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मराठा हॉस्टल मैदान में आजादी का ऐतिहासिक महोत्सव श्वेताम्बर-दिगम्बर परम्परा के राष्ट्र-संतों का मिलन भारत को बनाएँ स्वच्छ, स्वस्थ और समृद्ध - संत चन्द्रप्रभ मराठा हॉस्टल मैदान में सत्संगप्रेमियों ने राष्ट्र-संतों के सान्निध्य में किया झंडारोहण

बैंगलोर

16 Aug 2017

शहर के मराठा हॉस्टल मैदान में आचार्य पुष्पदंत सागर जी महाराज एवं राष्ट्र-संत ललितप्रभ जी एवं राष्ट्र-संत चन्द्रप्रभ जी महाराज के सान्निध्य में हजारों लोगों की उपस्थिति में आजादी का जश्न मनाया गया। झंडारोहण के बाद जब 71 फीट का राष्ट्र-ध्वज भारत माता के वेश में समाज की बालिकाएँ मैदान में लेकर आई, तो उपस्थित जन समुदाय ने तालीवादन के साथ इस अवसर का आनंद उठाया। जब हजारों श्रद्धालु अपने मोबाइलों से फोटोग्राफी-वीडियोग्राफी कर रहे थे, तो महौल और भावनामय बन गया। जैन युवा नारी शक्ति मंडल ने आजादी का जश्न मनाते हुए अपनी भव्य रंग बिरंगी नाट्य प्रस्तुति की, तो लोगों ने भारत माता की जय नाद करते हुए पूरे मैदान को राष्ट्र-भक्ति का मैदान बना दिया। श्वेताम्बर, दिगम्बर परम्परा के समन्वय ने सोने में सुहागा का काम किया।

राष्ट्र-संत चन्द्रप्रभ महाराज ने जब देश हमारा सबसे प्यारा, सबको गले लगाएँ, गीत मिलन के गाएं... गीत के साथ अपने प्रवचन की शुरुआत की तो हजारों लोगों ने एक साथ तिरंगा फहराकर अपनी राष्ट्रीय भावना प्रदर्शित की। चन्द्रप्रभ महाराज ने कहा कि भारत की पहचान ताजमहल, कुतुबमीनार, देलवाड़ा या खजुराहों से नहीं, गौरवपूर्ण सांस्कृतिक वैभव से है। राम की मर्यादा, कृष्ण का कर्मयोग, महावीर की अहिंसा और बुद्ध की करुणा के संदेश भारत से ही विश्व के कौने-कौने तक पहुँचे हैं। पिता के वचनों की आन रखने के लिए चैदह साल का कठोर वनवास सहर्ष स्वीकार करने वाले राम को, माता-पिता को कावड़ पर बिठाकर तीर्थयात्रा करवाने वाले श्रवणकुमार को और कबूतर की रक्षा करने के लिए जांघ तक का मांस काटकर देने वाले राजा शिवि जैसे महापुरुष इसी धरती पर पैदा हुए। उन्होंने कहा कि भारत केवल भूमि का टुकड़ा नहीं, वरन् एक जीवंत संस्कृति एवं महान दर्शन है। जिस दिन हम सत्यमेव जयते, अहिंसा परमो धर्म, जीयो और जीने दो, अनेकता में एकता, वसुधैव कुटुम्बकम् जैसे सिद्धांतों को आत्मसात कर लेंगे उस दिन हमारे भीतर भारत की चेतना साकार हो उठेगी।

देश को साफ-सुथरा रखें-संतप्रवर ने कहा कि देश के नाम पहला संकल्प यह लें कि हम देश को साफ-सुथरा रखेंगे। हम विदेशों की स्वच्छता की तारीफ करते हैं, वहाँ जाते हैं तो स्वच्छता का पूरा ध्यान रखते हैं फिर भारत में आकर वैसे के वैसे क्यों हो जाते हैं। चुटकी लेते हुए संतप्रवर ने कहा कि यहाँ गलियों की अच्छी सफाई तब होती है जब कोई मंत्री वगैरह वहाँ से गुजरने वाले होते हैं। स्वच्छता स्वर्ग की जननी है। जैसे हम अपने घर को स्वच्छ रखते हैं वैसे ही गलियों को भी स्वच्छ रखें। कचरा या गंदगी को मन में आए जहाँ न फेंकें । गंदगी वास्तुदोष का कारण है फिर वह चाहे घर में हो घर के बाहर। स्वच्छता को लेकर खुद भी जागरूक रहें, औरों को भी जागरूक करें और प्रशासन को भी सचेत करते रहें। जिस दिन भारत में स्वच्छता आ जाएगी उस दिन भारतवासियों की इज्जत विश्व में सौ गुना बढ़ जाएगी। भ्रष्टाचार का खातमा अब जरूरी-संतप्रवर ने कहा कि देश के नाम दूसरा संकल्प यह लें कि हम भारत से भ्रष्टाचार का खातमा करेंगे। यह कितने शर्म की बात है कि जिस भारत ने पूरे विश्व को नैतिकता का पाठ पढ़ाया आज वह खुद अनैतिकता से घिर गया है। अब जरूरत यह है कि जैसे कभी अंग्रजो भारत छोड़ो! का नारा बुलंद हुआ था अब भ्रष्टाचार भारत छोड़ो! का नारा बुलंद हो।

नैतिकता से कमाया गया 1 रुपया बेईमानी से कमाए गए 100 रुपयों से ज्यादा श्रेष्ठ होता है। भ्रष्ट तरीके से की गई कमाई कभी बरकत और ताकत नहीं देती। अगर लक्ष्मी गलत तरीके से आएगी तो दुख और दौर्मनस्य लाएगी और सही तरीके से आएगी तो खुशियाँ का अंबार लगाएगी। याद रखें, माँ का धन चुराने पर जितना पाप लगता है मातृभूमि का धन चुराने पर उससे हजार गुना पाप लगता है। बेईमानी करके आप अपनी पत्नी को तो हीरे की चूड़ी पहना लोगे, पर आपके हाथ में लोहे की हथकड़ी आ गई तो फिर क्या करोगे। आओ हम सब मिलकर देश और जीवन से भ्रष्टाचार की सफाई करें और भारत को फिर से सोने की चिडिया बनाएँ।

जीवन में नैतिकता को फिर से जीवित करें-संतप्रवर ने कहा कि देश के नाम अंतिम संकल्प लें कि मैं जीवन में नैतिकता को फिर से जीवित करूंगा। पाँच का नोट दिख जाए तो हम ईमानदार बन जाते हैं, पर पाँच सौ नोट दिख जाए तो क्या उसे हथियाने की कोशिश नहीं करते? राधा, सीता और सरस्वती की आरती करते हैं और सड़क चलती नारी को देखकर आँखें गंदी नहीं करते? हर कोई अपने अंतर में झाँके और खुद का सुधार करे। अब राम, कृष्ण और महावीर को बुलाने की नहीं, भीतर में सोये राम, कृष्ण, महावीर को जगाने की जरूरत है। संतप्रवर ने कहा कि हम देश के नाम संकल्प लें कि मुफ्त की दमड़ी और गोरी चमड़ी को देखकर नहीं फिसलेंगे, व्यसन और फैशन से दूर रहेंगे, मांसाहार का सेवन नहीं करेंगे, चमड़े और हिंसक चीजों से बनी वस्तुओं को नहीं खरीदेंगे, मांस-निर्यात के नाम पर होने वाली पशु-हत्या रोकें गे, परिवार में सबको खुशियाँ बाँटेंगे और बच्चों को संयम, पर्यावरण-रक्षा और यौन-रक्षा के पाठ पढ़ाएँगे।

इस अवसर पर आचार्य पुष्पदंत सागर जी महाराज ने कहा कि शहीदों ने हमारे लिए त्याग किया, हमें आने वाले कल के लिए त्याग करना होगा। हमें अपनी संस्कृति को बचाना होगा, जो धन और शक्ति से नहीं अपितु संस्कारों से जीवित रहेगी। हमें गणतंत्र के साथ गुणतंत्र का भी ध्यान रखना है। उन्होंने कहा कि अपेक्षा, अधिकार और अंहकार इन तीनों से मुक्त होकर राष्ट्रहित में चिंतन करना होगा। जैसे हम अपने धर्म, जाति और व्यवस्था को निष्ठा पूर्वक जिंदा रखते हैं, वैसे ही हमें राष्ट्र-भक्ति को भी जीवित रखना होगा। समारोह का शुभारम्भ श्री राजेन्द्रकुमारजी, यशकुमारजी छाजेड़, संघवी श्री तेजराजजी गुलेच्छा, श्री मोहनचंद जी ढढ्ढा, श्री सुरेन्द्र जी हेगड़े, श्री अनिलजी सेठी, श्री वीरेन्द्रजी मेहता ने एवं दादावाड़ी के ट्रस्ट
मंडल ने दीपप्रज्वल कर किया।


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