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रामायण से सीखें परिवार में जीने की कला - पूज्य श्री चन्द्रप्रभ


घर-परिवार में जीने की कला राम से सीखें, जीवन में उन्नति के द्वार खोलने का पाठ कृष्ण से सीखें, साधना और संसार के बीच संतुलन साधने की मार्ग बुद्ध से सीखें और जीवन में मुक्ति पाने का रास्ता महावीर से सीखें। राम जीवन की नींव है तो महावीर जीवन का अंतिम शिखर। कोई व्यक्ति कितना ही धर्म-कर्म क्यों न करे, पर जब तक वह राम के उसूलों को नहीं जिएगा तब तक वह सच्चा धार्मिक नहीं बन पाएगा। राम का मतलब है - माता-पिता के प्रति समर्पण, भाइयों के प्रति अटूट प्रेम, अपनों के प्रति बड़प्पन, मर्यादा की सीख और परायों के प्रति सहानुभूति। जिसके जीवन में राम और रामायण का त्याग आ गया वह धर्म के हर पथ को जीने का उत्तराधिकारी बन गया।

मैं भगवान श्री महावीर का जितना भक्त हूँ उतना ही भगवान श्री राम का भी उपासक हूँ। मुझे राम के नाम और राम के चरित्र ने बेहद प्रभावित किया। दुनिया में भगवान को सबसे छोटा और मीठा नाम है राम। राम का रा बोलते ही भीतर के षट्चक्र खुल जाते हैं और म बोलते ही वे शुद्ध हो जाते हैं। हर मंत्र के आगे बीज मंत्र और पीछे नमः लगाना पड़ता है, पर राम अपने आप में पूर्ण मंत्र है और राम बोलते ही हमारा बह्माण्ड की दिव्य शक्तियों से संबंध जुड़ जाता है। राम केवल सनातनियों के नहीं, वरन् सम्पूर्ण भारत के भगवान हैं। राम के र में जैन धर्म के पहले तीर्थंकर ऋषभदेव और म में अंतिम तीर्थंकर महावीर समाए हुए हैं। राम के र में मुस्लिम धर्म के रहमोदीदार अल्लाह और म में मोहम्मद साहब समाहित हैं। एक राम का नाम लेते ही सारे तीर्थंकरों और पैगम्बरों को वंदना हो जाती है।

राम का जीवन जीता-जागता उपदेश - धरती के और महापुरुषों ने तो उपदेश भी दिए, पर राम का तो जीवन ही जीता-जागता उपदेश था। उन्होंने सीता को दिए एक पत्नी व्रत के वचन को जीवनभर निभाया। राम ने अश्वमेध यज्ञ में सीता की स्वर्णमूर्ति बिठा दी, पर अपने वचन पर अडिग रहे। आप भी जीवन भर एक पत्नी व्रत का पालन करें और दूसरी औरत पर बुरी नजर डालने को पाप समझें। युद्ध के दौरान जब इन्द्रजीत का शव सामने आया तो राम ने यह कहते हुए उस पर अपना उत्तरीय वस्त्र ओढ़ा दिया कि इन्द्रजीत महान था जिसने अपने पिता के लिए अपनी जान तक न्यौछावर कर दी। इसे कहते हैं शत्रु में भी सद्गुण देखने की कला। हम राम से सहजता का गुण सीखें। राज्याभिषेक की जगह वनाभिषेक हो गया फिर भी उनके चेहरे पर शिकन तक न आई। वनवास के दौरान घटी हर घटना में राम सहज रहे। रावण से युद्ध लड़ा तो भी सहजता पूर्वक। हम हर परिस्थिति में धैर्य और सहजता को ले आएँ तो जीवन राममय हो जाए।

मंथरा जैसे स्वार्थी लोगों को परिवार से दूर रखें-रामायण की हमारे लिए पहली सीख है हम अपने परिवार को मंथरा जैसे स्वार्थी लोगों से दूर रखें अन्यथा हमारे घर की हालत भी रघुकुल जैसी हो जाएगी। जहाँ तक हो सके रिश्तों में स्वार्थ को न लाएँ। चार दिनों का जीना है, सब यहीं छोड़-छाड़ के जाना है, न अपने बाप-दादे साथ में ले गए न अपन ले जाएँगे फिर स्वार्थ में उलझकर क्यों घर को नरक बनाया जाए। स्वार्थ की लकीरें इंसानों के बीच दीवारें खड़ी करने का काम करती है। हममें से हर कोई घर में रामायण जरूर रखे, प्रतिदिन उसकी कुछ चैपाइयों का संगान करे ताकि हमारे घर में राम और रामराज्य साकार हो सके।

भाई होकर भाई के काम आएँ-रामायण की दूसरी सीख है भाई होकर भाई के काम आएँ। जो भाई होकर भाई के काम न आया उसका भाई होना व्यर्थ है। एक तरफ मंदिर में चढ़ावा बोलना अथवा स्थानक में कमरा बनाना हो और दूसरी ओर केंसरग्रस्त भाई की सहायता करनी हो तो आपका पहला धर्म है भाई की सेवा करना। हम लक्ष्मण से सीखें जिसने भाई की सेवा के लिए वनवास का मार्ग तक स्वीकार कर लिया और वनवास में राम-सीता की इतनी सेवा की कि सौ जन्मों तक उस कर्ज को उतारा नहीं जा सकता। हम भरत से सीखें जिसने बड़े भाई के लिए राजमहल तक का त्याग कर दिया, चरणपादुकाओं को सिंहासन पर स्थापित कर राज्य संचालन करने लगे, पर्ण कुटीर में रहने लगे और जमीन से भी डेढ़ फुट नीचे सोने लग गए। हम राम-लक्ष्मण-भरत जैसे भाई बनें जो अपने भाई के लिए सब कुछ कुर्बान करने को तैयार रहे।

त्याग भावना अपनाएँ-रामायण की तीसरी सीख है हमारे जीवन में त्याग भावना हो। राम खुद खाने से पहले सीता को खिलाते और लक्ष्मण राम को खिलाकर फिर स्वयं खाते। हम भी खिलाकर खाने की भावना रखें। जो औरों को खिलाकर खाता है उसके लिए भोजन भी प्रभु का प्रसाद बन जाता है। कभी पानी पीने की इच्छा हो तो पहले घरवालों को पानी पीने का निवेदन करें फिर खुद पीएँ। मात्र दो मिनट का आपका धैर्य और त्याग-भावना सबके लिए आदर्श बन जाएगी।




गुरुदेव श्री

श्री चन्द्रप्रभ सागर जी म. :- विचार और व्याख्यान


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