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माँ के चरणों में छिपा है स्वर्ग-सा सुकून - संत चन्द्रप्रभ

बैंगलोर

30 Jul 2017

रविवार का दिन बैंगलोर शहर के लिए ऐतिहासिक अवसर बनगया जब महान दार्र्शनिक राष्ट्र-संत चन्द्रप्रभ महाराज के अंतर्राष्ट्रीयस्तर पर चर्चित प्रवचन सोचो अगर माँ न होती...को सुनने के लिए फूलों की नगरी मराठा हॉस्टल मैदान में उमड़ पड़ी। प्रवचन सुनते-सुनते ऐसा लगा मानो पूरा शहर माँ की ममतामय हो गया हो। जनसैलाब इतना उमड़ा कि मैदान भी छोटा
नजर आया। लोगों को मंच पर बिठाना पड़ा। बैठने की जगह न मिली तो सैकड़ों लोगों ने बाहर पार्किंग की जगह पर खड़े होकर माँ की ममता को सुनने का आनंद लिया। माँ के चरणों की धूलि को सिर पर धारण कर जब संतप्रवर ने माँ की
ममता व खुद के जीवन से जुड़े जीवंत घटना प्रसंगों का जिक्र किया तो संतों के साथ हर सत्संगप्रेमी सुबक-सुबक कर रो पड़े। इस अवसर पर जब संतश्री ने ओ माँ... ओ माँ... तू कितनी सुंदर है तू कितनी शीतल है तू प्यारी प्यारी
है, प्यारी माँ मुझको तेरी दुआ चाहिए, तेरे आँचल की ठंडी हवा चाहिए, माँ मुझे तू अपने आँचल में छिपा ले, गले से लगा ले कि और मेरा कोई नहीं जैसे भजन गुनगुनाए तो श्रद्धालुओं की आँखें माता-पिता के प्यार और सम्मान में तर-ब-तर हो गई। जब हजारों-हजार लोगों ने एक साथ घुटनों के बल पर बैठकर माता-पिता को पंचांग प्रणाम किया तो यह दृश्य  बैंगलोर के लिए अनूठा इतिहास बन गया। संत चन्द्रप्रभ रविवार को परिवार सप्ताह के अंतिम दिन सोचो, अगर माँ नहीं होती... विषय पर हजारों भाई-बहिनों को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि माँ के एक शब्द में पूरी दुनिया के शब्द समाहित है। माँ में गीता भी
है कुरआन भी, राम भी है और रहमान भी। स्वर्ग भले ही आसमान में होगा, पर उसका सुकून तो माँ के चरणों में ही समाया है। उन्होंने कहा कि माँ से बढ़कर न तो कोई मजहब न कोई शास्त्र। माँ बिना जीवन वैसे ही सूना है जैसे बिना माली का बगीचा और बिना माँझी की नाव। हमारे लिए ईश्वर तुल्य अगर कोई है तो माँ-बाप है। हमने माँ-बाप के रूप में ईश्वर के दर्शन किए और अपना पूरा जीवन उनकी सेवा के लिए समर्पित कर दिया। जिस व्यक्ति के दिन की शुरुआत माता-पिता को प्रणाम करने से और दिन का समापन माता-पिता के चरणों की सेवा से होता है वह किसी संत की तरह आदरणीय बन जाता है।
जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी श्रेष्ठ-संतश्री ने कहा कि जननी और जन्मभूमि की महिमा स्वर्ग से भी ज्यादा है। जिस धरती पर जन्म लेने मात्र से हम उसके ऋणी हो जाते हैं सोचो जिसने हमें जन्म दिया है उसका हम पर कितना ऋण होता होगा? मातृभूमि पर तो शहीद होने वाले हजारों-हजार हैं, पर माँ पर फिदा होने वाला श्रवणकुमार तो कोई-कोई सा होता है। जो माँ का न हो पाया वह भला भारत माँ का क्या हो पाएगा? आज राम और महावीर बनने से पहले जरूरत श्रवणकुमार बनने की है। हमें गर्व है कि हम उस माता-पिता की संतान हैं जिन्होंने संन्यास धारण किया और हम वो संतानें हैं जिन्होंने
माता-पिता की सेवा के लिए संन्यास लिया। महावीर और महादेव से जैसी है माँ-माँ की महावीर और महादेव से तुलना करते
हुए संतप्रवर ने कहा कि अगर मेरे सामने एक तरफ महावीर, महादेव, मोहम्मद हो और दूसरी तरफ माँ-बाप हो तो माता-पिता को भी उतने ही सम्माने से प्रणाम करना पसंद करूंगा क्योंकि माँ के म में महावीर, महादेव, मोहम्मद तीनों छिपे हैं तो माँ के अ में अल्लाह, आदि बह्मा और आदिनाथ समाए हुए हैं। आप माँ की वंदना कीजिए, सारे महापुरुषों की वंदना अपने आप हो जाएगी।

उन्होंने कहा कि निश्चित ही तीर्थंकर बड़े होते हैं, पर दुनिया का कोई भी तीर्थंकर माँ से बड़ा नहीं हो सकता। चाहे अवतार हो या पैगम्बर, सिकन्दर हो या सम्राट, दुनिया में ऐसा कौन होगा जो माँ के दूध का कर्जदार न बना होगा। परमात्मा से पहले करें माँ की पूजा-संतश्री ने कहा कि व्यक्ति महावीर की पूजा करता है, पर माँ की पूजा करना भूल जाता है। महादेव का तो रुद्राभिषेक करता है, सुबह-शाम दूध चढ़ाता है, पर क्या माँ को कभी अपने हाथों से दूध पिलाता है? जो माँ-बाप की सेवा नहीं करता उसके द्वारा किए गए सारे धर्म-कर्म व्यर्थ है। धर्म की शुरुआत माता-पिता के प्रति रहने वाले दायित्वों को निभाने से होती है। जिनसे माँ-बाप को सुख पहुँचे वही हमारा पहला धर्म और कर्तव्य है। उन्होंने कहा कि माँ के हम पर कितने उपकार है यह देखना हो तो एक बार अपनी पत्नी को देख लो जिसने किस तरह आपके बच्चे को कष्ट सहकर पालपोसकर बड़ा किया ठीक वैसे ही आपकी माँ ने आपको जन्म दिया और बड़ा किया। सोचो जैसे आज हमने उन्हें भाग्यभरोसे छोड़ दिया है अगर उन्होंने भी जन्म देते ही हमें भाग्यभरोसे छोड़ दिया होता तो हम किसी यतीमखाने या किसी की दया तले आज जी रहे होते। उन्होंने तो अपनाफर्निभादिया, अब हम अपना फर्ज निभाएँ और उनके ऋणों को इसी जन्म में उतारें।

ऐसे उतारें माँ-बाप के ऋण-माँ-बाप के ऋण उतारने की प्रेरणा देते हुएसंतश्री ने कहा कि जैसे पत्नी और बच्चों को हम हर माह हाथखर्ची देते हैं वैसे ही अपनी कमाई का एक हिस्सा बिना माँगे माता-पिता को समर्पित करें। मोबाइल की स्क्रीन पर माँ-बाप का फोटू रखें। सुबह उठते ही उन्हें पंचांग प्रणाम करें। जो माता-पिता को प्रतिदिन प्रणाम करता है उसके ग्रह-गोचर सदा अनुकूल रहते हैं। सप्ताह में एक दिन घर के सभी लोग मम्मी-पापा के साथ खाना खाएँ और अपने हाथों से उन्हें रोटी चूरकर खिलाएँ। साल में एक बार उन्हें तीर्थयात्रा के लिए ले जाएँ और जिनके माता-पिता ऊपर चले गए हैं वे उनकी संपत्ति का ढाई प्रतिशत निकाल कर सत्कर्म में लगाएँ। दिव्य सत्संग की शुरुआत लाभार्थी परिवार श्री घेवरचंदजी, कुशलराजजी, सफलकुमारजी साकरिया, रमणलालजी, रणजीत जी साकरिया, ने दीपप्रज्वलन कर किया।


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