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बुढ़ापे का आह! नहीं, वाह! बनाकर जिएँ - संत ललितप्रभ रविवार को होगा सोचो अगर माँ न होती का ऐतिहासिक प्रवचन

बैंगलोर

29 Jul 2017

राष्ट्र-संत महोपाध्याय ललितप्रभ सागर महाराज ने कहाकि हम बुढ़ापे को भार नहीं भाग्य समझें। बुढ़ापे को आह! भरा बनाने की बजाय वाह! भरा बनाएँ। बचपन ज्ञानार्जन के लिए, जवानी धनार्जन के लिए और बुढ़ापा पुण्यार्जन के लिए है। बचपन में व्यक्ति माँ की अंगुली थामे,यौवन में पत्नी का हाथ थामे, पर बुढ़ापे में परमात्मा की शरण स्वीकार करे। जो लोग बुढ़ापे में भोग की बजाय योग का, लाभ की बजाय भला का और अर्जन की बजाय विसर्जन का मार्ग अपनाते हैं उसका जीवन सत्यम् शिवम् सुंदरम् सरीखा बन जाता है।

संत ललितप्रभ शनिवार को मराठा हॉस्टल मैदान में परिवार सप्ताह के छठे दिन कैसे जिएँ सुखी और स्वस्थ बुढ़ापा विषय पर सत्संगप्रेमियों को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि दुनिया में कोई बूढ़ा होना नहीं चाहता, पर लंबी उम्र पाने पाने हर व्यक्ति को बुढ़ापे का सामना करना पड़ता है। अब यह हम पर निर्भर है कि हम इसे विषाद बनाएँ या प्रभु का प्रसाद। उन्होंने कहा कि जब
आप 21 साल के हुए थे तो शादी की तैयारी की थी वैसे ही जब 61 साल के हो जाएँ तो शांति की तैयारी करना शुरू कर दे। व्यक्ति ब्रह्मचर्य और गृहस्थ आश्रम तो नियत उम्र के अनुसार जीता है, पर जब वानप्रस्थ और संन्यास आश्रम की उम्र आती है तो घर-गृहस्थी का मोह छोड़ नहीं पाता और दुनियादारी में फँसा रहता है परिणाम शेष जीवन दुखदायी बन जाता है। संतप्रवर ने जिंदगी का गणित समझाते हुए कहा कि हम सोमवार को जन्मे, मंगलवार को बड़े हुए, बुधवार को विद्यालय गए, गुरुवार को शादी की, शुक्रवार को बूढ़े हुए, शनिवार को बीमार पड़े और रविवार को मर गए। सात दिनों की यह छोटी-सी जिंदगी है फिर
क्यों न हम संसार में उलझने की बजाय अनासक्त भाव से जीवन जिएँ। घर में बूढ़े-बुजुर्गों का होना सौभाग्य-युवाओं की आत्मा को झकझोरते हुए  संतप्रवर ने कहा कि वे लोग तकदीर वाले होते हैं जिनके घर में बूढ़े-बुजुर्गों का साया होता है। जिस दिन वे चले जाते हैं घर अनाथ हो जाता है। आपसे धर्म-कर्म हो तो ठीक अन्यथा कोई दिक्कत नहीं, पर माता-पिता की सेवा में कभी कोई कमी मत छोडना। किसी लायंस क्लब, रोटरी क्लब, सोश्यल गु्रप के सदस्य बनकर शहर की सेवा करना सरल है, पर अपने घर में रहने वाले बूढ़े-बुजुर्गों की सेवा करना मुश्किल है। संस्थाओं के सदस्य बनने की बजाय पहले घर के सदस्य बनें और घरवालों की सेवा संभालें। उदाहरण देते हुए संतप्रवर ने समझाया कि आपके पास एक घंटा हो, उसमें एक तरफ मंदिर जाकर परमात्मा की पूजा करनी हो और दूसरी ओर घर में बीमार दादीजी की सेवा करनी हो तो आप खुद सोचें आपका पहला धर्म कौनसा है? एक तरफ सड़क पर बैठी महिला, दूसरी तरफ वृद्धाश्रम में बैठी महिला, तीसरी तरफ अस्पताल में बीमार महिला और चैथी तरफ घर में बीमार महिला हो तो आप खुद सोचें कि सेवा की शुरुआत कहाँ से की जानी चाहिए। संतप्रवर ने महिलाओं से कहा कि जो अपने पति का कहना मानती है वह पत्नी कहलाती है, पर जो अपने सास-ससुर का कहना मानती है वह घर की महालक्ष्मी होती है। आप किसी की पत्नी बाद में बनिए हो सके तो पहले महालक्ष्मी बनिए। माता-पिता की सेवा से मिलते हैं भगवान-संतप्रवर ने कहा कि जब भगवान को प्रणाम करवाना होता है तो वह मंदिर में जाकर बैठता है, पर जब उसे प्रणाम का परिणाम देना होता है तो हमारे घर में माता-पिता के रूप में अवतार लिया करता है। इसलिए मंदिर बाद में जाएँ, संतों की सेवा बाद में करें, पहले
अपने माता-पिता को संभालें। याद रखें, भगवान की सेवा से माता-पिता मिले या न मिले, पर माता-पिता की सेवा से भगवान जरूर मिलते हैं। उन्होंने कहा कि कभी पत्नी ने तलाक ले लिया और आपके एक्सीडेंट हो गया तो वह बिल्कु ल
नहीं आएगी, पर आप माँ-बाप से अलग भी क्यों न हो गए हों, बोलचाल भी नहीं रखते फिर भी आपके कभी एक्सीडेंट हो गया तो वे आपको संभालने जरूर आ जाएँगे। हम खुद सोचें कि हमारे लिए पहले महत्त्वपूर्ण कौन हैं? संतप्रवर ने बेटे-बहुओं को इस बात के लिए सावधान किया कि अगर आपने अपने बूढ़े सास-ससुर, दादा-दादी को दुख पहुँचाया, सताया, उनकी सही ढंग से सेवा न की तो सावधान! एक दिन जब आप बूढ़े हो जाएँगे ये कर्म दस गुने होकर लौटेंगे और आपको भी अपने कर्मों का फल भोगना पड़ेगा। याद रखें, जो मछलियाँ तालाब के कीड़ों को खाकर जिंदा रहती है एक दिन उसी तालाब का पानी सूखता है, मछलियाँ
मरती है और कीड़े वापस उन मछलियों को खाना शुरू कर देते हैं। बुढ़ापे को बनाएँ स्वस्थ, सुरक्षित एवं सक्रिय-संतप्रवर ने बुजुर्गों को प्रेरणा दी कि वे अपने बुढ़ापे को स्वस्थ, सुरक्षित एवं सक्रिय बनाएँ। स्वस्थ बुढ़ापे के लिए खानपान पर संयम रखें। जवानी में हर चीज पच जाती है, बुढ़ापे में बीमारी का कारण बन जाती है। सुबह-सुबह टहलने अवश्य जाएँ, छरू माह में एक बार शरीर की जाँच करवाएँ। सक्रिय बुढ़ापे के लिए घर के छोटे-काम खुद करने की आदत डालें और प्रतिदिन कुछ समय हल्के-फुल्के योगासन, यौगिक क्रियाएँ कर लें। सुरक्षित बुढ़ापे के  लिए सारी संपत्ति बेटे-बेटियों के नाम न करें। एक हिस्सा खुद व पत्नी के नाम रखें और मरने के बाद वह मानवता के काम आए ऐसी व्यवस्था करके जाएँ। इससे पूर्व संतप्रवर ने श्जो बोएगा वही पाएगा, तेरा किया आगे आएगा। सुख दुख है क्या, फल कर्मों का। जीवन है पानी की बूँद...्य भजन सुनाया तो श्रद्धालु आत्मविभोर
हो उठे।

दिव्य सत्संग की शुरुआत लाभार्थी परिवार श्री अशोककुमारजी, अंकितकुमारजीचैधरी, श्री सज्जनराजजी, प्रवीणकुमारजी, बागरेचा, श्री लॉयन्स प्रांतपाल सुखराजजी मेहता, श्री कांतिलालजी जगावत, श्री लक्ष्मणभाई पटेल, श्री
सम्पतराजजी पारख ने दीपप्रज्वलन कर किया।


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