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जो रहेगा अनाशक्त वहीं होगा मुक्त: संत चन्द्रप्रभ

बैंगलोर

11 Aug 2017

महान दार्शनिक श्री चन्द्रप्रभ सागर महाराज ने कहा कि मृत्यु तो दुनिया में प्राणीमात्र की होती है, पर मुक्ति का आनंद वही
व्यक्ति प्राप्त कर सकता है जिसने जीवन को प्रेम, शांति, आनंद और वैराग्य के साथ जीया है। जीवन में सारे काम मृहुर्त के साथ किए जाते हैं, पर जन्म और मृत्यु दोनों अनिश्चित होते हैं। यहाँ कब किसका नम्बर आ जाए, पता नहीं चलता। हर व्यक्ति को चाहिए कि उसकी मृत्यु हो उससे पहले वह अपनी मुक्ति का बंदोबस्त कर ले। संत चन्द्रप्रभ मराठा हॉस्टल मैदान में निर्णय  कीजिए: मृत्यु चाहिए या मुक्ति विषय पर जनता को प्रवचन दे रहे थे। उन्होंने कहा कि जीव अकेला आता है और अकेला जाता है। पर जीवनभर मोह माया के जाल में उलझा रहता है। संसार में सब अपने अपने स्वार्थों से जुडें रहते हैं। जब जिसका जहाँ स्वार्थ पूर्ण होता है वहाँ आदमी अपने मोह माया के जाल को बुनता रहता है। राष्ट्र-संत ने कहा कि दुनिया में चार तरीके के लोग होते हैं - लोभी, संतोषी, सज्जन और संत। जो व्यक्ति सोचता है - मेरा सो मेरा, तेरा भी मेरा वह लोभी है, जो सोचता है - तेरा सो तेरा, मेरा सो मेरा, वह संतोषी है और जो तेरे सो भी तेरा और मेरा सो भी तेरा सोचता है, वह सज्जन होता है, पर संत सदा सोचता है - न तेरा न मेरा, दुनिया तो एक रैन बसेरा।

संतश्री ने कहा कि जीवन में रोज हम वही सब दोहराते हैं, जो हम रोज जीते हैं। उन्होंने कहा कि संसार में रहना बुरा नहीं है, पर अपने भीतर संसार को बसा लेना वह बुरा है। हमें संसार में ऐसे जीना चाहिए जैसे कीचड़ में कमल रहता है। हमें अगर मुक्त होना है तो संसार से तृप्त होना पड़ेगा। जो अतृप्त है उनके पास मृत्यु है, पर जो तृप्त है वही मुक्ति के द्वार पहुँच सकता  है।
संतप्रवर ने कहा कि हम मंदिर में दीपक जलाएँ या न जलाएँ, पर कभी किसी का दिल नहीं जलाना चाहिए। दुनिया में वहीं व्यक्ति सुखी जीवन का मालिक बन सकता है, जो अपने जीवन में कभी किसी को दुख नहीं देता है। दिव्य सत्संग की शुरुआत लाभार्थी परिवार श्रीमती नेमीबाई, सरदारमलजी संकलेचा, श्री देवीचंदजी, राकेशजी श्रीश्री माल, श्री जयकुमारजी, सौरभकुमारजी कांकरिया ने दीपप्रज्वलन कर किया।


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