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सामायिक को स्वभाव बनाएँ मात्र क्रिया नहीं - संत चन्द्रप्रभ

बैंगलोर

08 Aug 2017

राष्ट्र-संत श्री चन्द्रप्रभ सागर महाराज ने कहा कि साठ वर्ष की उम्र तक व्यक्ति को सफलता के लिए प्रयास करना चाहिए, पर जैसे ही,साठ के पार जिंदगी हो जाए, तो आदमी को सार्थकता की ओर कदम बढ़ाने शुरू कर देने चाहिए। जो लोग सफलता के लिए जीवन जीते हैं वे इस भव में सुखी हो जाते हैं, पर जो अपने जीवन को सार्थक कर लेते हैं, उनका भव-भव सुखी हो जाता है। सामायिक न केवल समता की साधना है अथवा एक घंटे की आराधना है,अपितु जीवन को सार्थक करने के लिए किया जाने वाला एक महान कर्म है। संत चन्द्रप्रभ मंगलवार को मराठा हॉस्टल मैदान में अध्यात्म सप्ताह के
दूसरें दिन साधना की पहली सीढ़ी रू सामायिक विषय पर सत्संगप्रेमियों को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि दान,पूजा और सामायिक धर्म के तीन चरण हैं। किसी भी गृहस्थ व्यक्ति को अपने धन को शुद्ध करने के लिए दान करना चाहिए,भावदशा को शुद्ध करने के लिए पूजा करनी चाहिए और जीवन को समतामय करने के लिए सामायिक की आराधना करनी चाहिए। हमें भावपूर्वक अपने धन का
हिस्सा मानवीय सेवा में अवश्य लगाना चाहिए। कोई भी अमीर अपने धन का मूल्यांकन करते हुए यह न देखे उसके पास कितना धन है। अपितु यह देखे की उसने कितने धन का दान किया है। इंसान का साथ अंततरू वही धन देता है, जो वह दूसरों को दान देता है।

उन्होंने कहा कि कमाने के लिए भेजा चाहिए, पर लगाने के लिए कलेजा चाहिए। हम भलाई का काम कम करते हैं, इकट्ठा करने का काम ज्यादा करते हैं। दूध का सार मलाई है, पर जीवन का सार भलाई है।
संतश्री ने धार्मिक ट्रस्टों से अनुरोध किया कि वे केवल बैंकों में धन इकट्ठा न करते रहें अपितु  मानवता के कल्याण के लिए और समाज के उद्धार के लिए अपने धन को खर्च करें। उन्होंने कहा कि हमें रोज मंदिर जाकर भगवान के दर्शन करने चाहिए केवल तीर्थों में जाकर ही मंदिर के दर्शन न करें अपितु अपने शहर एवं गाँव में जो भगवान के मंदिर हैं उनकी भी पूजा-अर्चना करें।

संतप्रवर ने कहा - जहाँ है आस्था, बंद द्वार में खुल जाता है रास्ता। संतप्रवर ने हर श्रद्धालु को प्ररेणा देते हुए कहा कि हर व्यक्ति को रोजएक सामायिक जरूर करनी चाहिए। इससे विषमता का वातावरण समाप्त हो जाता है और जीवन में समता की साधना होनी शुरू होती है और मन की शांति, पारिवारिक
प्रेम और शुभ कर्मों के उदय का द्वार खुलता है। दिव्य सत्संग का शुभारम्भ लाभार्थी परिवार श्री गिरधारीमल जी, बाबुलालजी, अशोक जी, महावीर जी मेहता, श्रीमती पवनबाई बाबूलालजी राठोड़, श्री महावीर
जी मेहता लुंकड़, श्रीमती लीला दांतेवाडिया , श्री कल्पेश जी लुंकड़ ने दीपप्रज्वलन कर किया।


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