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व्यवहार सुधारें, तो रिश्तें सुधरेंगे- राष्ट्र-संत ललितप्रभ शनिवार को होगा क्रोध से छुटकारा पाने के शर्तिया उपाय

बैंगलुरु

07 Jul 2017

राष्ट्र-संत श्री ललितप्रभ महाराज ने कहा कि हमारा व्यवहार हमारे व्यक्ड्ढितत्व, स्वभाव, चरित्र और कुल का परिचायक है।
इन्हें बेहतर बनाने के लिए हम अपने व्यवहार को बेहतर बनाएँ। कई लोगों का व्यवहार शालीनतम होता है वहीं कुछ लोग अशालीन होते हैं। महान लोग शत्रु के साथ भी श्रेष्ठ व्यवहार करते हैं वहीं ओछे लोग मित्र के साथ भी छल भरा व्यवहार करते हैं। हम अपने व्यवहार में बदलाव लाकर जिंदगी को बेहतर बना सकते हैं। श्री ललितप्रभ महाराज चामराज पेट स्थित मराठा हॉस्टल मैदान में आयोजित सतावन दिवसीय प्रवचनमाला के अंतर्गत छठे दिन विनम्र व्यवहार का जादुई चमत्कार विषय पर प्रवचन दे रहे थे। उन्होंने कहा कि हमारा एक शालीन व्यवहार हमें किसी के दिल में उतारता है वहीं हमारा एक गलत व्यवहार हमें किसी के दिल से उतारता है। हम ऐसा व्यवहार करें जो हमें किसी के दिल से नहीं, बल्कि किसी के दिल में उतारे। चेहरे का रंग हमें प्रकृति देती है इसलिए चेहरे के रंग को सुन्दर बनाना हमारे हाथ में नहीं है, पर जीवन जीने का ढंग हमारे हाथ में होता है। हम इसे सुधार कर चमत्कारी व्यक्तित्व के मालिक बन सकते हैं।

संतप्रवर ने प्ररेणा देते हुए कहा कि हमें अपने बच्ड्ढचों एवं कर्मचारियों के साथ भी सम्मान भरा व्यवहार करना चाहिए। उनको भी आप कहने का बड़प्ड्ढपन दिखाइए। औरों से सम्मान पाने के लिए हमें दूसरों के प्रति सम्मान भरा बर्ताव करना होगा। अपने व्यवहार को खुशनुमा और आकर्षक बनाने की प्ररेणा देते हुए राष्ट्र-संत ने कहा कि केवल सुन्दर जूते एवं कपड़ों से दूसरों की आँखों को लुभाया जा सकता है, पर आत्मा में जगह नहीं बनाई जा सकती। आपका चरित्र और व्यवहार ही दूसरों के दिलों में आपके लिए जगह बनाता है। उन्होंने कहा कि खाली नहीं अपितु खुले दिमाग के मालिक बनिए। खाली दिमाग शैतान का घर होता है वहीं खुला दिमाग भगवान का मंदिर होता है। संतप्रवर ने कहा कि प्रभावी शख्सियत के मालिक बनिए, कार्य की जिम्मेदारी स्वीकार कीजिए, अच्छा होने पर श्रेय लीजिए, पर बुरा हो जाने पर उसकी जिम्मेदारी स्वीकार करने को तैयार रहिए। अगर किसी की तारीफ नहीं कर सकते, तो दूसरों के खिलाफ टिप्पणी मत कीजिए।

राष्ट्र-संत श्री ललितप्रभ ने कहा कि शब्दों का प्रयोग सावधानी से कीजिए। हर बात सोचने की तो होती है, पर कहने की नहीं। याद रखिए, दुनिया में सबसे तीखा बाण कठोर वचनों का होता है। द्रोपदी के व्यंग्य भरे वचनों ने महाभारत को पैदा कर दिया था। बुद्धिमान व्यक्ति सोच कर बोलता है वहीं बेवकूफ बोलने के बाद सोचता ही रहता है। हमें मृदुभाषी बनना चाहिए। साधारण
व्यक्ति भी इस गुण से महान बन सकता है। जैसे माँ के पेट से निकला बच्ड्ढचा वापस भीतर नहीं जा सकता, वैसे ही मुँह से निकले शब्द वापस लौटाए नहीं जा सकते। संतप्रवर ने कहा कि सदा दयालुता और मुस्कान से भरे रहिए, चिड़चिड़े इंसान
के साथ कोई नहीं रहना चाहता। अच्छे व्यवहार वाले व्यक्ड्ढित को पड़ौसी भी पसंद करते हैं वहीं टेढ़े व्यवहार का व्यक्ति घरवालों के दिल में भी जगह नहीं बना पाता है। समारोह शुभारंभ बैंगलोर के पुखराज कवाड़, पृथ्वीराज श्रीश्रीमाल, गजेन्द्र
सांकलेचा, उदयपुर के भीमनदास, भीलवाड़ा के सुरेन्द्रसिंह सुराणा बाबुलाल ललवानी, अनिल भड़कतिया, जयपुर के प्रकाश दफ्तरी एवं इंदौर के किशोर बिंदल ने दीपप्रज्वलन कर किया। दीपप्रज्वलन से पूर्व सभी लोगों ने सामूहिकरूप
से नवकार मंत्र का पारायण किया।


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