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जहाँ प्रेम और क्षमा वहाँ स्वर्ग, जहाँ क्रोध और नफरत वहाँ नरक - संत श्री चन्द्रप्रभ जी


एक बार मेरा जोधपुर के कारागार में प्रवचन देने के लिए जाना हुआ। वहाँ ऐसे ही कैदियों के मध्य बैठा हुआ था। एक कैदी से पूछा, 'भाई, तुम्हें किस जुर्म में कैद हुई है? वह रोने लगा, मैंने सांत्वना देकर पूछा, 'कुछ कहो तो सही। उसने कहा, 'मेरे गुस्से के कारण मुझे ग्यारह साल की जेल हुई है। मैंने कहा — 'मतलब? तब उसने बताया कि उसे शराब पीने की आदत थी। पत्ïनी ने कई बार समझाया लेकिन कुछ हल न निकला। तब तय हुआ कि वह घर में शराब नहीं पिएगा। पीना ही है तो बाहर पिए। एक दफा पत्नी कुछ दिनों के लिए मायके गई। उसने सोचा अब दस-पन्द्रह दिन तक तो पत्ïनी आने वाली है नहीं, सो घर में ही महिफल सजने लगी। एक दिन जब वह अपने दोस्तों के साथ बैठा शराब पी रहा था तो अचानक पत्नी आ धमकी। आते ही वह तमतमा उठी और उसने दोस्तों के सामने ही खरी-खोटी सुना दी। मुझे गुस्सा आ गया मैंने सामने पड़ा पेपरवेट उठाकर उसके दे मारा। पेपरवेट सिर में लगा, पत्नी के सिर से खून की धार बह निकली। वह घबराया, उसे लेकर डॉक्टर के यहाँ गया, पर अब उस देह में प्राण नहीं थे, वह मृत घोषित हो गई और हत्या के जुर्म में उसे ग्यारह वर्ष की जेल हो गई। उसने मुझसे कहा कि वह आज तक इसी बात को लेकर पछता रहा है कि उसने गुस्सा क्यों किया?

साधारण गणित में एक और एक दो हो सकते हैं लेकिन गुस्से के गणित में तो एक और एक ग्यारह ही होते हैं। मैंने भी गुस्सा किया है और उसके दुष्परिणाम देखे हैं। आपने भी अपने गुस्से के दुष्परिणाम जरूर ही देखे होंगे। हम सभी प्रॉफिट वाला बिजनेस करना चाहते हैं, कोई मुझे बता सकता है कि क्रोध करने के क्या-क्या लाभ हैं? क्या बिल्डर, क्या व्यापारी, क्या अफसर, क्या चपरासी, क्या विद्यार्थी, क्या गृहस्थी, बच्चा या बूढ़ा, जवान या मजदूर कोई नहीं कह सकता कि क्रोध करने के अमुक-अमुक लाभ हैं। फिर भी क्रोध किए चले जाते हैं। क्यों?

अगर आप अपने-आप को शांति के रास्ते पर ले आते हैं तो जीवन के संत कहलाएँगे और अशांति आपको जीते-जी नरक में ढकेल देगी। वेश बदलकर संत तो बना जा सकता है, पर शांत होना वास्तविक संतत्व का प्राण है। महाराज तो बन सकते हैं, पर संत होना महान्ï बात है। आप घर में रहकर शांत रह सके तो यह किसी संत होने से कम नहीं है। हम केवल अरिहंत की पूजा न करते रहें। खुद अरिहंत होने की पहल करें। अरिहंत यानी शत्रु का हनन करने वाला। क्रोध हमारा शत्रु है। हम शत्रु पर विजय प्राप्ïत करें। क्रोध पर विजय प्राप्ïत करना सबसे बड़ी विजय है।

मैं प्रेम का पथिक हूँ, प्रेम से जीता हूँ, प्रेम को जीता हूँ। प्रेम में, शांति में ही जीवन का स्वर्ग और जीवन का सुख नजर आता है। भाई, सबका चार दिन का जीना है और कब किसको चला जाना है, कहा नहीं जा सकता। याद वे ही रखे जाएँगे जो याद रखे जाने जैसा कर्म और व्यवहार करेंगे। प्रेम, शांति, सम्मान और विनम्रता का परिणाम है स्वर्ग। क्रोध, घमंड, ईष्र्या, नफरत का परिणाम है नरक। खुद ही खुद का मूल्यांकन कर लो कि हमारे जीवन का परिणाम स्वर्ग है या नरक!

चीन के संत हुए हैं नानू सीची। उनके पास यूनान के सेनापति पहुँचे और कहा — 'महात्मन्, मैंने आपका बहुत नाम सुना है और मन में एक प्रश्न उठा है, मैं उसका उत्तर पाना चाहता हूँ।

नानू सीची ने कहा — 'अपनी जिज्ञासा व्यक्ïत करो। 'महात्मन्, मैं जानना चाहता हूँ कि स्वर्ग क्या है और नरक क्या है? धार्मिक पुस्तकों में इन शब्दों को पढ़ा है, लेकिन नहीं जान पाया कि स्वर्ग और नरक क्या है।

नानू सीची ने उसे ध्यानपूर्वक देखा और कहा, 'तुम मुझे अपना परिचय तो दो।

'मैं, अरे मैं तो यूनान का सेनापति हूँ।

'क्या तुम यूनान के सेनापति हो? पर चेहरे से तो ऐसा नहीं लगता। चेहरा तो किसी भिखारी जैसा नजर आ रहा है।

'महाराज! यह तुम क्या और किससे कह रहे हो, जानते हो? तुमने यूनान के सेनापति को भिखारी कहा? मुझमें ऐसा क्या देखा जो तुमने मुझे भिखारी कह दिया, क्या मेरे हाथ में भीख माँगने का कटोरा है?

'नहीं, भाई मैंने तो बस तुम्हारे चेहरे को देखकर ऐसा कहा। तुम्हारे हाथ में क्या है?

'मेरे हाथ में तलवार है।

'ओह, तो तुम्हारे पास तलवार है। इसमें धार भी है या नहीं?

इतना सुनते ही तो सेनापति को गुस्सा चढऩे लगा। उसने म्यान में से तलवार निकाल ली और कहा — 'महाराज, इसमें धार भी है और जो तुमने मुझे भिखारी कहा था, अगर किसी और ने कहा होता तो उसका सिर कटकर $जमीन पर होता। पर तुमने कहा है इसलिए मैंने तुम्हें .....।

सो तो ठीक है, पर तुम्हारी तलवार में वास्तव में धार है या.....? यह सुनते ही सेनापति ने तलवार तुरन्त पास में ही खड़े पेड़ की डाली पर चला दी। डाल नीचे आ गिरी और बोला, 'देख लिया मेरी तलवार में कितनी धार है?

संत ने कहा, 'अरे भाई, तुम तो मेरी बात का बुरा मान गए। मैं तो तुम्हारे सवाल का जवाब दे रहा था।

'क्या मतलब? सेनापति ने पूछा।

'यही कि मेरे द्वारा अपमान के दो शब्द कहने पर तुम्हें जो गुस्सा आया है न्, यही है नरक।

सेनापति चौंका, उसे सारी बात समझ में आ गई। वह संत के पैरों में गिर पड़ा और बोला — 'महाराज, मैं आपकी रहस्यमयी बात को समझ नहीं पाया। मैं आपसे क्षमा माँगता हूँ।

नानू सीची ने उसे उठाया और कहा — 'यही है स्वर्ग।

'क्या मतलब? पुन: सेनापति ने पूछा।

नानू सीची ने कहा, 'तुम्हारे द्वारा गुस्सा करना ही नरक है और माफी माँगने के लिए झुक जाना ही स्वर्ग है। नानू सीची ने कहा,

तो यह है स्वर्ग और यह है नरक। एक ओर नरक, एक ओर स्वर्ग। जिनसे गलती हो जाए, उन्हें माफ कर दो, यह है स्वर्गिक व्यवहार। इसी तरह खुद से गलती हो जाए, उसके लिए माफी मांग लो, यह है स्वर्गिक बरताव। याद रखो, स्वर्ग उनके लिए है जो गलती करने वालों को माफ कर देते हैं, और स्वर्ग उनके लिए है जो दूसरों पर रहम करते हैं। ईश्वर उन्हीं से प्यार करता है जो दयालु और क्षमाशील होते हैं।

आप बहीखाते में शुभ-लाभ और शुभ खर्च लिखने के अभ्यस्त होंगे। मेरा अनुरोध है शुभ कर्म और शुभ व्यवहार भी लिखे जाने चाहिए। शुभ सोचो, शुभ बोलो, शुभ देखो, शुभ सुनो, शुभ करो — ये पाँच बातें ही जीवन की पंचामृत बन जानी चाहिए।

मैंने गुस्से के दुष्परिणाम और प्रेम के शुभ परिणाम देखे हैं। इसीलिए कहता हूँ गुस्सा मत करो, प्राणीमात्र से प्रेम करो। सभी से प्रेम करना जीवन जीने की बेहतरीन कला है। प्रेम स्वयं अहिंसा है और अहिंसा का मतलब है अनंत प्रेम। ऐसा मत सोचो कि थोड़ा-सा गुस्सा कर लिया तो क्या हो गया। दुनिया में कुछ चीजें होती तो थोड़ी-सी हैं, पर कब बढ़ जाती हैं पता नहीं चलता। कभी किसी से कर्ज नहीं लेना। यह कभी भी बढ़ सकता है। घाव कभी होने मत देना, वरना घाव कभी भी बढ़ सकता है। आग लगने मत देना, क्योंकि यह कभी भी तेज हो सकती है और क्रोध कभी न करना अन्यथा यह भी आगे बढ़ सकता है। हो सकता है कभी आपको क्रोध करना ही पड़ जाए तब भी अल्प मात्रा में ही क्रोध करें। क्रोध तभी करें जब आपके पास अन्य कोई विकल्प न बचे, क्योंकि क्रोध तो ब्रह्मास्त्र है, इसे तभी उपयोग में लाएँ जब आपके सभी अस्त्र विफल हो जाएँ। क्रोध के परमाणु-अस्त्र का तभी इस्तेमाल करें जब अपने समस्त सकारात्मक अस्त्र निष्फल हो जाएँ।

क्रोध तीन प्रकार का होता है — एक, पानी में उठे बुलबुले की तरह कि अभी गुस्सा आया और काफूर हो गया। जैसे पानी में लकीर खींचें तो कितनी देर टिकती है, बस कुछ लोगों का गुस्सा ऐसा ही होता है। दूसरे प्रकार के लोगों का गुस्सा मिट्टी में पड़ी दरारों की तरह होता है कि जब तक प्रेम या मिठास का पानी न मिले दरार रहती है फिर सब एक समान। उनका गुस्सा प्रेम की बरसात होते ही, मीठे बोलों की शीतलता से ठंडा हो जाता है। और तीसरे प्रकार के लोगों का गुस्सा पत्थर में पड़ी दरार की तरह होता है। चाहे जितना प्रयत्ïन कर लो पत्ïथर जल्दी जुड़ते नहीं, ठीक इसी प्रकार इन लोगों का गुस्सा कम नहीं हो पाता। और कुछ लोग कमठ की तरह होते हैं, जो जन्मों-जन्मों तक क्रोध की धारा को साथ लिए रहते हैं।

कृपया याद रखें, जो भाई भाई से नहीं बोलता, उससे वैर-विरोध रखता है, वह संवत्सरी प्रतिक्रमण में समाज के मध्य खड़े होकर क्षमापना का अधिकारी नहीं होता। अगर आपके जीवन में किसी भी प्रकार के क्रोध ने स्थान बना लिया हो तो उससे ऊपर उठने का प्रयास कीजिए। पानी में खींची गई लकीर जैसा क्रोध तो शायद क्षम्य भी हो, पर अन्य दोनों प्रकार के क्रोध आपके जीवन को अशांत और तनावमय बना देंगे। आपके रिश्तों में जहर घोल देंगे।

अब हम देखेंगे कि गुस्सा किन कारणों से आता है —

गुस्सा हमेशा दूसरे की गलतियों पर आता है, स्वयं की गलतियों पर नहीं। मानो कि आप शेविंग कर रहे हैं और गाल पर ब्लेड से कट लग गया और खून आ गया तो आप किस पर गुस्सा करेंगे? किसी पर नहीं, हाँ, अगर कोई आप पर थूक दे तो जरूर आग-बबूला हो जाएँगे, पर यदि अपना थूक ही अपने पर गिर जाए तो? खुद की गलती पर हम गौर नहीं करते, पर दूसरे से गलती हो जाए तो!

मेरे प्रभु, याद रखो, जो मसला सुई से हल हो जाए उसके लिए तलवार मत चलाइए। जो बात आँख दिखाने से समझ में आ जाए उसके लिए गाली-गलौच मत कीजिए क्योंकि अभी-अभी जिस बात पर गुस्सा आया है उसके साथ चार दिन पुरानी बातें और भी जुड़ जाती हैं, गड़े मुर्दे उखडऩे लगते हैं। अरे भाई, शीशी अभी फूटी है, जबकि पन्द्रह दिन पहले टूटे गुलदस्ते का गुस्सा भी आज शामिल हो जाता है।

दूसरी बात, गुस्सा हमेशा कमजोर पर आता है। पिता अपने बच्ïचों पर, मालिक नौकर पर, बच्चे खिलौनों पर गुस्सा करते दिखाई देते हैं। जो किसी दूसरे पर गुस्सा नहीं कर सकते वह निरीह मूक जानवरों पर क्रोध करते देखे जा सकते हैं। कुछ नहीं, चल रहे हैं। सड़क पर से उठाया पत्थर और मार दिया किसी कुत्ते पर, जमा दी छड़ी गाय या बकरी पर। गुस्सा हमेशा नीचे की ओर बहता है और प्रेम हमेशा ऊपर की ओर।

कहते हैं एक व्यक्ïित सड़क पर जा रहा था। कहीं से आकर उसे पत्थर लगा। उसे क्रोध आ गया। उसने उठाया पत्ïथर और चला उस घर की ओर जहाँ से पत्थर आया था कि अभी जाकर खबर लेता हूँ, पर वहाँ जाकर देखा कि एक पहलवान गदा-मुद्ïगर उठाए कसरत कर रहा था। उस व्यक्ïित को देखकर उसने कहा, 'ए, क्या है? वह व्यक्ïित घबराया और कहा, 'कुछ नहीं, आपके घर का पत्थर गिर गया था, लौटाने आया हूँ।

क्रोध कमजोर पर आता है। बलवान के आगे झुक जाता है। क्रोध का परिणाम बड़ा घातक होता है। एक बार क्रोध करने से हमारी एक हजार ज्ञान-कोशिकाएँ जलकर नष्ट हो जाती हैं। जो बच्चे दिन में दस दफा गुस्सा करते हैं उनकी दस हजार ज्ञान-कोशिकाएँ नष्ट हो जाती हैं। इसलिए मेरे बच्चो, सदाबाहर प्रसन्न रहो। सहनशील बनो। शांत रहो। अगर आप चाहते हैं कि आपकी स्मरण-शक्ïित प्रखर बनी रहे तो संकल्प लीजिए कि गुस्सा नहीं करेंगे, नहीं करेंगे, नहीं करेंगे। एक तो गुस्से का त्याग कीजिए। दूसरा मन लगाकर पढ़ाई कीजिए, आप निश्िचत ही प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण होंगे। आप गुस्सा करेंगे तो हृदय कमजोर होगा, पाचन-क्रिया बिगड़ेगी, दिमागी क्षमता कमजोर होती जाएगी। रक्तचाप असंतुलित होगा, भूख नहीं लगेगी, नींद भी नहीं आएगी। क्रोध का अन्य दुष्परिणाम है— स्वयं पर नियंत्रण समाप्त हो जाता है। क्रोध के कारण आपसी संबंधों में खटास आ जाती है। पलभर का क्रोध पूरा भविष्य बिगाड़ सकता है। क्रोध के कारण केरियर भी प्रभावित होता है।

जो क्रोध नहीं करता वह एक समय भोजन करके भी ऊर्जावान बना रहता है। उसका स्वयं पर नियंत्रण बना रहता है। मैं अनुशासनप्रिय तो हूँ, पर गुस्सा नहीं करता। गुस्सा करना मूर्खता है, जब भी व्यक्ïित गुस्सा करता है, मूर्खता को ही दोहराता है। गुस्से में व्यक्ïित अपशब्दों का प्रयोग भी करता है। क्रोध आने पर सारी समझदारी एक तरफ हो जाती है और मुँह से गालियाँ झरने लगती हैं। हमारे द्वारा किया गया थोड़ा-सा गुस्सा हमारे मैत्रीपूर्ण संबंधों को समाप्ïत कर देता है।

हम अपने गुस्से को अपने नियंत्रण में रखें। इसीलिए कहता हूँ जो कार्य सुई से हो जाए, उसके लिए तलवार का उपयोग न करें। मेरी एक चर्चित कहानी है —

एक एस. पी. महोदय अपने लाव-लश्कर के साथ किसी दंगाग्रस्त क्षेत्र में पहुँचे। मोहल्ले के लोग बहुत गुस्साए हुए थे। उनमें से किसी ने एस. पी. के मुँह पर थूक दिया। यह देखते ही थानेदार ने रिवॉल्वर निकाल ली और उस व्यक्ïित पर तान दी। वह गोली चलाने को तत्पर हुआ ही था कि एस.पी. ने कहा, 'ठहरो, क्या तुम्हारे पास रूमाल है? 'हाँ, सर है 'मुझे रूमाल दो। रूमाल हाथ में आया। एस. पी. ने मुँह पौंछकर रूमाल फेंक दिया और थानेदार से कहा, 'हमेशा याद रखना जो काम रूमाल से निपट जाए उसके लिए रिवॉल्वर चलाना बेवकूफी है।

यही है क्रोध को जीतने का पहला और कारगर फॉर्मूला कि जो काम प्रेम भरे शब्दों से पूरा हो सकता है, उसके लिए तैश क्यों खाया जाए! क्रोध तभी करें जब क्रोध करने के अतिरिक्ïत कोई विकल्प ही न बचे। अपने मातहत को, बेटे को, बहू को, नौकर को तभी डाँटें-डपटें जब इसके अलावा कोई रास्ता ही न रहे।

नौकर को अगर छोडऩा भी हो तो गुस्से में न छोडें़। वह आपके लिए घातक बन सकता है। आपने गुस्से में आकर उसे घर से या दुकान से निकाला है, निश्चय ही इसका गुस्सा उसे भी है। वह अपना गुस्सा आप पर निकाल सकता है। आप पर कोई जानलेवा हमला भी कर सकता है। इसलिए सावधान! जब भी किसी नौकर को छोडें, मिठास भरे वातावरण में छोड़ें, जाते समय उसे इनाम भी दें और धन्यवाद भी कि इतने समय तक तुमने हमारी सेवा की। यही नहीं, भाई-भाई भी अगर कभी अलग हों, पिता-पुत्र अलग हों, तब भी प्रेम के साथ एक-दूसरे से बिदा हों, ताकि अलग होने के बाद एक-दूसरे से मिलने के काबिल तो रहो। जरूरत पडऩे पर एक-दूसरे की मदद भी ली-दी जा सके। गुस्से में अगर अलग हो बैठे, तो उपेक्षित बेटा-बहू दूसरों के सामने आपकी बदनामी ही करेंगे। व्यक्ïित की समझदारी इसी में है कि वह विपरीत वातावरण बन जाने पर उस पर किस तरह विजय पाता है।

अब हम देखें कि क्रोध आने पर कैसे इसका निवारण किया जाए —

जब भी गुस्सा आए तो इसे कल पर टालने की आदत डालें। यदि गुस्से को हाथो-हाथ प्रकट कर दिया तो वह बात नहीं होगी, आग का लावा होगा। गुस्से में व्यक्ïित, व्यक्ïित नहीं होता, पिता पिता नहीं होता। ज्वालामुखी बन जाता है। गुस्सा प्रकट हुआ यानी ज्वालामुखी फट पड़ा। इसलिए गुस्सा आ जाए तो दस मिनट के लिए शांति धारण कर लें। अरे भाई, गुस्सा कोई मामूली चीज थोड़े ही है जो जब चाहो तब प्रकट कर दो। इसके लिए तो किसी राजज्योतिषी जी से 'अमृतसिद्धि-योग या 'सर्वार्थसिद्धि-योग का मुहूर्त निकलवाओ। फिर करना गुस्सा। हाथोहाथ अगर गुस्सा कर बैठे तो वह वक्त आपके लिए 'कालयोग या 'व्यतिपात का दुष्प्रभाव दे बैठेगा।

गुस्सा आ गया। कोई बात नहीं, थोड़ा धीरज धरें। धीरज से बड़ा कोई मित्र नहीं है। विपरीत वातावरण बन जाने पर ही धैर्य की परीक्षा होती है। क्रोध का इलाज है धैर्य। 10 मिनट का धीरज आपके 10 घंटे की शांति को बर्बाद होने से बचा सकता है। धीरज छोड़ा कि गये काम से। फिर तो क्रोध का पूरा खानदान आ धमकेगा। आपसे कई तरह के सैलटैक्स, इनकमटैक्स वसूल जाएगा। आपकी शांति, आपकी समझदारी, आपके रिश्ते, आपके आनंद — सबको चूहों की तरह कुतर जाएगा।

ऐसा हुआ : रूसी संत गुिर्जएफ मृत्यु-शैय्या पर थे। उनका भक्त अपने पुत्र के साथ उनसे मिलने आया। उसने कहा, 'महात्मन्, मेरे पुत्र को कुछ जीवनोपयोगी शिक्षा दें। गुिर्जएफ ने उस लड़के को ध्यान से देखा और कहा, 'बेटा, जब भी कोई तुम पर क्रोध करे तुम तुरंत उसका जवाब मत देना। जवाब जरूर देना, लेकिन चौबीस घंटे बाद। युवा-पुत्र सहमत हो गया। अब हुआ यह कि क्रोध के निमित्त आते लेकिन संत की बात याद आ जाती और चौबीस घंटे बाद वह भूल ही जाता कि उसे क्रोध किस बात पर करना है।

मैं भी आपसे यही कहता हूँ कि अगर किसी से गलती हो जाए तो पहली बार उसकी उपेक्षा कर दो, दूसरी बार ध्यान दो और तीसरी दफा उसे प्यार से समझाओ फिर भी वह अपनी गलतियाँ दोहराता चला जाए तो...? फिर भले ही उसके टिका दो। भगवान कृष्ण ने तो शिशुपाल की निन्यानवें गलतियाँ माफ कर दी थीं। हम कम-से-कम किसी की नौ या तीन गलतियाँ तो माफ कर सकते हैं न्।

मेरी समझ से जो व्यक्ïित अपने गुस्से को काबू में रखता है वही यथार्थ में लौकिक और अलौकिक दोनों प्रकार के स्वर्ग का अधिकारी होता है। आप समता में रहने वाले लोग हैं। रोज एक घंटा मौन की सामायिक करें। रोजाना एक घंटा मौन का व्रत रखें। वैसे भी हर आदमी को एक महीने में एक दिन तो व्रत करना ही चाहिए और व्रत यह कि अमुक दिन या अमुक वार को मैं गुस्सा नहीं करूँगा, मैं किसी तरह की उग्र प्रतिक्रिया नहीं करूँगा। घटना चाहे जैसी हो जाए, पर मेरे आज क्रोध का व्रत है, क्रोध का उपवास है। जैसे लोग आहार न लेने का उपवास करते हैं, आप क्रोध न करने का उपवास कर लीजिए। आप यह व्रत लगातार तीन दिन का भी कर सकते हैं। आपको 'तेले का लाभ मिल जाएगा। आठ दिन भी कर सकते हैं, आपके 'अठाई हो जाएगी। महीने भर का अगर आप यह संकल्प लेते हैं तो आपके 'मासक्षमण हो गया। कितना सरल तप है यह! खाते-पीते हुए भी आप तपस्वी। तपस्वी इस रूप में कि आपने गुस्सा नहीं किया। बाकी तो भूखा रहने वाले तपस्वियों को गुस्सा जल्दी आ जाता है। आप तो गुस्सा छोडि़ए, सुख से जीवन का आनंद लीजिए।

क्रोध-मुक्ित का एक और मंत्र लीजिए : क्रोध का वातावरण बनने पर उस स्थान से अलग हो जाएँ। कमरे में आ जाएँ, कुछ अच्छा-सा संगीत सुन लें, नहीं तो सफाई कर लें मतलब कि अपना ध्यान बँटा दें। अगर ऐसा नहीं कर सकते यानी कि वहाँ से हटना मुमकिन नहीं है तो ठंडा पानी पी लें। जब दूध में उफान आता है तो पानी के छींटे डालकर उफान को रोक देते हैं या गैस बंद कर देते हैं। ठीक इसी तरह क्रोध का तापमान कम करने के लिए ठंडा पानी पी लीजिए, वह भी ठंडा हो जाएगा। आप ठंडा होकर देखिए तो सही, अगला ठंडा बर्फ हो जाएगा।

एक बात और यदि हमारे कारण यदि किसी को गुस्सा आ जाए तो 'सॉरी कहना न भूलें। जरा भी देर न लगाएँ, तुरन्त 'सॉरी कह दें। सॉरी शब्द बड़ा पावरफुल है। अगले के टेम्परेचर को एक ही क्षण में 'फिफ्टी परसेंट कर देता है। जीवन में तीन शब्द — प्लीज, थैंक यू और सॉरी — सदा इस्तेमाल कीजिए। आप जितनी बार प्लीज कहेंगे सामने वाला उतना ही प्लीज्ड होगा, धन्यवाद देते ही वह कृतज्ञ हो जाएगा और सॉरी कहने से क्रोध के वातावरण में तत्काल नमी का संचार हो जाएगा।

गलती होने पर गुस्सा न आने दें क्योंकि कर्ज को, घाव को और आग को बढऩे मत दो और गुस्से को पैदा ही न होने दो। थोड़ा मौन रहने की आदत भी डालिये। सबसे भली और सबसे मीठी चुप। देते गाली एक हैं, उलटे गाली अनेक, जो तू गाली दे नहीं, तो रहे एक-की-एक। दूसरे के क्रोध को स्वीकार मत कीजिए। वह स्वभाव से क्रोधी है तो क्या, आप तो नहीं? उसकी नाराजगी को अस्वीकार कर दीजिए। उसका क्रोध उन्हें ही मुबारक हो। अगर आपने उसके क्रोध को स्वीकार कर लिया तो आप पर भी क्रोध हावी हो जाएगा। एकमात्र क्रोध ऐसा कषाय है जिससे हमारी आत्मा भी गिरती है, मन में संत्रास पैदा होता है, हमारे संबंध भी कटते हैं। पर यह सब केवल कहने-सुनने से क्रोध कम नहीं होगा। क्रोध तब कम होगा जब हम क्रोध के दुष्परिणामों को समझेंगे, इससे बचने का संकल्प लेंगे, होश और बोधपूर्वक जिएँगे, 'हे जीव! शांत रह — इस संदेश को जीने का प्रयत्ïन करेंगे।

सबके साथ विनम्रता से पेश आइये, गुस्से का वातावरण नहीं बनेगा। हर समय प्रसन्ïन रहने की आदत डालिये। जैसे ही सुबह आँख खुले एक मिनट तक भरपूर मुस्कुराइये। ऐसे मुस्कुराइये कि आपका रोम-रोम खिल उठे। प्रत्येक कार्य को करने के पहले मुस्कुराइये। माता-पिता को प्रणाम करना हो या किसी से मिल रहे हों, ऑफिस पहुँचे हों या दुकान, अतिथि-सत्कार करना हो या किसी से बात करना हो, पहले मुस्कुराइये। आप पाएँगे कि परिस्थितियाँ आपके अनुकूल होती जा रही हैं। विपरीत वातावरण में भी मुस्कुराने की आदत डालिये।

िजंदगी में सदा मुस्कुराते रहें, फासले कम करें और प्रेम करना सीखें। ताने मारना छोड़ें और प्रेम करना सीखें। याद रखें माचिस की तीली के सिर होता है, पर दिमाग नहीं। अत: वह थोड़े से घर्षण से जल उठती है, पर हमारे पास तो सिर भी है और दिमाग भी, फिर हम क्यों जरा-जरा सी बात पर सुलग उठते हैं। हमें तो अपनी बुद्धि का उपयोग करना है और विवेकपूर्वक अपने गुस्से पर नियंत्रण रखना है।

मै एक खास कहानी का उपयोग कर रहा हूँ। कहते हैं : बादशाह हारूँ रशीद के बेटे ने अपने पिता से आकर राजसभा में ही कहा — अमुक सेनापति के लड़के ने आज मुझे माँ-बहिन की गाली दी है। इस पर मंत्रियों में से किसी ने कहा — सेनापति के लड़के को देश-निकाला दे देना चाहिए। कोई बोला — उसकी जबान खिंचवा देनी चाहिए, जिसने राजकुमार को गाली दी हो। किसी ने सलाह दी — उसे फौरन सूली पर चढ़ा देना चाहिए।

आिखर बादशाह ने बेटे को समझाते हुए कहा — बेटा, अगर तुम अपराधी को माफ कर सको, तो यह सबसे अच्छी बात होगी। और, अगर तुम ऐसा नहीं कर सकते तो तुम भी उसे गाली दे सकते हो, लेकिन ऐसा करने से पहले जरा इतना सोच लो कि गाली देना तुम्हें शोभा देगा? राजकुमार ने कुछ सोचा और शांतिपूर्वक महलों में चला गया। उसे समझ आ गई कि क्रोध का कारण मौजूद होने पर भी जो शांत रह सकता है, वही सच्चा वीर है। हम सब लोग अपनी वीरता को पहचानें और शांति-पथ के पुजारी बनें। मेरी समझ से आज के बाद आप अपने क्रोध को अपने काबू में रखेंगे, क्रोध पर संयम रखेंगे। जीवन में, वाणी में, व्यवहार में मिठास घोलेंगे। दुनिया में शिव-शंकर वही कहलाते हैं, जो दूसरों के हिस्से का जहर खुद पी जाया करते हैं और बदले में लोगों को अपनी दिव्यता और मिठास लौटाया करते हैं। आज से हम लोगों को फूलों के गुलदस्ते नहीं, अपनी मिठास के गुलदस्ते भेंट करेंगे।




गुरुदेव श्री

श्री चन्द्रप्रभ सागर जी म. :- विचार और व्याख्यान


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