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समाचार दान का संस्कार हमें बनाएगा धनवान - संत चन्द्रप्रभ बैंगलोर की मानवसेवी संस्थाओं के सहयोग के लिए एक मिनट में हुए पाँच लाख रुपये इकठ्ठे

बैंगलोर

03 Aug 2017

महान दार्शनिक संत चन्द्रप्रभ महाराज ने कहा कि हाथ से फैंका गया पत्थर पचास फुट दूर जाता है, बंदूक से चलाई गई गोली पाँच सौ फुट दूर जाती है, तोप से छोड़ा गया गोला पाँच हजार फुट दूर जाता है, लेकिन भूखे को खिलाई गई रोटी ठेठ स्वर्ग तक जाया करती है। जो भूखों को भोजन खिलाता है और प्यासों को पानी पिलाता है उसके नवग्रह कभी विपरीत नहीं
होते। उन्होंने कहा कि महर्षि दधिची ने देवताओं की रक्षा के लिए अस्थियों का दान तक कर दिया, राजा बलि ने कबूतर की रक्षा के लिए जंघा का मांस तक दान कर दिया, राजा कर्ण ने द्वार पर आए याचक को जीवनरक्षक कवच और कुंडलों तक का दान कर दिया और महावीर ने शरीर पर रखा उत्तरीय वस्त्र तक का दान कर दिया तो क्या हम उनके अनुयायी किसी भूखे को चार रोटियों का दान तक नहीं कर सकते हैं। याद रखें, खाया पीया अंग लगेगा, दान दिया संग चलेगा और बाकी बचा जंग लगेगा। जो अपने लिए किया जाए वह कर्म है, पर जो औरों के लिए किया जाए वह धर्म है।

संत चन्द्रप्रभ श्री जिन कुशलसूरि जैन दादावाड़ी द्वारा मराठा हॉस्टल मैदान में आयोजित सत्संग महाकुंभ के तेतीसवें दिन कैसा दें दान जो बनाए हमें धनवान विषय पर जनमानस को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि दुनिया में दो धर्म सबसे श्रेष्ठ है - ईश्वर से प्रेम और इंसानों की सेवा। जिनका इस दुनिया में कोई नहीं है उनके काम आना यही इंसान का पहला और आखिरी धर्म है। जो इंसानों से प्यार न कर पाया वह भला परमात्मा से क्या प्यार कर पाएगा। उन्होंने कहा कि ईश्वर उन्हीं लोगों के करीब होता है जो लोग इंसानों की भलाई के काम किया करते हैं। अगर किसी सुखी आदमी को देखकर हम खुश होते हैं और किसी दुखी आदमी को देखकर दुखी होते हैं तो समझना हमारा इंसान के रूप में जन्म लेना सार्थक हुआ है। मनुष्य का एक ही धर्म रू दूसरों की मदद करना-संतप्रवर ने कहा कि मनुष्य का एक ही धर्म है दूसरों की मदद करना। हम दूसरों का भला करने में सदा आगे रहें। किसी नेत्रहीन को चैराहा पार करवाना हो, किसी घायल को हॉस्पिटल पहुँचाना हो, अपंग को बैठने के लिए जगह देनी हो, किसी बुजुर्ग को उनके घर पहुँचाना हो, बिछुड़े हुए बच्चे को माँ-बाप से मिलवाना हो, गरीब को दवाई दिलवानी हो, किसी कोढ़ी के घाव धोना हो तो हम संकल्प लें कि पीठ दिखाने की बजाय उनकी सहायता करेंगे। ऐसा करके आपको न केवल इंसान की सेवा का वरन् ईश्वर की पूजा का भी लाभ मिल जाएगा।

गृहस्थ का धर्म है दान और पूजा - संतप्रवर ने कहा कि संत के दो धर्म है ज्ञान और ध्यान और गृहस्थ के दो धर्म है दान और पूजा। उन्होंने कहा कि इंसान केवल मेहनत और बुद्धि से आगे नहीं बढ़ता। मेहनत करने वाला मजदूर चार सौ रुपये कमाता है तो बुद्धि रखने वाला इंजिनियर चार हजार रुपये, पर कोई अगर प्रतिदिन लाखों रुपये कमा रहा है तो इसका मतलब उसकी पुण्याई प्रबल है। पुण्याई दान देने से बढ़ती है। प्रकृति में हर चीज लौटकर आती है। जो मानवता के नाम दस रुपये लगाता है भगवान उसे हजार गुना करके लौटाता है। उन्होंने कहा कि हर व्यक्ति जीवन में दान देने की आदत डाले। चाहे थोड़ा ही
दो, पर रोज दो। जो करना है अपने हाथों से करके जाना। कल का कोई भरोसा नहीं है और हमारे पीछे हमारे नाम पर दान-पुण्य होगा इस बात पर भी भरोसा मत करना। उन्होंने कहा कि लक्ष्मी और सरस्वती की कृपा सदा वहाँ बरसती है जहाँ इनका सदूपयोग होता है। इस दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं कुछ खाकर खुश होते हैं तो कुछ खिलाकर। जो खाकर खुश होते हैं वे सदा औरों पर आश्रित रहते हैं, पर जो खिलाकर खुश होते हैं उनके भंडार प्रभु-कृपा से सदा भरे हुए रहते हैं। वस्त्रदान और औषधि दान करें-महिलाओं को वस्त्रदान करने की प्रेरणा देते हुए संतप्रवर ने कहा कि जब भी नई साड़ी खरीदें पहले एक पुरानी साड़ी का दान कर दें। इससे परिग्रह भी नहीं बढ़ेगा, गरीबों की सेवा भी होगी और नई साड़ी भी आ जाएगी। संतप्रवर ने कहा कि अगर कोई गरीब या जरूरतमंद बीमार दिख जाए तो उसे औषधि दान दें। अगर किन्हीं लोगों या सामाजिक संस्थाओं के पास अतिरिक्त जमीन हो तो वे भूदान करें। अपने जरूरतमंद भाइयों को मकान बनाकर दें। जीते जी एक बार रक्तदान और मरने के बाद नेत्रदान करें। अन्नदान,वस्त्रदान, औषधिदान, ज्ञानदान, भूदान, रक्तदान, नेत्रदान देकर न केवलईश्वर आप पर सदा मेहरबान रहेगा वरन् आप मानवता के ऋण से भी मुक्त होजाएँगे।

श्रद्धालुओं ने लिया प्रतिदिन दान देने का संकल्प-प्रवचन से प्रभावित होकर हजारों श्रद्धालुओं ने खड़े होकर एवं हाथ जोड़कर प्रतिदिन कोई न कोई दान देने का संकल्प लिया। जब संतप्रवर ने शहर की गौशाला एवं मानव सेवाभावी संस्थाओं का सहयोग करने की प्रेरणा दी और कहा - हर व्यक्ति अपनी ओर से बैंगलोर की गौशाला एवं सेवाभावी संस्थाओं को सहयोग करने के लिए
अपनी इच्छानुसार एक नोट समर्पित करें, संतप्रवर की प्रेरणा से सभी श्रद्धालुओं ने एक-एक नोट डाला और मात्र एक मिनट में पाँच लाख रुपये इकठ्ठे हो गए। दिव्य सत्संग का शुभारम्भ लाभार्थी परिवार संघवी श्री कुशलराजजी, उत्तमचंदजी, ललितकुमार गुलेच्छा, रायचंदजी, चैनराजजी, निर्मलकुमारजी छाजेड़, मफतलालजी पालरेचा, पवनजी संकलेचा, श्रीमती कान्ता फोफलिया ने
दीपप्रज्वलन कर किया।


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