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जैनों में लानी होगी सामाजिक एकता रू संत ललितप्रभ सर्वधर्मों का सार संदेश रविवार को

बैंगलोर

05 Aug 2017

राष्ट्र-संत महोपाध्याय ललितप्रभ सागर महाराज ने कहा कि दुनिया की सबसे बड़ी शक्ति पारस्परिक रहने वाली एकता है। अगर दुनिया में मुठ्ठी भर लोग भी साथ है तो ताकतवर कहलाएंगे और हजारों लोग भी बिखरे हुए हैं तो अर्थहीन हो जाएंगे। उन्होंने कहा कि जब तक हम साथ-साथ हैं तब तक हमारी कीमत है और जैसे ही अलग हुए कि कीमत खतम। माना कि भले ही तिनक ो की कोई ओकात नहीं होती, पर वही तिनके मिल जाए तो रस्सी बनकर हाथी को बांधने में सफल हो जाते हैं। उन्होंने कहा कि भाइयों में अगर एकी है तो कोई भी उनके सामने आँख उठाकर देखने की हिम्मत नहीं करेगा, नहीं तो टूटे
हुए भाइयों पर पड़ोसी भी भारी पड़ जाएगा। संत ललितप्रभ शनिवार को मराठा हॉस्टल मैदान में कैसे लाएँ समाज में एकता
विषय पर सत्संगप्रेमियों को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि हजार के नोट को चाहे मिट्टी में डाल दो या मरोड़ दो, उसकी कीमत में कोई फर्क नहीं आएगा, पर उसे फाड़ दिया तो उसकी कीमत भी फट जाएगी। उन्होंने कहा कि एक ओर
अमीर परिवार है, पर वहाँ भाई-भाई, सास-बहू, देरानी-जेठानी अलग-अलग रहते हैं और दूसरी ओर गरीब परिवार है, पर वहाँ सभी सदस्य हिलमिलजुलकर रहते हैं तो सोचो कौनसा परिवार ज्यादा सुखी है? अरे, साथ में रहने वालों के शक्कर
भी सस्ती पड़ती है और अलग रहने वालों के नमक भी महंगा पडने लग जाता है।

टूटे बहुत, अब जुडने की बात हो-संतश्री ने कहा कि आज जो समाज एक है उनकी चारों ओर तूती बजती है, कोई उनकी ओर अंगुली उठाने की भी हिम्मत नहीं करता, पर जो समाज टूटे हुए हैं तो उन्हें गली का कुत्ता भी नहीं पूछता। उन्होंने कहा कि हमने पिछले पच्चीस सौ सालों तक मंदिर-मस्जिद, पंथ-ग्रंथ, मूर्ति-मुहपत्ति, वस्त्र-शास्त्र के नाम पर लड़-लड़कर खोया ही खोया है, अब
हम केवल पच्चीस सालों के लिए इन सब भेदभावों को भुलाकर एक हो जाए तो मात्र पच्चीस सालों में दुनिया में सिरमोर हो जाएंगे। उन्होंने कहा कि आज किसी गली से ताजिया नहीं गुजर सकता तो किसी गली से गणेश की शोभायात्रा, पर यह हमारा कितना दुर्भाग्य है कि उन दोनों गलियों से कचरे से भरा नगरपालिका का टे्रक्टर तो आराम से गुजर जाता है। सबसे जुड़ो और सबको जोड़ो-जुड़ने की सीख देते हुए संतश्री ने कहा कि इंसान को बांटना वरदान नहीं अभिशाप है। उदाहरण देते हुए संतश्री ने कहा कि कभी जैनी दिगम्बर-श्वेताम्बर के नाम पर टूटे तो कभी मंदिर-मुहपत्ति के नाम पर, परिणाम ताकत कमजोर हुई। जब मंदिरमार्गी मंदिर में पूजा करते हैं तो मुख पर कपड़ा बांधते हैं और स्थानकवासी जब सामायिक करते हैं तब मुख पर कपड़ा बांधतेे हैं। कपड़ा तो दोनों ही बांध रहे हैं फिर कपड़े के नाम पर भेद कैसा? व्यक्ति से धर्म-कर्म हो तो ठीक, न हो तो कोई दिक्कत नहीं, पर वह उदार बने और सोच को सकारात्मक बनाए यही सबसे बड़ा धर्म है। उन्होंने कहा कि हिन्दू आगमों को इसलिए न पढ़े कि वह जैनों के शास्त्र है और जैन गीता को इसलिए न पढ़े कि वह हिन्दुओं का शास्त्र है वरन् जैन गीता को और हिन्दू आगमों को इसलिए पढ़े कि उनमें अच्छी बातें हैं। उन्होंने कहा कि पूना का यह सौभाग्य होगा कि जब यहाँ जैनी जन्माष्टमी मनाएंगे और हिन्दू पर्युषण पर्व। जब ऐसा पूरे देश में होगा उस दिन महावीर और श्रीकृ ष्ण प्रभु सबसे ज्यादा खुश होंगे। अगर हमारे प्रवचनों में छत्तीस कौम के लोग आते हैं तो उसका एक मात्र कारण अपने नजरिये को विराट बनाना है। याद रखें, छोटे केनवास पर कभी बड़े चित्र बनाए नहीं जा सकते, चित्रों को बड़ा बनाना है तो कृपया अपने केनवासों को बड़ा बनाएं।
दिव्य सत्संग का शुभारम्भ लाभार्थी परिवार श्री महेन्द्रकुमारजी, ललितकुमारजी रांका, श्री जितेन्द्रजी डागा, श्री अचलचंद जी चैपड़ा, श्री सुरेशजी नाहर, श्रीमती मधु कोठारी ने दीपप्रज्वलन कर किया।


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