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बेहतर मनोदशा से निर्मल कीजिए आभामंडल - संत ललितप्रभ तीस उपवास की तपस्विनी का किया गया अभिनंदन

बैंगलोर

12 Aug 2017

राष्ट्र-संत श्री ललितप्रभ जी ने कहा कि व्यक्ति के मन की निर्मल दशा ही स्वर्ग है और कुत्सित दशा ही नरक। उन्होंने कहा कि
प्रत्येक इंसान के जब जैसे मनोभाव हुआ करते हैं उसके आधार पर ही उसके आभामंडल का निर्माण हुआ करता है। यदि किसी व्यक्ति की भावदशाएं निकृष्ट हैं तो आदमी का आभामंडल भी कलुषित हो जाता है। अगर मन और आत्मा की भावदशा उन्नत है तो व्यक्ति का आभामंडल भी निर्मल, पवित्र, सौम्य और श्वेत प्रकाश से भर जाता है। संत चन्द्रप्रभ सत्संग प्रेमियों से खचाखच भरे मराठा हॉस्टल मैदान में आयोजित प्रवचनमाला में मन का लेश्या मंडल: कैसे करें निर्मल विषय पर जन समुदाय को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि भगवान की प्रतिमा पत्थर की होती है लेकिन व्यक्ति जब अपने मनोभावों द्वारा यह आरोपण कर लेता है कि यह भगवान है तो उसमें भगवत्ता का निवास होने लग जाता है। उन्होंने कहा कि क्रिलियान फोटोग्राफी के द्वारा यह नया तथ्य सामने आया है कि प्रतिष्ठा से पहले मूर्ति का आभामंडल अलग होता है और बाद में अलग हो जाता है। अगर मूर्ति का आभामंडल नहीं बदलता है तो स्पष्ट हो जाता है कि प्रतिष्ठा नहीं हो पाई। मंत्रों में इतनी शक्ति होती है कि मूर्ति का भी आभामंडल बदल जाया करता है। यदि हमारे मन में निराशा, घुटन, हीनभावना भरी है तो हमारा आभामंडल भी कलुषित, दुषित, काला, छोटा और हीन होगा वहीं अगर हमारे मन में प्रेम, मोहब्बत और आनंद भरी भावदशा है तो हमारा आभामंडल गुलाबी, पीला या श्वेत हो जाएगा।

संतप्रवर ने कहा कि बेटे की बजाय बेटी हो गई तो व्यक्ति का भाग नहीं फूटता। घाटा लग भी जाए तो करम नहीं फूटता पर जिस दिन हमारे जीवन से प्रेम, मोहब्बत, शांति की मृत्यु हो जाती है, तो उस दिन समझ लेना कि हमारे भाग फूट गए। जब तक किसी भी व्यक्ति के पास प्रेम, शांति और आनंद की दौलत बनी हुई है तब तक हर आदमी मुक्कदर का सिकंदर हुआ करता है। लेश्या
शब्द की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा कि लेश्या यानी मन की वे वृत्तियाँ जो हमारे मनोमस्तिष्क पर हावी हो जाए, जो हमारे मन, आत्मा, वाणी को घेर ले वही है लेश्या। कोई भी व्यक्ति किसी और के घेरे में घिरा हुआ नहीं होता है, वरन् वह अपने ही मन के घेरों में घिरा होता है। उन्होंने कहा कि अगर हमें अपने मन के घेरों से बाहर निकलना है तो हम निर्लिप्तता का जीवन जीने की कोशिश करें इससे हमारे जीवन में समदर्शिता का उदय हो जाएगा। मन को शांत करने से पहले जरूरी हम उसे शुद्ध कर लें।

अगर हमने लालटेन के काँच का गोला साफ नहीं किया, तो रोशनी कभी बाहर नहीं आएगी। आत्मा की शुद्धि के लिए जरूरी है मन पहले शुद्ध हो। स्वभाव की प्रचंडता, वैर की मजबूत गाँठ, विषय लोलुपता ये सब मन की वे अशुभ प्रवत्तियाँ है जिससे हमारा आभामंडल दुषित होता है। स्वभाव में समभाव, दयालुता, त्यागशीलता, सरलता, क्षमा-प्रधानता और समदर्शिता ये मन के वे
शुभ परिणाम हैं, जिससे हमारा आभामंडल निर्मल और पवित्र होता है। इस अवसर पर तीस उपवास की तपस्वीनी श्रीमती अनिता मुथा का दादावाड़ी ट्रस्ट द्वारा सम्मान किया गया। साथ ही आठ उपवास करने वाली कई तपस्वी बहिनों का श्रीसंघ द्वारा स्वागत किया गया।

दिव्य सत्संग की शुरुआत लाभार्थी परिवार श्री शांतिलालजी, सज्जनराजजी गादिया, श्री अशोकभाई, दलपत भाई शाह, श्रीमान रतनलालजी, शांतिलालजी, सेठिया, श्री सोहनलालजी वडेरा, श्री अमरारामजी कुमावत, श्री वनेचंदजी दांतेवाडिया ने दीपप्रज्वलन कर किया।


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