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बच्चों को दीजिए कार से पहले संस्कार - संत चन्द्रप्रभ

बैंगलोर

26 Jul 2017

महान दार्शनिक संत चन्द्रप्रभ महाराज ने कहा कि हमें बच्चों को कार से पहले संस्कार देने चाहिए और कोई कार कब तक चलेगी कहा नहीं जा सकता, पर जिस घर में संस्कार की कार होती है, वहां पर बड़े बुजुर्गों का बुढ़ापा सुखमय जाता है। जो बच्चों को केवल जन्म देते हैं और भाग्य भरोसे छोड़ देते हैं वे सामान्य दर्जे के माँ-बाप होते हैं, जो बच्चों को जन्म के साथ सुविधाएँ एवं संपत्ति भी देते हैं वे मध्यम दर्जे के माँ-बाप होते हैं, पर जो बच्चों को जन्म और संपत्ति के साथ संस्कृति
और संस्कार भी दिया करते हैं वे ही उत्तम दर्जे के माँ-बाप कहलाया करते हैं। संस्कार रहेंगे तो परिवार में सदाबहार खुशियाँ रहेंगी अन्यथा खुशियों को ग्रहण लगते वक्त नहीं लगेगा। संतप्रवर ने कहा कि घर के बाहर कार है यह आपकी संपत्ति का परिणाम है, पर आपकी बहू घर की बूढ़ी दादीसा को गर्मागर्म खाना बनाकर अपने हाथों से परोस रही है यह आपके संस्कारों का
परिणाम है। संत चन्द्रप्रभ मराठा हॉस्टल मैदान में सत्संग महाकुंभ के पच्चीसवें दिन बच्चों को दीजिए कार से पहले संस्कार विषय पर जनमानस को संबोधित कर रहे थे। उन्होंन कहा कि इंसान वैसा ही बनता है जैसा उसे साहचर्य एवं संस्कार
मिलता है। गंदगी का भी अगर खाद के रूप में उपयोग किया जाए तो वह फूल में सुगंध पैदा करने का आधार बन जाती है। कोई बड़ा होकर महावीर बनेगा या हिटलर, कोई गाँधी बनेगा या गोडसे, कोई ओसामा बनेगा या ओबामा, यह उसे दिये गए संस्कारों पर निर्भर करेगा। अगर हम अपने बच्चों के मोह में अंधे धृतराष्ट बन जाएँगे तो वे दुरूशासन और दुर्योधन जैसे निकल जाएँगे और उनके संस्कारों के प्रति सावधान रहेंगे तो वे राम-कृष्ण-महावीर-बुद्ध जैसे बनजाएँगे।

ऐसा करें कि बच्चे बन जाएँ आदर्श-संतप्रवर ने अपने जीवन का यथार्थ बताते हुए कहा कि हमारे माता-पिता ने हमें बचपन में ही संत बना दिया था। इसलिए देने के नाम पर उन्होंने हमें विशेष कुछ न दिया, पर उन्होंने हमें उत्तम संस्कार दिए, अच्छे और ऊँचे लोगों से पढ़वाया परिणाम आज हम लोगों के लिए आदर्श बन पाने में सफल हुए हैं। हमारे पास न तो कोई सम्प्रदाय है, न पंथ-परम्परा है, न चेले-चपाटों की फौज है फिर भी देशभर में हमें बड़े प्रेम से पढ़ा और सुना जाता है। उन्होंने अभिभावकों से कहा कि बच्चों को कितना भी धन क्यों न देकर चले जाओ वे कभी भी आपको धन्यवाद नहीं देंगे।अगर बेटा सपूत है तो धन नहीं दोगे तो भी चल जाएगा और अगर बेटा कपूत है तो कितना भी धन दे दो कुछ नहीं बचा पाएगा। इसलिए आप अपने बच्चों को ऊँची
शिक्षा के साथ ऊँचे संस्कार दें ताकि वे न केवल अपने पाँवों पर खड़े हो सकें वरन् सबके लिए आदर्श भी बन सकें।
समृद्धि तो खूब बढ़ी, पर संस्कार घट गए-संतप्रवर ने घटते संस्कारों पर चिंता जाहिर करते हुए कहा कि पिछले पचास सालों में भारत में समृद्धि तो खूब बढ़ी, पर हमने संस्कारों पर ध्यान देना छोड़ दिया परिणाम वे घटते चले गए। अब आत्मा, परमात्मा, मोक्ष, स्वर्ग, नरक की बातें करने की, भागवत और सत्यनारायण की कथाएँ करने की जरूरत कम है संस्कारों का निर्माण करने की जरूरत ज्यादा है। संस्कारों पर ध्यान न देने की वजह से ही परिवार और रिश्ते टूटते जा रहे हैं। अगर यही स्थिति रही तो पच्चीस सालों के बाद गली-गली में वृद्धाश्रम खुल जाएँगे। उन्होंने कहा कि बड़े दुख की बात है कि व्यक्ति अपने कर्तव्यों को भूलता जा रहा है। आजकल संतों को यह कहना पड़ता है कि माँ-बाप की सेवा करो, भाई होकर भाई के काम आओ।

जीवन में लाएँ विनम्रता का संस्कार-संतप्रवर ने कहा कि जीवन में जो कुछ मिलता है वह विनम्रता से ही मिलता है। रावण के पास सब कुछ था, पर विनम्रता नहीं थी इसलिए वह लोगों के दिलों में जगह न बना पाया, पर राम के पास विनम्रता थी, सो वे भगवान बन गए। विनम्रता को जीवन में लाने के लिए संतप्रवर ने कहा कि बड़ों के सामने बैठें, न उनसे ऊपर न उनके आसन के बराबर बैठें, बड़ों के आवाज देने पर उनके पास जाकर धीमी आवाज से जवाब दें, उनके आने पर खड़े हो जाएँ और कभी उनके स्वागत-सम्मान में कमी न आने दें। वे जो आज्ञा दें उसे बिना तर्क दिए पूरा कर दें। जीवन में अनुशासन ले आएँ-संतप्रवर ने कहा कि बच्चे इसलिए कहना नहीं मानते क्योंकि हम उन्हें पहले ही माथे चढ़ा देते हैं। हम बच्चों का लाड करें, पर लाड में वे बिगड़ न जाए इसका भी ध्यान रखें। उन्हें अनुशासन में रहना सिखाएँ। अनुशासन को अंग्रेजी में कहते हैं - डिसीप्लीन जिसकी स्पेलिंग है
डि आई एस सी आई पी एल आई एन इ। अगर इन्हें डी=4, आई=9, इस तरह मार्क दिए जाए तो आता है डिसीप्लीन = 100 अर्थात् जिंदगी में अनुशासन सौ प्रतिशतसफलता पाने की नींव है।

समारोह में लाभार्थी परिवार संघवी श्री चंपालालजी प्रकाशचंदजी सिंघवी,श्री राजेन्द्रकुमारजी, संजयकुमारजी गांधी, श्री तेजराजजी गुलेच्छा, श्रीमांगीलालजी लूणिया,श्री श्रीकांतजी पाराशर, श्री गजेन्द्रजी संकलेचा,श्री सुरेन्द्रजी सुराणा, श्री शशिजी मेहता, श्रीमती जश्मिता जैन नेदीपप्रज्वलन कर किया।


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