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टूटे रिश्तों में प्रेम की सुई से साँध लगाएँ - संत ललितप्रभ प्रवचन में भाई-भाई ने लगाया एक-दूसरे को गले, माहौल बना भावनापूर्ण

बैंगलोर

27 Jul 2017

परिवार सप्ताह के चैथे दिन मराठा हॉस्टल मैदान में उमड़ा लोगों का हुजुम। रिश्तों में कैसे घोलें प्रेम और मिठास विषय पर हुआ
राष्ट्र-संत ललितप्रभ सागर महाराज का प्रवचन। परिवार की हृदयस्पर्शी घटनाओं को सुनकर श्रद्धालुओं की आँखें हुई नम। झकझोरने वाली बातें सुनकर सास-बहू, भाई-भाई, देवरानी-जेठानियों ने खड़े होकर लगाया एक-दूसरे को गले
और फिर से हिलमिलजुलकर रहने का किया वादा। संतप्रवर ने घर में नहीं, घर को ही मंदिर बनाने का दिया पैगाम।
संत ललितप्रभ गुरुवार को मराठा हॉस्टल मैदान में आयोजित प्रवचनमाला के तहत चार हजार से अधिक सत्संगप्रेमियों को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि जैसे बिना पानी का तालाब और बिना पैसे का पर्स काम का नहीं होता
ठीक वैसे ही बिना प्रेम का परिवार होता है। अगर हम अपने सातों वारों को आनंददायी बनाना चाहते हैं तो पहले आठवें वार परिवार को प्रेम और मिठास से भरें। उन्होंने कहा कि पहले पाँच भाई छोटे घरों में भी जैसे-तैसे साथ रहना चाहते थे क्योंकि उनके दिल बड़े थे, आज दो भाई भी जैसे-तैसे अलग होना चाहते हैं क्योंकि मकान तो बड़े हो गए, पर लोगों के दिल बहुत छोटे हो गए।
पहले एक माँ-बाप पाँच बेटों को पाल-पोषकर बड़ा कर लेते थे और आज पाँच बेटे मिलकर भी एक माँ-बाप का पालन-पोषण कर नहीं पा रहे हैं। अब हम छोटा परिवार सुखी परिवार की बजाय प्रेम भरा परिवार सुखी परिवार का नारा अपनाएँ।

माँ-बाप की सेवा सबसे पहले-संतप्रवर ने कहा कि माँ-बाप का रिश्ता दुनिया का सबसे बड़ा रिश्ता है क्योंकि वह रिश्ता जन्म से नौ माह पहले ही शुरू हो जाता है। माँ-बाप तो भगवान से भी बड़े दाता है जिन्होंने नख से लेकर शिख तक हमें सब कुछ दिया है। इसलिए एक बार भाग्य या भगवान भी हमसे रूठ जाए तो कोई दिक्कत नहीं, पर माँ-बाप हमसे रूठने नहीं चाहिए। संतप्रवर ने कहा कि वे लोग किस्मत वाले होते हैं जिनके सिर पर माँ-बाप का साया होता है। याद रखें, माता-पिता उस बूढ़े पेड़ की तरह होते हैं जो फल भले ही न दे, पर छाया जरूर देते हैं। कहते हैं, बच्चा जब पैदा होता है तो माँ को उतना दर्द होता है जितना दर्द एक साथ बीस हड्डियों के टूटने पर हुआ करता है। जिन्होंने दर्द सहकर हमें जन्म दिया हम संकल्प लें कि हम उन्हें कभी दर्दनहीं देंगे। अगर हमारे कारण उनकी आँखों में आँसू आ गए तो इससे बड़ा और कोई पाप नहीं होगा। पति को श्रवणकुमार बनाएँ-संतप्रवर ने महिलाओं से कहा कि अगर वे श्रवणकुमार की माँ बनना चाहती है तो कुछ न करें बस अपने पति को
श्रवणकुमार बना दें। आखिर दुनिया में वही लौटकर आता है जैसा हम दूसरों को दिया करते हैं। उन्होंने युवाओं से कहा कि महीने में कुछ दिन अपनी बूढ़ी माँ या दादी के पास सोने की भी आदत डालें। रात को आपके कुछ हो जाए तो संभालने के लिए पत्नी है और पत्नी के कुछ हो जाए तो संभालने के लिए आप हैं, पर बूढ़ी माँ-दादी के रात को कुछ हो जाए तो...? उन्होंने कहा कि हो
सके तो माँ-बाप की किसी बात को न काटें। अपने मन की करने के लिए तो पूरी जिंदगी पड़ी है, पर माँ-बाप कोई हमेशा थोड़े ही रहने वाले हैं।

अगर थोड़ाउनके मन मुआफिक करने से उन्हें खुशी मिल जाए तो इससे बढ़कर हमारा और क्या सौभाग्य होगा। उन्होंने कहा कि श्रवणकुमार ने तो माँ-बाप को कावड़ में बिठाकर कंधे पर उठाकर उनकी तीर्थयात्रा की मनोइच्छा पूरी की थी, हम
कम-से-कम घर पर तो उनकी सेवा संभाल ही सकते हैं। जॉब के नाम पर माँ-बाप को अकेले न छोड़ें-संतप्रवर ने युवाओं की आत्मा को झकझोरते हुए कहा कि जिन माँ-बाप ने कष्ट उठाकर हमारा भविष्य बनाया हम जॉब के नाम पर उन्हें अकेले छोड़कर कहीं उनका भविष्य तो नहीं बिगाड़ रहे हैं। आपको अपनी पत्नी को अपने साथ परदेश या विदेश ले जाना याद रहता है, पर
माँ-बाप को साथ ले जाना क्यों याद नहीं रहता। जैसे आपने उनको भगवान भरोसे छोड़ दिया है सोचो बचपन में उन्होंने भी आपको भगवान भरोसे छोड़ दिया होता तो आप किसी की दया पर जीवन काट रहे होते। जब हमने पहली साँस ली तब वे
हमारे पास थे, हम इतना पुण्य जरूर कमाएँ कि जब वे अंतिम साँस ले तो हम उनके पास हों। याद रखें, बेटा वो नहीं होता जिसे माँ-बाप जन्म देते हैं, असली बेटा वो होता है जो बुढ़ापे में माँ-बाप की सेवा-सुश्रुषा संभालता है।

समारोह में लाभार्थी परिवार श्री निर्भयलालजी, लालचंदजी गुलेच्छा, श्री बाबुलालजी, प्रकाशजी भंसाली, श्रीमती आरती जैन, श्री ललित डाकलिया, श्रीआशोक भाई शाह ने दीपप्रज्वलन कर किया।


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