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तीर्थंकर हो या अवतार हर कोई माँ के दूध का कर्जदार - पूज्य श्री चन्द्रप्रभ


माँ संसार का सबसे खूबसूरत शब्द है। दुनियाँ के सारे शब्द कोषों में माँ या मदर से ज्यादा प्यारा शब्द और कोई नहीं है। माँ शब्द तो बीज की तरह छोटा है, और बरगद की तरह विशाल। माँ अपने आप में संसार का सम्पूर्ण शास्त्र है जिसमें दुनियाँ भर के सारे शास्त्र और उनका सत्य आकर समाहित हो जाता है। माँ तो अपने आप में मजहबों का मजहब है कि जिसमें दुनियां भर के सारे सारे पंथ और परम्पराएँ आकर सुख और सुकून पाया करती हैं।

माँ तो ममता का महाकाव्य है। माँ से ही पहली तुतलाती बोली शुरू होती है और माँ ही पीड़ा का पहला अल्फाज होता है। वह कैसी जबान जिस पर माँ की चासनी न लगी हो, वह कैसी किताब जिसमें माँ शब्द का उपयोग न हुआ हो, वह कैसी पीड़ा जिसकी गहराई से ओ माँ न निकला हो। सच तो यह है कि माँ से ही जीवन की शुरूआत है। माँ ही जीवन के हर दुख दर्द का पड़ाव है और माँ ही अन्तिम शरण स्थली है। जब दुनियां में कोई कहीं भी पनाह न पाए तब धरती पर एक अकेेली माँ ही उसे शरण देती हैै। अपने राह भूले थके हारे बच्चे को अपनी कोमल अंगुलियों के स्पर्श से उसकी थकान को दूर करने वाली पहली और आखिरी शरण माँ ही होती है।

माँ राहत की सांस है। माँ तो अपने आप में जीवन का महाव्रत है। योगी लोग तो कोई एक व्रत या कोई एक अनुष्ठान करते होंगे पर माँ का तो सम्पूर्ण जीवन ही योगों का योग, अनुष्ठानों का अनुष्ठान और पूजनों का महापूजन है।

माँ अपने आप में एक अनोखा व्रत है। जीवन में किसी के लिए भी एकादशी के व्रत को ग्यारह साल तक करना आसान है, संवत्सरी पर्व पर तीन दिन के उपवास करने सरल हैं, चातुर्मास के दरम्यान एक महिने का उपवास करके मासक्षमण करना सहज है, पर किसी के द्वारा भी माँ होना और माँ के दायित्वों को निभाना उन समस्त व्रतों, उपवासों व मासक्षमण करने से भी ज्यादा दुष्कर तप है। माँ की ममता, उसके त्याग, उसके अहसान, अपने आप में एक महातप और कुर्बानी की दास्तान है।

माँ तो हमारे घर के कुमकुम की रंगोली है। माँ तो हर रोज सूर्य भगवान को दिया जाने वाला आस्था का अघ्र्य है। यह माँ ही है जो कि धैर्य और शान्ति रखने वाले चन्द्रमा का कार्य करती है। सभी देवी-देवताओं के स्वतंत्र मन्दिर हैं, पर माँ तो वह मन्दिर है जिसमें ब्रह्मा, विष्णु, महेश कुदरती तौर पर प्रतिष्ठित हैं, जिसकी वाणी में सत्यम् है, जिसकी आँखों में शिवम् है और जिसके हाथों में सुन्दरम् है।

कहते हैं ब्रह्मा का कार्य सृजन करना है। हमारा सृजन माँ ने किया इसलिए माँ ब्रह्मा है। हमारा पालन-पोषण माँ करती है इसलिए माँ विष्णु है। अपनी छाती की अमृत बूंदें माँ ने हमारे जिगर में उतारी। माँ ही हमारा उद्घार करती है। माँ ही हमें संस्कार देती है और माँ ही हमें अपने पाँवों पर खड़ा करती है। इसलिए माँ महादेव है। तीन देवताओं की अगर एक साथ पूजा करनी है तो माँ को पूजिए।

माँ ही ममता माँ ही तीरथ-जीवन में माँ का होना ही काफी है। माँ है तो जीवन में पूर्णता है। जिस दिन व्यक्ति के जीवन से उसकी माँ दूर हो जाती है उसी दिन से उसका जीवन अपूर्ण हो जाता है। पत्नी को अर्धांगिनी बनाकर व्यक्ति अपने जीवन को पूर्णता देने की कोशिश अवश्य करता है किन्तु माँ के बगैर कोई भी व्यक्ति अपने जीवन का दैवीय उपसंहार नहीं कर सकता। माँ है तो जीवन की कविता का अर्थ है, पर माँ ही अगर चली जाए तो जीवन की कविता के कोई मायने नहीं हैं। याद रखिए पत्नी आपकी पसन्द है पर माँ परमात्मा का अनुग्रह है। कहीं ऐसा न हो कि हम अपनी पसन्द के चक्कर में परमात्मा के अनुग्रह को ठुकरा बैठें।

जिसने अब तक माँ के प्रेम को न पहचाना, माँ के वात्सल्य और ममता को महसूस न किया वही व्यक्ति कहता है कि पृथ्वी सहनशीला है। जिसने माँ की वत्सलता को न समझा वही यह कहने की जुर्रत कर सकता है कि सागर अथाह है। जिसने माँ के हृदय को न जाना वही कहेगा कि आकाश अनन्त है। जिसने माँ की ममता को जान लिया, अनुभव कर लिया वह जानता है कि सागर की थाह फिर भी पाई जा सकती है, पर माँ की ममता तो सागर से भी ज्यादा अथाह है।

माँ के वात्सल्य और त्याग को समझेंगे तो ही समझ पाएंगे कि आकाश का अन्त फिर भी ढूंढा जा सकता है, पर माँ की सहृदयता का अन्त नहीं पाया जा सकता। जहाँ में जिसका अंत नहीं, उसे आसमां कहते है और संसार में जिसका अंत नहीं उसे माँ कहते है। माँ पृथ्वी की तरह सहनशीला है, उसकी ममता सागर की तरह अथाह है, उसके अहसान आकाश की तरह अन्तहीन हैं। माँ अपने आप में पूर्ण है। श्मातृ देवो भवरू्य के पुण्य जाप से तो देव, दानव और मनुज सभी तिर गए। श्रवणकुमार ने इसी मंत्र के जाप से अनेक सिद्धियाँ हासिल कर ली थीं।

माँ तो जब तक जीवित रहती है तब तक सरवर, तरुवर और संत की तरह अपने बच्चों पर अपना हर सुख, शांति, प्रेम, वात्सल्य लुटाती रहती है और जब शरीर छोड़कर परलोक सिधार जाती है तो वहाँ बैठे-बैठे ही अपने बच्चों को अपने आशीर्वाद लुटाती रहती है इसलिए माँ महज माँ नहीं वरन हर माँ एक जगदम्बा है।

माँ जब तक हमारी आँखों के सामने है तब तक हमको ईश्वरीय छाया का सुकून देती है और जिस दिन हमें छोड़कर चली जाती है तो अपने देवदुर्लभ आशीर्वादों का कवच पहना जाती है। वह दूर रहकर भी अपने बच्चों के लिए मंगल कामनाएँ किया करती है। माँ सचमुच धन्य है, वह यज्ञ की वेदी है, वह मन्दिर की प्रतिमा है, हर तीर्थ की देवी है। माँ के कदमों में ही जन्नत है। माँ के आंचल में ही कामधेनु का आशीर्वाद है। माँ के होठों में जीवन का गुलाबी सुख है। माँ के हाथों में जादुई स्पर्श है, जो देता है हमें एक अनोखा सुख, सन्तुष्टि, तृप्ति और मुक्ति।

यह माँ ही है जो हमें जन्म देने के लिए एक अव्यक्त, अघोषित प्रसूति की भयंकर वेदना सहन करती है। यह माँ ही है जो हमारे धरती पर आने का हमें पहला अहसास कराती है। माँ ही अपनी कोख में हमारी पहली आहट पाती है और वही हमें पहले पदचाप का अहसास कराती है। जन्म लेते ही अपने प्यार भरे चुम्बनों से स्वागतम् स्वागतम् की झड़ी लगा देती है। हमारे लिए ढेर सारी शुभकामनाएँ सागर की लहरों की तरह हम पर उलीच देती है।

क्या हम माँ के ऋणों को चुका पाएंगे? - अगर कोई व्यक्ति यह सोचे कि मैं माँ के ऋण से उऋण हो सकता हूँ तो ऐसा सोचना भी माँ के प्रति घृष्टता होगी। भला हम किस-किस ऋण को उतारेंगे? क्या हम उस ऋण को उतार पाएँगे जो माँ ने हमें नौ माह तक गर्भ में रखकर पीड़ाएँ सहन की थीं? जब माँ हमें अपनी कोख में लेकर समाज में आती जाती होगी, जहां लोग उसे तिरछी नजरों से देखते होंगे, पर उसने लाज का त्याग करके भी हमें पेट में रखा। यदि प्रकृति यह अधिकार पुरुषों को दे दे कि तुम्हें नौ महिने तक अपनी संतान को पेट में रखकर, फिर उसे पैदा करना होगा तो दुनियां के 90 प्रतिशत पुरुष संतान को जन्म देना स्वीकार ही नहीं करेंगे।

सचमुच माँ, यह तेरी ही ताकत है कि तू इस संसार को जन्म देती है। हमारा पालन करती है। हमें अपने पांवों पर खड़ा करती है। हमें बेहतर संस्कार देती है। निश्चय ही किसी देश की सरकार को चलाना आसान हो सकता है पर किसी संतान को श्रेष्ठ संस्कार और शिक्षा देकर उसे बेहतर इंसान बनाना सरकार चलाने से भी ज्यादा कठिन काम है। क्या आप इस महत्व को समझ सकते हैं? भले ही कोई कहे इस संसार की रचना करनेवाला कोई ईश्वर या खुदा है, पर खुली आँखों से अगर सच को कहा जाए तो इस खूबसूरत दुनियाँ को और दुनियाँ की हर रचना को बनाने वाली माँ है। भले ही माँ का निर्माण ईश्वर ने किया होगा, पर संसार का निर्माण तो माँ ने किया है। ईश्वर को जब-जब भी अपने अपने आपको व्यक्त करना होता है तब-तब वह माँ के रूप में जन्म लेता है। जब कभी ईश्वर को इस दुनियाँ का सृजन करना होता है तब वह माँ के हृदय में उतरता है और माँ की कोमल कोख का स्पर्श करते हुए इस संसार का सृजन किया करता है।

हममें से कोई भी व्यक्ति माँ के ऋण को नहीं उतार सकता। इस गर्भपात के युग में भी माँ ने हमें जन्म दिया है। क्या उनका यह अहसान भी कम है याद कीजिए अपने बचपन को। हमें नजर न लग जाए, इसलिए माँ हमारे माथे पर काजल की काली बिंदी लगाती थी। क्या हममें से कोई भी व्यक्ति उन बिंदियों का ऋण उतार पाएगा? हमारे पाँवों में पैंजनियाँ बाँधी जाती थीं और हम ठुमक-ठुमक कर चलते थे। क्या हम उन पैंजनियों का ऋण उतार पाएँगे? याद करो कि आपने अपने नन्हे-नन्हे पैरों से अपनी माँ को जब-तब कितनी लाते मारी थीं। माँ फिर भी हमारे गालों को प्यार से सहलाती रहती। क्या हम उस प्यार का ऋण उतार पाएंगे। बच्चे लोग घर में सामान को एक जगह नहीं रहने देते। हम अपने बचपने स्वभाव के कारण माँ के सजाए हुए सामानों को भी बिखेर देते थे। माँ हमें इस पर एक मीठी डांट जरूर देती थी पर फिर खुद ही सामान सजा देती। क्या हम उन सामानों को समेटने का ऋण चुका पाएँगे? जब हम बीमार पड़ जाते तो माँ माथे पर राई की पोटली रखा करती, ताकि हम जल्दी से ठीक हो जाएँ। माँ ने हमारे सिरहाने राई का एक-एक दाना हमारे जीवन के कल्याण के लिए, स्वास्थ्य और आरोग्य के भाव के साथ रखे। क्या हम राई के उन दानों का ऋण उतार पाएँगे।

जब हम बुखार में तप रहे होते तब माँ ही वह शक्ति होती जो हमारे माथे पर गीली पट्टियाँ रखती और अपनी कोमल-कोमल अंगुलियों से सहलाती हुई कहती, श्बेटा, सो जा रो मत, बीमारी हाथी के चाल से आती है और चीटीं के चाल से जाया करती है। मैं मना नहीं करती थी कि ठण्डे पानी में मत नहा, पर तू मानता कहां है, अब हो गए ना बीमार। थोड़ा धीरज रख, सब ठीक हो जाएगा। क्या हम माँ की इस भाव दशा का अहसास कर पाएंगे?

माँ की उन मीठी-मीठी लोरियों को क्यूं भूल जाते हैं जो वह हमें सोने के लिए सुनाया करती थी। माँ की उन प्यार भरी लोरियों को जरा याद कीजिए, जिनसे फिल्म संसार ने भी अपने को सजाया और संवारा है। माँ गाती थी - चन्दा है तू मेरा सूरज है तू। हाँ मेरी आँखों का तारा है तू। चन्दा है तू मेरा सूरज है तू।

माँ के मन की मनौतियाँ तो देखिए कि वह हममें ही धरती का फूल देखती है और हममें ही आसमान का चाँद और सूरज देखती है। माँ की लोरियों के सम्बोधन तो देखिए-

तुझे सूरज कहूं या चँदा, तुझे दीपक कहूं या तारा, मेरा नाम करेगा रोशन, जग में मेरा राज-दुलारा।

कितनी मंगल-भरी उछामणी है, कितनी प्यारभरी हिलोर है यह। बेटे को राजदुलारा कहना, उसे घर का चिराग कहना माँ की अन्तरभावनाओं को समझने और समझाने का एक तरीका भर है।

जरा अपने बचपन के बर्थडे को याद कीजिए किस तरह मम्मी हमारे लिए कैक बनाती खीर और लापसी बनाती। बर्थडे मनाते हुए गाया करती - ओ नन्हे से फरिश्ते, कैसा ये तुझसे नाता, कैसे ये दिल के रिश्ते, नन्हे से फरिश्ते! हैप्पी बर्थडे टू यू ..... हैप्पी बर्थ डे टू यू!

यह तो माँ की मंगलकामना की बात है, पर हमारे नखरों की बात! जरा अपने उन नखरों को याद करें कि माँ, मुझे तो आज अजवाईन वाली रोटी ही खानी है। मुझे तो भिंडी के भाजे और टमाटर की खट्टी मीठी सब्जी ही चाहिए। भिंडी के भाजों से लेकर मक्की के गरम-गरम भुट्टे और वो दही की माखनियाँ लस्सी और ठण्डा-ठण्डा श्रीखण्ड, हममें से कौन ऐसा है जो इन नखरों का ऋण उतार पाए।

ओह, मैं क्या-क्या कहूं, क्या-क्या गिनाऊँ? एक बात तय है जिनके जीवन में माँ है, वे धन्य हैं। उनका जीवन पूर्ण है। जिसे अपनी माँ का अहसास है, वही श्रवण कुमार की भूमिका अदा कर सकता है। जिसने माँ की उपेक्षा कर डाली उसने केवल जन्मदात्री माँ की ही नहीं, माँ के नाम पर धरती के भगवान की भी उपेक्षा कर डाली।

मैंने माँ की ममता को समझा है, जाना है। इसीलिए जब-जब माँ की ममता का बखान करता हूँ तब-तब मुझे लगता है कि मैं माँ पर नहीं धरती पर जन्म देने वाले परमात्मा पर बोलता हूँ। जब-जब मुझे परमात्मा के चरणों में चार फूल चढ़ाने होते हैं तब-तब माँ के श्रीचरणों को परमात्मा का मन्दिर समझकर वहीं मत्था नवा लेता हूँ।

अगर हम पहले माँ की ममता के मंदिर में धोक लगाकर महादेव के मंदिर में जाएंगे तो वहां जाना सार्थक है। अगर माँ के मंदिर की उपेक्षा करके महादेव, महावीर और मोहम्मद की पूजा कर भी लें तो वे उस पूजा को कभी स्वीकार नहीं करेंगे। आपके बुजुर्ग माता-पिता जो कि अपने हाथों से स्नान नहीं कर पा रहे हैं, अगर आपने उनको नहला दिया तो क्या यह दुनियां के किसी रुद्राभिषेक से कम नहीं है ? माँ के चरणों की धूल क्या किसी मन्दिर के चन्दन की चुटकी की तरह नहीं है?

महावीर के मंदिर में जाकर अनुष्ठान करने वाले लोग अपनी माँ के प्रति उनके दायित्वों के अनुष्ठान को क्यों भूल जाते हैं? माता-पिता के चरणों की धूल को अपने माथे पर लगाने से क्यों कतराते हैं? माता-पिता के चरणों की रज तो दुनियाँ के किसी भी गुरु और परमात्मा की चरण-रज से ज्यादा असरकारी होती है। जिस किसी के नौ ग्रह बुरे चल रहे हों, वह जाए अपनी माँ के पास और श्रद्घापूर्वक माँ की तीन परिक्रमा लगाकर उनके चरणों की माटी को रोजाना अपने माथे से लगाए। शायद हम किसी औपचारिकता के नाते गुरु के पाँव छूते होंगे, पर अगर माँ केपाँव हम औपचारिकता से भी छू लेंगे, तब भी माँ का कलेजा तो हमें दुआओं से सराबोर कर देगा।

जिस किसी बेटे-बहू ने अपने बुजुर्ग दादा-दादी और माता-पिता की सेवा की है, मैं दावे के साथ कहता हूँ कि उस व्यक्ति की आने वाली पीढ़ी फली-फूली है। मान लो तुम्हारे सास-ससुर या माता-पिता गरीब हैं पर अगर तुमने उनकी दिल से सेवा की है तो याद रखना माइतों की सेवा कभी-भी निष्फल नहीं जाती। यह पुण्याई तुम्हारे सात जन्म काम आएगी। वे जीते जी हमें आशीर्वाद देंगे ही, मरकर भी वे देवलोक से हमें आशीर्वादों के अमृत फल देते रहेंगे। निश्चय ही, एक गंगा वह थी जिसे भगीरथ धरती पर लेकर आए थे और दूसरी गंगा वह माँ है जो देवलोक में रहते हुए भी हम बच्चों के लिए वहीं से दुआओं की गंगाएँ बहाया करती है।

याद रखो, रहना है तो भाइयों के बीच रहो, भले ही परस्पर वैर ही क्यों न हो। बैठना हो तो हमेशा छाया में बैठो फिर चाहे वह कैर ही क्यों न हो? जब भी खाना हो तो माँ के हाथ से खाओ, फिर चाहे वह जहर ही क्यों न हो? कम से कम यह तो सुकून रहेगा कि मुझे जहर भी उसने दिया है जिसने मुझे जन्म दिया था। अरे, माँ के हाथ से तो जहर भी अमृत बन जाता है।

योगियों के योग की भी मातृ-सत्ता के आगे कोई बिसात नहीं है। हम साधु-साध्वियों के, संत-महन्तों के, सिद्घ अरिहन्तों के कितने भी गुण क्यों न बखान लिए जाएँ पर माँ की महिमा को किसी से कम नहीं किया जा सकता। यह माँ ही है जो राम, कृष्ण, महावीर और बुद्ध को जन्म देने का सामथ्र्य रखती है। यदि दुनियाँ में इस बात का सर्वेक्षण करवाया जाए कि दुनियाँ का सबसे प्यारा शब्द कौनसा है? तो जवाब होगा - माँ। यह सच है कि राम महान् हो सकते हैं, पर जन्म देनेवाली माँ कौशल्या से बड़े नहीं हो सकते। गणेश प्रथम पूजनीय और कार्तिकेय ज्ञान के दाता हो सकते हैं पर अपनी माँ पार्वती से वे दोनों ही बड़े नहीं हो सकते। चन्द्रप्रभ ने जिस धर्म में संन्यास ग्रहण किया है, उस धर्म की व्यवस्था है कि साध्वी कितनी भी बड़ी क्यों न हो वह साधु-संत से छोटी ही होती है, पर मैं श्रद्घापूर्वक कहना चाहूंगा कि मुझे इस बात का गौरव है कि मैं ऐसे माता-पिता की संतान हूँ जो स्वयं भी संत हैं और जिन्होंने मुझे भी विरासत में संत जीवन ही प्रदान किया है। मेरी माँ भले ही साध्वीजीवन में हो, पर मैं उन्हें सदा अपने पंचांग नमन समर्पित करता हूं। माँ की सेवा को महावीर और महादेव की सेवा मानता हूँ । मेरे लिए पहला मंदिर माँ है और दूसरा मंदिर महावीर और महादेव हैं। जो व्यक्ति इस बात को अपने जीवन में समझ सकेगा वह अपने जीवन में माँ-बाप के प्रति रहने वाले फर्ज अदा करने में सफल हो सकेगा।

यही कारण है कि भले ही प्रकृति ने मुझे संत या गुरु क्यों न बना दिया हो पर मैं आज भी हजारों की भीड़ में भी माँ सामने आती दिख जाए तो बगैर किसी संकोच के हजारों लोगों के बीच भी अपना माथा माँ के सामने जाकर झुकाता हूँ। जो व्यक्ति अपनी माता या अपने पिता को भरी पब्लिक के बीच धोक लगाता है तो इससे माँ-बाप का नहीं, बेटे का गौरव बढ़ता है। यदि लाहोटी जी ने सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधिपति होने की शपथ लेकर सबसे पहले कोर्ट में माँ के चरण छुए तो इससे माँ का नहीं वरन बेटे का गौरव बढ़ा कि इन्सान माँ केचरण छूकर दुनियाँ को यह सन्देश दे रहा है कि आज मैं जो कुछ हूँ माँ की बदौलत हूँ।

जो सर माँ के आगे न झुक सका, वह जिन्दगी में कभी सर न बन सकेगा। वह और किसी के आगे झुकने का अधिकारी नहीं हो सकता। जो माथा माँ के आगे न नमा, वह गुरुग्रन्थ साहब के आगे नमकर भी सच्चे अर्थ में कहाँ नम पाया!

माँ के दिन की शुरुआत चाहे श्नमो अरिहंताण से हो, चाहे ऊँ अस्य श्रीराम रक्षा स्तोत्र मन्त्र से हो, अथवा लाइलाहेइल्ललाहु से हो या फिर चाहे ओ-गॉड से हो, पर माँ के हृदय से दुआओं की सदा एक ही शीतल धारा बहती रहती है- हे मेरे प्रभु, मेरी सन्तान यशस्वी हो, चिरायु हो, वैभवशाली हो। वह अपनी जिन्दगी में कभी थके नहीं, रुके नहीं, चूके नहीं। किसी भी सुनहरे अवसर से वंचित न रह जाए। हे प्रभु, मेरे बच्चों को सही-सलामत रखना। मेरा बच्चा फले-फूले, दूधो नहाए पूतो फले।

माँ की हर प्रार्थना का सार संतान का हित होता है। जिसका कण-कण, रक्त की हर बूंद, हर रोम-रोम अपने संतानों के हित से जुड़े रहते हैं, उस माँ की तुलना में आखिर हम किसे रख सकते हैं। उसको नहीं देखा हमने कभी, पर उसकी जरूरत क्या होगी? हे माँ, तेरी सूरत से अलग, भगवान की सूरत क्या होगी?

भगवान को अगर देखना है तो माँ में देखो। माँ तो भगवान की जीती-जागती तस्वीर है। जिसने माँ को पूजा उसने भगवान को पूजा। जिसने माँ को नजरअंदाज किया उसकी सारी प्रार्थनाएँ और नमाज नजरअंदाज हो गईं। हे कुदरत, तुमने माँ को न जाने कैसी शक्ति दे डाली है कि माँ केवल माँ नहीं है। माँ जीवन का ब्रह्मा है। जिस तरह ब्रह्मा में ब्रह्माण्ड और ब्रह्माण्ड में ब्रह्मा समाए हुए हैं, उसी तरह माँ में पुत्र और पुत्र में माँ समाई हुई है। माँ ब्रह्मा भी है, माँ विष्णु भी है, माँ महेश भी है। ब्रह्मा जन्म देते हैं, विष्णु पालन करते हैं और महेश उद्धार करते हैं। माँ भी जन्म देती है, पालन करती है और बेहतर संस्कार देकर जीवन का उद्धार भी करती है, इसलिए प्यार से बोलो- माँ मेरी ब्रह्मा भी है, माँ मेरी विष्णु भी है, माँ मेरी महावीर और महादेव भी है।

बरसों पहले मेरी माँ ने वर्षीतप किया था अर्थात एक वर्ष के उपवास की तपस्या, एक दिन आहार लेना और दूसरे दिन निराहार रहना। अड़तालीस घंटों में से बारह घंटे आहार के लिए और शेष छत्तीस घंटे पूर्णतरू उपवास में रहना। वर्षीतप की पूर्णाहुति से पूर्व हमारी साध्वी माँ ने हमें लिखा कि हालांकि आप लोग मुझसे बहुत दूर हैं और इतनी दूर आना आपके लिए दुष्कर, कष्टदायी यात्रा होगी। पर रह-रहकर मेरे भीतर एक ही भाव उठता है कि मैं अपने इस लम्बे तप की पूर्णाहुति अपने संतपुत्रों के हाथों से करूँ।

हमने अपनी सीधी-सरल माँ के खत को दो-तीन बार पढ़ा। अपने बचपन को याद किया। हमने उसी समय फैसला कर लिया कि हम अपनी माँ की भावनाओं को पूरा करेंगे। हमने अपने पूर्व निर्धारित सारे कार्यक्रम कैंसल कर दिए। तब हम लोग एक हजार किलोमीटर की पदयात्रा कर अपनी साध्वी माँ के पास पहुँचे और उन्हें अपने हाथों से वर्षीतप का पारणा करवाया। माताजी महाराज को हमारे आने से बेहद प्रसन्नता थी और हमें उनकी भावना को पूर्ण करने की प्रसन्नता थी। हम सभी आनन्दित और भावविह्वल थे। इस कार्यक्रम में हमारे साथ शेरे हिन्द दारासिंह जी भी शामिल हुए।

माँ के तप की पूर्णाहुति केकरीब एक सप्ताह बाद मैं अपनी माँ के पास अकेला बैठा था। मैंने माँ से अपना बचपन जानना चाहा। मैंने पूछा- साध्वी माँ, मुझे बताओ मेरा वह बचपन, वे बिफिक्री के दिन कैसे बीते?

माँ को जितना जो याद आता गया वे सुनाती रहीं। उन्होंने तो कई घटनाएँ सुनाईं, उन्हीं में से एक घटना है। माँ ने बताना शुरू किया, यह घटना तब की है जब तू डेढ़ वर्ष का था। हम सब लोग ननिहाल में थे, कोई विशेष महत्त्व का दिन था। इस पर ननिहाल वालों ने अपनी सारी बाई-बेटियों को बुलाया था।

खीर पक रही थी। रसोइया खीर बनाने में लगा था। भट्टी पर कड़ाही के नीचे चार छोटे-छोटे ईंट के टुकड़े रखे हुए थे। रसोईया जोर-जोर से खीर हिला रहा था ताकि खीर पैंदे में चिपक न जाए। कुदरत का संयोग। तुम्हारे जीवन में ऐसी कोई होनी होनी थी कि अचानक उन ईंट के टुकड़ों में से एक टुकड़ा खिसक गया और कढ़ाई में रखी हुई खीर बाहर छलक पड़ी। तुम पास ही लेटे हुए थे। वह खीर सीधी तुम्हारी छाती पर आकर गिरी।

मैं माँ के यह कहते ही चैंक पड़ा। माँ ने कहा-बेटा तुम्हारे पूरे हाथ, तुम्हारा पेट, तुम्हारी छाती जल गई। तत्काल तुम्हें अस्पताल ले जाया गया। उस समय हम जहाँ रहते थे वहाँ इतनी अच्छी चिकित्सा-व्यवस्था नहीं थी कि जिससे उचित उपचार मिल सके। साध्वी माँ ने कहा- बेटा, उस समय मैंने दो साल तक तुम्हें अपने हाथों में रखा। डॉक्टर ने कह दिया था कि अगर बच्चे का एक भी फफोला फूट गया तो जिन्दगी भर के लिये दाग रह जाएंगे। बेटा, उस दौरान मैं सो नहीं पाई, ढंग से खा नहीं पाई। लम्बे अर्से तक केवल तुम्हें ही सहेजती रही। हरदम यही ख्याल रहता था कि मेरे बेटे की छाती पर कहीं दाग न रह जाए। बेटा, फिर भी कुछ फफोले फूट ही गए। तुम्हारी छाती और पेट पर छोटे-छोटे दाग रह ही गए हैं। अगर हो सके तो बेटा उन दागों के लिए मुझे माफ करना।

अच्छी किस्मत उन्हीं की है, जिनकी किस्मत में माँ की लकीर है। सच्ची मुस्कान उन्हीं की है जिनकी मुस्कानों में माँ की दुआएँ हैं। जीना उसी का जीना है जिनके माथे पर माँ की छाया है, मरना उन्हीं का मरना है जिनकी जां माँ के चरणों में हैं। सांस चाहे आए, चाहे जाए, सांस के हर सुरताल में एक ताल जरूर होना चाहिए और वह है माँ।

माँ तू धन्य है, कृतपुण्य है, तूने तीर्थंकरों को जन्मा है, अवतार और पैगम्बरों को पैदा किया है। राम और रहीम तुमसे हैं, कृष्ण और कबीर भी तुमसे हैं, महावीर और मोहम्मद भी तुम्हीं से हैं। सचमुच, स्वर्ग अगर कहीं है तो माँ के चरणों में हैं। मोहब्बत का अगर कहीं कोई सच्चा चिराग जलता है तो वह माँ के आँचल में है। माँ केआँचल में सूरज की रोशनी है, चाँद की चाँदनी है, तारों की टिमटिमाहट है, फूलों की खुश्बू है, झरनों का कलरव है, कोयल के गीत हैं, हिमालय की शीतलता है, सागर की गहराई है, धरती की सहनशीलता है। माँ सचमुच तू माँ है। तुझसे ही नारीजाति धन्य है। सोचो अगर दुनियाँ में माँ न होती! तुम और हम कहाँ से होते। इस गर्भपात के युग में भी माँ ने अपन सब लोगों को जन्म दिया है, हे माँ तुम्हारी इससे बड़ी हमारे लिए दौलत और अमानत क्या होगी? तुम्हारा धन हमारी विरासत नहीं है, तुम्हारी सम्पत्ति हमारी अमानत नहीं है वरन हम स्वयं ही तुम्हारी विरासत हैं और तुम्हारी अमानत है। इसीलिए तुम हमारी मोहब्बत भी हो और इबादत भी। तुम हमारी खुदा भी हो और खिदमत भी। तुम हमारी ईश्वर भी हो और हमारी प्रार्थना भी।

माँ तो हमारे जीवन को जन्म देने वाली केवल जननी और कोख में धारण करने वाली धरित्री ही नहीं है, वरन् वो तो हमारे जीवन की गुरु और शिक्षिका भी है। अपने बच्चों को बेहतर संस्कार देकर उन्हें बेहतर इंसान बनाना किसी भी देश की सरकार को चलाने से भी अधिक चुनौतीपूर्ण है। चाहे पौराणिक काल की पार्वती हो या त्रेता युग की सीता अथवा द्वापर युग की कुंती या यशोदा, चाहे राजा-महाराजाओं के युग की जीजाबाई या अहिल्याबाई हो अथवा हमारे युग की मदर टेरेसा हो अथवा मेरी और आपकी माँ हो, अपने द्वारा दी जाने वाली ममता, मोहब्बत, बेहतर संस्कार और बेहतर जीवन के कारण ही सदा-सदा पूजनीय रहती है, जॉर्ज वाशिंग्टन ने लिखा है कि मैं अपने जीवन में झूठ कभी भी इसलिए नहीं बोल पाया क्योंकि बचपन में एक बार झूठ बोलने पर माँ ने यह कहते हुए झन्नाटेदार चांटा मारा था कि मैं झूठे बेटे की माँ कहलाने की बजाय बांझ कहलाना ज्यादा पसंद करूंगी।

माँ तो ममता की महादेवी है। माँ तो सहनशीलता की प्रतिमूर्ति है। माँ बस माँ नहीं, संस्कारों को देने वाली शिक्षिका और गुरु भी है। माँ अपने आप में त्याग का यज्ञ है, कुर्बानी का जज्बा है। हमने अब तक साधना-केन्द्र तो देखे होंगे, मगर समता और समाधि का ऐसा मन्दिर नहीं देखा होगा जो कि माँ के रूप में आपके घर में है।

एक सच्ची घटना है। एक हँसता-खिलता परिवार था। परिवार बहुत प्रेम से रह रहा था कि कुदरत का कहर बरपा। पिताजी का असमय निधन हो गया। पीछे बच गई माँ और उसका अकेला बेटा। पिता की यह तहेदिल की इच्छा थी कि उसका बेटा डॉक्टर बने। पिता के देहावसान के पश्चात माँ पर अपने बच्चे का सारा दायित्व आ गया था। उसे रह-रहकर अपने पति की ख्वाहिश याद आती। माँ सोती तब भी उसे अपने पति के शब्द याद आ जाते। उसने ठान लिया कि मैं पति की इच्छा पूरी करूँगी और बच्चे को डॉक्टर बनाऊँगी।

बेटे का भविष्य बनाने के लिए वह लोगों के यहाँ काम करने के लिये जाती। जो आमदनी होती उससे अपने बच्चे को पढ़ाती-लिखाती। जो थोड़ा बहुत गहना था उसे बेचा, मकान भी बेच डाला, एक झुग्गी-झोपड़ी में आकर रहने लग गई। पर जैसे-तैसे उसने अपने बेटे को अन्तत: डॉक्टर बना ही दिया।

समय बीता, बेटे की शादी हुई। बहू भी डॉक्टर मिली। फिर शुरू हुआ पुरानी और नई पीढ़ी के बीच असन्तुलन का सिलसिला। सास को बहू का रहन-सहन रास न आया तो कभी माँजी कह दिया करती थीकृ बेटा, सिर ढक लो। बहू को यह टोकाटोकी पसन्द न आई और बहू ने तब यह फैसला कर लिया कि वह अपनी सास से अलग हो जाएगी।

बहू ने अपने पति से कहा- मैं अब किसी भी हालत में इस घर में नहीं रहूंगी। आप या तो माँजी को अलग करो या मुझे। बेटे ने पत्नी को समझाने की कोशिश की किकृ कुछ तो सोचो मेरी माँ ने मेरे लिए कितनी कुर्बानियाँ दी हैं, कितनी कठिनाइयों से मुझे पाला-पोसा और डॉक्टर बनाया है। आज मेरी जो भी हैसियत है उसमें मेरी माँ का ही हाथ है, पर बहू न मानी। बेटे को आखिर बहू के आगे झुकना पड़ा, बीवी का गुलाम जो ठहरा। माँ को अपना घर में पहुँचाया गया। बहू भी साथ में छोडने आई। बेटे ने माँ से कहा- माँ, तुम यहीं वृद्घाश्रम में रहो। यहां और भी बूढ़े लोग हैं। यहां तुम्हारा मन भी लग जाएगा। मैं जब-तब आता रहूंगा। तुम्हें कोई तकलीफ न हो, इसलिए मैं तुम्हें पाँच सौ रुपए हर महिने भिजवाता रहूँगा।

माँ ने अपना घर को देखा। सोचने लगी कि जिस घर में पैदा हुई थी वह भी अपना न बन पाया। जिस बेटे को पढ़ा-लिखाकर तैयार किया, वह भी अपना बेटा न रह पाया। जिस बहू को इतनी मनौतियाँ करके लाई, वह भी अपनी बहू नहीं बन पाई। अब तो यहाँ जो अन्तिम शरण मिली है यही मेरा अपना घर हो जाए। माँ ने वृद्घाश्रम को देखा, फिर बेटे को एक नजर देखा और कहाकृ ठीक है बेटा, जिसमें तुम लोगों को सुख मिले, वैसा ही करो।

बुढिया वृद्घाश्रम में रहने लगी। हर महिने पांच सौ रुपए आते रहे। बेटा छः महिने में एक बार मिलने के लिए आ जाता तो कभी-कभार बहुरानी लोक-लाजवश वहां चली जाती। इस तरह कोई ढाई वर्ष बीत गए।

एक दिन वृद्घाश्रम के संचालक का बेटे के पास फोन आया- डॉक्टर साहब, आपकी माँ नाजुक हालत में है। आप तत्काल यहाँ पहुँच जाइए। आपकी माँ जाने से पहले आपसे मिलना चाहती है।

बेटे ने कहा- मेरे पास कुछ मरीज हैं। बस, उन्हें निपटा कर आता हूँ। उसी माँ की बेटी अमेरिका में रहती थी, उसको भी सूचना मिली। वह तो अगले दिन पहुँच गई। अगले दिन बेटा अपनी पत्नी और अपने दो बच्चों को साथ लेकर वृद्घाश्रम में पहुँचा। देखा कि वहां पर पूरा गमगीन माहौल है। सामने बहिन को खड़े पाया तो और चैंका। उसने पूछाकृ माँ कहाँ है? सबके चेहरे लटके हुए थे। चेहरे बयां कर रहे थे कि माँ नहीं रही।

बेटे को अपनी गलती का अहसास हुआ। उसे अपना अतीत याद हो आया। उसे लगा कि उसने अपनी माँ के साथ ठीक व्यवहार नहीं किया। आगे बढ़ा तो देखा कि सामने सफेद चादर में लिपटी माँ की लाश पड़ी थी। बहन ने टोका- भैया, तुम्हारे हाथ इस काबिल नहीं हैं कि तुम दिवंगत माँ के पाँव छुओ। जो व्यक्ति जीते जी अपनी माँ के काम न आया वह माँ के मरने के बाद उसके हाथ लगाने के भी काबिल नहीं रहता। बहिन की इस कटाक्ष भरी बोली को सुनकर आक्रोश भरी नजरों से बहिन को देखा। उसने वृद्घाश्रम के संचालक से पूछा- क्या आखिरी सांस लेने से पहले माँ ने मुझे याद किया था? संचालक ने दर्दभरी आवाज में कहा- डॉक्टर, पिछले ढाई सालों में तुम्हारी माँ केवल तुम्हें ही याद करती रही। मरने से पहले भी उसकी यही अन्तिम इच्छा थी कि वह मरने से पहले अपने बेटे का मुँह देख ले, लेकिन तुम न आए तो न ही आए। हाँ तुम्हारी माँ ने जाने से पहले तुम्हारे लिए ये दो लिफाफे दिए हैं।

उसने देखा कि एक लिफाफा पतला था और दूसरा मोटा। उसने लिफाफे हाथ में लिये और पतला लिफाफा खोला। उसमें माँ का लिखा एक खत था। लिखा था।

मेरे प्यारे बेटे, आखिर तुम आ गए। मुझे विश्वास था कि तुम जरूर आओगे। जब मैं यह खत लिखवा रही हूँ तो मैं अपनी अन्तिम भावना व्यक्त कर रही हूँ कि मैं मरने से पहले तुम्हारी शक्ल जरूर देखूं।

बेटे, तुम कितने अच्छे बेटे थे कि तुमने हर महिने मुझे पाँच सौ रुपए भिजवाए। तुमने मेरी देखभाल करवायी। मुझे इस घर में कोई तकलीफ नहीं हुई। जितना सुख मुझे ससुराल या पीहर में नहीं मिला, उससे ज्यादा सुख-शान्ति मुझे अपना घर में मिली है। बेटा, मुझे यहां एक पैसा भी खर्च करने की जरूरत ही नहीं पड़ी। मैं जो साडियाँ अपने साथ लाई थी उसी में ही मेरे ढाई वर्ष निकल गए। खाना-पीना मुझे यहाँ पर मुफ्त में मिलता था तो एक पैसा भी काम न आया। बेटा, तुमने हर महिने पाँच सौ रुपए भेजे जो ढाई वर्ष में पन्द्रह हजार रुपए हो गए। मैं मरने से पहले ये पन्द्रह हजार रुपए इस लिफाफे में डलवाकर जा रही हूं। बेटा, जैसे मैं बूढ़ी हुई हूँ ऐसे ही एक दिन तुम भी बूढ़े हो जाओगे। तुम तो मेरे बहुत अच्छे, बहुत प्यारे बेटे हो जो तुमने पाँच सौ रुपए हर महीने मुझे भेज दिए। लेकिन बेटा, जमाना बदल रहा है। एक दिन तुम भी बूढ़े होओगे, हो सकता है तुम्हें भी ऐसे ही किसी श्अपना घर्य में रहना पड़े। मुझे नहीं पता उस समय तुम्हारा बेटा तुम्हें पाँच सौ रुपए भी भेज पाएगा या नहीं। उस समय तुम्हें पैसों की दरकार रहेगी। ये पन्द्रह हजार रुपए मैं तुम्हारे उस समय के लिए छोड़कर जा रही हूँ।

माँ, तुम सचमुच माँ हो। त्याग का यज्ञ हो। माँ इस त्याग के यज्ञ को पूरा करना तुम्हारी ही ताकत के बलबूते पर है। हम पुत्रों के बल पर यह त्याग का यज्ञ पूरा नहीं किया जा सकेगा। शायद दुनियाँ का बड़े से बड़ा करोड़पति भी रोजाना दान नहीं देता होगा पर माँ तो रोजाना दान देती है। सरवर, तरवर और संतजन की तरह निष्पृह दान देती है। जितना उसने हमसे लिया है उससे कई- कई गुना अधिक उसने हमें लौटाया है। माता-पिता दिन-भर में बेटे की चार रोटियाँ खाते होंगे, पर वे दिनभर तुम्हारे बच्चों को सहेज-सम्भालकर संस्कार देते रहते हैं। माँ-बाप तो घर के मुफ्त के चैकीदार हैं। बूढ़े माँ-बाप तो उस बूढ़े पेड़ की तरह होते हैं जो फल भले ही न दे पर जो भी उनके पास आकर बैठते हैं उन्हें अपनी शीतल सुखद छाया तो देते ही हैं।

माता के तो बहुत सारे अवढर दान हैं। लेकिन अब जरूरत आ पड़ी है कि हम अपनी ओर से माँ के प्रति रहने वाले दायित्वों को किस तरह निभाते हैं, यह सोचो। सोच-सोचकर सोचो। जो माँ के साथ हैं वह सोचें, जो माँ से अलग हैं वह सोचें, जिनकी माँ ऊपर जा चुकी है वे भी सोचें कि हमने अपनी ओर से उनके प्रति कितने दायित्व और फर्ज अदा किए हैं, या अदा कर रहे हैं अथवा अदा करेंगे।

माँ के प्रति अपने फर्ज अदा करने हैं तो पहला कत्र्तव्य यह निभाओ कि सुबह उठते ही अपने माता-पिता को प्रणाम अवश्य करो। हमारी आँख खुले तो सबसे पहले माँ केचरणों के दर्शन हों। उनसे मिली हुई दुआएँ जगदम्बा से मिली हुई दुआएँ हैं। माँ के चरणों में जाकर अपना मत्था टेकें। पंचांग नमन करें। दो घुटने, दो हाथ, चारों जमीन पर टिकाकर, करबद्घ होकर मस्तक उनके पाँवों में झुकाकर उनके हाथ को अपने माथे पर रखाओ। माँ के हाथ से जो आभामण्डल, जो किरणें हमारी पीठ और हमारे माथे पर बरसेंगी वो हमारे लिए प्रकाश का, रक्षा-कवच का, भाग्योदय का काम करेगा। सुबह-सुबह माता-पिता को किये जाने वाले प्रणाम के साथ अपने दिन की शुरुआत करना श्रेष्ठ पुरुषों का, श्रेष्ठ बहु-बेटियों का पहला संस्कार है। यदि आप अपने माँ-बाप को प्रणाम करेेंगे तो आपके बच्चे आपको भी प्रणाम करेंगे, इस तरह आपके पूरे परिवार के हर दिन की शुरुआत प्रेमभाव से, प्रणामभाव से, शुभकामनाओं से होगी। बासी मुंह बड़े-बुजुर्गों के आशीर्वाद लेना कुलीन घर-घरानों की बहु-बेटियों का, कुलीन बच्चों का पहला दायित्व है।

माँ के प्रति फर्ज अदा करने के लिए दूसरा काम यह करें कि चैबीस घंटों में से एक समय भोजन माता-पिता के साथ बैठकर अवश्य करें, ताकि हमें यह विश्वास रहे कि मेरी माँ को आखिर वही भोजन मिल रहा है जो मैं, मेरे बच्चे, मेरी पत्नी और मेरे भाई लोग स्वीकार करते हैं।

अभी कुछ दिन पहले की घटना है। हमारे पास एक महानुभाव आये। उन्होंने बताया कि एक दिन मैं खाना खाने बैठा तो मैंने अपने बेटे की बहू से कहाकृ आज थोड़ा दही दे दो। बहू ने कहा- पापा, दही तो नहीं है। खैर जो कुछ भी था, मैंने खाया और घर से निकल गया। अमुमन खाना खाने के बाद मैं घर लौटकर नहीं आता, पर उस दिन पता नहीं क्या संयोग था कि मैं लौटकर आया तो देखा कि मेरे बेटे की थाली में दही की कटोरी रखी थी।

ऐसी घटना न घटे इसके लिए ही यह हिदायत दे रहा हूँ कि चैबीस घंटें में एक बार माता-पिता के साथ बैठकर खाना अवश्य खाएँ। इससे एक-दूजे के प्रति मोहब्बत भी बढ़ेगी, माँ-बाप बच्चों के साथ खाना खाकर खुश होंगे और बच्चे, भी माँ-बाप के साथ खाना खाकर सुकून पाएँगे।

तीसरा काम यह करें कि रात को सोने केलिए जाने से पहले माता-पिता केपास जाकर इतना-सा पूछ लें कि मम्मी-पापा कोई सेवा की जरूरत है? अगर कोई काम हो तो कर दीजिए। फिर अपने कमरे में जाएँ। अगर उनके शरीर के किसी भाग में दर्द है तो उनके हाथ-पैर-कमर दबा दें। दर्द से राहत पाते-पाते उनकी हमारे लिए जो दुआएँ निकलेंगी वही हमारे लिए मुस्कान का काम करेंगी।

चैथा काम यह करें कि अलसुबह अपनी बुजुर्ग माँ को मंदिरजी के दर्शन कराने ले जाएँ। शायद इसी बहाने सही, माँ के थोड़े कर्ज उतारने का अवसर मिल जाए। माता-पिता के मरने के बाद जीमणवारी करना या हरिद्वार जाकर उनके फूलों को विसर्जित करना महज रूढ़ता की लकीरों को पीटने की तरह है, माँ के जीते-जी तुम कुछ ऐसा करो कि तुम्हारे कारण उनकी सद्गति का प्रबंध हो जाए। और इसकी शुरूआत करने के लिए हर रोज अपनी माँ को मंदिर दर्शन कराने ले जाओ। माँ की अंगुली पकड़कर उतने साल तो मन्दिर अवश्य ले जाएँ जितने साल तक माँ हमारी अंगुली पकड़कर हमें विद्यालय लेकर गई।

मैंने सुना है कि भारतीय संस्कृति में पुत्रों का जन्म इसलिए महत्वपूर्ण होता है कि वे अपने माता-पिता का तर्पण कर सके। उनकी गति सद्गति कर सके। मरने के बाद तो हम ब्राह्मणों को भोज दे देंगे, उनके नाम से प्याऊ भी बना देंगे। मुझे नहीं पता कि यह कितना सार्थक तर्पण होता है। अगर हम जीते-जी उनकी गति और सद्गति की व्यवस्था करते हैं तो यही पुत्र होने की सार्थकता है। मरना तय है, सबके शरीर यहीं छूट जाने वाले हैं, पर माता-पिता मरें, उससे पहले हम उनकी सद्गति की व्यवस्था करें। भले ही हम कहीं अन्यत्र अपना अलग घर क्यों न बसा चुके हों पर माँ की अन्तिम सांस जब निकले, तब हम उनके पास जरूर हों। मेरे मित्र, ईश्वर से इतनी प्रार्थना अवश्य करना कि माता-पिता के जब प्राण निकले तो हम सारे पुत्र उनके करीब हों, उन्हें कंधा देने वाले हों, उन्हें तर्पण देने वाले हों, उनकी मुक्ति का प्रबंध करने वाले हों।

हाँ, एक और कत्र्तव्य यह है कि साल में एक दफा अपनी घर-गृहस्थी या बिजनेस से छुट्टी लेकर अपने बुजुर्गों को सात दिन के लिए तीर्थयात्रा के लिए जरूर ले जाएँ। मेरी बहनों, अपने पति को केवल पति ही मत बनाओ, अपने पति को श्रवण कुमार बनने की भी प्रेरणा दो। आप किसी घर की पत्नी ही नहीं उस घर की कुलवधु भी बनें। कुलवधु वह नहीं होती जो अपने पति को लेकर घर अलग बसा लेती है। कुलवधु वह है जो मरते दम तक अपने सास-ससुर की सेवा किया करती है। बहिनो, यदि आप अपने बूढ़े सास-ससुर की सेवा करेंगी तो निश्चय ही आपके पति के नवग्रह अनुकूल होंगे और आपकी सात पीढियां फलेंगी-फुलेंगी। बहू चाहे गोरी हो या सांवली इससे क्या फर्क पड़ता है। ठीक है, गोरी बहू आँखों को अच्छी लगती है पर तुम उसे आखिर कितना देखोगे? जीवन में रंग का नहीं जीने के ढंग का महत्त्व है। घर में बहु का आदर रंग के कारण नहीं वरन उसके गुणों के कारण होता है। आप एक बड़े बाप की बेटी हैं और एक बड़े घर की बहु। स्वयं को एक अच्छी कुलवधु साबित कीजिए।

आप साल में एक बार अपने सास-ससुर को तीर्थयात्रा कराने के लिए अवश्य ले जाएँ और भाइयो, हो सके तो आप महिने में जितना कमाते हैं, उसका एक अंश अपने माता-पिता को ले जाकर अवश्य दें। उनसे कहें कि आप धर्म में खर्च करें, गौशालाओं के लिए उपयोग करें, दीन-दुखियों की मदद करें। जिस प्रकार हम अपने बच्चों की फीस, बीवी की साड़ी, घर का सामान, घर का किराया चुकाते हैं तो क्या हम कुछ हिस्सा माता-पिता को नहीं दे सकते? आखिर भाई उनकी भी कुछ ख्वाहिशें हैं, वे भी धर्म में कुछ खर्चा करना चाहते हैं, अपने पोते-पोतियों और दोहिते-दोहितियों का लाड़ करना चाहते हैं। और यह सब तभी संभव होगा जब तुम अपनी कमाई का एक चाराना उन्हें दोगे। जब हम असहाय थे तो उन्होंने हमें थामा था और अब जब वे बुजुर्ग हो चुके हैं तो हमारा फर्ज बनता है कि हम उनकी अंगुली थामें। उन्होंने हममें अपना भविष्य देखा। हम उनमें अपने वर्तमान को सजाएं-संवारें। याद रखिएगा जो अपने माँ-बाप का न हो सका वो किसी बीवी या दोस्त का क्या होगा।

माता-पिता के प्रति अपने फर्ज अदा करने के लिए भाई-भाई सब साथ रहो। रोटी दो हो और खाने वाले चार, तब भी सब मिल-बांट कर खाओ। भाइयों को हंसते-खिलते देखकर ही माइतों को खुशी होती है। सच्चाई तो यह है कि माँ-बाप के आँचल में ही दुआओं का वह खजाना भरा हुआ है जिसे तुम जितना लूटना चाहो, लूट लो। याद रखो, माँ-बाप को भूखा रखकर अगर वृद्घाश्रम में दान भी दोगे तो ऐसा करना दान का अपमान कहलाएगा। माँ-बाप के भोजन की व्यवस्था न करके अगर कोई कबूतरों को दाना भी डालता है तो कबूतर भी ऐसे दानों को स्वीकार करने से परहेज रखेंगे। मंदिर की देवी को चुनरी ओढ़ाने से पहले कृपया अपनी देवी माँ की फटी हुई चुनरिया को बदलो तभी जगदम्बा मंदिर में चढ़ाई गई चुनरिया को स्वीकार करेगी।

मेरे भाई जीवन में एक ऐसा मंदिर अवश्य बनाना जिसके गर्भ गृह में परमात्मा की प्रतिमा हो और जिसके प्रवेश द्वार पर करबद्घ अवस्था में दो मूर्तियाँ और हों जो सदा याद दिलाती रहें आपको अपने माँ-बाप की।




गुरुदेव श्री

श्री चन्द्रप्रभ सागर जी म. :- विचार और व्याख्यान