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श्रीकृष्ण ने दुनिया को दिया हंसता-खिलता धर्म - संत चन्द्रप्रभ


कृष्ण जब जन्मे थे तब थाली बजाने वाला कोई न था और धरती से गए तो आँसू ढुलकाने वाला कोई न था फिर भी वे जिंदगी भर आनंद से जिए और आनंद से भरा धर्म देकर चले गए। वे धरती के पहले ऐसे भगवान थे जिन्होंने न तपस्या की न साधना, न संन्यास लिया न मंत्र-जाप किया फिर वे पूरी दुनिया में पूजे गए। उनका कारागार में जन्म लेना, चुराके मक्खन खाना, गायों के थन में मुँह डालना, केवल मुष्ठी के प्रहार से दानवों का वध कर लेना, युद्ध के मैदान में गीता का संदेश देना, अपने ही शिष्य के सारथी बनना, गरीब सुदामा के चावल-सत्तू खाना जैसी सारी लीलाएँ अद्भुत थीं। वे मक्खन चुराने के बहाने गोपिकाओं का दिल चुरा लेते और मटकियाँ फोडने के बहाने पापों का घड़ा फोड़ देते थे।

श्रीकृष्ण माधुर्य के देवता थे। उन्होंने नीरस हो चुके धर्म को सरस बनाकर सबको मोहित कर डाला। वे गौमाता के भक्त थे। जहाँ गौ है वहाँ गोविंद है। गाय की सेवा साक्षात गोविंद की सेवा है। उन्हें मुरली बड़ी प्रिय थी। जो मुरली की तरह घर-परिवार में जरूरत होने पर बोलता है, जब भी बोलता है मधुर बोलता है और वातावरण को मिठासभरा बना देता है वह भी श्रीकृष्ण का प्रिय बन जाता है।

भक्त वत्सल और शांतिदूत थे श्रीकृष्ण-श्रीकृष्ण भक्तों की पुकार सुन दौड़े चले आते थे। ये उनकी भक्तवत्सलता थी कि उन्होंने दुर्योधन के छप्पन भोगों को ठुकराकर विदुराईन द्वारा खिलाए गए केले के छिलकों को भी बड़े प्रेम से खा लिया था, प्रेमवश अर्जुन के रथ को हाँक लिया था और राजसूययज्ञ में जूठी पत्तलों तक को उठा लिया था। श्रीकृष्ण युद्ध के प्रेरक नहीं शांतिदूत थे। शिशुपाल वध के अलावा उन्होंने कभी शस्त्र नहीं उठाया और महाभारत के युद्ध को भी अंतिम क्षण तक टालने के लिए पुरुषार्थ किया।

भारत की आत्मा है गीता-गीता भारत की आत्मा है।गीता युद्ध करना नहीं अरिहंत बनाना सीखाती है। अगर गीता के संदेशों को भीतर से जोड़ दिया जाए तो ये महावीर के आगम बन जाएंगे। दुर्नीति के दुर्योधन, दुष्कर्म के दुरूशासन, स्वार्थ के शकुनि और अहंकार के शिशुपाल से लडने का नाम है गीता। कर्तव्य पालन का पाठ पढ़ाने और सोये हुए आत्मविश्वास को जगाने की पे्ररणा है गीता। मैं भगवान श्रीकृष्ण का भक्त हूँ और गीता का मुझ पर ऋण है। गीता ने ही मुझे मौत के भय से बाहर निकाला। जब भी आपको लगे कि आपका मन कमजोर और दुर्बल हो गया है, तब-तब आप गीता को पढ़ें अपने आप चमत्कार होगा।

कर्मयोग और ज्ञानयोग का आह्वान है गीता-गीता कर्मयोग करने और आगे बढने का आह्वान है। यह मत सोचो कि पैसा नहीं है तो काम कैसे करें, आप काम करना शुरू करो, पैसा अपने आप आएगा। जीवन का निर्माण माँ के पेट से नहीं जीवन में लगने वाली ठोकरों और मिलने वाली चुनोतियों से होता है। जब प्रभु को याद करें तो सोचें सब कुछ प्रभु पर है और जब कर्म करें तो सोचें जब कुछ मेरे ऊपर है। गीता हमें ज्ञान फैलाने और समर्पित होने की प्रेरणा देती है। हम प्रतिदिन अच्छी किताबें पढ़ें, अच्छी किताबों को बाँटें और अनपढ़ों को पढ़ाएं। अगर आप संपन्न हैं तो किन्हीं पाँच बच्चों को गोद लेकर उनकी शिक्षा-दीक्षा की व्यवस्था करने का सौभाग्य लें। प्रभु की शरण स्वीकार करें - सारी सिरपच्चियों से मुक्त होने का एक ही आधार है प्रभु शरण। जो अपना सर्वस्व प्रभु के चरणों में समर्पित कर देता है प्रभु उसके रक्षक बन जाते हैं। प्रभु को केवल लड्ड़ू-प्रसाद-पैसे-मिठाइयाँ-फूल ही न चढ़ाएँ वरन् साथ ही अपने पापों को भी चढ़ाएँ और भविष्य में उन पापों को न दोहराने का संकल्प लें तभी वे हमें पापों से मुक्त करके अपने चरणों में स्थान दे सकेंगे।




गुरुदेव श्री

श्री चन्द्रप्रभ सागर जी म. :- विचार और व्याख्यान


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