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जैन धर्म जीना ही नहीं, मरना भी सिखाता है


संलेखना जैन धर्म की तप-त्यागमयी परम्परा का एक आध्यात्मिक चरण है। यह आत्महत्या नहीं तप-त्याग पूर्वक देह के प्रति रहने वाले ममत्व भाव का विसर्जन है। जैन धर्म अपने मुनियों को यह सिखाता है कि शरीर को नौका की तरह उपयोग करो और खुद को नाविक की तरह। जब तक शरीर तुम्हारा साथ देता है तुम संयम और साधना भाव से इसका उपयोग करो और जिस दिन लगे कि शरीर अब मेरा किसी भी रूप में साथ नहीं दे रहा है तो अन्न-जल का त्याग करके इसे विसर्जित कर दो।

जैन धर्म जीना तो सीखाता ही है, जीवन के अंतिम क्षणों में समाधिपूर्वक मरना भी सीखाता है। जैन धर्म की इस महान आत्म-दृष्टि का जैन मुनिजन तो सम्मान करते ही हैं आचार्य विनोबा भावे जैसे महापुरुष भी इसका सम्मान करते थे। संलेखना के महत्त्व को वे ही समझ सकते हैं जो अपने व्यावहारिक जीवन को बड़े तप-त्याग और आत्मभाव के साथ जीते हैं। संलेखना के वक्त साधक की अंतर्दशा को कोई देख ले तो बड़े से बड़ा नास्तिक भी उसके आगे नतमस्तक हो जाएगा। यदि कोई याचिकाकत्र्ता यह कहता हो कि संलेखना के बारे में जैन धर्म शास्त्रों में कोई आदेश नहीं है तो इसका मतलब है कि उसे धर्मशास्त्रों का ज्ञान नहीं है। जैन धर्म की प्राचीन पुस्तकों एवं शास्त्रों में संलेखना के अनेक संदर्भ प्राप्त हैं। यह धर्म देश के संविधान का सम्मान करता है। संलेखना जैसी उत्कृष्ट तपस्या को विवाद का विषय बनाने की बजाय इस पर सकारात्मक नजरिया अपनाना चाहिए। संलेखना का उत्तम स्वरूप बना रहे इस हेतु इसे तप-त्याग से जीने वाले साधु-साध्वीजन के लिए ग्राह्य माना जाना चाहिए।




गुरुदेव श्री

श्री चन्द्रप्रभ सागर जी म. :- विचार और व्याख्यान


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