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सुख से जीना और औरों को सुख देना है धर्म - ललितप्रभ नवकार-मंत्र से कैसे पाएँ सुख, शांति, समृद्धि पर विशेष प्रवचन कल

बैंगलोर

31 Jul 2017

महोपाध्याय ललितप्रभ महाराज ने कहा कि धर्म दीवार नहीं द्वार है। धर्म के नाम पर मानव जाति को तोडना पाप है। धर्म का का जन्म इंसानियत को जोडने के लिए हुआ है, तोडने के लिए नहीं। धर्म का संबंध केवल मंदिर, मस्जिद, सामायिक, पूजा-पाठ से नहीं, जीवन से है। जो चित्त को निर्मल और कषायों को कमकर जीवन को पवित्र करे वही सच्चा धर्म है। व्यक्ति खुद भी सुख से जिए और औरों के लिए भी सुख से जीने की व्यवस्था करे इसी में धर्म का सार छिपा हुआ है। उन्होंने कहा कि जो क्रोध के वातावरण में भी शांत रहता है, लोभ का निमित्त मिलने पर भी संतोष रखता है, अहंकार की बजाय सरलता दिखाता है और वासना के माहौल में भी संयम को बरकरार रखता है वही सच्चा धार्मिक कहलाता है। संत ललितप्रभ मराठा हॉस्टल मैदान में प्रवचनमाला के तीसवें दिन धर्म सप्ताह के नये युग में धर्म का प्रेक्टिकल स्वरूप विषय पर जनता को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि धर्म पगड़ी नहीं कि जब चाहे पहन लिया और उतार लिया, धर्म कोई दमड़ी नहीं कि जब चाहे खरीद लिया, धर्म तो चमड़ी है जो व्यक्ति की अंतिम सांस तक साथ रहता है। धर्म की चर्चा करने वालों से संतश्री ने कहा कि धर्म चर्चा का नहीं चर्या का विषय है।

राम, कृष्ण, महावीर, मौहम्मद कौन थे, कहाँ पैदा हुए थे, इनको जानने से कुछ नहीं मिलेगा। अगर जानना ही है तो यह जानो कि इनके जैसा कैसे बना जा सकता है। कत्र्तव्यों का पालन करें रू संतश्री ने कहा कि पानी का धर्म है शीतलता और आग का धर्म है उष्णता। व्यक्ति सोचे कि उसका आखिर धर्म क्या है? कत्र्तव्य-पालन को पहला धर्म बताते हुए संतप्रवर ने कहा कि एक तरफ मंदिर में पूजा करनी हो दूसरी ओर घर में बीमार सासू माँ की सेवा करनी हो, एक ओर पांच लाख का चढ़ावा बोलना हो दूसरी ओर गरीब भाई की मदद करनी हो तो व्यक्ति खुद सोचे कि उसका पहला दायित्व क्या है? स्थानक में सामायिक करना धर्म है, पर घर में बहू से गलती हो जाने पर माफ कर देना उससे भी बड़ा धर्म है। उन्होंने युवाओं से कहा कि वे महिने में एक दिन माँ के पास भी सोने की आदत डालें ताकि पता चल सके कि उन्हें रात को कोई तकलीफ तो नहीं होती है। अगर आपके रहते बड़े-बुजुर्गों को कोई दिक्कत है तो आपका जीना ही व्यर्थ है। जो माता-पिता, सास-ससुर का कभी दिल नहीं दुरूखाता और सोने से पहले
उसकी दो मिनट सेवा करता है उसे बिना कुछ किए सारे तीर्थों की यात्रा का पुण्यफल मिल जाता है।

मनोविकारों पर विजय पाएं रू संतप्रवर ने कहा कि इंसान का दूसरा धर्म है भीतर पलने वाले विकारों पर विजय पाना। इंसान आकृति से ही नहीं, प्रकृति से भी इंसान बने। कमजोर और काले मन वाले कभी सच्चे धार्मिक नहीं बनते। उन्होंने कहा कि भारत के लोग बहुत ईमानदार हैं, पर तभी तक जब तक बेईमानी का मौका नहीं मिलता। व्यक्ति केवल सीता की मूर्ति में ही सीता को न देखे, वरन् सड़क चलती नारी में भी सीता माँ के दर्शन का सौभाग्य ले। इंसान होकर इंसान के काम आएं रू संतप्रवर ने कहा कि इंसान का तीसरा धर्म है रू इंसान होकर इंसान के काम आना। व्यक्ति धन को केवल कमाए ही नहीं वरन् लगाए भी। लाभ के साथ भला भी करे। दिन की शुरुआत दान से हो। पुरुष लोग प्रतिदिन दस रुपये निकाले और महिलाएं दो मुट्ठी आटा। इससे हमारे तो कोई फर्क नहीं पड़ेगा, पर जिसको सहायता मिलेगी उसके बहुत फर्क पड़ जाएगा। इसलिए हर व्यक्ति रात को सोने से पहले जरूर सोचे कि उसके द्वारा दिन भर कोई सत्कर्म हुआ या नहीं। अगर हुआ तो कल फिर करूँगा और नहीं हुआ तो कल
जरूर करूँगा का संकल्प लें।

दिव्य सत्संग की शुरुआत लाभार्थी परिवार श्रीमती बख्तावरीबाई, देवराजजी चैहान, हेमराजजी, मनुभाई पालगोता, राजेशजी मानव, अशोकजी लोढ़ा, डॉ. उत्तमचंद गोठी, बाबुलालजी भंसाली श्रीमती विजयलक्ष्मी कोठारी नेदीपप्रज्वलन कर किया।


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