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मन अशान्त तो छप्पन भोग भी फीके: संत ललितप्रभ

बैंगलोर

21 Jul 2017

 राष्ट्र-संत महोपाध्याय ललितप्रभ सागर महाराज ने कहा कि मन शांत है तो सूखी दाल-रोटी भी अच्छी लगती है और मन अशांत है तो छप्पन भोग भी फीके नजर आते हैं। अगर किसी व्यक्ति के पास महंगी कार हो, सुंदर पत्नी हो पर मन अशांत हो तो समझो वह दुरूखी है, वहीं दूसरे व्यक्ति के पास चलाने को केवल साइकिल हो, सांवली पत्नी हो, पर मन शांत हो तो समझना वह सबसे सुखी है। उन्होंने कहा कि हम किसी बड़े बंगले में रहते हैं, पर घर में रोज-रोज कलह होती है तो समझना हम नरक में जी रहे हैं। वहीं हम किसी झौंपड़ी में रहते हैं, पर उसमें भी शांति है तो वह घर घर नहीं हमारे लिए जीता जागता स्वर्ग है।

संत ललितप्रभ मराठा हॉस्टल मैदान में सत्संगमाला के बीसवें दिन मन की शांति के लिए क्या करें, क्या न करें विषय पर हजारों लोगों को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि जीवन में कभी ऐसी नौबत आए कि एक पलड़े में पांच करोड़ हो और दूसरे पलड़े में मन की शांति हो, पर किसी एक का चयन करना हो तो पांच करोड़ लेने की बेवकूफी मत करना। झट से मन की शांति का चयन करना क्योंकि जिसके पास मन की शांति है वह करोड़पति है, जिसके पास मन की शांति नहीं समझो वह करोड़पति होते हुए भी रोड़पति है। उन्होंने कहा कि मन की शांति जीवन की सबसे बड़ी दौलत है। वह करोड़पताई भी व्यर्थ है जिसके लिए सुख
की रोटी और चैन की नींद भी चली जाती है। शांति की व्यवस्था जीते जी करके जाएं: चुटकी लेते हुए संतश्री ने कहा कि
किसी अमीर व्यक्ति की मृत्यु के पीछे जब श्रद्धांजलि सभा होती है तो लोग भगवान से यह प्रार्थना नहीं करते कि उसे अच्छी पत्नी, महंगी कार, बड़ा बंगला अथवा बहुत सारा धन मिले वरन् उसके लिए शांति की प्रार्थना करते हैं क्योंकि उसने सब कुछ कमाया, पर मन की शांति कमा न पाया।

उन्होंने कहा कि हम ऐसा जीवन जीकर जाएं कि हमारे पीछे लोगों को शांति की प्रार्थना न करनी पड़े वरन्ड्ढ हम स्वयं जीते जी शांति की दौलत कमा कर जाएं। शांति से पहले मन की शुद्धि करें: संतश्री ने कहा कि मन को शांत करें उससे पहले जरूरी है हम मन को शुद्ध करें। शुद्ध मन वाला चाहे अपरिचित ही क्यों न हो, उससे रात को भी खतरा नहीं है, पर अशुद्ध मन वाला चाहे परिचित भी क्यों न हो उससे तो दिन में भी सावधान रहने की जरूरत है। सहजता को अपनाएं: शांति पाने का पहला मंत्र देते हुए संतश्री ने कहा कि जब जो जैसा हो जाए उसे प्रेम और सहजता से स्वीकार करें। किसी बात को लेकर मन में ज्यादा आपाधापी या सिरपच्ची न पालें। घर में केवल श्कोच्य की भूमिका निभाएं, समझाएं और मुक्त हो जाएं। दूसरों को सुधारने की आदत
छोड़ें, खुद को संवारने की कोशिश करें। घर में दीवार भले ही खड़ी हो जाए, पर ऐसा कोई काम न करें कि मन में दरार आ जाए। उन्होंने कहा कि किसी बात को लेकर माथा भारी हो जाए तो इन मंत्रों का स्मरण करें - ठीक है कोई बात नहीं, मेरा है सो जाता नहीं चला गया सो मेरा नहीं, तू थारी संभाल छोड़ शेष जंजाल, ऐसा सोचते ही तुरंत माथा ठण्डा हो जाएगा। समारोह में लाभार्थी परिवार श्री बाबुलालजी, भरतकुमार जी भंसाली, श्रीमती सुखीदेवी, पारसमलजी मुथा, श्री संजयजी जैन, श्री फतेहचंद जी जैन, श्री अमोलकचंदजी गादिया, श्री गौतमजी कोठारी ने दीपप्रज्वलन कर किया।


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