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प्रतिशोध की भावना हटाइए


किसी बात या घटना के कारण अगर मानसिक दूरियाँ बन गयी हैं तो उन्हें जल्द से जल्द मिटा दीजिये। अन्यथा आपका मन वह सूखा तालाब बन जाएगा जिसमें दरारों के सिवा कुछ नहीं होता।

अपने मन को निर्मल और निर्भार करने केलिए वैर-विरोध और प्रतिशोध की भावना हटाइए, प्रतिशोध वह जहर है जो व्यक्ति के मस्तिष्क को कमजोर करता है और मन की शक्ति को भस्म/नष्टï करता है।

पुराने आघातों को याद करना मानसिक दिवालियापन है, बदला लेने की भावना कूरता है और प्रतिशोध की सोच आत्मघात। अपने भीतर करुणा और क्षमा को जन्म दीजिए, इंसान से हैवान होने की बजाय भगवान बनने की ओर कदम बढ़ाइये।

जिसके हृदय में दुर्भावनाएं भरी हैं उसकी जिंदगी में सुख-शांति का अभाव रहता है, आखिर आग से जलती शाखा तो पर कोई भी पंछी बैठना पंसद नहीं करता।

प्रतिशोध की भावना और मन की शांति कभी भी साथ-साथ नहीं रह सक ते। कृपया प्रतिशोध को हटाइये और मन की शांति को पाइये। वैर से वैर कभी मिटता नहीं है। स्याही से सने वस्त्र को स्याही से धोना मूर्खता नहीं तो और क्या है! खून से सना वस्त्र क्या कभी खून से साफ होता है? वैर-विरोध की गाँठें खोलिए, मन को निर्मल कीजिए और प्रेम के पानी से प्रतिशोध के मैल को धो लीजिए।

दरार तीन तरह की होती है - मिट्टी की दरार, सूखे तालाब की दरार और पत्थर की दरार। भूल से भी अपने मन में पत्थर की दरार मत डालिए। मिट्टी की दरार तब मिट जाएगी जब हवा का झोंका आएगा और सूखे तालाब की दरारें तब मिट जाएगी जब उसमें पानी भर जाएगा। पर प्रतिशोध के पत्थर की दरार को कभी पाटा न जा सकेगा।

करुणा और प्रेम से भरा व्यक्ति दुश्मन के दिल में जगह बनाने में सफल हो जाता है वहीं कठोर व्यक्ति अपनों के प्रेम से भी हाथ धो बैठता है। पे्रम से जीने वाले व्यक्ति को पड़ोसन भी पसंद करती है वहीं गुस्से में जीने वाले व्यक्ति को खुद की पत्नी भी पसंद नहीं करती।

वैर मन के सरोवर में ऐसी गंदी मछली है जो पूरे सरोवर को गंदा कर देती है किसी ने बीस वर्ष पूर्व आपका अपमान किया आप उसकी वैर की गांठ अभी तक क्यों बांधे हैं ? इंसान की मूर्खता तो देखिए दो साल पूराना कैलेण्डर घर में नहीं है, पर बीस वर्ष पुरानी बातों को आज भी हम ढ़ो रहे हैं।

कठोरता से स्नेह का नाश होता है, मेल जोल का अभाव रहता है, व्यक्ति का मन दुखी और परेशान रहता है, क्रोध और अहंकार उसके पिछलग्गु बन जाते हैं।

प्रतिशोध छोडि़ए, क्षमा अपनाइए, अहंकार के अंधकार से निकलिये और प्रकाश की ओर अपने कदम बढ़ाइये। प्रतिशोध मिटाने और प्रेम जगाने के लिए सहनशीलता का विकास कीजिए, क्षमा का माधुर्य बढ़ाइए और आक्रोश को समाप्त कर दीजिए।

प्रेम की राह पर फिर से अपने कदम बढ़ाइए। सच्चा ग्रंथ, पंथ और संत वही होता है जो सबको प्रेम का पाठ पढ़ाता है। हिंसा का बहिष्कार कीजिए, दूसरों केसाथ मधुरता बढाइए, बंधुत्व भाव का संचार कीजिए, वक़्त बेवक़्त काम आने की कोशिश कीजिए। याद रखिए किसी सम्राट के प्रतिशोध से भिखारी की क्षमा कहीं ज्यादा महान होती है।


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