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संकट की वेला का अंतिम शस्त्र है प्रार्थना: ललितप्रभ सामाजिक एकता विशेष प्रवचन शनिवार को

बैंगलोर

04 Aug 2017

राष्ड्ढट्रसंत महोपाध्याय ललितप्रभ सागर महाराज ने कहा कि संकट की वेला का अंतिम शस्त्र है प्रार्थना। ईष्ट की प्राप्ति और
अनिष्ट के निवारण के लिए प्रार्थना रामबाण औषधि है। प्रार्थना और कुछ नहीं हृदय से उठने वाली पुकार का नाम है। जब भी हृदय से पुकार उठती है वहां प्रभु अवश्यमेव साकार होते हैं। उन्होंने कहा कि गाती तो लता भी है और मीरां भी, पर एक कंठ से गाती है और दूसरी हृदय से। इसीलिए लता को पुरस्कार मिलता है और मीरां को परमात्मा। अगर भीतर में भक्ति की तरंग जग
जाए तो मीरां के द्वार पर मोहन, राजुल के द्वार पर नेमी, राधा के द्वार पर कृष्ण और चंदनबाला के द्वार पर महावीर खुद चलकर आ जाते हैं। संत ललितप्रभ मराठा हॉस्टल मैदान में प्रवचनमाला के चैतिसवें दिन परमात्मा तक कैसे पहुँचाएँ अपनी प्रार्थना विषय पर जनमानस को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि विद्यार्थी को परीक्षा के समय, नौकर को नौकरी
छुटते समय, अमीर को बीमारी के समय, पापी को मौत के समय और नेता को चुनाव के समय भगवान की याद आती है। इस तरह इंसान भगवान को याद तो करता है पर सुख के समय नहीं जब वह दुरूख में होता है। अगर इंसान सुख में भगवान का
स्मरण करना शुरू कर दे तो उसके जीवन में दुरूख आने की नौबत ही न आये। उन्होंने कहा कि अगर हम अपनी चिंता बार-बार दूसरों को बताएंगे तो वे उकता जाएंगे पर भगवान हमारी चिंता को सुन कर कभी नहीं उकतेगा साथ ही हमारी
चिंता को हमेशा के लिए दूर कर देगा। भोग से नहीं भावना से प्रकट होते हैं प्रभु रू संत प्रवर ने कहा कि भगवान भोग और पैसे के नहीं भावना और पुकार के प्यासे होते हैं। जब व्यक्ति के अंतरमन से प्रभु को पाने की भावना प्रकट होती है तो प्रभु स्वतरू प्रकट
होते हैं। अगर हमारी जिंदगी प्रभु चरणों में समर्पित हो जाए तो जहर को भी अमृत बनते देर नहीं लगती। उन्होंने कहा कि अगर कभी हमारा कोई परिचित बीमार पड़ जाए तो दुरूखी होने की बजाय एकांत में जाकर प्रभु से अपने दिल के तार जोड़े और बीमारी को दूर करने की प्रार्थना करें। जो काम दवा और डॉक्टर नहीं कर पाएंगे वह काम आप द्वारा की गई कुछ समय की प्रार्थना कर
देगी। प्राणी मात्र में भगवान को देखने की प्रेरणा देते हुए संतप्रवर ने कहा कि मूर्ति में भगवान को देखना सामान्य बात है पर प्राणी मात्र में भगवान को देखना भक्ति की पराकाष्ठा है। सच्चा भक्त वही होता है जो हर प्राणी में न केवल भगवान को देखता है वरन् भगवान तुल्य व्यवहार किया करता है। जो किसी से झूठ नहीं बोलता, किसी का दिल नहीं दुखाता, औरों को बुरी नजर से नहीं देखता और किसी के साथ धोखा नहीं करता वही भगवान का सच्चा भक्त होता है।

भक्ति महोत्सव में झूमे श्रद्धालु रू सत्संग के दौरान जब संत प्रवर ने एक ओर श्तारा है सारा जमाना प्रभु हमको भी तारो... जैसे भजन सुनाये तो श्रद्धालु प्रभु भक्ति में लयलीन हो गए। वहीं दूसरी ओर मीरां, सूरदास, संत एकनाथ, भक्त केवट जैसे प्रभु भक्तों के प्रसंगों का विवेचन किया तो सत्संग प्रेमी आनंद विभोर हो गए। इस अवसर पर संत प्रवर ने सभी श्रद्धालुओं को भक्तियोग का अभ्यास करवाया। सभी लोगों ने दोनों हाथ आसमान में उठाकर प्रभु भक्ति में डूबने का रसास्वादन लिया।
दिव्य सत्संग का शुभारम्भ लाभार्थी परिवार श्री गजराजजी, महेशकुमारजी गोठी, श्री मोहनलालजी, राकेशकुमारजी बलदोटा, श्री सुरेशजी राठी, श्री कैलाशजी ओझाा, श्री विजयकुमार जी अग्रवाल, श्री गौरव जी सकंलेचा ने दीपप्रज्वलन कर किया।


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