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मेडिटेशन सबसे अच्छी मेडिसन - संत चन्द्रप्रभ

बैंगलोर

17 Aug 2017

राष्ट्र-संत श्री चन्द्रप्रभ सागर महाराज ने कहा कि अध्यात्म हमारी आंतरिक समृद्धि का मार्ग है। हम केवल शरीर या मन नहीं हैं, आत्मा भी हैं। इस आत्म-तत्व पर गौर करना ही अध्यात्म है। ध्यान अध्यात्म में उतरने की चाबी है। चित्त की वृत्तियों का निरोध ही योग है। ध्यान का प्रभाव हमें अचेतन मन की गहराइयों तक पहुँचता है। निर्मल और तनावमुक्त जीवन जीने के लिए हर रोज 30 मिनट मेडिटेशन कीजिए, आपको कभी किसी न्यूरो मेडिसिन की जरूरत नहीं  पडेगी। संत चन्द्रप्रभ बुधवार को मराठा हॉस्टल मैदान में योग सप्ताह के चैथे दिन ध्यान से कैसे बढ़ाएँ मानसिक शक्तियाँ विषय पर सत्संगप्रेमियों को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि मानसिक शांति और आध्यात्मिक स्वास्थ्य के लिए ध्यानयोग संसार का सर्वश्रेष्ठ मार्ग है। ध्यान-साधना का मार्ग हमें अन्तर्जगत में ले जाता है जहाँ परमात्मा का साम्राज्य है। उन्होंने कहा कि ध्यान का लक्ष्य है रू अंतर्मन की शांति, अंतर्मन की शुद्धि, अंतर्मन में दिव्य आनंद की अनुभूति। हम श्वास, शरीर और अंतर्मन के साथ एकलयता साधें, और स्वयं को अधिकतम सहज और शांतिमय बनाएँ। राष्ट्र-संत ने कहा कि ध्यान के प्रभावी परिणामों के लिए ध्यान की नियमित बैठक अनिवार्य है। समय, स्थान और प्रयोग नियत और नियमित हों तो ज्यादा श्रेष्ठ है। ध्यान-साधना के पूर्व प्रतिदिन सुबह योगासन करना सहज लाभप्रद है। इससे सम्पूर्ण शरीर और नाड़ी-तंत्र जाग्रत और स्फूर्त होता है। उन्होंने कहा कि योगासन के बाद कुछ देर तक प्राणायाम भी करें। इससे श्वसन-तंत्र स्वस्थ होगा, मस्तिष्क ऊर्जस्वित होगा और चित्त में स्थिरता आएगी। प्राणायाम ध्यान की पूर्व भूमिका है।

संतप्रवर ने कहा कि ध्यान के लिए बैठें, तब अपना मुख पूर्व या उत्तर दिशा की ओर रखें, जिससे हमें सूर्य और पृथ्वी की चुम्बकीय शक्ति का लाभ मिले। सहज सीधी कमर बैठें, लेकिन अकड़कर नहीं। मेरुदण्ड सीधा हो, ताकि प्रमाद न आए और सुषुम्ना नाड़ी-तंत्र का मार्ग प्रशस्त रहे। हाथ घुटनों पर रखें या गोद में। गोद में रखें तो बायें हाथ पर दायाँ हाथ रहे। ध्यान ऐसे स्थान पर करें जहाँ शान्ति, स्वच्छता और एकान्त हो। उस कक्ष में ध्यान करना अधिक श्रेष्ठ है, जिसका ध्यान के लिए नियमित उपयोग होता है। संतश्री ने कहा कि ध्यान में नियमित बैठक के लिए सूर्योदय का समय अधिक उपयुक्त है। सुबह के समय वातावरण में सहज शान्ति और सौम्यता रहती है। शुरुआत में ध्यान की बीस से तीस मिनट की बैठक हो। ज्यों-ज्यों तन-मन में शांति और सौम्यता आती जाएगी, बैठक का समय स्वतरू एक घंटे तक बढ़ता जाएगा। उन्होंने कहा कि अति-तनाव और अति थकान में ध्यान करने की बजाय कायोत्सर्ग अर्थात तन-मन के एक-एक अंग और मांसपेशी का रिलेक्सेशन करना अधिक श्रेष्ठ है। जब भी ध्यान में बैठें तो पहले शांत गति की कुछ गहरी साँस लें ताकि सम्पूर्ण शरीर में शुद्ध प्राणवायु की अतिरिक्त मात्रा पहुँचे। ध्यान में मन जब भी बाधित होता लगे तो दीर्घ श्वास के साथ ú का स्मरण करें।

संतप्रवर ने ध्यान की पूर्व भूमिका बताते हुए कहा कि आध्यात्मिक उत्कंठा के साथ ध्यान में बैठें। शांत गति की गहरी साँस लेना शुरू करें। प्रत्येक साँस का अनुभव करते हुए साँसों के समंदर में डूबते जाएँ। बोध रखें रू मैं सचेतन श्वास साधना कर रहा हूँ। आप लगातार अपनी सहज साँस में डूबते जाएँ, स्वतरू आप अपने अस्तित्व में उतरते जाएँगे। उन्होंने कहा कि हृदय-स्थल अथवा दोनों भौंहों के मध्य तिलक-प्रदेश पर ध्यान केन्द्रित करना विशेष सहयोगी है। हृदय शान्ति, समर्पण और प्रसन्ड्ढनता का दिव्य केन्द्र है जबकि अग्र मस्तिष्क संकल्प, विश्वास और चिन्तन-शक्ति का। ध्यान-कक्ष में प्रकाश मंद हो, परमात्मा के इष्ट स्वरूप और गुरु-मूर्ति का चित्र हो, ओम् जैसे मंत्र का प्रतीक भी लगा हो तो और भी श्रेष्ठ है। ध्यान रखें, भोजन सदा सात्त्विक करें। ताजा, हल्का और पोषक भोजन करना साधना के लिए उपयुक्त है और स्वास्थ्य के लिए भी। विचारों को सहज-स्वस्थ-सकारात्मक रखें। विपरीत निमित्त या वातावरण उपस्थित हो जाने पर भी मन की शांति को मूल्य दें और प्रत्येक परिस्थिति में प्रसन्न रहें।

दिव्य सत्संग का शुभारम्भ लाभार्थी परिवार श्री सुरेन्द्रकुमारजी, बसंतकुमारजी रांका, श्री छगनलालजी, श्री देवेन्द्रजी गेलेड़ा, श्री
अक्षयजी धारीवाल ने दीपप्रज्वलन कर किया।


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