slide3-bg



मराठा हॉस्टल मैदान में सम्पन्न हुआ देश का सबसे बड़ा राखी महोत्सव बहिन बिना परिवार अधूरा है तो भाई सूना - संत चन्द्रप्रभ सत्संगप्रेमियों को समर्पित की गई 31 फुट की विशाल राखी

बैंगलोर

07 Aug 2017

मराठा हॉस्टल मैदान के विशाल पांडाल में हजारों भाई-बहिनों ने गुरुवार को राखी पर्व के पावन अवसर पर राष्ट्र-संत चन्द्रप्रभ महाराज, महोपाध्याय ललितप्रभ सागर महाराज और मुनि शांतिप्रियसागर महाराज के सान्निध्य में रक्षाबंधन महोत्सव मनाने का आनन्द उठाया। मैदान में सैकड़ों श्रद्धालु बहिनें भाव-विह्वल होकर 31 फीट की राखी लेकर जब मंच पर आई तो हजारों सत्संगप्रेमियों ने ताली बजाकर इस विशाल राखी का स्वागत किया। जब गुरुजनों के द्वारा अभिमंत्रित रक्षासूत्र सभी सत्संगप्रेमियों में बाँटा गया और सबने एक-दूजे को मंत्रोंचार के रक्षासूत्र एक साथ बाँधा तो पूरे पांडाल में श्रद्धा, भक्ति और प्रेम का अद्भुत माहौल बन गया।

इस अवसर पर संत चन्द्रप्रभ महाराज ने कहा कि रक्षाबंधन रिश्तों में मिठास घोलने और टूटे रिश्तों को साँधने का पर्व है। रिश्तों को बनाना आसान है, पर उन्हें मीठा-मधुर बनाकर रखना मुश्किल है। रिश्तों को बनाना तो ठीक वैसे ही है जैसे मिट्टी पर मिट्टी से मिट्टी लिखना, पर उन्हें निभाना पानी पर पानी से पानी लिखने जैसा है। उन्होंने कहा कि हमारे रिश्ते रोटी जैसे न हो कि थोड़ी-सी आँच क्या लगी कि वह काली पड़ गई, रिश्ते तो मछली और सरोवर जैसे होने चाहिए कि जब तक जिएँगे तब तक साथ-साथ रहेंगे। जो घर को सदा जोड़कर रखे समझना वह बुद्धिमान और बुद्धिनिधान है। उन्होंने बहुओं को समझाया कि जो बहुएँ घर को तोड़ती हैं वह घर के लिए अभिशाप बन जाती है, पर जो बहू घर को किसी भी हालत में टूटने नहीं देती वही घर की महालक्ष्मी कहलाया करती है। लक्ष्मी की पूजा करने से पता नहीं लक्ष्मी जी कितने प्रतिशत आएँगे, पर घर की बहुएँ महालक्ष्मी बन जाए तो घर में सदा लक्ष्मीजी का बसेरा हो जाएगा। जोडने का आधार रू राखी का त्यौहार-संतप्रवर ने कहा कि राखी महज धागों को बाँधने का नहीं, आपस में जुडने और जोडने का त्यौहार है। अगर हमारे रिश्तों में दरार आ गई है, अगर हमारी किसी से बोलचाल नहीं है तो हम उन्हें फोन लगाएँ और कहें कि मैं आपसे राखी बाँधने या आपको राखी बाँधने आ रहा हूँ, बस आपका इतना-सा बड़प्पन इस पर्व को धन्य कर देगा और दूरियाँ हमेशा के लिए जीवन से दूर हो जाएगी।

एक-दूसरे की रक्षा का संकल्प है राखी-संतप्रवर ने कहा कि राखी एक-दूसरे की रक्षा करने का महान संकल्प है। जैसे कभी अतीत में भगवान श्री कृष्ण ने द्रोपदी की चीर बढ़ाकर रक्षा की थी, राजा हुमायूँ ने पश्चिम बंगाल में चल रहे अपने युद्ध को छोड़कर रानी कर्णावती के राज्य को शत्रुओं से बचाया था ठीक वैसे ही हम भी नारी-जाति की आन, बान और शान की रक्षा करने का संकल्प लें। मर जाएँगे, पर नारी की लाज को मिटने नहीं देंगे। बहिन बिना भाई अधूरा और परिवार सूना-संतप्रवर ने कहा कि बहिन बिना भाई अधूरा है तो परिवार सूना। हम अपने घर में पुत्र के रूप में न केवल लक्ष्मण को चाहें बल्कि लक्ष्मी के रूप में कन्या को भी जन्म दें। जिस घर में कन्या का जन्म नहीं होता उस घर में कभी कल्पवृक्ष नहीं लहराता। लक्ष्मी आएगी तो कल्पवृक्ष अपने आप लहराएगा। उन्होंने कहा कि आज के दिन तो संत-हृदय भी द्रवित हो उठता है। यद्यपि हमें सगी बहिनें न मिली, पर भगवान को धन्यवाद है कि उसने हमें हजारों बहिनें दी हैं। जब तक हम जीवित हैं किसी भी बहिन पर आँच आने नहीं देंगे। उन्होंने कहा कि महिला को अपनी जिंदगी में दो लोगों का ही आसरा होता है एक पति का और दूसरा भाई का। कंधे से कंधा मिलाकर जो साथ रहे और संकट की घड़ी में हनुमान की भूमिका निभाए वह भाई भाई नहीं बहिन के लिए भगवान है। भू्रण-हत्या है राखी का अपमान-संतप्रवर ने कहा कि भ्रूण-हत्या करना राखी का अपमान करना है। हर संतान ईश्वर के घर से मिला उपहार है। उसकी कोख में हत्या करना स्वयं ईश्वर की हत्या करना है। आज हजारों लोग ऐसे हैं जो संतान न होने की वजह से बिलख रहे हैं, अगर आपने ऐसा पाप किया तो आपको भी ऐसे ही बिलखना पड़ेगा। आप कोख में आई संतान को अवश्य जन्म दें और संतान रहित दंपति को उसे उपहार में दे दें, उनका वंश आबाद हो जाएगा और वे जिंदगी भर आपके ऋणी भी बने रहेंगे। मन की गाँठें खोलें और राखी बाँधें-संतप्रवर ने कहा कि राखी केवल भाई-बहिन ही नहीं, वरन् सास-बहू, देवरानी-जेठानी, भाई-भाई, देवर-भाभी भी बनाएँ और राखी बाँधने के बहाने किसी से किसी भी तरह का मनमुटाव हो तो मन की गाँठें खोल लें। मन की गाँठें खोलने से बड़ा कोई धर्म नहीं है अन्यथा ये गाँठें हमारी जन्म-जन्मांतर तक पीछा करती रहेंगी। उन्होंने कहा कि जैसे वर्ष पूरा होने पर हम केलेण्डर उतार के फेंक देते हैं ठीक वैसे नया साल आने से पहले आपसी मनमुटाव, दूरियाँ और पुरानी बातों को रद्दी की टोकरी में फेंक दें। जिस दिन राखी के बहाने दो टूटे हुए एक हो जाएँगे समझना उस दिन विश्व मैत्री दिवस साकार हो उठेगा।्र दिव्य सत्संग का शुभारम्भ लाभार्थी परिवार श्री छगनलालजी, चंपालालजी, बाबुलालजी, किरणकुमार, भंसाली, श्रीमती इचरजबाई, चंपालालजी, विजयकुमारजी डोसी चुन्नीलालजी गुलेच्छा, श्रीमती पूनम कोठारी, शशि चैपड़ ने दीपप्रज्वलन कर किया।


Event Gallery


Our Lifestyle

Features