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दीर्घ आयु और स्वस्थ जीवन जीने का आधार - प्राणायाम


प्राणायाम दीर्घ आयु और स्वस्थ जीवन जीने का आधार है। प्राणायाम से श्वसन-क्रिया स्वस्थ होती है। फेफड़ों में लचीलापन बरकरार रहता है और फेफड़े मजबूत, शक्तिशाली होते हैं जिससेसूक्ष्म से सूक्ष्म नाड़ी तक प्राणवायु का संचार होता है।

पूज्य गुरुदेव श्री चन्द्रप्रभ जी ने सम्बोधि-साधना के दौरान प्राणायाम के चार चरणों को प्रत्येक साधक के लिए अनिवार्य रूप से जोड़ा है। पहला चरण है : उदर-शुद्धि प्राणायाम, दूसरा है : हृदय-शुद्धि प्राणायाम, तीसरा है : मस्तिष्क-शुद्धि प्राणायाम और चौथा है : नाड़ी-शोधन प्राणायाम।

प्राणायाम करने से पहले हमें कुछ महत्त्वपूर्ण बातों का ध्यान रखना चाहिए : 1. गन्दे और दूषित वातावरण में प्राणायाम नहीं करना चाहिए। 2. तेज वायु में प्राणायाम नहीं करना चाहिए। 3. भोजन के तीन-चार घंटे तक प्राणायाम नहीं करना चाहिए।

वज्रासन, पद्मासन, सुखासन आदि में बैठकर प्राणायाम करना श्रेष्ठ रहता है। प्राणायाम के लिए शौच से निव्रत होना अनिवार्य है। प्राणायाम करते समय शरीर के किसी भी भाग में तनाव नहीं रखना चाहिए। सहज, शांत और प्रसन्न भावों के साथ किया गया प्राणायाम लाभदायक होता है। 1. उदर-शुद्धि प्राणायाम - इसके लिए पेट और पेडु से श्वासों को बाहर उलीचने का काम करना होता है। इतनी गहराई से श्वास को बाहर उलीचें कि पेट खाली हो जाए। हमें केवल श्वास को बाहर फेंकने का काम करना है श्वास लेने का काम अपने आप होता चला जाएगा। इसकी 20 से 60 तक आवृत्ति कर सकते हैं।

लाभ- पेट की चर्बी क म होती है, मधुमेह, कब्ज और गैस सम्बन्धी विकार दूर होते हैं।

विशेष : उदर शुद्धि प्राणायाम के लिए हम श्वास को मुँह के जरिए भी उलीच सकते हैं।

हृदय-शुद्धि प्राणायाम- इसमें नाक के जरिए भरपूर श्वास को छाती में भरना होता है और वापस पूरी साँस को बाहर निकालें। इसकी न्यूनतम 20 आवृत्ति करें।

लाभ - कफ, दमा, श्वास, एलर्जी और साइनस की तकलीफ दूर करने में कारगर है।

मस्तिष्क-शुद्धि प्राणायाम - दोनों हाथों की मुट्टी बाँधकर कंधे के बराबर रखें फिर गहरी श्वास भरते हुए हाथों को ऊपर उठाए और गहरी श्वास छोड़ते हुए हाथ वापस कन्धे के बराबर लाएँ। हाथ ऊपर जाएंगे तो मुट्टी खुल जाएगी और कन्धे के बराबर आते ही मुट्टी वापस बन्द हो जाएगी। 10-10 की आवृति तीन बार दोहरानी चाहिए। लाभ - मस्तिष्क की सुप्त कोशिकाएँ सक्रिय होती हैं और स्मरण शक्ति बढ़ती है। ब्रह्माण्ड में व्याप्त आध्यात्मिक ऊर्जा को प्रवेश करने केद्वार खुलते हैं।

नाड़ी-शोधन प्राणायाम - उल्टे हाथ को उल्टी जँघा पर रखें। सीधे हाथ को नासिका के पास। अंगुठे को सीधे नाक की तरफ, प्रथम दो अंगुलियाँ ललाट प्रदेश पर और शेष दो अंगुलियां उल्टे नाक के छिद्र पर। पहले सीधे नासिका छिद्र को अंगुठे का हल्का दबाव देकर बन्द कर दें और उल्टी तरफ से जितनी श्वास भीतर भरी है उसे बाहर निकाल दें और अब मंद गति से बिना आवाज के श्वास भीतर भरें, फिर अंगुली से उल्टे नासिका छिद्र को बंद कर दें और सीधे नासिका छिद्र से श्वास को बाहर निकाल दें। फिर सीधे तरफ के छिद्र से श्वास को भीतर भरें और उल्टी तरफ से बाहर उलीच दें। यह पूरा एक चक्र हुआ। इस तरह से हमें कम से कम नौ च्रक पूरे करने चाहिए।

लाभ - पूरे शरीर में प्राण-वायु का संचार होता है। फेफड़े के एक-एक अंगुरे तक श्वास पहुंचती है जिससे रक्त की शुद्धि में सहायता मिलती है। सूर्य स्वर और चन्द्र स्वर - दोनों स्वर क्रोध, कषाय आदि दुषित भावों का विसर्जन होता है। तन-मन में ताजगी का संचार होता है।




गुरुदेव श्री

श्री चन्द्रप्रभ सागर जी म. :- विचार और व्याख्यान


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