slide3-bg



भारत की आत्मा है पर्युषण पवर्रू संत ललितप्रभ हजारों सत्संगप्रेमियों ने पर्युषण में क्रोध न करने का लिया संकल्प

बैंगलोर

18 Aug 2017

राष्ट्र-संत महोपाध्याय श्री ललितप्रभ सागर महाराज ने कहा कि पर्युषण पर्व भारत की आत्मा है। जैसे सारी नदियाँ सागर में आकर विलीन हो जाती है वैसे ही सारे पर्व पर्युषण में आकर समा जाते हैं क्योंकि सारे पर्व बाहर की दुनिया को रोशन करते हैं, पर यह हमारे अंतर्मन को रोशनी से भरने के लिए आता है। यह कोई दिये जलाने का, रंग उड़ाने का,
मिठाइयाँ बांटने का, लेन-देन करने का, सजने-संवरने का या मंदिरों को रोशन करने का नहीं भीतर का दीप जलाकर खुद को रोशन करने का पर्व है। यह मन को मांजने का, कषाय की होली जलाने का, कु्र रता से करुणा की ओर व दुश्मनी से मैत्री भाव की ओर बढने का पर्व है। यह तो जीवन की प्रयोगशाला में प्रवेश है जहाँ प्रेम, क्षमा और सरलता की साबुन लेकर मन में जम चुकी  वैर-प्रतिशोध और कटुता की गंदगी को धोने के प्रयोग किए जाते हैं।

 संत ललितप्रभ ने ये विचार शुक्रवार को मराठा हॉस्टल मैदान में पर्युषण पर्व प्रवचनमाला के प्रथम दिन रखे। वे पर्युषण पर्व का अंतर्रहस्य विषय पर श्रद्धालुओं को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि पयुषर्ण में तीर्थंकरों एवं महापुरुषों के जीवन चरित्र का श्रवण किया जाता है। महापुरुषों के चरित्र सुनने के लिए नहीं स्वयं के चरित्र को सुधारने के लिए होते हैं। जो मेरे गुरु, मेरे शास्त्र में सीमित हो जाता है वह कभी प्रभु तक नहीं पहुँच पाता है। शास्त्रों का निर्माण अखिल मानवजाति के लिए हुआ है। हम हर महापुरुष को व हर शास्त्र को सुनें, समझें, पढें व चिंतन कर अच्छी बातों को जीवन से जोडने की कोशिश करें। झुकाने का नहीं, झुकने का है पर्व-संतश्री ने कहा कि सम्पूर्ण धरती पर एक मात्र पर्युषण ही ऐसा पर्व है जो हाथ मिलाने या गले लगने का नहीं, पैरों में झुककर मांफी मांगने की प्रेरणा देता है। यह झुकाने का नहीं झुकने का पर्व है। जो पर्युषण के दिनों में भी दूसरों के प्रति प्रतिशोध रखता है वह गृहस्थ कहलाने के काबिल नहीं रहता। 364 दिन भले ही बड़े छोटों को प्रणाम करवाएं, पर संवत्सरी का 1 दिन मानवजाति को संदेश देता है कि सास बहू को, पिता बेटे को, अधिकारी कर्मचारी को और बड़े छोटों को प्रणाम कर हो चुके अनुचित व्यवहार की क्षमायाचना कर ले। व्यक्ति अन्न का त्याग भले ही न कर पाए, पर कम से कम इन दिनों में क्र ोध का त्याग करने का उपवास अवश्य करे। जो गलती करता है वह इंसान है और जो गलती पर गलती किए जाता है वह इंसान कहलाने के काबिल नहीं रहता और जो गलती होने पर क्षमा मांग लेता है वह भगवान तुल्य बन जाता है।

औरों की भूलों को भूल जाएं-संतश्री ने कहा कि औरों की भूलों को भूलने में ही हमारी भलाई है। जेब में आइना और कब्रिस्तान रखने की प्रेरणा देते हुए संतश्री ने कहा कि आइना इसलिए कि हम खुद की कमियों को देख सकें और कब्रिस्तान इसलिए कि हम दूसरों की कमियों, गलतियों, भूलों और कटू व्यवहारों को उसमें दफना सकें। जब भगवान श्रीकृष्ण शिशुपाल की 99 गलतियों
को माफ कर सकते हैं और भगवान महावीर कानों में कीले ठुकवा सकते हैं तो क्या हम किसी की 9 गलतियों को माफ करने का और किसी के दो कड़वे  शब्दों को सहन करने का बड़प्पन नहीं दिखा सकते हैं। जैसे साल बीतते ही पुराना केलेण्डर फैंक देते हैं वैसेही दिन बीतते ही हमें पुरानी बातों, वैर-विरोध की गांठों को फैंक देना चाहिए। पर्युषण में क्रोध न करने का लिया संकल्प-जब संतप्रवर ने पर्युषण के नौ दिनों में क्रोध न करने की तपस्या करने की प्रेरणा दी तो हजारों लोगों ने हाथ जोड़कर क्र ोध के उपवास करने के संकल्प लिए। दिव्य सत्संग का शुभारम्भ लाभार्थी परिवार श्री उम्मेदराजजी, अचलचंदजी, प्रवीण कुमार जी बाफना ने दीपप्रज्वलन कर किया।


Event Gallery


Our Lifestyle

Features