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अगर महावीर आज होते तो पहले आतंकवादियों के शिविरों में जाते - संत श्री ललितप्रभ जी


हम महावीर को धर्मस्थलों की चारदीवारी में बांधकर रखने की बजाय सबके आंगन के बीच में ले आएँ ताकि वे आमजनमानस के काम आ सकें, प्राणी मात्र के हो सकें।

जैसे नदियों में गंगा और देवों में गणेश है वैसे ही महापुरुषों में महावीर हैं। महावीर ने जितनी जबरदस्त साधना की उतनी साधना न कोई महापुरुष कर पाया न कर पाएगा। महावीर का जीवन और उनके संदेश तब भी उपयोगी थे, आज भी उपयोगी हैं और जब तक मानव समाज है तब तक उपयोगी बनें रहेंगे। महावीर ने जितने महान संदेश दिए उतना ही महान जीवन भी जिया इसी कारण वे कभी आउट आफ डेट नहीं हो सकते वरन सदा अप टू डेट रहेंगे। उन्हें पढ़ा और सुना जाए तो मन पवित्र होता है और उनके संदेशों को जिया जाए न केवल जीवन धन्य होता है वरन व्यक्ति आत्मा से परमात्मा तक बन जाता है।

महावीर अखिल मानवता के भगवान - हम ये न सोचें कि महावीर पर केवल जैनों का अधिकार नहीं है वे अखिल मानवता के भगवान हैं। महापुरुष किसी पंथ परम्परा से बंधकर नहीं रहते। वे सबके होते हैं सबके लिए होते हैं। राम, कृष्ण, महावीर, जीसस, बुद्ध, मौहम्मद, नानक और सुकरात के दीये भले ही अलग हों, पर ज्योति सबकी एक है। अगर हम माटी के दियों पर ध्यान देंगे तो मृण्मय हो जाएंगे और ज्योति पर ध्यान देंगे तो ज्योर्तिमय हो जाएंगे। दुनिया को महावीर की जरूरत है। हमें चाहिए कि हम महावीर को धर्मस्थलों की चारदीवारी में बांधकर रखने की बजाय सबके आंगन के बीच में ले आएँ ताकि वे आमजनमानस के काम आ सकें, प्राणी मात्र के हो सकें।

महावीर से सीखें माँ के प्रति प्रेम-भाव- हम लोग भगवान श्री महावीर से सबसे पहले माँ-बाप के प्रति प्रेम रखने का गुण सीखें। महावीर स्वामी ने यह सोचकर माँ के गर्भ में हिलना-डुलना बंद कर दिया कि इससे माँ को कष्ट होगा, लेकिन ऐसा करने से माँ अत्यंत दुखी हो गई। महावीर ने सोचा - जब माँ का मेरे जन्म लेने से पहले मेरे प्रति इतना स्नेहभाव है तो मेरे जन्म लेने का बाद कितना स्नेह भाव होगा। और अगर मैं उन्हें छोड़कर संन्यास ले लूंगा तो माँ-बाप की क्या हालत होगी। इसी प्रेम भाव के चलते महावीर ने माँ के पेट में ही संकल्प कर लिया था कि जब तक माता-पिता जीवित रहेंगे तब तक मैं संन्यास नहीं लूंगा, उनकी भरपूर सेवा करूँगा। यह थी उनकी असीम मातृत्व भक्ति। हम भी संकल्प लें कि जब तक माता-पिता जीवित रहेंगे तब तक हम न तो उनसे जुदा होंगे न ही भाई-भाई अलग घर बसाएँगे। उनकी अंतिम श्वास तक सेवा संभालेंगे। सच्चा सपूत वही होता है जो माँ-बाप के बुढ़ापे को स्वर्ग सरीखा बना देता है।

महावीर शब्द में छिपा है महान रहस्य - महावीर शब्द अपने आप जीता-जागता शास्त्र है। महावीर का म महादेव का, ह हनुमान का, व विष्णु का व र राम का वाचक है। एक महावीर का नाम लेने से चारों महापुरुषों को एक साथ प्रणाम हो जाता है। महावीर का म हमें महान बनने, ह हिम्मत न हारने, व वचन निभाने और द दया दिखाने की प्रेरणा देता है। व्यक्ति दिये गए वचन को राम की तरह व लिए हुए संकल्प को महावीर की तरह निभाने का संकल्प ले ताकि दुनिया उसके जाने के बाद भी उसका नाम गर्व महसूस करे।

मंदिर बनाएँ, पर गरीबों को ऊपर भी उठाएँ - महावीर को धर्म के नाम पर भीड़ नहीं भाव चाहिए। उन्हें आपकेसिक्के नहीं सादगी चाहिए। उन्हें जिह्वा की बजाय जीवन में बसाया जाना चाहिए और उनका नाम दीवारों पर लिखने की बजाय दिल में लिखा जाना चाहिए तभी वे हमारे लिए उपयोगी बन सकें गे। आजकल लोग महावीर को नहीं चाहते, महावीर से चाहते हैं। हम धन-दौलत, जमीन-जायदाद, पत्नी-बच्चे पाने के लिए महावीर की शरण में न जाएं क्योंकि इन सबका तो उन्होंने त्याग कर दिया था। हमारा उनके पास जाना तभी सार्थक होगा जब हम प्रेम, शांति और आनंद को पाने के लिए उनके पास जाएंगे। महावीर चाहते हैं कि हम दूसरों के जीवन में आग लगाने की बजाय बाग लगाएं। अगर हमारे पास तीली है तो हम उसका उपयोग घरों को जलाने की बजाय घरों के अंधकार को दूर करने में करें। हम महावीर प्रभु के खूब मंदिर बनाएँ, पर साथ ही साथ अपने धन का उपयोग गरीबों को ऊपर उठाने में उपयोग करेंगे तो इससे महावीर स्वामी को ज्यादा खुशी मिलेगी।

जीयो और जीने दो अपनाएं - महावीर का धर्म कोई लम्बा-चौड़ा नहीं है। सार रूप में कहें तो महावीर के धर्म का सार जीयो और जीने में छिपा है। खुद भी सुख से जियो और औरों को भी सुख से जीने की व्यवस्था दो। जो तुम अपने लिए चाहते हो वही तुम औरों के लिए चाहो और जो अपने लिए नहीं चाहते वह दूसरों के लिए भी मत चाहो। अगर हम औरों से लाड चाहते हैं तो भूलचूककर भी किसी से लड़ाई न करें। जब हर कोई जीयो और जीने दो का नारा अपना लेगा तभी महावीर का सच्चे अर्थों में धरती पर अवतरण होगा।

हिंसक कृत्यों एवं हिंसा से निर्मित वस्तुओं का करें बहिष्कार - महावीर की सच्ची पूजा तभी होगी जब हम उनके अहिंसा के स्तंभ बनाने की बजाय जीवन को अहिंसामय बनाएंगे। हम महावीर की जय जरूर बोलें, पर हो सके तो पहले लिपिस्टिक, चमड़े से बनेजूते, बेल्ट, पर्स का और रात्रिभोजन का त्याग कर दें। हिंसक कृत्यों का और हिंसा से निर्मित वस्तुओं का त्याग करना भगवान महावीर की दृष्टि में सर्वश्रेष्ठ है। मांसाहार करने वाले, चमड़े से बनी वस्तुओं को उपयोग करने वाले, चलते जीवों की अकारण हिंसा करने वाले और दूसरों को दुख पहुँचाने वाले न केवल महावीर की अहिंसा के वरन् पूरी इंसानियत के दुश्मन हैं।

महावीर की अहिंसा और प्रेम को पूरे विश्व में फैलाएँ - महावीर का एक ही संदेश है अहिंसा और सबसे प्रेम। अहिंसा से विश्व में शांति आएगी और प्रेम से धरती समृद्ध होगी। अगर आज महावीर होते तो वे शहरों की बजाय कश्मीर की घाटियों में जाते और आतंकवादियों के शिविरों में जाकर अहिंसा का शंखनाद करते। याद रखें, विध्वंस करने वाला शैतान होता है और सृजन करने वाला भगवान। धरती पर मारकाट करने वाले कभी याद नहीं किये जाते। अगर ओसामा बिन लादेन जैसे लोग अपनी शक्ति विश्व का निर्माण करने में लगाते तो आज वे भी महावीर भगवान की तरह पूजे जाते।

नेक संकल्प लेने से धन्य होगा कल्याणक दिवस - तीन त्रिलोकी नाथ, तारणहार, अहिंसाअवतार भगवान श्री महावीर स्वामी के जन्म कल्याणक के पावन पर्व पर मैं अपनी ओर से सभी भाई-बहिनों को शुभकामनाएँ समर्पित करता हूँ। हम सबका जीवन सुखमय, धर्ममय, उन्नतिमय और आनंदमय हो। इस पर्व पर हम सब संकल्प लें कि कभी किसी का दिल नहीं दुखाएँगे, अगर भूल से ऐसा हो गया तो उससे तुरंत माफी मांग लेंगे, जीवन-मृत्यु का प्रश्न आने पर भले ही झूठ बोल देंगे, पर व्यावहारिक जीवन में सत्य और प्रिय भाषा का ही उपयोग करेंगे, पराए धन और पराई औरत पर बुरी नजर नहीं डालेंगे, दुव्र्यसनों का सेवन कभी नहीं करेंगे, प्रतिवर्ष कमाई का एक हिस्सा धर्म में, अहिंसा के विस्तार में और मानवता के नाम जरूर खर्च करेंगे और साल में कम-से-कम एक व्यक्ति को दुव्यर्सन और मांसाहार का त्याग करवाएँगे। अगर हम इनसे से एक भी संकल्प लेते हैं तो मानकर चलिए भगवान महावीर के आशीर्वाद हम पर सदा बरसते रहेंगे।

प्रासंगिक प्रेरक कहानियाँ

दया और अहिंसा का परिणाम - एक शिकारी जंगल में शिकार करने गया। दिनभर वह कोई शिकार न कर पाया। थका-हारा वह वापस घर जा रहा था तो उसके हाथ एक हिरणी का बच्चा आ गया। वह उसे पकड़कर ले जाने लगा तो पीछे-पीछे उसकी माँ भी आ गई। उसे लगा कि आज एक साथ दो शिकार हो जाएँगे। उसने हिरणी की माँ को देखा तो उसके आँखों से झर-झर आँसू बह रहे थे मानो वह अपने बच्चे पर दया करने की भीख माँग रही हो। न जाने शिकारी को क्या सूझा उसने दया खाकर बच्चे को छोड़ दिया। हिरणी बच्चे को लेकर वापस जंगल में चली गई। शिकारी को रात को सपना आया। उसने देखा, वही हिरणी सपने में आकर कह रही है कि आज तूने जो मेरे बच्चे पर दया की है उसका परिणाम तुझे जरूर मिलेगा। कहते हैं वही शिकारी आगे जाकर गजनी का बादशाह बना।

पानी मूल्यवान या खून - भगवान महावीर के समय दो राजाओं में पानी को लेकर युद्ध छिड़ गया। एक राजा ने कहा-ये नदी मेरी तो दूसरे ने कहा-ये नदी मेरी। जब भगवान महावीर को पता चला तो वे युद्ध के बीच मैदान में पहुँच गए। भगवान को देख दोनों राजा रथ से नीचे उतरे। उन्हें प्रणाम किया और पूछा-भंते, आप और युद्ध मैदान में। भगवान महावीर ने दोनों राजाओं को ललकारते हुए पूछा-बताओ कि पानी ज्यादा मूल्यवान है या खून? दोनों ने कहा-खून। भगवान महावीर ने कहा-तो फिर तुम दोनों पानी के चक्कर में खून बहाने की मूर्खता क्यों कर रहे हो? नदी की एक धार इस ओर मोड़ दो और एक धार उस ओर। राजाओं को अक्कल आ गई। दोनों ने भगवान से क्षमा मांगी और परस्पर मित्रता का हाथ बढ़ा दिया।


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