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हर धर्म और हर महापुरुष का करें सम्मान- संत ललितप्रभ मराठा हॉस्टल मैदान में होगा विशाल राखी महोत्सव 31 फिट की राखी होगी समर्पित

बैंगलोर

06 Aug 2017

राष्ट्र-संत महोपाध्याय ललितप्रभ सागर महाराज ने कहा कि व्यक्ति हिन्दू, जैन, बौद्ध, मुस्लिम, सिख, ईसाई बनने के साथ एक अच्छा इंसान अवश्य बने। एक अच्छा इंसान अपने आप में एक अच्छा हिन्दू-जैन-मुसलमान भी होता है और अच्छा सिख-ईसाई भी। उन्होंने कहा कि हम किस जाति में पैदा हुए अथवा किस धर्म को मानते हैं यह उतना महत्त्वपूर्ण नहीं है जितना कि यह कि हमारे कर्म कैसे हैं? कर्म अच्छे हैं तो गरीब और निम्न जाति वाला भी हम सबके लिए आदरणीय है और कर्म अच्छे नहीं तो अमीर और उच्च जाति वाला भी मानवता के लिए अभिशाप है। उन्होंने कहा कि हम इंसान को क्रियाकांड की बजाय श्रेष्ठ कर्म करके महान बनने का पाठ सिखाते हैं। याद रखें, धर्म का जन्म स्वर्ग को पाने या नरक से बचने के लिए नहीं, जीवन को अच्छा बनाने के लिए हुआ है। अगर एक तरफ कोई संत थोड़ा-सा विपरीत निमित्त आते ही हो-हल्ला करने लग जाए और दूसरी तरफ एक गृहस्थ प्रतिकूल परिस्थिति बन जाने के बावजूद धैर्य और शांति रखे तो हम खुद सोचें कि उनमें वास्तविक तौर पर संत कौन हैं? जो क्रोध के वातावरण में भी क्षमा को, लोभ के निमित्त में भी संतोष को, वासना के माहौल में भी संयम को बरकरार रखता है समझो वही सच्चा धार्मिक है।

संत ललितप्रभ रविवार को मराठा हॉस्टल मैदान में धर्म सप्ताह के सातवें दिन एक घंटे में समझें सर्व धर्मों के संदेश विषय पर सत्संगप्रेमियों को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि चाहे राम, कृष्ण, महावीर, बुद्ध हो या चाहे नानक, मोहम्मद, जीसस इन महापुरुषों में जो भेद दिखाई देते हैं ये सब मूर्तिकारों के भेद हैं। किसी मूर्ति को धनुष पकड़ा दिया तो वे राम हो
गए, किसी को चक्र पकड़ा दिया तो वे कृष्ण हो गए, किसी को ध्यान मुद्र में बना दिया तो वे महावीर हो गए, किसी को क्रॉस पर लटका दिया तो वे जीसस हो गए। भले ही इनके दियों में फर्क हो, पर ज्योति सबकी एक है। उन्होंने कहा कि आज विश्व में जितने भी धर्म हैं वे सब धरती पर खिले हुए अलग-अलग तरह के फूल हैं जो धरती को शोभा को बढ़ा रहे हैं। हम धर्म को दीवार बनाने की बजाय द्वार बनाएँ और एक-दूसरे के निकट आने की कोशिश करें। यह कितने दुर्भाग्य की बात है कि देश के कुछ स्थानों में रामनवमी आने पर राम की शोभायात्रा निकल नहीं सकती तो कहीं से ताजिया नहीं जा सकता, पर उन दोनों स्थानों से नगरपालिका का कचरे से भरा ट्रेक्टर आराम से निकल जाता है जिसमें किसी को कोई दिक्कत नहीं होती। अरे! हमसे तो वे कबूतर कहीं ज्यादा अच्छे हैं जो कभी मंदिर के शिखर पर गुटर-गूँ कर लेते हैं तो कभी मस्जिद की मीनार पर बैठ जाते हैं।

महापुरुषों के संदेश सबके लिए समान-संतप्रवर ने कहा कि महापुरुष किसी एक धर्म के नहीं होते। उन्हें किसी धर्म-विशेष की परिधि में बाँधना अपराध है। वे सबके हैं और उनके संदेश सम्पूर्ण मानव-जाति के लिए हैं। क्या भगवान महावीर द्वारा जियो और जीने दो का दिया गया संदेश केवल जैनों के लिए है? क्या भगवान राम की मर्यादा और भगवान कृष्ण का निष्काम कर्मयोग केवल हिन्दुओं के लिए है? क्या मोहम्मद साहब द्वारा ईमान को अपनाने का दिया गया पैगाम केवल मुसलमानों के लिए है? उन्होंने कहा कि हम हर महापुरुष का सम्मान करें और हर धर्म से दो अच्छी बातें सीखने की कोशिश करें। हिन्दू गीता को, जैन आगमों को, मुसलमान कुरान को, ईसाई बाइबिल को, सिख गुरुग्रंथसाहिब को और बौद्ध पिटकों को इसलिए न पढ़ें कि वह उनका शास्त्र है, वरन् इन धार्मिक गं्रथों को इसलिए पढ़ा जाए कि इनमें अच्छी बातें हैं और ये प्राणीमात्र के काम की है। आज जरूरत इस बात की है कि हर व्यक्ति दिल को बड़ा रखे और हर धर्मग्रंथ को पढ़कर कुछ सीखने का प्रयास करे।

हर धर्म का किया विश्लेषण-संतप्रवर ने हिन्दू, जैन, बौद्ध, इस्लाम, सिख और ईसाई मुख्यतरू इन छः धर्मों का विस्तार से विश्लेषण किया। उन्होंने हर धर्म के महापुरुष, शास्त्र, मुख्य सिद्धांत, धर्मवाक्य, धर्ममंत्र, विशेषताएँ एवं तीर्थ-स्थानों के बारे में जानकारी दी। उन्होंने हिन्दू धर्म की व्याख्या करते हुए कहा कि जो मन की हीन भावनाओं पर विजय पाने का
प्रयास करे वह हिन्दू है। हिन्दू धर्म की मुख्य प्रेरणाएँ हैं-ईश्वरीय भक्ति, अनासक्ति और निष्काम कर्मयोग। जो जयणा अर्थात् विवेक पूर्वक जिए और मन की कमजोरियों को जीते वह जैन है। जैन धर्म के मुख्य सिद्धांत हैं - अहिंसा, अनेकांत और अपरिग्रह। हम किसी को दुख न पहुँचाएँ, सबके विचारों का सम्मान करें और आवश्यकता से ज्यादा धन को मानवता के नाम समर्पित करें। संतप्रवर ने कहा कि अगर हम धर्म को सार रूप में देखेंगे तो पता चलेगा कि फर्क सब बाहर के हैं, मूल सिद्धांत सबमें एक है। सबसे प्रेम, सबकी सेवा, नैतिक आचरण, प्रभु-प्रार्थना सार रूप में यही हर धर्म की सिखावन है। दिव्य सत्संग का शुभारम्भ लाभार्थी परिवार श्री पारसमलजी, शांतिलालजी, सुरेन्द्रकुमारजी सालेचा, श्री जवाहरलालजी-शारदादेवी चैधरी, श्री प्रशांतजी श्रीश्रीमाल, श्री प्रेमराज लुणावत, श्री रणजीतजी ललवाणी, श्रीमती किरणा ललवाणी, श्री दिनेशजी संकलेचा ने दीपप्रज्वलन कर किया।


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