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राम ने ऐसा जीवन जीया कि जीवन स्वयं प्रेरणा-संदेश बन गया - श्री चन्द्रप्रभ


सावधान! रावण के सिर दस थे और आँखें बीस, पर नजर एक औरत पर थी, आपके सिर एक है और आँखें दो, पर नजर हर औरत पर है सोचो असली रावण कौन है?

शदुनिया में तीन महापुरुषों का बड़ा महत्व है - राम, कृष्ण और महावीर। राम ने मर्यादा का, कृष्ण ने कर्मयोग का और महावीर ने तप-त्याग का पाठ पठाया। जहाँ घर-परिवार को खुशहाल रखने के लिए राम और सफलता के शिखरों को छूने के लिए कृष्ण आदर्श हैं वहीं जीवन को आध्यात्मिक ऊँचाइयाँ देने के लिए महावीर प्रेरणा-स्तंभ हैं। यह कितने बड़े आश्चर्य की बात है कि दुनिया के हर महापुरुष ने उपदेश दिए और धर्म की स्थापना की। कृष्ण ने गीता में, महावीर ने आगम में और बुद्ध ने पिटक में संदेश दिए, पर राम ने न तो कोई ग्रंथ लिखा न ही उपदेश दिए वरन् उनका जीवन ही अपने आप में सबसे बड़ा उपदेश था। इसलिए राम जितने पहले उपयोगी थे, आज उससे भी हजार गुना उपयोगी है। किसी के घर में गीता, आगम या मंदिर हो न हो, पर रामायण का गुटका जरूर होना चाहिए। अगर घर में प्रतिदिन रामायण की चार चौपाइयों को संगान होगा तो मानकर चलिए इससे सास-बहू, भाई-भाई, पति-पत्नि के रिश्तों में मिठास जरूर बढ़ेगी।

रामायण को लिखा नहीं, पर जिया है - मैंने भले ही सनातन कुल में जन्म न लिया हो, पर रामायण को अवश्य जीया है। मैंने और मेरे छोटे भाई ललितप्रभ हम दोनों ने संत बन रहे अपने माता-पिता की सेवा के लिए आजीवन संन्यास धारण किया और आज भी हम दोनों भाई राम-लक्ष्मण की तरह 33 साल से साथ रह रहे हैं। मैं यह बात गर्व से कहूंगा कि मैं जितना महावीर का उपासक हूँ उतना राम का भी। मुझे राम और महावीर कहीं कोई फर्क नजर नहीं आता। जहाँ राम महावीर की भूमिका है वहीं महावीर राम का उपसंहार। राम का र जहाँ जैनों के पहले तीर्थंकर रिषभदेव और इस्लाम के रहमोदीदार अल्लाह का सूचक है वहीं राम का म अंतिम तीर्थंकर महावीर और अंतिम पैगम्बर मौहम्मद साहब का परिचायक है। राम का नाम लेते ही समस्त तीर्थंकरों और पैगम्बरों की वंदना हो जाती है। जो राम और रामायण के प्रेम और त्याग को जी न पाए वे भला महावीर के अहिंसा और शील को प्रामाणिकता के साथ कैसे जी पाएंगे।

मैं राम के नाम और स्वभाव से प्रभावित हूँ - मुझे राम की जिन चीजों ने प्रभावित किया उनमें राम का शब्द, राम का नाम और राम का महान स्वभाव है। वेदों का सार उपनिषद, उपनिषद का सार पुराण, पुराण का सार गीता, गीता का सार महावीर और महावीर का सार राम है। राम अपने आप में पूर्ण शब्द है। रा कहते ही मुँह खुल जाता है और म कहते ही मुँह बंद हो जाता है अर्थात राम से ही जीवन की शुरुआत और राम से ही जीवन का समापन है। जो सुबह-शाम 27 बार राम का नाम ले लेता है उसके लिए राम शब्द संकट मोचक हनुमान का काम करता है। राम क ा नाम तो राम से भी ऊँचा है इसलिए पत्थर पर राम लिख दिया गया तो पत्थर भी तैरने लग गया। यह राम का महान स्वभाव था जिसके चलते पिता के न कहने के बावजूद वचनों को पूरा करने के लिए वे वनवास चले गए। अयोध्या लौटने पर सबसे पहले वनवास देने वाली कैकेयी माँ को प्रणाम करना और इन्द्रजीत के शव पर अपना उत्तरीय वस्त्र यह कहते हुए बिछा देना कि इन्द्रजीत का जितना सम्मान किया जाए उतना कम है जिसने पिता के लिए अपने प्राणों की आहूति तक दे डाली, ये प्रसंग राम के महान व्यक्तित्व का प्रकट करने के लिए काफी है। राम का यह महान चरित्र था कि राजसूययज्ञ में दूसरा विवाह करने के पारिवारिक दवाब के बावजूद उन्होंने सीता की मूर्ति बिठाना स्वीकार कर लिया, पर सीता को दिए गए एक पत्नी व्रत के संकल्प को नहीं तोडऩा पसंद न किया।

रामायण की पहली प्रेरणा है घर को स्वार्थ से बचाएँ - रामायण हमें पहली प्रेरणा देती है हम घर को स्वार्थ से बचाएं नहीं तो हमारे घरों की हालत वैसी ही हो जाएगी जैसी कैकेयी के वर मांगने के बाद रघुकुल की हुई थी। इसलिए मैं हर नारी से कहूँगा कि वह त्याग रखने वाली सीता बने, स्वार्थ साधने वाली कैकेयी नहीं। मैं सासूमाताओं को प्रेरणा दूँगा कि वे बहू आते ही घर की चाबियाँ उसे पकड़ा दे और बहुओं को सीख दूँगा कि वे पीहर का माल कमरे में रखने की बजाय सास को सौंप दे, यह बड़प्पन घर को सदा स्वर्ग बनाकर रखेगा। रामायण की दूसरी प्रेरणा है भाई होकर भाई के काम आने की। लक्ष्मण ने जहाँ भाई के लिए वनवास ले लिया वही भरत ने भाई के लिए राजमहल में रहकर भी वनवासी का जीवन जिया। इसे कहते हैं भाई का भाई के प्रति प्रेम और त्याग।

नारी न करें लक्ष्मण रेखा का उल्लंघन-नारि-जाति को रामायण से सीखना चाहिए कि अगर नारियाँ सीता की तरह मर्यादा की लक्ष्मणरेखा का उल्लंघन करेगी तो रावण जैसे लोगों से ठगी जाएगी और पुरुष राम की तरह मृगतृष्णा में उलझेंगे तो सीता जैसी धर्मपत्नी को खोने का दुख पाएँगे। अगर नारियाँ मर्यादा और पुरुष संयम का जीवन का जिए तो विश्व में होने वाली पचास प्रतिशत अराजकताओं पर स्वत: अंकुश लग जाए। हमें रामायण से आत्मविश्वास को सदा जाग्रत रखने की सीख लेनी चाहिए। जैसे हनुमान का आत्मविश्वास जग जाए तो वह सौ कौस के समुद्र को भी लांघने में सफल हो जाता है। राम को जपने वाले और रामायण को पढऩे वाले जीवन में शील पर अडिग रहने का संकल्प लें। केवल राम का नाम लेने भर से हमारा भला नहीं होगा जब तक कि हम राम की मर्यादाओं को नहीं जिएंगे। राम और सीता के जीवन में भी कसौटियाँ आईं, पर उन्होंने किसी भी हालत में शील से समझौता नहीं किया।

भीतर के राम को जगाएँ और ससंद पहुँच रहे रावणों को रोकें - आजकल एक तरफ रावण के पुतलों को फूँका जा रहा है और दूसरी तरफ रावण उतना ही दुनिया में फैलता जा रहा है। सावधान! रावण के सिर दस थे और आँखें बीस, पर नजर एक औरत पर थी, आपके सिर एक है और आँखें दो, पर नजर हर औरत पर है सोचो असली रावण कौन है?अब घर-घर में रावण पैदा हो गए हैं जो घर और समाज को तोड़ रहे हैं और धन-शक्ति के बल संसद में पहुँच रहे रावण भ्रष्टाचार फैला रहे हैं। लंका का रावण तो मर गया, पर भ्रष्टाचार का रावण पैदा हो गया। पहले रावण को मारने के लिए राम ने अवतार लिया था, अब भ्रष्टाचार के रावण को समाप्त करने के लिए किसी अवतार की प्रतीक्षा किये बगैर भीतर के राम को जगाना होगा। तभी भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों को भारत से खदेड़ा जा सकेगा। अगर भारत से 15 प्रतिशत भ्रष्टाचार भी कम होता है तो यह हमारी बहुत बड़ी जीत कहलाएगी। अब घर-घर में राम और रामायण का पुनर्जन्म होना चाहिए। भारत का भला महाभारत से नहीं रामायण से होगा। हर व्यक्ति, हर बच्चा राम बने तभी भ्रष्टाचार का अंत हो सकेगा।

रामायण की प्रेरक कहानियाँ


निश्चल भक्ति - वनवास के दौरान श्रीराम, लक्ष्मण और जानकी को गंगा नदी पार करनी थी। उन्होंने केवट से अनुरोध किया। केवट ने कहा - प्रभु, पहले आप अपने पाँवों का प्रक्षालन करवाइए। आपकी चरण रज से पत्थर अहिल्या बन गई कहीं मेरी नाव भी आपकी चरण रज से नारी बन गई तो मेरा जीना दुष्कर हो जाएगा। राम को राजी होना पड़ा। केवट नदी के मझधार में नाव को चक्कर कटाने लगा तो लक्ष्मण को गुस्सा आ गया। केवट ने कहा - आपने तो हमें चौरासी के चक्कर में डाल रखा है और मैंने चार चक्कर क्या खिलाए कि आपको चक्कर आने लग गए। जब केवट ने सबको नदी पार पहुँचा दिया तो राम ने सीता से कहा - केवट को पार लगाई के लिए कुछ दे दो। केवट ने कहा - प्रभु, आप और मैं तो जाति भाई हैं। आपका भी काम है तिराना और मेरा काम भी है आए हुए को पार लगाना, फिर किस बात का लेनदेन? प्रभु हो सके तो केवल इतनी कृपा करना जैसे आज मैंने आपको पार पहुँचाया वैसे ही जब मैं आपके यहाँ आऊँ तो आप भी मुझे भवसागर से पार पहुँचा देना। यह है निश्चल भक्ति।

पहले कैकेयी को प्रणाम - कैकेयी के दो वचनों को सुनकर दशरथ मूच्र्छित हो गए। जब राम को पता चला कि कैकेयी ने पिता से राम का वनवास और भरत का राज्याभिषेक माँगा है तो उन्होंने कैकेयी से कहा - लगता है राम पर आपको भरोसा नहीं था। अगर आपने सीधा मुझसे कह दिया होता तो यह राम 14 साल का वनवास तो क्या प्राण हाजिर कर देता। 14 साल का वनवास पूर्ण करके राम जब वापस अयोध्या आए तो तीनों माताएँ उनके सामने थीं, पर उन्होंने सबसे पहले वनवास देने वाली कैकेयी को प्रणाम किया तो कैकेयी ने कहा - राम, तुम सचमुच भगवान हो। ऐसा विनम्र और क्षमाशील व्यवहार एक भगवान ही कर सकता है।




गुरुदेव श्री

श्री चन्द्रप्रभ सागर जी म. :- विचार और व्याख्यान


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