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भीतर के प्रदूषण को हटाने का पर्व है पर्युषण - संत चन्द्रप्रभ कल्पसूत्र व अंतगड़दशांग आगमों की कल निकाली जाएगी भव्य शोभायात्रा

बैंगलोर

19 Aug 2017

राष्ट्र-संत श्री चन्द्रप्रभ सागर महाराज ने कहा कि पर्युषण भीतर के प्रदूषण को हटाने का पर्व है। बाहर के प्रदूषण आती है और मन के प्रदूषण से परेशानियाँ आती है। इसलिए जितनी जरूरत बाहर के प्रदुषण को कम करने की है, उतनी ही जरूरत है भीतर के प्रदूषण को समाप्त करने की। संतप्रवर ने कहा कि पर्युषण हृदय शुद्धि और कषाय मुक्ति का पर्व है। 84 लाख जीवयोनियों से क्षमा मांगना सरल है, पर जिनसे हमारा मनमुटाव है या जिसका हमने और जिसने हमारा दिल दुखाया है उससे माफी मांगना सच्चा धर्म है। संवत्सरी का इंतजार करने की बजाय आज ही माफी मांगकर हिसाब चुकता कर लें। हम साल भर भले ही गरम रहें, पर अब तो नरम बन जाएं और मन में पलने वाली गांठों को दूर कर लें। जैसे गन्ने की गांठों में रस नहीं होता वैसे ही जो मन मेें दूसरों के प्रति गांठ पाले रखता है उसका जीवन भी नीरस बन जाता है। उन्होंने कहा कि गांठ बन जाने के बाद सामने वाले में केवल दोष ही नजर आते हैं। जिसे हम चाहते हैं उसकी हर बात हमें अच्छी लगती है क्यों न हम सबको चाहना शुरू कर दे ताकि हमें सबकी बातों अच्छी लगनी शुरु हो जाए। याद रखें, दूरियाँ जमीन की नहीं दिल की होती है। इसीलिए तो रूस दूर
होकर भी पास है और पाकिस्तान पास होकर भी भारत से दूर है।

संत चन्द्रप्रभ ने ये विचार शनिवार को मराठा हॉस्टल मैदान में प्रवचनमाला के दौरान रखे। वे पर्युषण पर्व में क्या करें, क्या न करें विषय पर श्रद्धालुओं को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि महावीर बनें, महावीर भक्त नहीं। केवल राम या महावीर का नाम रटने से हमारा कल्याण नहीं होगा। महावीर उस व्यक्ति को ज्यादा पसंद करते हैं जो उनका नाम लेने की बजाय उनके मार्ग पर चलने की कोशिश करता है। अगर भगवान का नाम लेने से सब कुछ मिल जाता तो महावीर महलों को छोड़कर जंगलों में नहीं जाते । अरिहंत का नाम लेने से हमें मन की शांति तो मिल सकती है, पर अरिहंत बनने के लिए तो हमें महावीर के मार्ग पर चलना होगा। उन्होंने कहा कि सिकन्दर द्वारा हजारों-हजार योद्धाओं को जीतना सरल है, पर खुद को जीतना मुश्किल। उसकी विजय परम विजय है जो दूसरों को जीतने की बजाय स्वयं क ो जीत लेता है। संसार नहीं, संन्यासी बनकर जाएं-संसार से संन्यासी बनकर जाने की प्रेरणा देते हुए संतश्री ने कहा कि संसार में जन्म लेना हमारी नियति है, पर
परमात्मा से इतनी प्रार्थना जरूर करें कि जब यह शरीर छूटे तो इस शरीर पर संसारी की बजाय संन्यासी का वेश जरूर हो। व्यक्ति जब भी मुक्त होता है, संसार से उबरकर ही मुक्त होता है। संसार में चाहे जितना रहा जाय और भोगा जाय, मन अतृप्त ही रहता है इसलिए संसारी बनकर भले ही जिओ, पर एक दिन ही सही, संत जीवन अंगीकार करने का भाव अवश्य रखो। इसी में जीवन की धन्यता है।

भजन सुनाया-जब संतप्रवर ने खुद जिओ सबको जीने दो, यही मंत्र अपनाना है। इसी मंत्र से विश्व-शांति का, घर-घर दीप जलाना है... भजन सुनाया तो श्रद्धालु आत्मविभोर हो उठे। शोभायात्रा निकलेगी-दादावाड़ी ट्रस्ट के अध्यक्ष महेन्द्र जी रांका ने बताया कि रविवार को प्रातः 8.45 बजे कल्पसूत्र और अंतगड़दशांग आगमों की भव्य शोभायात्रा निक ाली जाएगी जो दादावाड़ी से रवाना होकर मराठा हॉस्टल मैदान पहुँचेगी जहाँ लाभार्थी पन्नालालजी, पुखराज जी कवाड़ परिवार द्वारा प्रवचन के दौरान वांचन किए जाने वाले शास्त्रों को राष्ट्र-संतों के mकरकमलों में समर्पित किया जाएगा। दिव्य सत्संग का शुभारम्भ लाभार्थी परिवार समरथमलजी, सोनाजी, भरतजी रांका, नवरतनमल जी बंसल, विनोद जी मांडोत, संतोष जी कोठारी राजीव-आरती जैन ने दीपप्रज्वलन कर किया।


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