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आहार सुधारिए, स्वास्थ्य स्वतः सुधरेगा: संत चन्द्रप्रभ राष्ट्र-संत की प्ररेणा से सैकड़ों युवाओं ने किया रात्रि भोजन का त्याग

बैंगलोर

20 Jul 2017

 महान दार्शनिक संतश्री चन्द्रप्रभ महाराज ने कहा कि आहार जीवन का आधार है। अगर पेट भरा हो तो इंसान को धर्म और ईमान सूझता है, मन भरा हो तो दर्शन और विज्ञान सूझता है, आत्मा-परमात्मा-नैतिकता की बातें बहुत अच्छी है,पर भूखे को तो भोजन में ही भगवान सूझता है। जिसका भोजन सात्त्विक, संतुलित और संयमित होता है उसे कभी डाक्टर के पास जाने
की जरूरत नहीं पड़ती क्योंकि वह तो खुद ही खुद का चिकित्सक बन जाता है। उन्होंने कहा कि आहार बिगड़ जाए तो व्यक्ति बीमार पड़ जाता है और आहार सुधर जाए तो व्यक्ति स्वस्थ हो जाता है इसलिए सबसे पहले हम अपना आहार सुधारें
हमारा स्वास्थ्य स्वतरू सुधर जाएगा। संत श्री चन्द्रप्रभ चामराज पेठ स्थित मराठा हॉस्टल मैदान में स्वस्थ सप्ताह के  चैथे दिन कैसा करें आहार कि कभी न पड़ें बीमार विषय पर हजारों सत्संगप्रेमियों को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि कुछ लोग खाने के लिए जीते हैं तो कुछ लोग जीने के लिए खाते हैं। जो ज्यादा खाते हैं वे कम जीते हैं जो कम खाते हैं वे ज्यादा जीते हैं। हम घर का बना हुआ खाना खाएंगे तो ज्यादा स्वस्थ रहेंगे और बाजार का खाएंगे तो पेट भी बर्बाद होगा और बीमारियाँ भी फ्री में आएंगी। जीमणवारियों से बचने की सलाह देते हुए संतश्री ने कहा कि अगर कोई जिमणवारियों का खाना पाँच दिन लगातार खा
ले तो वह गारन्टेड बीमार पड़ेगा इसलिए हम जीमणवारियों में जाएं ही नहीं और जाना ही पड़े तो पहले घर से भोजन करके जाएं और वहाँ हल्का-फुल्का कुछ भी ले लें।


स्वस्थ इंसान धरती पर चलता-फिरता मंदिर हुआ करता है। जिसका तन-मन स्वस्थ और हृदय पवित्र है समझो उसमें परमात्मा का बसेरा है। बीमार पड़कर दवाइयाँ खाना मजबूरी है, पर अपने आप को सदाबहार स्वस्थ रखना, बीमार ही न पडने देना यह सबसे बड़ी समझदारी है। उन्होंने कहा कि स्वस्थ रहने के तीन मंत्र हैं - हितकारी भोजन, सीमित भोजन और ऋतु अनुसार भोजन। जो स्वाद की बजाय स्वास्थ्य युक्त आहार करता है, भूख की मात्रा से दौ कौर कम खाता है और मौसम के अनुरूप वस्तुएँ खाता है वह कभी बीमार नहीं पड़ता। उन्होंने जीने के लिए खाने की सीख देते हुए कहा कि जो खाने के लिए जीते हैं वे कम खा पाते हैं क्योंकि वे जल्दी बीमार पड़ते हैं और कम ही जी पाते हैं, पर जो जीने के लिए खाते हैं वे स्वस्थ भी रहते हैं और ज्यादा भी जीते हैं।


संत चन्द्रप्रभ संसार का पहला सुख निरोगी काया है। हम काया को नश्वर समझकर न तो उसकी उपेक्षा करें न उसे भोग का साधन मात्र समझें वरन् उसमें वीणा के तारों की तरह संतुलन साधें तभी उससे सुंदर संगीत का जन्म हो पाएगा। काया को निरोगी बनाने के लिए उन्होंने कहा कि हम राजसिक और तामसिक भोजन की बजाय सात्विक भोजन लें। सात्विक भोजन लेने से हमारे तन और मन में सात्विकता का संचार होगा। मांसाहार छोड़ें, शाकाहार अपनाएं-मांसाहार छोडने की प्रेरणा देते हुए
संतश्री ने कहा कि अगर कोई हमारे सुई या पिन चुभाए तो हमें कितनी पीड़ा होती है सोचो, जिन पशु-पक्षियों पर कटार चलती है उन्हें कितनी पीड़ा होती होगी। क्या दूसरों को पीड़ा पहुँचाना कभी धर्म हो सकता है? हमें दूसरों का मांस खाना अच्छा लगता है, कोई हमारा मांस खाए तो क्या हमें अच्छा लगेगा। हम खुद भी शाकाहार अपनाएं और दूसरों को भी शाकाहार की प्रेरणा दें। एक
माँसाहार को शाकाहार बनाना अड़सठ तीर्थों की यात्रा का पुण्य लाभ अर्जित करने के बराबर है।


भोजन में रखें कुछ सावधानियाँ-भोजन से जुड़ी सावधानियों का जिक्र करते हुए संतश्री ने कहा कि आहार-शुद्धि के लिए घर में पीसे हुए मसालों का उपयोग करें, धान को धोकर के काम लें, नाखूनों को पूरा साफ रखें, खाने से पहले हाथों को अच्छी तरह धो लें, मौनपूर्वक भोजन करें, पेट में ओवरलोडिंग न करें और भूख से दो कौर कम खाएं। उन्होंने कहा कि जिस घर में जा चुके
मेहमानों के प्रति शुक्रि या का और आने वाले मेहमानों के  प्रति इंतजार का भाव रहता है वह घर मंदिर की तरह पावन होता है और जो दूसरों को खिलाकर खाते हैं उनके लिए भोजन भोजन नहीं रहता प्रभु का प्रसाद बन जाता है। करें रात्रि भोजन का त्याग - राष्ट्र-संत ने रात्रि भोजन से बचने की प्रेरणा देते हुए कहा कि जो लोग सूर्यास्त से पहले भोजन कर लेते हैं वे सदा स्वस्थ रहते हैं। वे पर्याप्त मात्रा में पानी भी पी सकते हैं और भोजन को हजम करने का वक्त भी मिल जाता है। संतप्रवर ने कहा किव्यक्ति अगर दो दिन रात्रि भोजन का त्याग करता है, तो उसे एक उपवास करनेका पुण्य मिल जाता है। संतश्री के प्रभावी वचनों से प्रभावित होकर सैकड़ों युवाओं ने खड़े होकर रात्रि भोजन त्याग करने का संकल्प लिया। समारोह में लाभार्थी परिवार श्रीसुमेरमलजी, अगमराजजी रणजीतजी ललवाणी, श्री दिलीपकुमारजी, निहालचंदजी पुनमिया, श्री गौतमचंदजी बोहरा, श्री
पारसमलजी कांकरिया, श्री नंदुभाई पारख, तनिष्क जैन ने दीपप्रज्वलन कर किया।


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