slide3-bg



Powerful Stories


एक सास-बहू पूज्य श्री ललितप्रभ जी-चन्द्रप्रभ जी से मिलने आई। बहू ने बताया-मेरी सासूमाँ के वर्षीतप चल रहा है। पूज्यश्री ने माताजी का स्वागत किया। बातों ही बातों में पता चला कि माताजी के पहला नहीं तीसवाँ वर्षीतप है, यह सुनकर पूज्यश्री ने खड़े होकर माताजी को प्रणाम किया और सुखशाता पूछी। पूज्य श्री चन्द्रप्रभ जी ने कहा-धन्य है आपकी तपस्या। माताजी ने कहा-असली तपस्या तो मेरी बहू क र रही है जो तीस सालों में एक बार भी पीहर नहीं गई। पूज्यश्री ने बहिन जी से पूछा-आखिर इसका कारण? बहिन ने कहा-मैं यह सोचकर पीहर नहीं गई कि पारणे के दिन जाऊंगी तो सासूमाँ को पारणा बनाना पड़ेगा और उपवास के दिन जाऊंगी तो उन्हें उपवास में घर का सारा काम करना पड़ेगा। पूज्यश्री सास-बहू केप्रेम को देखकर हर्षविभोर हो गए और कहा-अगर हर घर में ऐसी सास-बहुएं हो तो धरती स्वर्ग बन जाए।

एक सज्जन ने पूज्य श्री ललितप्रभ जी से पूछा-मैं सुख आने पर सुखी और दुख आने पर दुखी हो जाता हूँ। मुझे दुख से बचने के लिए क्या करना चाहिए। पूज्यश्री ने उन्हें समझाते हुए कहा-आपके घर में परदेश से चाचाजी आए। आपने उनका स्वागत किया। मनुहार पूर्वक भोजन करवाया। वे लगभग सौ रुपये का खाएंगे, पर जाते समय पाँचसौ देकर जाएंगे मतलब आप लाभ में रहे। दूसरे दिन जंवाई आया। आप बड़े खुश हुए। चाचाजी से भी ज्यादा आवभगत की, पकवान बनवाए। वह न केवल दो सौ का खाएगा वरन् जाते समय पाँच सौ और लेता जाएगा। फिर भी आप चाचा से ज्यादा जंवाई का स्वागत करते है ना। सुख आए तो समझो चाचाजी आए हैं और दुख आए तो समझो जंवाई आया है। सुख को कहिए वेलकम और दुख को कहिए मोस्टवेलकम।

एक सम्पन्न व्यक्ति ने दस करोड़ की लागत से मकान बनाया। आने वाले कल में मकान का उद्घाटन होने वाला था। उसने देशभर से अपने रिश्तेदारों और मित्रों को बुलाया। दो हजार लोगों के भोजन की तैयारी की गई। उसी मकान में भोजन हेतु गैस सिलेण्डर रखे हुए थे। दुर्भाग्य से किसी में गैस लिकेज हो गई और आग लग गई। पूरा मकान धूँ-धूँ जलने लगा। मकान मालिक भी दौड़ा-दौड़ा आया। सभी उसे सांत्वना देने लगे, पर मकान को जलता देखकर भी मालिक के चेहरे पर कोई गम नहीं था। लोगों ने पूछा तो उसने बताया-इसमें अफसोस की क्या बात है। यह तो अच्छा हुआ क्योंकि आग लगने का तो योग था ही, पर भगवान की बड़ी मेहरबानी हुई कि आग आज लग गई। अगर यही आग कल लगती तो हममें से कोई भी नहीं बचता।

पत्नी के कहने पर संत तुकारात खेत में गन्ने लेने गए। सुबह गए, शाम को लौटे, पर हाथ में केवल एक गन्ना। यह देखकर पत्नी आगबबूला हो उठी। उसने गुस्से में कहा-खेत में केवल एक ही गन्ना था क्या? तुकाराम बोले-भाग्यवान, गन्ने तो बहुत थे और तोड़कर भी ढेर सारे लाया था, पर बीच रास्ते में बच्चे मिल गए। अब बच्चों को मना कैसे करता सो एक ही बच पाया। पत्नी ने गन्ना उठाया और तुकाराम की पीठ पर दे मारा। गन्ने के दो टुकड़े हो गए। तुकाराम बोले-मैं सोच ही रहा था कि गन्ने के दो टुकड़े कर दूँ, पर भाग्यवान तू कितनी अच्छी है जो एक केदो कर दिए। ले, एक तू चूस ले और एक मैं चूस लेता हूँ। सिक्खों के अंतिम गुरु गोविंद सिंह देह त्यागने वाले थे। उन्होंने सभी शिष्यों को बुलाकर कहा-मेरे मरने के बाद कोई भी मेरे नाम पर किसी तरह का स्मारक नहीं बनाएगा। और अगर किसी ने बना लिया तो वह वंशहीन हो जाएगा। सभी शिष्य सोच में पड़ गए कि अब किया तो क्या किया जाए। राजा रणजीतसिंह परम गुरुभक्त थे। उन्होंने गुरुमंदिर बनाने का निर्णय लिया। जनता ने कहा-महाराज, अनर्थ हो जाएगा, आपका एक ही पुत्र है और वह चला गया तो...?, पर वे अडिग रहे। इधर अमृतसर के स्वर्ण-मंदिर की प्रतिष्ठा हुई और उधर उनका इकलौता पुत्र चल बसा। वंश को कुर्बान करना स्वीकार कर लिया, पर गुरु क ा नाम मिटने नहीं दिया। इसे कहते हैं गुरुभक्ति।

एक पिता अपनी बेटी से बहुत ज्यादा प्यार करता था। माँ न होने की वजह से बेटी भी पिता की दिनभर सेवा करती। संयोग से बेटी भी एक दिन चल बसी। वह पत्नी के गम को सहन कर गया, पर बेटी की याद उसे बहुत सताने लगी। वह दिनभर रोता। एक दिन उसने सपने में परिलोक की परियों को हाथ में जली हुई मोमबत्तियाँ ले जाते हुए देखा, पर एक परी की मोमबत्ती बुझी हुई थी। उसने पास जाकर देखा तो पता चला वह उसकी ही बेटी थी। उसने पूछा-ऐसा क्यों? बेटी ने कहा-आपके आँसुओं के कारण मेरी रोज मोमबत्ती बुझ जाती है। पिता ने पूछा-फिर मैं क्या करूँ? बेटी ने कहा-आप मेरी याद में आँसू बहाने की बजाय हर पल मुस्कुराएं और नेक काम करें। यह सुनकर पिता जैसे ही मुस्कुराया कि बेटी की बुझी हुई मोमबत्ती फिर से जल उठी।

एक पति-पत्नि फिल्म देखने फिल्म हॉल गए, साथ में उनका डेढ़ साल का बच्चा भी था। फिल्म देखते-देखते अचानक बच्चा रो पड़ा। माँ ने बच्चे को चुप कराने की कोशिश की, पर बच्चा चुप न हुआ। पति ने पत्नी से कहा-जल्दी से बच्चे को चुप करा। पत्नी ने कहा-कोशिश कर रही हूँ, पर यह चुप हो ही नहीं रहा। फिल्म का मजा किरकरा होते देख पति ने चिल्लाकर कहा-जल्दी कर, चुप करा ना, थोड़ा दूध पिला दे। पत्नी ने कहा-समझ में नहीं आता, क्या करूं। आज तो दूध भी नहीं पी रहा है। पति को गुस्सा आ गया, तेश में आकर बोला-अरे, पीता कैसे नहीं, ये क्या इसका बाप भी पिएगा।

स्कूल में बच्चे हॉकी खेल रहे थे। एक बच्चे ने इतना जोर से शॉट मारा कि दूर स्थित एक घर की खिड़की का काँच टूट गया। घर की महिला ने प्रिंसीपल से शिकायत की। प्रिंसीपल यह सुनकर आश्चर्यचकित रह गए। उन्होंने उस बच्चे को फिर ऐसा करने को कहा। इस बार बच्चे ने गेंद को उस घर से भी पार पहुँचा दिया। प्रिंसीपल ने बच्चे की पीठ थपथपाई और अपना पूरा ध्यान पढ़ाई के साथ हॉकी पर देने की प्रेरणा दी। इसी प्रशंसा और प्रेरणा के चलते एक दिन वह बच्चा भारतीय हॉकी टीम का कप्तान रूपसिंह बना।

तीन दोस्त पिकनिक पर गए। घूमने के बाद उन्होंने खीर बनाई। सबने धापकर खीर खाई। एक कटोरा बच गया। निर्णय लिया गया जिसे अच्छा सपना आएगा वही सुबह इसको पिएगा। एक दोस्त रात को उठा और खीर का कटोरा चुपचाप पी गया। तीनों दोस्त उठे। पहले दोस्त ने कहा-खीर का कटोरा मैं पिऊंगा क्योंकि मेरे सपने में लक्ष्मीजी आए थे। वे मुझे बैकुण्ठ ले गई। वहाँ बह्मा, विष्णु, महेश के दर्शन करवाए। दूसरे दोस्त ने कहा-मेरा सपना सबसे अच्छा है। मुझे सपने में पालीताणा तीर्थ केदर्शन हुए, मैंने वहाँ पैतीस हजार भगवान की प्रतिमाओं की पूजा की। तीसरे दोस्त ने कहा-मैं तो कटोरा पी गया। दोनों ने कहा-हमें बिना पूछे ही। उसने क हा-रात को दो बजे हनुमानजी आए, सोटे से मेरी धुनाई की और कहा-उठ और जल्दी से कटोरा पी ले। मैंने कहा-दोस्तों को पूछ तो लूं। हनुमान जी ने कहा-पूछेगा कैसे, एक सपने में बैकुण्ठ गया हुआ है तो दूसरा पालीताणा। संदेश-जो जागे सो पावे जो सोवे सो पछतावे।

एक राजा को युद्ध में करारी शिकस्त मिली। वह मैदान से भागा और बचते-बचाते एक गुफा में पहुँचा। थोड़ी देर बाद उसने देखा कि एक चींटी अपने बिल में जाने की कोशिश में नीचे गिर पड़ी। वह वापस ऊपर चढऩे लगी और बिल तक पहुँचते-पहुँचते वापस गिर पड़ी। राजा को यह देखकर बड़ा मजा आने लगा। वह ध्यान से चींटी को देखने लगा। चींटी एक बार, दो बार, चार बार और इस तरह सत्तरह बार नीचे गिरी, पर राजा को यह देखकर बड़ी खुशी हुई कि वह अठ्ठारहवीं बार में बिल में जाने में सफल हो गई। राजा को चींटी से सबक मिला और उसने भी धीरे-धीरे सेना को इकठ्ठïा कर मजबूत किया। अंतत: वह भी अपने खोये हुए राज्य को फिर से पाने में सफल हो गया।

रामसेतु बन रहा था। रामजी ने देखा, एक गिलहरी बार-बार पानी में जाती, मिट्टी पर आती और रामसेतु के पत्थरों पर शरीर की मिट्टïी झटक देती। रामजी ने उससे कहा-यह तू क्या कर रही है? गिलहरी ने कहा-जब आप रामसेतु पर से समुद्र लाघेंगे तो नुकीले पत्थर आपके पैरों में न चुभे इसलिए मैं पत्थरों के बीच की दूरी को मिट्टी से भर रही हूँ। रामजी ने कहा-यह तो ठीक है, पर कहीं तू इन वानरसेना के पाँवों के नीचे आ गई तो? गिलहरी ने कहा-तब तो मेरा और सौभाग्य होगा कि रावण विजय में पहला योगदान मेरा काम आया। राम ने गिलहरी को चूमते हुए कहा-धन्य है तेरी निस्वार्थ सेवा और भक्ति।

एक व्यक्ति का एक्सीडेंट में गर्दन के नीचे का पूरा शरीर निष्क्रिय हो गया। उसे कंपनी से निकाल दिया गया। उसने सोचा-मेरा शरीर निष्क्रिय हो गया तो क्या हुआ, मस्तिष्क तो अभी भी सक्रिय है। उसने बच्चों को इंजिनियरिंग पढ़ाना शुरू कर दिया। पहले महिने दो छात्र आए। उसने दोनों पर जमकर मेहनत की। दूसरे महिने दस छात्र आए। एक साल बाद उससे साढ़े तीन सौ छात्र पढऩे लगे और आज उसी व्यक्ति के पास पूरे पैतीस हजार छात्र पढ़ रहे हैं। वह व्यक्ति है बी. के. बंसल, बंसल इंन्स्टीट्यूड ऑफ कोटा।

एक महिला की शादी के कुछ महिने बाद ही पति चल बसा। ससुराल वालों ने मनहूश कहकर उसे घर से निकाल दिया। वह अपनी छोटी बच्ची के साथ घर-घर राशन मांगने लगी। एक दिन वह पूज्य श्री चन्द्रप्रभ जी के पास आई और महिनेभर के राशन-पानी की व्यवस्था करने की गुजारिश करने लगी। वह आठवीं तक पढ़ी हुई थी। पूज्यश्री ने उसे समझाया। वह नौकरी करने के लिए तैयार हो गई। पूज्यश्री ने उसे एक स्कूल में चपरासी की नौकरी पर लगवा दिया। महिना पूरा होने पर वह आई। पूज्यश्री ने उसे पुन: पढऩे और आगे बढऩे की प्रेरणा दी। उसने दसवीं का फार्म भरा। दसवीं पास की, बारहवीं पास की, बीए किया, बीएड किया। वह उसी स्कूल में टीचर बन गई। उसने हिम्मत करके पीएचडी की और आज वह लेक्चरार के सम्मानित पद पर है।

एक पिता को अपनी ज्ञानी बेटी से ईष्र्या हो गई। बेटी को नीचा दिखाने के लिए पिता ने उसकी शादी ऐसे मूर्ख व्यक्ति से कर दी जो जिस पेड़ पर बैठा था उसी की डाली को काट रहा था। बेटी को शादी के पहले दिन ही पता चल गया कि उसका पति मूर्ख और अज्ञानी है। उसने पति को घर से धक्के देते हुए बाहर निकाल दिया और कहा-अगर मेरे साथ रहना है तो पहले ज्ञानी बनकर आओ। वह घर से चला गया। उसने सरस्वती माँ की घोर उपासना की और दुनिया का सबसे मूर्ख कहलाने वाला वही व्यक्ति एक दिन दुनिया का सबसे बड़ा महाकवि कालिदास बन गया।

एक राजा का अंगूठा कट गया। मंत्री के मुँह से निकल गया-चिंता मत करो राजन्, भगवान जो करता है अच्छा करता है। यह सुनकर राजा आगबबूला हो गया। उसने मंत्री को कारागार में डलवा दिया। एक दिन वह शिकार खेलने निकला। रास्ता भटक गया, सिपाही पीछे रह गए। आदिवासियों ने बलि देने के लिए राजा को पकड़ लिया। जैसे ही देवी को राजा की बलि चढ़ाई जाने लगी कि पुरोहित ने कहा-ठहरो, यह बलि के अयोग्य है क्योंकि इसका अंग-भंग है। राजा सही सलामत राजमहल पहुँच गया। उसे मंत्री की बात सही लगी। उसने मंत्री को बाहर निकालकर पूछा-मेरा अंगूठा कटना अच्छा हुआ, पर तुम्हारा कारागार में रहना अच्छा कैसे हुआ? मंत्री ने कहा-राजन्, यह तो और भी अच्छा हुआ। अगर मैं कारागार में न जाता, तो आपके साथ जाता। आप तो बच जाते और बलि का बकरा मैं बन जाता।

एक अमीर व्यक्ति ने पिता की पुण्यस्मृति में पंडितजी को भोजन करवाने बुलाया। उसने पंडितजी को भरपेट भोजन करवाया। व्यक्ति ने सोचा, आज मैं जितना पंडितजी को खिलाउंगा उतना ही मेरे स्वर्गस्थ पिता को माल पहुँचेगा। सो उसने पंडितजी से कहा-अब प्रत्येक लड्डू पर पचास रुपये, पंडितजी दो लड्डू और टिका गए। व्यक्ति ने कहा-अब एक लड्डू पर सौ रुपये की प्रभावना। वे जैसे-तैसे एक और खा गए। अमीर ने अंतिम दांव फैंका-अब एक लड्डू पर पाँच सौ रुपये। पाँच सौ का नोट देखकर वे एक लड्डू और खाने लगे कि खाते-खाते बेहोश हो गए। पुत्र को बुलाया गया। पुत्र वैद्य केपास से हाजमावटी चूर्ण लेकर आया और पिताजी से कहा-यह ले लो, पेट साफ हो जाएगा। पिता ने कहा-मूर्ख, चूर्ण खाने की जगह होती तो एक लड्डू और न टिका देता।

अकबर और बीरबल कहीं घूमने जा रहे थे। साथ में अकबर का पुत्र भी था। चलते-चलते राजकुमार थक गया। उसने अपना कोट उतार कर बीरबल के कंधे पर रख दिया। थोड़ी देर आगे चले कि अकबर ने भी अपना कोट बीरबल के कंधे पर रख डाला। बीरबल चुपचाप चलता जा रहा था। अकबर को मजाक सूझी। उसने कहा-क्यों बीरबल, एक गधे जितना तो भार हो गया होगा। बीरबल नहले पर देहला मारते हुए बोला-जनाब, एक का नहीं, दो गधों का कहिए।

गाँधीजी नास्ते में बकरी का दूध और 10 खजूर लिया करते थे। खजूर भिगोने का काम वल्लभ भाई पटेल को सौंपा हुआ था। पटेलजी को लगा-गाँधीजी अब वृद्ध हो गए हैं, उन्हें खजूर थोड़ी ज्यादा खानी चाहिए। उन्होंने दूसरे दिन 15 खजूर भिगोकर दी। गाँधीजी को खाते-खाते लगा आज खजूर कुछ ज्यादा है। गाँधीजी ने इस संदर्भ में पूछा तो पटेलजी ने कहा-अब 10 और 15 खजूर में क्या फर्क पड़ता है। एक घंटे बाद गाँधीजी ने पटेलजी को बुलाकर कहा-कल से केवल 5 खजूर ही भिगोना। पटेलजी ने पूछा-क्यों? गाँधीजी ने कहा-मैंने सोचा, जब 10 और 15 में फर्क नहीं पड़ता तो 10 और 5 में क्या फर्क पड़ जाएगा। इसे कहते हैं विचारों की महानता।

पूज्यश्री चन्द्रप्रभजी-ललितप्रभजी मध्यप्रदेश की यात्रा पर थे। उनका एक बार सर्किट हाउस में रुकना हुआ। संयोग से वहाँ प्रदेश विशेष के मंत्री का आना हुआ। वे पूज्यश्री से भी मिले। उन्होंने पूज्यश्री से कहा-मेरा मन बड़ा अशांत है। मैं मुख्यमंत्री बनने वाला था, पर केवल मंत्री ही बन पाया। यह सुनकर पूज्यश्री को हँसी आई। लाल बत्ती वाली कार, आगे-पीछे पुलिस की गाडिय़ाँ फिर भी मन दुखी। पूज्यश्री ललितप्रभ जी ने उनसे कहा-जो नहीं है उसको देखोगे तो जिंदगी भर दुखी बनो रहोगे इसलिए भगवान ने जो दिया है उसका आनंद उठाओ। मंत्री महोदय को जीवन की सीख मिल गई और वे खुश होकर चले गए।

एक व्यक्ति मरकर के स्वर्ग में पहुँचा। जब उसने स्वर्ग के नजारे को देखा, सेवा में खड़ी सुंदर अप्सराओं को देखा तो उदास हो गया। एक अप्सरा ने पूछा-तुम उदास क्यों हो गए हो? उसने कहा-मुझे क्या मालूम था कि स्वर्ग में इतना ऐशो आराम है, नहीं तो मैं दस साल पहले ही आ जाता। अप्सरा ने पूछा-ऐसा कैसे हो गया? उसने कहा-क्या बताऊं, मैं ललितप्रभजी-चन्द्रप्रभजी के प्रवचनों को सुनने चला गया। प्रवचनों ने मेरा बुढ़ापा दूर कर दिया, जिंदगी में फिर से नया जोश भर दिया नहीं तो मैं तो दस साल पहले ही मर चुका होता। एक अप्सरा ने कहा-मूर्ख, उन्होंने तेरे जीवन को स्वर्ग बना दिया तभी तुझे ऊपरवाला स्वर्ग नसीब हुआ, नहीं तो तुम्हें नरक में भी जगह नहीं मिलती।

बोम्बे की घटना। समाज के एक प्रतिष्ठित घर में रात को दो बजे पुलिस पहुँची। पुलिस देखकर घर का मालिक चौंक गया। एस.पी ने कहा-आपके बेटे ने अमुक जगह एक लड़की को छेड़ा, उसके साथ अभद्र व्यवहार किया। बाकी के तीन लकड़ों को हमने पकड़ लिया, अब आपके बेटे की बारी है। व्यक्ति ने कहा-ठहरो। वह बेटे के कमरे में गया और पूछा-क्या तूने यह काम किया। उसका सिर नीचा हो गया। उसने बेटे को पुलिस को सौंप दिया। पुलिस बेटे को ले जाने लगी कि बाप एस. पी को कमरे में ले गया और दस हजार रुपये थमाते हुए कहा-मेरे बेटे की आज एक ही रात में इतनी पिटाई करना कि आज के बाद वह किसी और लड़की पर बुरी नजर न डाल सके।

एक सेठ के सपने में लक्ष्मी आई और कहा-मैं कल जाने वाली हूँ, जो तुझे अंतिम वर मांगना है मांग ले। सेठ ने एक दिन की मोहलत मांगी। सेठ ने सात बेटे-बहुओं को बुलाया और लक्ष्मी की बात बताई। एक बेटे ने कहा-लक्ष्मी से ढेर सारी जमीनें मांग लो, दूसरे ने कहा-अखूट धान्य मांग लो, तीसरे ने कहा-हीरे-मोती मांग लो। सबने अपनी-अपनी बात कही। सबसे छोटी बहू ने कहा-लक्ष्मी जाएगी तो कुछ भी मांगो, सब समाप्त हो जाएगा इसलिए पिताजी लक्ष्मी से कहना-तू भले ही जा, पर जाने से पहले एक कृपा कर कि मेरे सात बेटे-बहुओं में सदा प्रेम बना रहे, वे एक साथ रहे और एक ही थाली में खाना खाए। सेठ को न जाने क्या सूझा उसने लक्ष्मी से छोटी बहू वाला वर मांग लिया। यह सुनते ही लक्ष्मी मुस्कुरा उठी और कहने लगी-यह वर मांगकर तो तूने मुझे सौ साल और इस घर में रहने को विवश कर लिया है क्योंकि मैं वहीं रहती हूँ जहाँ प्रेम और सम्प होता है।

सिसली केराजा ने डेयन को एक अपराध में फाँसी की सजा सुना दी। डेयन ने कहा-मुझे एक साल की मोहलत दी जाए ताकि मैं बीबी-बच्चों के लिए थोड़े धन की व्यवस्था कर लूं। राजा ने कहा-कोई तुम्हारे स्थान पर मरने को तैयार हो तो...। डेयन का मित्र पीथियस तैयार हो गया। साल पूरा हो गया, पर डेयन न पहुँचा तो पीथियस को फाँसी पर चढ़ा दिया गया। जैसे ही फाँसी दी जाने वाली थी कि डेयन दूर से दौड़ता हुआ चिल्लाया-ठहरो, मैं आ गया हूँ। डेयन ने कहा-मुझे माफ करना, विलम्ब हो गया। पीथियस ने कहा-अगर तुम केवल एक मिनिट और लेट आते तो आज दोस्ती की मिसाल कायम हो जाती। यह सुनकर राजा का हृदय पसीज गया। उसने कहा-ऐसे दोस्तों को तो राजा भी दूर नहीं कर सकता। आप दोनों की दोस्ती तो सिसली राज्य की शान है।

महाभारत का युद्ध शुरू होने वाला था। युधिष्ठिïर निहत्था पैदल चलकर शत्रु सेना की ओर जाने लगा। सभी पांडवों को आश्चर्य होने लगा कि बड़े भाई युद्ध मैदान में यह क्या कर रहे हैं। युधिष्ठिïर भीष्म पितामह के रथ के पास पहुँचा और पंचांग प्रणाम करने लगा। पितामह ने कहा-विजयी भव। यह सुनकर दुर्योधन आगबबूला हो उठा। उसने कहा-आप युद्ध मेरी ओर से कर रहे हैं और विजय का आशीर्वाद शत्रु को दे रहे हैं। पितामह ने कहा-मूर्ख, प्रणाम के बदले हमेशा आशीर्वाद ही मिला करता है। अगर तू भी बड़े भाई युधिष्ठिïर के पास जाकर प्रणाम करता तो तुझे भी विजयी भव का ही आशीर्वाद मिलता। ये है प्रणाम के संस्कार का परिणाम।

पूज्यश्री ललितप्रभ जी एक घर में आहार के लिए गए। घर के बाहर लिखा हुआ था-मातृछाया। घर में पति-पत्नि और दो बच्चे थे। पूज्यश्री ने पूछा-आपकी माँ कहाँ है? पति ने कहा-मेरी माँ और पत्नी के आपस में बनती नहीं है। इसलिए वह गाँव में रहती है। पूज्यश्री घर के बाहर आए और उस पति से कहा-मेरा कहना मानो तो घर का नाम 24 घंटों में बदल लेना और मातृछाया हटाकर पत्नीछाया रख देना। अरे जिस घर में माँ की छाया तक न पड़ती हो उस घर का नाम मातृछाया रखने का क्या मतलब? यह सुनकर वह व्यक्ति हिल गया। उसने माँ के साथ रहने की कसम खाई।

गौतमबुद्ध बिना किसी को बताए राजमहल से रात को 2 बजे साधना करने हेतु निकल गए। उन्हें साढ़े छ: वर्षों की साधना के बाद परमज्ञान प्राप्त हुआ। वे वापस राजगृही आए। उनके पिता राजा शुद्धोधन ने नगर को सजाया। सब प्रवचन सुनने आए, पर उनकी पत्नी यशोधरा न आई। वे यशोधरा से मिलने अंत:पुर जा पहुँचे। बुद्ध को देखकर भी यशोधरा मौन थी। उन्होंने यशोधरा से क्षमा मांगी। यशोधरा ने कहा-मुझे सब स्वीकार है, पर क्या आपको परमज्ञान राजमहलों में रहकर नहीं हो सकता था। बुद्ध मौन हो गए। यशोधरा ने कहा-हर पिता अपने पुत्र को वसीयत देता है आपने मेरे पुत्र राहुल को क्या दिया? बुद्ध ने कहा-हर पिता अपने पुत्र को वही देता है जो उसके पास होता है, यह कहते हुए उन्होंने राहुल को पास बुलाया, सिर पर हाथ फे रा और अपना भिक्षापात्र देकर उसे भी संन्यासी बना दिया।

एक बुजुर्ग दादाजी के बेटे हरामखोर निकले। 3 करोड़ का मकान पिता का, पर बेटों ने कब्जा कर लिया। अब बेटे न तो बाप की सेवा करे न भोजन के लिए पूछे। उन्होंने अपना दुखड़ा पूज्यश्री ललितप्रभ जी को बताया। पूज्यश्री ने उन्हें कुछ सलाह दी। दादाजी घर गये और छुट्टिïयों के मौसम में बेटों को बुलाकर कहा-मेरे अभी बैंक से दो लाख रुपये आए हैं, मैंने तुम्हारे लिए मसूरी की टिकटें बनाई हैं, वहाँ 15 दिन अमुक होटल में कमरे बुक है। तुम सभी जाओ और घूमकर आ जाओ। यह सुनकर सभी बेटे खुश हुए। सामान पैक कर सभी रवाना हो गए। पीछे से उस व्यक्ति ने मकान को बेच दिया। बेटे वापस आए तो देखकर हक्के-बक्के रह गए। पूज्यश्री ने उनको कहा-ये और कुछ नहीं तुम्हारे कर्मों का फल है, याद रखना जैसी करणी वैसी भरणी।

इंदौर के डॉ. प्रकाश बाँगानी अमेरिका में चिकित्सक थे। पिता चल बसे। वे भारत आए। उन्होंने माँ से कहा-तू मेरे साथ अमेरिका चल। यहाँ तेरी सेवा करने वाला कोई नहीं है। माँ ने कहा-मैं अमेरिका नहीं चल सकती, वहाँ मेरा मन नहीं लगेगा। मैं यहीं ठीक हूँ। एक तरफ करोड़ों का व्यापार दूसरी तरफ माँ की सेवा। प्रकाश जी ने अमेरिका फोन किया और अपने सहयोगी डॉक्टर से कहा-मेरा क्लिनिक बेच दो और जो राशि आए उसे यहाँ भेज दो। अब मैं अमेरिका नहीं आ पाऊंगा। उन्होंने माँ की ताउम्र सेवा की। आज भी वे इंदौर में कार्यरत हैं। उनकी सेवा और समर्पण देखकर पूरा शहर गद्गद है।

एक पिता अपना जरूरी व्यापारिक काम रहे थे। उनका नौ साल का बच्चा आया और साथ में खेलने की जिद करने लगा। पिता ने मना कर दिया, पर बच्चा नहीं माना। पिता ने बच्चे से कहा-पहले तुम मेरा एक काम करो। पिता ने विश्व के नक्शे को लिया, फाड़ा, दस-बीस टुकड़े किए और कहा-इस नक्शे को जोड़कर लाओ। पिता सोचने लगा यह जोड़ेगा तब तक मेरा काम हो जाएगा। पाँच मिनिट बीते ही थे कि बच्चा नक्शा जोड़कर ले आया। पिता को आश्चर्य हुआ। उसने पूछा-इतना जल्दी कैसे नक्शा जोड़ लिया। बेटे ने कहा-नक्शे के पीछे इंसान का चित्र था, मैंने इंसान को जोड़ा तो विश्व का नक्शा अपने आप जुड़ गया।

एक महिला की शादी नास्तिक घर में हो गई। महिला हर काम करने से पहले मंत्र-जाप करती, जो उसके ससुरालवालों को अच्छा नहीं लगता। पति और सासू उसके इस धर्म-कर्म से जलने लगे। सासू ने बहू को ठिकाने लगाने की सोची। सासू ने एक मटके में साँप रखवाया और बहू से कहा-बेटी, मुझे पूजा करनी है, जरा मटकेमें से फूलों की माला लाकर देना तो। बहू ने मटके में हाथ डालने से पहले मंत्र-स्मरण किया और जैसे ही हाथ डाला कि सास यह देखकर आश्चर्यचकित रह गई कि साँप साँप न रहा फूलों की माला बन गया। ससुरालवालों को अक्कल आ गई। जिस मंत्र से यह चमत्कार हुआ वह था नवकार महामंत्र।

गाँधीजी के आश्रम में एक व्यक्ति पहुँचा। आश्रम का नियम था जो भी वहाँ भोजन करता उसे एक चम्मच नीम की चटनी परोसी जाती। वह व्यक्ति भोजन करने बैठा तो उसकी थाली में भी नीम की चटनी आई। उसने चटनी को चखा तो मँुह खारा हो गया। उसने सोचा, क्यों न इसको एक साथ खा लूं ताकि बार-बार मुँह कड़वा न हो। उसने जैसे ही यह किया कि गाँधीजी ने उसे देख लिया। गाँधीजी ने उसे वापस दो चम्मच नीम की चटनी परोसते हुए कहा-लगता है आपको नीम की चटनी बड़ी स्वादिष्टï लगी है जो एक साथ पूरी खा गए।

संत एकनाथ के साथ हजारों लोग कावड़ में गंगाजल लेकर रामेश्वरम की यात्रा के लिए निकले। वे रामेश्वरम के पाँच पहुँचे कि देखा एक गधा गर्मी में तडफ़ड़ा रहा था। लोग कह रहे थे-इसे पानी पिलाओ नहीं तो यह मर जाएगा। कोई पानी पिलाने को तैयार न हुआ। संत एकनाथ आगे आए और कावड़ का जल पिलाने लगे तो लोगों ने कहा-यह क्या कर रहे हो, दो सौ मील चलकर लाए इस गंगाजल को गधे को पिला रहे हो, यह तो भगवान पशुपतिनाथ को चढ़ाना है। संत एकनाथ ने कहा-तुम्हारा भगवान रामेश्वरम में होगा, पर मेरे लिए तो यही पशुपतिनाथ है। यह देख सबको आश्चर्य हुआ कि वहाँ से गधा तो गायब हो गया और पशुपतिनाथजी का लिंग प्रकट हो गया।

जब औरंगजेब को पता चला कि गुजरात में सम्पन्न लोग अपने नाम के आगे शाह लगाते हैं तो उसे बर्दाश्त न हुआ। उसने फरमान जारी कर दिया कि आज के बाद कोई भी व्यक्ति नाम के आगे शाह नहीं लगाएगा। मेरे नाम के बाद शाह लगे और दूसरों के नाम के पहले शाह लगे, यह नहीं हो सकता। मंत्रियों ने कहा-आप शाहों से पंगा मत लीजिए, ऐसा हो गया तो अनर्थ हो जाएगा। गुजरात में एक बार अकाल पड़ा। औरंगजेब ने मंत्रियों से कहा-जाओं, अकाल को दूर करने के लिए शाहों से दस करोड़ स्वर्ण मुद्राएं इकठ्ठïी करके लाओ, आज पता चल जाएगा कि इन शाहों में कितना दम है। मंत्री एक गांव में पहुँचे। उन्होंने एक घर का दरवाजा खटखटाया। अंदर से शाह पीथड़चंद निकले। मंत्रियों ने राजाज्ञा बताई तो पीथड़चंद ने कहा-जाओ और सम्राट से कह दो, गुजरात के अकाल को दूर करने के लिए सारे शाहों को हिलाने की जरूरत नहीं है। इसके लिए एक अकेला पीथड़ ही काफी है।

वनवास से वापस अयोध्या लौटने के बाद एक बार राम मिथिला पधारे। उनके लिए छप्पन भोग तैयार किए गए। राम को भोजन करवाते-करवाते जनक ने पूछा-राम, आपको ये छप्पन भोग कैसे लगे। यह सुनते ही राम की आँखों में आँसू आ गए। जनक ने कहा-क्या मैंने कुछ गलत पूछ लिया, अगर ऐसा हो तो मुझे श्रमा करें। राम ने आँखें खोलते हुए कहा-स्वाद क्या होता है यह तो जिंदगी में केवल एक बार पता चला जब मुझे शबरी ने प्रेम और श्रद्धा से भरे झूठे बेर खिलाए थे।

अमेरिका, रूस और चीन की प्रगति देखकर भगवान बड़े खुश हुए। एक दिन वे प्रकट हुए और उन्हें वरदान मांगने को कहा। अमेरिका ने कहा-अगर आप हम पर खुश हैं तो एक वरदान दीजिए कि दुनिया के ग्लोब में सबका नाम रहे, पर चीन का नामोनिशान मिट जाए। भगवान ने चीन से वरदान मांगने को कहा। चीन ने कहा-विश्व से अमेरिका का नामोनिशान मिट जाए बस इतना-सा वरदान दे दो। भगवान आश्चर्यचकित रह गए। मैं वरदान देने आया हूँ और ये वरदान की बजाय एक-दूसरे को मिटाने की बात कर रहे हैं। भगवान ने रूस से पूछा-तुम्हें क्या चाहिए। रूस ने कहा-हमें कुछ नहीं चाहिए, बस इन दोनों ने जो वरदान मांगा है इसे पूरा कर दीजिए।

एक पिता नई कार खरीद कर लाया। पिता घर में दीवार पर कीलें मारने का काम रहा था। उसके चार साल के छोटे बच्चे को न जाने क्या सूझा। उसने गिरी हुई कुछ कीलें उठाई और कार पर घुमाने लगा। नई-नई कार पर स्क्रेच डालते देख बच्चे पर पिता को गुस्सा आ गया। उसने आव देखा न ताव। हाथ में पड़े हुए हथोड़े को बच्चे की अंगुलियों पर दे मारा। अंगुलियाँ चकनाचूर हो गई। वह भागा-भागा उसे हॉस्पिटल ले गया। ऑपरेशन हुआ। दो दिन बाद बच्चे को होश आया। बच्चे ने पापा से कहा-सॉरी, मैंने आपकी कार पर स्क्रे च कर दिए, पर पापा ये मेरी अंगुलियाँ वापस कब आएगी। पिता की आँखें झर-झर रोने लगी, कहा-बेटा, मुझे क्षमा करना, मैंने गुस्से में अनर्थ कर डाला। अब मैं कभी गुस्सा नहीं करूंगा।

माँ-बेटी एक रास्ते से जा रहे थे। बेटी चलते-चलते थक गई। तभी पीछे से एक ऊँ टवाला आया। माँ ने उससे कहा-मेरी बेटी को थोड़ा आगे छोड़ दे। उसने कहा-जा,जा, तेरी बेटी को बिठाने के लिए ऊँट खरीदा है क्या। ऊँटवाला थोड़ा आगे बढ़ा कि मन में आया-अरे, मैंने यह क्या कर दिया, जवान लड़की को बिठाने से मना कर दिया। उसको भगाकर ले जाता और बुढिय़ा को पता तक न चलता। वह वहीं रुक गया। माँ को चलते विचार आया-अरे, मैंने भी कैसी मूर्खता भरी बात कर ली और अनजान व्यक्ति पर भरोसा कर लिया। माँ-बेटी ऊँटवाले के पास पहुँची तो उसने कहा-तेरी बेटी को बिठा ले, आगे छोड़ दूंगा। बुढिय़ा ने कहा-जा, जा, अब पहले जैसी बात नहीं रही, तेरे भी विचार बदल गए और मेरे भी विचार बदल गए।

संत राबियावसी अपनी झौपड़ी के बाहर सुई खोज रही थी। वहाँ से कुछ संत गुजरे। राबिया ने पूछा-कहाँ जा रहे हो? संतों ने कहा-भगवान को पाने के लिए जंगलों में जा रहे हैं। संतों ने पूछा-आप क्या कर रही हो। राबिया ने कहा-मेरी सुई खो गई है। संत भी उसकी सूई खोजने लग गए। एक संत ने पूछा-सूई खोई कहाँ थी? राबिया ने कहा-झौपड़ी के अंदर। यह सुनकर सबको हँसी आई। सबने पूछा-फिर बाहर में खोज क्यों? राबिया ने कहा-अंदर अंधकार है। संतों ने कहा-फिर भी सूई तो वहीं मिलेगी जहाँ खोई है। राबिया ने कहा-मैं भी तो आपको यही समझाना चाहती हूँ कि जब भगवान हमारे अंदर है तो उसकी खोज बाहर करने से क्या मतलब?

पूज्य श्री ललितप्रभ जी के बचपन की घटना है। उनके पड़ोस में एक महिला की बत्तीसी में सोने के दो दाँत लगे हुए थे। उनके मन में आया यह महिला सोने के दाँतों को $जरूर अपने साथ ले जाएगी। संयोग से वह महिला चल बसी। उनके मन में कुतूहल जगा कि एक बार उस महिला को देखें तो सही। वे चुपके से घर में घुस गये। उन्होंने देखा कि महिला का चेहरा तो एकदम सही था, पर मुँह के आगे रुई दबाई हुई थी। उन्होंने धीरे से रुई हटाई तो यह देखकर आश्ïचर्य हुआ कि बाकी सब दाँत तो सही सलामत थे, पर सोने वाले दो दाँत गायब थे। यह है संसार का सत्य।

रामसेतु बन रहा था। राम के नाम के पत्थर तिर रहे थे। राम ने सोचा मैं भी एक पत्थर पानी में डाल के देखता हूँ। राम ने पत्थर उठाया और पानी में डाला तो आश्चर्यचकित रह गए क्योंकि पत्थर पानी में डूब गया। राम को लगा, मेरे नाम में ताकत तो मुझसे भी ज्यादा है। हनुमान यह देखकर राम के पास आए और प्रणाम कर कहने लगे-प्रभु, पत्थर का डूबना तो तय था, भला जिसे राम ने छोड़ दिया वह पत्थर तो क्या देवता होता तो भी डूब जाता।

भगवान महावीर के समय दो राजाओं में पानी को लेकर युद्ध छिड़ गया। एक राजा ने कहा-ये नदी मेरी तो दूसरे ने कहा-ये नदी मेरी। जब भगवान महावीर को पता चला तो वे युद्ध के बीच मैदान में पहुँच गए। भगवान को देख दोनों राजा रथ से नीचे उतरे। उन्हें प्रणाम किया और पूछा-भंते, आप और युद्ध मैदान में। भगवान महावीर ने दोनों राजाओं को ललकारते हुए पूछा-बताओ कि पानी ज्यादा मूल्यवान है या खून? दोनों ने कहा-खून। भगवान महावीर ने कहा-तो फिर तुम दोनों पानी के चक्कर में खून बहाने की मूर्खता क्यों कर रहे हो? नदी की एक धार इस ओर मोड़ दो और एक धार उस ओर। राजाओं को अक्कल आ गई। दोनों ने भगवान से क्षमा मांगी और परस्पर मित्रता का हाथ बढ़ा दिया।

स्वामी विवेकानंद अमेरिका में एक पुस्तकालय देख रहे थे। पुस्तकालय के मैनेजर ने इशारा करते हुए कहा-देखा, भारतीय धर्मग्रंथ की स्थिति, सबसे नीचे रखा हुआ है। विवेकानंद ने उसे उठाकर देखा तो पता चला वह श्रीमदभागवत गीता थी। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा-यह ग्रंथ नहीं, विश्व के सम्पूर्ण धर्मग्रंथों की नींव है। और नींव हमेशा नीचे रहती है जिस पर सम्पूर्ण धर्मशास्त्र टिके रहते हैं।




गुरुदेव श्री

श्री चन्द्रप्रभ सागर जी म. :- विचार और व्याख्यान


Our Lifestyle

Features