slide3-bg



नारी मन में न रखें किसी तरह का बोझ


हर मनुष्य उस अन्तर्दृष्टि का स्वामी बने जिससे जीवन के निर्भार होने का मार्ग प्रशस्त हो सके। उस ज्ञान-दृष्टि का मालिक बने जिससे वह अपने जीवन के भार को नीचे उतार फेंके। कौन आदमी ऐसा होगा जो अपनी पीठ पर बोझ को लादे हुए घूमेगा। आदमी मजबूरी में बोझा अपने कंधे पर उठाता हैय सामान को एक जगह से दूसरी जगह पहुँचाना हो, तो आदमी बोझ को अपने कंधे पर ढोएगा, मगर ऐसा कोई मूर्ख नहीं होगा जो बेवजह अपनी पीठ पर बोझा ढोए।

साधु-फकीर लोग अपनी देह को यातना देते हैं और आम संसारी आदमी मानसिक यातनाओं को ओढ़ता है। अगर व्यक्ति किसी भी तरह का कोई कार्य कर रहा है तो वह बेमन से कर रहा है। बेमन से किया गया कार्य व्यक्ति के लिए भारभूत हो जाता है और उत्साहपूर्वक किया गया कार्य व्यक्ति के लिए प्रार्थना और पूजा बन जाया करता है। कार्य और कर्तव्य तो व्यक्ति के लिए देवदूत की तरह हैं, लेकिन बेमन से किए गए कार्य व्यक्ति के लिए नरक का लबादा ओढ़े हुए जीना है। हमारा हर कार्य हमारी मनोदशाओं का प्रतिबिंब बना करता है। हमारे हर कार्य में हमारे चित्त की प्रतिच्छाया अवश्य झलक आती है। अगर आप उत्साह, प्रेम, मनोयोग से कोई भी कार्य कर रहे हैं तो उस कार्य की स्फूर्ति, माधुर्य और आनंद ही अनेरा होता है। बेमन से अगर कार्य करने जाओगे तो पिता कहेंगेकृ जरा बाजार जाओ और अमुक-अमुक सामान खरीद लाओ। बेटा कहता हैकृ पिताजी यह सामान न मिले तो? पिता कहते हैं - तू नकारात्मक सोच रहा है, तो सामान मिलेगा भी कैसे? बेमन से किया गया कार्य कभी पूर्णता नहीं देता, चाहे वह कार्य व्यवसाय हो, सामाजिक सेवा हो या धार्मिक कलाप। हर कार्य को बड़े उत्साह के साथ करो। अगर झाड़ू भी लगाना हो तो ऐसे लगाओ मानो शेक्सपियर कविता लिख रहा हो। जीवन को इतने पुलक-भाव से जीयो।

जीवन से बढ़कर न तो शांति का कोई तीर्थ है, न आनंद का कोई धाम है और न ही माधुर्य का अखंड पाठ ही। जीवन को आनंद से जीयो, जीवन की सारी गतिविधियों को आनंद से अंजाम दो। भले ही कोई कार्य गलत प्रतीत हो, पर उसे भी बेमन से मत करो। उसमें भी एक आनंद को, एक रस को अपनी ओर से निछावर कर ही दो। अगर आपको लगता है कि आप अपने कार्य में असफल हो रहे हैंय आप जिस शैली से जी रहे हैं, वह आपके लिए भारभूत हो रही है तो आप अपने कार्य और शैली को मत बदलो। हर कार्य हमारे लिए एक आईने की तरह है और आईने में वही झलकेगा जो वस्तुस्थिति है। अगर आपका चेहरा आईने में भद्दा दिखाई देता है, तो आईने को न बदलें, अपने चेहरे पर प्रसन्नता ले आएँ।

उम्र भर गालिब एक ही गलती करता रहा धूल जमी थी चेहरे पर, वो आईना ही पोंछता रहा। आईना नहीं, अपना चेहरा धोएँ, खुद की मनोदशा को सकारात्मक बनाएँ। अपने कार्यों को न बदलें, वरन् कार्यों के प्रति रहने वाली जो मन की दशाएँ हैं, मन की स्थितियाँ हैं, उन्हें बदलें। मन की दशाएँ सुधरीं, तो कार्य अपने आप सुधर गया, मन की स्थितियाँ बदलीं, तो कार्य अपने आप बदल गया। एक ही सूत्र स्मरण रखें कि हर कार्य को बड़े मन से करें। आप सामायिक एक करते हैं या सात करते हैं, यह खास बात नहीं है। खास बात यह है कि आप कितने मन से सामायिक करते हैं। बेमन से अगर बीस सामायिक भी कर लोगे तो लाभ न देगी और मन से अगर दो सामायिक भी हुईं तो सामायिक अपना परिणाम देकर जाएगी। महत्त्व इस बात का नहीं है कि आप प्रतिदिन मंदिर जाते हैं कि नहीं जाते, महत्त्व इस बात का है कि आप कितने मन से मंदिर जाते हैं। अगर कोई व्यक्ति आज दरिद्र है, गरीब है तो इसलिए कि वह अपने जीवन के प्रति, अपने कार्य और कर्तव्य के प्रति मनोयोगपूर्वक सन्नद्ध नहीं है, ईमानदारीपूर्वक अपने कार्य और आशाओं के प्रति सजग नहीं है।

कार्य कोई छोटा या बड़ा नहीं होता। आदमी की मन की दृष्टि ही छोटी और बड़ी होती है। किसी के आगे सहयोग के लिए हाथ फैलाएँ, इससे तो अच्छा है कि जूस की दुकान खोलकर अपनी आजीविका चला लें। आप लोगों ने एक कार का नाम सुना होगा, फोर्ड कार का, जो दुनिया की बेहतरीन कारों में से एक है। हेनरी फोर्ड की आत्मकथा में जि़क्र है कि फोर्ड के घर पर एक भारतीय व्यक्ति मिलने के लिए पहुँचा। वह रास्ते भर सोचता रहा कि उनसे मिलने के लिए बड़ी हुज्जत करनी पड़ेगी, पहरेदारों की लंबी-चैड़ी फौज होगी। वह भारतीय जब उनके द्वार पर पहुँचा और अपना परिचय दिया तो उसे अंदर जाने की अनुमति मिल गई। भीतर जाकर देखा तो पाया कि फोर्ड भोजन स्वीकार कर रहे हैं। वह पास ही के सोफे पर बैठ गया। उसने देखा कि हेनरी फोर्ड भोजन करने के बाद अपनी जूठन को बटोर रहे थे, जो खाते वक्त इधर-उधर बाहर गिर गई थी। भारतीय व्यक्ति चैंका कि संसार का इतना बड़ा धनाढ्य आदमी और उनमें इतनी बड़ी लघुता! इतना ही नहीं, फोर्ड भोजन करने के बाद अपनी जूठी थाली को अपने ही हाथों से धोने लगे।

हेनरी फोर्ड और भारतीय व्यक्ति औपचारिक रूप से मिले तो भारतीय ने कहाकृमेरे मन में एक जिज्ञासा है कि आप अपनी जूठन को स्वयं क्यों बटोर रहे थे? आप जूठी थाली को स्वयं क्यों धो रहे थे? फोर्ड मुस्कुराए और कहा-जब जूठन मैंने बिखेरी है, तो मुझे ही बटोरना चाहिएय जब भोजन मैंने किया है तो थाली को भी मुझे ही साफ करना चाहिए। इसमें संकोच कैसा? क्या आदमी हर सुबह अपना भंगी स्वयं नहीं होता? जब हमारी गंदी बैठक हम खुद धोते हैं, तो हमारी जूठी थाली कोई और क्यों धोए। अगर कोई व्यक्ति अपनी जूठी थाली को उत्साह और आनंद से धो रहा है तो वह आनंद से धोना भी आपके लिए मुक्ति का आधार बन जाएगा। वहीं यदि कार्य बेमन से किया गया तो वही आपके जीवन की बेड़ी बन जाएगा। कार्य ही आपकी बेड़ी है और वही आपकी मुक्ति का आधार भी।

महत्त्व कार्य का कदापि नहीं होता, महत्त्व कार्य के प्रति रहने वाली आपकी दशाओं का है। भारभूत मन से कोई कार्य न करें। अगर आप किसी ग्राहक से बात कर रहे हैं, तो भी बड़े उत्साह से बात कीजिएय अगर आप मंदिर जा रहे हैं, तो बड़े उत्साह से मंदिर जाइएय अगर आप किसी को दो पैसे का सहयोग देते हैं तो बड़े आनंद और उत्साह से दीजिए। ऐसा न हो कि हजार लोग बैठे हैं और कोई बोली, कोई चढ़ावा बोला जा रहा है और आप भी बोल पड़ते हैंकृ मेरे नाम से इतना। बोलने के बाद जब घर पहुँचते हैं तो लगता है कि व्यर्थ ही बोला। तुमने समाज के बीच में अपने नाम की घोषणा की है, इसलिए देना तो पड़ेगा, मगर देने से पहले यह जो अनुत्साह आया है, उदासीनता, नीरसता, रूखापन आया है, वह आपके दिए गए दान को भी व्यर्थ कर डालेगा। जो दान आपके लिए पुण्य का निमित्त बन रहा था, वही दान आपके लिए चित्त का बोझ बन जाएगा।

देना है, तो उत्साह से दो। जब तक बोले गए दान को न दे दो, तब तक मुँह में जल भी ग्रहण मत करो। यह सोचें कि दान की पूँजी को अपने घर में रखना देवद्रव्यध्परद्रव्य को सेवन करने के समान है। अगर आप अणुव्रती हैं, अचैर्य-व्रत का पालन करते हैं और आप दान की बोली गई राशि का तत्काल भुगतान नहीं करते हैं तो अचैर्य-व्रत खंडित होता है। अगर आप बोले गए एक लाख रुपए छरू साल बाद चुका रहे हैं, तो आपसे वह नब्बे हजार बेहतर हैं, जो हाथों-हाथ चुकाए गए। आप एक तो दूसरे के अंतराय के दोषी बने, दूसरा दान के द्रव्य का स्वयं ने सेवन किया और तीसरा, अचैर्य-व्रत का खंडन किया। जीवन में हर कार्य को करने के लिए, जीने के लिए उत्साह चाहिए, आनंद चाहिए। रोटी भी बेलो तो उत्साह से बेलो, झाड़ू भी लगाओ तो बड़े उत्साह से लगाओ। झाड़ू की हर बुहारी के साथ राम का, एक बार अरिहंत का, एक बार भगवान का नाम ले लें तो आपका वह झाड़ू लगाना भी भगवान की माला फेरने के समान हो जाएगा। अगर भोजन करने बैठे हैं और भोजन से पूर्व प्रभु का स्मरण किया तो भोजन करना भी भगवान का भोग हो जाएगा। जीवन में बस रस चाहिए, नीरसता अर्थहीन है। जीवन में आनंद चाहिए, रूखापन आपके लिए भारभूत होगा। जीवन हम तीस साल जीएँ या साठ साल, महत्त्व वर्षों का नहीं है, महत्त्व जीवन के आनंद और गहराई का है। मन का बोझ उतरे, चित्त में शांति घटित हो। जीवन में चाहे किंचित् भी क्यों न मिला हो, उसे भी हृदयवान होकर जीएँ। कहते हैं कि भगवान बुद्ध एक बार राजगृह पहुँचे। उसी दौरान श्रावस्ती नगर में रहने वाला एक बहुत बड़ा धनिक अपने व्यवसाय के काम से राजगृह आया। उसका नाम था अनाथपिंडिक। जिस व्यवसायी के यहाँ अनाथपिंडिक पहुँचा, उसी व्यवसायी के घर अगले दिन बुद्ध अपने संघ-सहित भोजन पर पहुँचने वाले थे। वह व्यक्ति अगवानी और भोजन की समस्त व्यवस्था में जुटा था।

अनाथपिंडिक वहाँ पहुँचा। उसने मेजबान से पूछा कि ये तैयारियाँ किसलिए हो रही हैं? मेजबान ने कहाकृकल मेरे घर पर स्वयं भगवान अपने संघ-सहित आहारचर्या के लिए पधार रहे हैं। उसने पूछाकृकौन भगवान? जवाब मिलाकृभगवान बुद्ध। जवाब पाकर अनाथपिंडिक को अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ कि भगवान बुद्ध पधार रहे हैं। वह इतना भाव-विह्वल था कि उसने उसी क्षण भगवान से मिलने की इच्छा जताई। मेजबान ने कहाकृ अभी तो मिलना मुमकिन नहीं है, क्योंकि रात घिर आई है और भगवान अभी निद्रालीन होंगे। अनाथपिंडिक सो गया, मगर उसे नींद न आई। वह मन ही मन भगवान से मिलने के सपने बुनने लगा। करवटें बदलीं, पर नींद तो हवा हो गई। तड़के ही वह भगवान से मिलने के लिए चल पड़ा उनके विहार-स्थल की ओर विहार-स्थल पर पहुँचकर अनाथपिंडिक ने देखा कि बुद्ध सुरम्य उपवन में टहल रहे थे। उनके चेहरे पर अजीब- सी आभा और अनूठा तेज था। उनकी दृष्टि जब आगंतुक पर पड़ी, तो उन्होंने कहाकृआओ, अनाथपिंडिक आओ। वह भगवान बुद्ध के मुख से अपना नाम सुनकर अचंभित था। अनाथपिंडिक ने पूछाकृभगवान, आपको रात में नींद तो बराबर आई? भगवान ने कहाकृजो अपने मन की आसक्तियों को दूर करके, हृदय को भय से मुक्त करके, चित्त को शांत करके सोता है, वह सदा सुख से सोता है। अनाथपिंडिक को बुद्ध का यह पहला उपदेश मिला। रात भर अनाथपिंडिक करवटें बदलता रहा, अपने चित्त में अशांति बनाए हुए था। वह भयग्रस्त था कि भगवान के पास गया और भगवान ने उसे स्वीकार न किया तो? रातभर भगवान के प्रति आसक्त बना रहा, उधेड़बुन चलती रही, नतीजतन वह सो नहीं पाया। बुद्ध का यह उपदेश उसी के लिए था। अनाथपिंडिक बुद्ध के सान्निध्य से इतना प्रभावित हुआ कि वह सदा-सदा के लिए बुद्ध का अनुयायी हो गया। उसी ने आगे चलकर अपने नगर में भगवान बुद्ध को आमंत्रित किया और वहाँ पर जैतवन का विकास किया। भगवान बुद्ध ने अपने जीवन का अधिकांश समय उसी वन में बिताया। जब अनाथपिंडिक पूरी तरह वृद्ध हो चुका था, उसकी देह जर्जर हो गई थी, उसने दिव्य आभा को चेहरे पर लिए हुए भगवान बुद्ध से कहा-भंते, अब आपका यह शिष्य अकिंचन हो चुका है। इसके पास अब और द्रव्य नहीं बचा कि यह आपकी सेवा में समर्पित कर पाए। तब भगवान बुद्ध ने अनाथपिंडिक से कहा-वत्स, दान की महिमा द्रव्य से नहीं होती, हृदय से होती है। तब बौद्ध धर्म के इतिहास में अनाथपिंडिक अमर हो गया।

जीवन के लिए यह आनंद का सूत्र है, चित्त को निर्भार करने का परम सूत्र है-मन को समस्त आसक्तियों से दूर करोय हृदय को भय से मुक्त करोय चित्त को शांत करते हुए जीवनयापन करो। ऐसा व्यक्ति सदा-सदा सुख से सोता है, सुख से रहता है, सुख से जीता है। मनुष्य की अपनी अशांतियाँ हैं, चित्त के अपने-अपने बोझ हैं, अपने-अपने भार है। मनुष्य के चित्त पर जो सबसे बड़ा भार है वह मनुष्य के मन में पलने वाली चिंताएँ हैं। चिता मनुष्य को एक बार जलाती है, मगर चिंता आदमी को पल-पल जलाती है। एक आग लकड़ी की होती है और एक आग चावल की भूसी की। चिंता चावल की भूसी की वह आग है, जो जलती तो है, लेकिन पता नहीं चलता। चिंता तो लिक्विड ऑक्सीजन है। ऑक्सीजन आदमी को मरने नहीं देती और लिक्विड आदमी को जीने नहीं देता। आखिर हमें किस बात की चिंता? परमात्मा ने जितना दिया है उसमें तृप्त और आनंदित क्यों नहीं होते? आने वाले कल की व्यवस्था की चिंता ही क्यों करते हो? जिसने जन्म दिया है, वह जीवन की व्यवस्था भी देगा। जो कल देगा, वह कल की व्यवस्था भी करेगा।

लोग मुझे अपनी पल-प्रतिपल की प्रमुदितता का रहस्य पूछा करते हैं। मैं उनसे कहता हूँ कि मैं जीवन में चिंतन को तो स्थान देता हूँ, मगर चिंता को कोई स्थान नहीं देता। चिंता को वह व्यक्ति स्थान देगा, जो आने वाले कल की सोचेगा। पता नहीं कि आने वाला कल होगा भी कि नहीं होगा! हमारी ओर से प्रतिदिन इतनी तैयारी रहनी चाहिए। लोग सोते हैं तो सोचते हैं कि कल के दिन की यह व्यवस्था करनी है, वह व्यवस्था करनी है। चंद्रप्रभ जब सोता है, तो देह का विसर्जन करके सोता है कि यह तुम्हारे जीवन की अंतिम रात है, विसर्जित कर दे अपनी देह को और आनंद से सो जा। तब इतनी नींद आती है कि आँख सुबह चार बजे ही खुलती है। जीवन में किसी भी स्थिति में चिंता को स्थान न दें। चिंताओं को चिता में जला डालें। जो मिला है, उसमें सदा संतुष्ट और परितृप्त रहें। जो प्रकृति हमें जन्म देती है, वह जन्म बाद में देती है और माँ की छाती को दूध से पहले भर देती है। जन्म बाद में होता है और जीवन की व्यवस्था पहले होती है। फिर चिंता किस बात की। सदा आनंदित रहो। अगर जीवन में कुछ अनुचित और अवांछित हो गया, तो चिंतित न हों। हो गया, सो हो गया। घाटा हो गया तो कोई बात नहीं, नफा भी तो तूने ही कमाया था। चिंताओं को अगर पालते रहोगे, तो तुम्हारा धन भी तुम्हारे लिए भारभूत हो जाएगा। चिंता से मुक्त होने का छोटा-सा सूत्र है - जो होता है, वह नियतिकृत है। जो हुआ है, वह होना था, सो हो गया। होनी में कैसा हस्तक्षेप! होनहार की कैसी चिंता, कैसी स्मृति! होनहार को हो लेने दें। जो हो रहा है, अच्छा या बुरा, जो भी हमारे साथ बीता है, वह महज संयोग भर रहा। हर घटना को संयोग भर मान लो, तो चिंता नाम की कोई चीज नहीं रहेगी। आप दुर्घटना के बावजूद सहज-शांत रहेंगे।

मुझे स्मरण है : एक संत किसी रास्ते से गुजर रहे थे कि तभी उनका एक विरोधी आदमी पीछे से दौड़ता आया हुआ और संत की पीठ पर लाठी का एक करारा प्रहार किया। प्रहार इतना जोर का था कि लाठी उसके हाथ से छिटक गई और संत वहीं गिर पड़े। प्रहार करने वाला व्यक्ति लाठी को छोड़कर उलटे पाँव दौड़ पड़ा। उसे भय था कि संत पलटवार जवाबी हमला न कर दे।

संत ने, लौटते हुए आदमी को आवाज लगाई-भाई, लाठी को छोड़कर क्यों जा रहा है, लाठी तो लेते जा, मगर वह लौटकर नहीं आया। संत के साथ जो दूसरा व्यक्ति चल रहा था, उसने पूछा कि भगवन् उसने आप पर प्रहार किया। क्या आपको क्रोध नहीं आया? आप तो उसे लाठी भी लौटा रहे हैं। संत ने कहा- मित्र, जो बात तुम कह रहे हो, वह मेरे मन में भी आई, लेकिन जिस समय मैं लाठी को लेने के लिए नीचे झुका तो मुझे लगा कि जिस पेड़ के नीचे मैं खड़ा हूँ, उस पेड़ की टहनी टूटकर मेरे कंधे पर आ गिरती तो क्या मैं उस टहनी को उठाकर उससे पेड़ को पीटने लगता? सहचर ने कहा -भगवन् वह तो एक संयोग होता। संत ने कहा-मित्र, जब तू उसको एक संयोग कहता है तो इस लाठी के प्रहार को संयोग क्यों नहीं कह सकता? जो व्यक्ति अपने जीवन में होने वाले हर वांछित-अवांछित कार्यों को एक संयोग, एक योगानुयोग मान लेता है, वह व्यक्ति न तो कभी चिंतित होता है और न ही कभी उत्तेजित होता है। मन का बोझ उतरे, इसके लिए दूसरा पहलू यह होगा कि व्यक्ति अपने चित्त में पलने वाली हीन भावनाओं को अपने से दूर करे। व्यक्ति के चित्त में निरंतर एक ही भावना पलती रही है कि मैं छोटा, मैं कुछ नहीं कर सकता। किसी में जाति को लेकर हीनता, तो किसी में रूप को लेकर हीनताय किसी में धन को लेकर हीनता, तो किसी में अपने शरीर के रंग को लेकर हीनता। नतीजतन व्यक्ति अपने जीवन में कुछ भी मौलिक और नवीन नहीं कर पाता। जब तक व्यक्ति के हृदय में आत्मविश्वास और उच्च मनोबल न होगा, वह अपने जीवन में कुछ भी नहीं कर सकता। एक छोटी-सी प्यारी-सी घटना है कि चैदह वर्ष की एक लड़की अपने पाँच वर्ष के छोटे भाई को कंधे पर उठाए पहाड़ी रास्ते पर चली जा रही थी। पहाड़ी रास्ता होने के कारण साँसें तेज चल रही थीं। एक दूसरा पथिक उसी रास्ते पर उस लड़की के पीछे-पीछे चल रहा था। वह उस लड़की की थकान को भाँप गया। उसने कहाकृबिटिया, तेरे कंधे पर भार है। थोड़ी देर के लिए तू इसे मुझे दे दे।

पथिक की बात सुनकर लड़की रुक गई। उसने पीछे मुड़कर पथिक को घूरा। उस लड़की ने जो जवाब दिया, वह जीवन को आनंद से भर देने वाला है। उस लड़की ने कहा खबरदार, जो इसे भार कहा। यह तुम्हारे लिए भार हो सकता है। मेरे लिए तो भाई है। उसने अपने भाई के माथे को चूमा और दुगुने उत्साह से आगे बढ़ गई। जिस व्यक्ति के लिए भाई, भार है, वह व्यक्ति जरूर भार को हल्का करना चाहेगा। मन की स्थिति, मन की दशा पर ही कार्य की परिणति होती है। किसी के लिए भाई भार हो जाता है, और किसी के लिए भाई ही भगवान हो जाया करता है। तुमने अगर भाई को भार मान लिया तो तुम हीन-भावनाओं से ग्रस्त हो जाओगे। अगर भाई ने दस पैसे का भी अतिरिक्त खर्चा कर दिया तो तुम भीतर-ही-भीतर जल उठोगे। जहाँ व्यक्ति घर के सदस्यों को भी भार मानना शुरू कर देगा, वहीं पर चिंता और हीन भावनाएँ अपने आप पनपने लग जाएँगी। तब आप एक दूसरे से टूटेंगे, उनसे कटते चले जाएँगे। जीवन में हीन भावना नहीं, सदा आत्मविश्वास और आत्मसंतोष रहे। जीवन सदा आत्मविश्वास से भरा हो। परमात्मा ने जो जीवन दिया है वह अपने आप में परिपूर्ण है। अगर कोई व्यक्ति अपने आपको गरीब कहता है वह अपने जीवन का, अपनी देह का मूल्य समझे। यह देह लाखों की संपदा है। कोई आपको आपकी दो आँखों के बदले में दो लाख रूपये देने को तैयार हो जाए तो आप आँखें नहीं देंगेय कोई अगर हार्ट के बदले में दस लाख रुपये और किडनी के बदले में पाँच लाख रुपये देने को तैयार हो तो भी आप अंग नहीं देंगे। जिस प्रकृति ने हमें जीवन की इतनी महान् संपदाए सौंपी हैं, फिर हम क्यों अपने आपको तुच्छ, हीन और नगण्य समझें। हमें जो कुछ मिला है, हम उसी में बड़े आनंद से जीएँ, बड़े उत्साह और प्रफुल्ल-भाव से जीएँ। हम जीवन को जीविका न बनाएँ। कमाई कम है तो क्या हुआ, यह सोचें कि हम कर्ज के दलदल से तो दूर हैं। रूखी-सूखी भी खाई, तो अपनी कमाई की खाई। भला, हम स्वयं को हीन मानें ही क्यों? परिस्थितियाँ तो हर किसी के जीवन में ऊँची-नीची आती हैं, पर परिस्थितियों के साथ हम क्यों ऊँचे-नीचे हों? एक बात ध्यान रखें, मनोमस्तिष्क में एक बार भी हीनता ने ग्रन्थि का रूप बना लिया, तो दुष्कर हो जाएगा उससे मुक्त होना। वह ग्रन्थि आपके लिए मनोरोग का रूप ले लेगी। आखिर मन के अधिकांश रोग हीन विचारों के कारण ही पनपते हैं। इसी कारण आदमी दुरूखी होता है। सुख का आधार है आत्मविश्वास। आत्मविश्वास से तो बड़ी-से बड़ी बाधाएँ लाँघी जा सकती हैं। नदियाँ और पर्वत लाँघे जा सकते हैं। आत्मविश्वास कहता है- दुनिया में असंभव कुछ नहीं। सब कुछ संभव है। इमपोसीबल शब्द खुद कहता है आई एम पोसीबल। मन के बोझ से निर्भार होने के लिए हम परिस्थितियों के साथ जीना सीखें, वर्तमान के उपभोक्ता हों, आत्मविश्वास के मालिक हों। आवेग और कटु वचनों को अपने में स्थान न दें। हर मनुष्य प्रकृति का एक महान् आविष्कार है। हम जीवन को सुखशांति के स्वामी बनकर जीएँ। हम पूरा प्रयास रखें कि हमारी वाणी से, हमारे व्यवहार से किसी को कोई ठेस न पहुँचे, किसी का शोषण न हो। हम मधुर चिंतन के स्वामी बनें। मधुर वाणी और मधुर व्यवहार के मालिक बनें, जीवन को सृजन का रूप दें, नकारात्मक विचारों और पहलुओं से बचें। सकारात्मक, संतुलित सोच ही चित्त को निर्भार करने का बीजमंत्र है। आप आनंदित मन के स्वामी हों, सदाबहार प्रसन्न चेतना के मालिक बनें, यही सजगता हो, और यही प्रयास।




गुरुदेव श्री

श्री चन्द्रप्रभ सागर जी म. :- विचार और व्याख्यान


Our Lifestyle

Features