर व्यक्ति जीवन में दान देने की आदत डाले। चाहे थोड़ा ही दो, पर रोज दो। जो करना है अपने हाथों से करके जाना। कल का कोई भरोसा नहीं है और हमारे पीछे हमारे नाम पर दान-पुण्य होगा इस बात पर भी भरोसा मत करना। याद रखें, इस दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं कुछ खाकर खुश होते हैं तो कुछ खिलाकर। जो खाकर खुश होते हैं वे सदा औरों पर आश्रित रहते हैं, पर जो खिलाकर खुश होते हैं उनके भंडार प्रभु-कृपा से सदा भरे हुए रहते हैं। महिलाएँ वस्त्रदान करें। जब भी नई साड़ी खरीदें पहले एक पुरानी साड़ी का दान कर दें। इससे परिग्रह भी नहीं बढ़ेगा, गरीबों की सेवा भी होगी और नई साड़ी भी आ जाएगी। अगर कोई गरीब या जरूरतमंद बीमार दिख जाए तो उसे औषधि दान दें। अगर किन्हीं लोगों या सामाजिक संस्थाओं के पास अतिरिक्त जमीन हो तो वे भूदान करें। अपने जरूरतमंद भाइयों को मकान बनाकर दें। जीते जी एक बार रक्तदान और मरने के बाद नेत्रदान करें। अन्नदान, वस्त्रदान, औषधिदान, ज्ञानदान, भूदान, रक्तदान, नेत्रदान देकर न केवल भगवान महावीर आप पर सदा मेहरबान रहेंगे वरन् आप मानवता के ऋण से भी मुक्त हो जाएँगे।

भीतर के भगवान को न चढ़ाएँ नशा-भगवान महावीर कहते हैं कि इंसान मेरे मंदिर में तो नशा नहीं चढ़ाता तो फिर भीतर के जीते-जागते भगवान को नशा क्यों चढ़ा देता है। याद रखना, जिनके खान-पान का कोई पता नहीं होता उनके खानदान का भी कोई पता नहीं होता। एक महिला शराबी पति की पत्नी बनने की बजाय विधवा बनना ज्यादा पसंद करेगी क्योंकि शराबी के साथ रहने की बजाय विधवा रहने में ज्यादा सुख है। बहिनों को चाहिए कि अगर घर में कोई नशा कर रहा है तो एक बार वे घर में युद्ध जैसा मोर्चा खोल लें। खाना बनाना और खिलाना छोड़ दें। जब तक घर व्यसनमुक्त न हो जाए तब तक चुपचाप न बैठें। अभिभावक बच्चों को कार से पहले संस्कार दें। बच्चों को आजादी दें, पर अंकुश भी रखें। उन्हें गलत संगत से बचाकर रखें। अगर बच्चे व्यसनों से घिर गए हैं तो हिम्मत करके उन्हें कहें कि वे या तो व्यसन छोड़ें या घर। बिगड़ेल बच्चों के बाप कहलाने की बजाय बिना बच्चों के रहना ज्यादा अच्छा है। साथ ही उन्हें सम्पत्ति के हक से भी वंचित रखें। अगर आप बच्चों को गलत दिशा में जाने से रोक नहीं सकते तो कृपया करके बच्चों को पैदा ही न करें। अगर आप खुद व्यसन करते हैं तो सावधान! आने वाले कल में आपके बच्चे आपकी बुरी आदतों के चलते आपका नाम लेने में भी शर्म महसूस करेंगे। याद रखें, व्यक्ति की सच्ची दीक्षा उस दिन होती है जिस दिन वह बुरी आदतों का त्याग कर अपने संस्कारों को सुधार लेता है।

महावीर की बुनियादी सीख हमारा आहार शाकाहार-अगर हम महावीर से प्रेम करते हैं तो अहिंसा को फिर से जीवित करने का संकल्प लें। परदों पर अहिंसा के संदेश लिखने की बजाय जीवन में अहिंसा लाए। हाथों में अहिंसा के बैनर रखना और पांवों में चमड़े के जूते पहनना कौन-सा धर्म है। चमड़े की वस्तुओं का उपयोग करने वाले भी उतने ही दोषी हैं जितना माँस खाने वाले। हम मांसाहार का त्याग तो करें ही साथ ही एक वर्ष में कम-से-कम एक मांसाहारी को मांस छुड़ाने का संकल्प भी लें। हम मांसाहारियों को समझाएँ कि जानवर बेजुबान तो होते हैं, पर बेजान नहीं। अगर हमारे शरीर में केवल पिन चुभ जाए तो हम कराह उठते हैं, सोचो जिन जीवों पर कटार चलती है उन्हें कितनी पीड़ा होती होगी? हमारा पेट कोई कब्रिस्तान नहीं है जो उसमें मरे जीवों को डाला जाए। जब शाकाहार के विकल्प मौजूद है तो फिर मांसाहार करने जैसा घृणित पाप क्यों किया जाए। इस संदेश को हम सब जगह टंगवा दें - संडे हो या मंडे, कभी न खाओ अंडे। जो खाएगा अंडे, उसके ऊपर पड़ेंगे डंडे। जब हम जीयो और जीने दो का नारा अपना लेंगे तभी महावीर का सच्चे अर्थों में धरती पर अवतरण हो पाएगा। आप सबको भगवान महावीर के जन्म कल्याणक अवसर पर ढेर सारी शुभकामनाएँ। आपका जीवन सुखमय, धर्ममय और आनंदमय हो।


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