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अच्छा बनाइए मित्र ताकि श्रेष्ठ हो चरित्र - संत ललितप्रभ

बैंगलोर

25 Jul 2017

राष्ट्र-संत महोपाध्याय ललितप्रभ सागर महाराज ने कहा कि हमारे जैसे मित्र होते हैं वैसा ही हमारा चरित्र बनता है। चरित्र को
अगर अच्छा बनाना है तो हम कुछ न करें केवल अच्छे लोगों को अपना मित्र बनाएँ हमारा चरित्र अपने आप अच्छा बन जाएगा।  जैसे पानी की एक बूँद मिट्टी में गिरे तो मिट्टी बन जाती है, गर्म लोहे पर गिरे तो भस्म हो जाती है, साँप के मुँह में गिरे तो जहर बन जाती है, केले के गर्भ में गिरे तो कपूर बन जाती है और सीप के मुँह में गिरे तो सच्चा मोती बन जाती
है ठीक वैसे ही इंसान को जैसी संगत मिलती है उसकी वैसी ही रंगत बन जाती है। अगर हमारे जीवन में कोई अच्छी आदत है तो वह किसी-न-किसी अच्छे मित्र की बदौलत है और कोई बुरी आदत है तो वह भी किसी बुरे मित्र की संगत के
कारण। उन्होंने कहा कि व्यक्ति पर माता-पिता, घरवालों से भी बढ़कर अगर किसी का प्रभाव पड़ता है तो वह उसका मित्र होता है। इसलिए व्यक्ति मित्र बहुत ही सोच-समझकर बनाए। मित्र सैकड़ों हों यह जरूरी नहीं, पर भला मित्र
तो एक भी बहुत होता है।

संत ललितप्रभ मंगलवार को मराठा हॉस्टल में परिवार सप्ताह के दूसरे दिन भल मित्र तो एक ही भला विषय पर सत्संगप्रेमियों को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि इंसान को तीन चीजें नसीब से मिलती हैं - अच्छी पत्नी, अच्छी संतान और अच्छा दोस्त। पत्नी का चयन परिवार वाले करते हैं, पुत्र का चयन भाग्य करता है, पर मित्र का चयन इंसान स्वयं करता है इसलिए पत्नी या संतान गलत निकल जाए तो इसका पूरा दोष आपको नहीं है, पर दोस्त गलत निकल जाए तो इसका जिम्मेदार व्यक्ति स्वयं होता है। अगर पत्नी या पुत्र सही नहीं निकले तो हमारा जीवन बर्बाद होगा, पर मित्र सही निकला तो सात पीढियाँ बर्बाद हो जाएगी। उन्होंने कहा कि हमारी दोस्ती सरोवर-पंछी जैसी न हो कि प्यास लगी तो पानी पिया और उड़ गए। दोस्ती मोम और धागे की तरह हो कि धागा जला तो मोम भी पिघलने लगा। हमारा दोस्त किसी ढाल जैसा हो जो सुख में तो पीछे रहे, पर दुख में हमारी रक्षा के लिए आगे आ जाए। केवल बातें करने वाले, मौज-शौक उड़ाने वाले मित्र ज्यादा काम के नहीं होते। जो सुख-दुख में साथ निभाते हैं वहीं सच्चे मित्र कहलाते हैं। विपदा में काम आने वाले होते हैं सही मित्र-संतप्रवर ने कहा कि यूँ तो
आपके सौ-दौ सौ मित्र होंगे, पर उनमें से सच्चे मित्र कितने हैं यह जानना हो तो एक दिन सबके पास जाना और कहना कि मुझे दो लाख रुपयों की तत्काल जरूरत है। अगर आपका मित्र बहाने बनाए तो समझ लेना यह केवल दिखावटी मित्र है और जो रुपये निकालकर दे दे समझ लेना वह आपका सही मित्र है। संतप्रवर ने कहा कि जब भी चार दोस्त इकठ्ठे होते हैं विशेषकर युवा दोस्त तो इधर-उधर की, उल्टी-सीधी बातें करना शुरू कर देते है। अगर आपका मित्र अकेले में भी आपको सच्चरित्रता की प्रेरणा दे, ईमानदारी की बात करे, प्रेम और मिठास से जीने की राह बताए, एक-दूसरे के काम आने का जज्बा जगाए तो समझ लेना वह आपके काम का मित्र है। उन्होंने कहा कि अगर आपका मित्र दुव्यर्सनी है तो सावधान या तो उसे दुव्र्यसन छोडने के लिए कहें या फिर उस दोस्त को ही छोड़ दें। अगर आपने उसे नहीं छोड़ा तो एक दिन वह आपको दुव्र्यसनी बनाकर छोड़ेगा और फिर आपके पैसे से खुद के शौक पूरे करने लगजाएगा।

स्वार्थी, मूर्ख एवं चापलूस मित्र से बचें-संतप्रवर ने कहा कि हमें तीनतरह के मित्रों से सदा बचकर रहना चाहिए - स्वार्थी, मूर्ख एवं चापलूस। ये अपने भले के लिए औरों को मित्र बनाते हैं और एक दिन अपने मित्र को विपदा में डालकर खुद गायब हो जाते हैं। गधे के पीछे और सांड के आगे से बचना चाहिए, पर ऐसे गलत मित्रों से चारों और बचने की जरूरत हुआ करती है। कृष्ण-सुदामा की मैत्री का भजन सुनाया-इस अवसर पर संतप्रवर ने कृष्ण-सुदामा की मित्रता का उदाहरण देते हुए जब श्अरे द्वारपालों कन्हैया कह दो दर पे सुदामा गरीब आ गया है, भटकते-भटकते न जाने कहाँ से तुम्हारे महल के करीब आ गया है... का भजन सुनाया तो श्रद्धालु झूमने लगे। समारोह में लाभार्थी परिवार श्री मेवारामजी, सूरजमलजी मालू, श्री मानमलजी अगरचंदजी लूणिया, श्री बाबुलालजी भोजाणी, श्री पुखराज जी कवाड़, श्री पीयुषजी अग्रवाल,श्री किशोरमलजी डागा, श्री पवनीबेन बाफना, श्री पारसजी पारख ने दीपप्रज्वलन कर किया।


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